आज भी खरे हैं तालाब/नींव से शिखर तक

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आज भी खरे हैं तालाब  (2004) 
द्वारा अनुपम मिश्र
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------नींव से शिखर तक------


आज अनपूछी ग्यारस है। देव उठ गए हैं। अब अच्छे-अच्छे काम करने के लिए किसी से कुछ पूछने की, मुहूर्त दिखवाने की ज़रूरत नहीं है। फिर भी सब लोग मिल-जुल रहे हैं, सब से पूछ रहे हैं। एक नया तालाब जो बनने वाला है।...

पाठकों को लगेगा कि अब उन्हें एक तालाब के बनने का - पाल बनने से लेकर पानी भरने तक का पूरा विवरण मिलने वाला है। हम खुद ऐसा विवरण खोजते रहे पर हमें वह कहीं मिल नहीं पाया। जहां सदियों से तालाब बनते रहे हैं, हज़ारों की संख्या में बने हैं- वहां तालाब बनाने का पूरा विवरण न होना शुरु में अटपटा लग सकता है, पर यही सबसे सहज स्थिति है। 'तालाब कैसे बनाएं' के बदले चारों तरफ 'तालाब ऐसे बनाएं' का चलन चलता था। फिर भी छोटे-छोटे टुकड़े जोड़े तो तालाब बनाने का एक सुन्दर न सही, कामचलाऊ चित्र तो सामने आ ही सकता है।

...अनपूछी ग्यारस है। अब क्या पूछना है। सारी बातचीत तो पहले हो ही चुकी है। तालाब की जगह भी तय हो चुकी है। तय करने वालों की आंखों में न जाने कितनी बरसातें उतर चुकी हैं। इसलिए वहां ऐसे सवाल नहीं उठते कि पानी कहां से आता है, कितना पानी आता है, उसका कितना भाग कहां पर रोका जा सकता है। ये सवाल नहीं हैं, बातें हैं सीधी-सादी, उनकी हथेलियों पर रखी। इन्हीं में से कुछ आंखों ने इससे पहले भी कई तालाब खोदे हैं। और इन्हीं में से कुछ आंखें ऐसी हैं जो पीढ़ियों से यही काम करती आ रही हैं।

यों तो दसों दिशाएं खुली हैं, तालाब बनाने के लिए, फिर भी जगह [ १३ ]का चुनाव करते समय कई बातों का ध्यान रखा गया है। गोचर की तरफ है यह जगह। ढाल है, निचला क्षेत्र है। जहां से पानी आएगा, वहां की ज़मीन मुरुम वाली है। उस तरफ शौच आदि के लिए भी लोग नहीं जाते हैं। मरे जानवरों की खाल वगैरह निकालने की जगह यानी हड़वाड़ा भी इस तरफ नहीं है।

अभ्यास से अभ्यास बढ़ता है। अभ्यस्त आंखें बातचीत में सुनी-चुनी गई जगह को एक बार देख भी लेती हैं। यहां पहुंच कर आगौर, जहां से पानी आएगा, उसकी साफ-सफाई, सुरक्षा को पक्का कर लिया जाता है। आगर, जहां पानी आएगा, उसका स्वभाव परख लिया जाता है। पाल कितनी ऊंची होगी, कितनी चौड़ी होगी, कहां से कहां तक बंधेगी तथा तालाब में पानी पूरा भरने पर उसे बचाने के लिए कहां पर अपरा बनेगी, इसका भी अंदाज़ ले लिया गया है।

सब लोग इकट्ठे हो गए हैं। अब देर काहे की। चमचमाती थाली सजी है। सूरज की किरणें उसे और चमका रही हैं। जल से पूर्ण लोटा है। रोली, मौली, हल्दी, अक्षत के साथ रखा है लाल मिट्टी का एक पवित्र डला। भूमि और जल की स्तुति के श्लोक धीरे-धीरे लहरों में बदल रहे हैं।

जहां सदियों से तालाब बनते रहे हैं,
हजारों की संख्या में बने हैं-वहाँ तालाब बनाने का
पूरा विवरण न होना शुरू में अटपटा लग सकता है,
पर यही सबसे सहज स्थिति है। तालाब कैसे बनाए के बदले
चारों तरफ तलब ऐसे बनाए का चलन था।

वरुण देवता का स्मरण है। तालाब कहीं भी खुद रहा हो, देश के एक कोने से दूसरे कोने तक की नदियों को पुकारा जा रहा है। श्लोकों की लहरें थमती हैं, मिट्टी में फावड़ों के टकराने की खड़खड़ाहट से। पांच लोग पांच परात मिट्टी खोदते हैं, दस हाथ परातों को उठाकर पाल पर डालते हैं। यहीं बंधेगी पाल। गुड़ बंट जाता है। महूरत साध लिया है। आंखों में बसा तालाब का पूरा चित्र फावड़े से निशान लगाकर ज़मीन पर उतार लिया गया है। कहां से मिट्टी निकलेगी और कहां-कहां डाली जाएगी, पाल से कितनी दूरी पर खुदाई होगी ताकि पाल के ठीक नीचे इतनी गहराई न हो जाए कि पाल पानी के दबाव से कमज़ोर होने लगे।...

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आज भी खरे हैं तालाब
 
[ १४ ]अनपूछी ग्यारस को इतना तो हो ही जाता था। लेकिन किसी कारण उस दिन काम शुरु नहीं हो पाए तो फिर मुहूर्त पूछा जाता था, नहीं तो खुद निकाला जाता था। गांव और शहर में घर-घर में मिलने वाले पंचांग और कई बातों के साथ कुआ, बावड़ी और तालाब बनाने का मुहूर्त आज भी समझाते हैं : "हस्त, अनुराधा, तीनों उत्तरा, शतभिषा, मघा, रोहिणी, पुष्य, मृगशिरा, नक्षत्रों में चंद्रवार, बुधवार, बृहस्पतिवार तथा शुक्रवार को कार्य प्रारम्भ करें। परन्तु तिथि चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी का त्याग करें। शुभ लग्नों में गुरु और बुध बली हो, पाप ग्रह निर्बल हो, शुक्रवार का चन्द्रमा जलचर राशिगत लग्न अथवा चतुर्थ हो, गुरु, शुक्र अस्त न हो, भद्रा न हो तो खुदवाना शुभ है।"

आज हममें से ज़्यादा लोगों को इस विवरण में से दिनों के कुछ नाम भर समझ में आ पाएंगे, पर आज भी समाज के एक बड़े भाग के मन की घड़ी इसी घड़ी से मिलती है। कुछ पहले तक तो पूरा समाज इसी घड़ी से चलता था।

... घड़ी साध ली गई है। लोग वापस लौट रहे हैं। अब एक दो दिन बाद जब भी सबको सुविधा होगी, फिर से काम शुरु होगा।

अभ्यस्त निगाहें इस बीच पलक नहीं झपकतीं। कितना बड़ा है तालाब, काम कितना है, कितने लोग लगेंगे, कितने औज़ार, कितने मन मिट्टी खुदेगी, पाल पर कैसे डलेगी मिट्टी? तसलों से, बहगी, लग्गे से ढोई जाएगी या गधों की भी ज़रूरत पड़ेगी? प्रश्न लहरों की तरह उठते हैं। कितना काम कच्चा है, मिट्टी का है, कितना है पक्का, चूने का, पत्थर का। मिट्टी का कच्चा काम बिलकुल पक्का करना है और पत्थर, चूने का पक्का काम कच्चा न रह जाए। प्रश्नों की लहरें उठती हैं और अभ्यस्त मन की गहराई में शांत होती जाती हैं। सैंकड़ों मन मिट्टी का बेहद वज़नी काम है। बहते पानी को रुकने के लिए मनाना है। पानी से, हां आग से खेलना है।

डुगडुगी बजती है। गांव तालाब की जगह पर जमा होता है। तालाब पर काम अमानी में चलेगा। अमानी यानी सब लोग एक साथ काम पर आएंगे, एक साथ वापस घर लौटेंगे।

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आज भी खरे है

तालाब

[ १५ ]सैंकड़ों हाथ मिट्टी काटते हैं। सैंकड़ों हाथ पाल पर मिट्टी डालते हैं। धीरे-धीरे पहला आसार पूरा होता है, एक स्तर उभर कर दिखता है। फिर उसकी दबाई शुरु होती है। दबाने का काम नंदी कर रहे हैं। चार नुकीले खुरों पर बैल का पूरा वज़न पड़ता है। पहला आसार पूरा हुआ तो उस पर मिट्टी की दूसरी तह डलनी शुरु होती है। हरेक आसार पर पानी सींचते हैं, बैल चलाते हैं। सैंकड़ों हाथ तत्परता से चलते रहते हैं, आसार बहुत धीरज के साथ धीरे-धीरे उठते जाते हैं।

अब तक जो कुदाल की एक अस्पष्ट रेखा थी, अब वह मिट्टी की पट्टी बन गई है। कहीं यह बिलकुल सीधी है तो कहीं यह बल खा

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सिमट-सिमट जल भरहिं तलावा
[ १६ ]रही है, आगौर से आने वाला पानी जहां पाल पर ज़ोरदार बल आजमा सकता है, वहीं पर पाल में भी बल दिया गया है। इसे 'कोहनी' भी कहते हैं। पाल यहां ठीक हमारी कोहनी की तरह मुड़ जाती है।

जगह गांव के पास ही है तो भोजन करने लोग घर जाते हैं। जगह दूर हुई तो भोजन भी वहीं पर। पर पूरे दिन गुड़ मिला मीठा पानी सबको वहीं मिलता है। पानी का काम प्रेम का काम है, पुण्य का काम है, इसमें अमृत जैसा मीठा पानी ही पिलाना है, तभी अमृत जैसा सरोवर बनेगा।

इस अमृतसर की रक्षा करेगी पाल। वह तालाब की पालक है। पाल नीचे कितनी चौड़ी होगी, कितनी ऊपर उठेगी और ऊपर की चौड़ाई कितनी होगी- ऐसे प्रश्न गणित या विज्ञान का बोझ नहीं बढ़ाते। अभ्यस्त आंखों के सहज गणित को कोई नापना ही चाहे तो नींव की चौड़ाई से ऊंचाई होगी आधी और पूरी बन जाने पर ऊपर की चौड़ाई कुल ऊंचाई से आधी होगी।

मिट्टी का कच्चा काम पूरा हो रहा है। अब पक्के काम की बारी है। चुनकरों ने चूने को बुझा लिया है। गरट लग गई है। अब गारा तैयार हो रहा है। सिलावट पत्थर की टकाई में व्यस्त हो गए हैं। रक्षा करने वाली पाल की भी रक्षा करने के लिए नेष्टा बनाया जाएगा। नेष्टा यानी वह जगह जहां से तालाब का अतिरिक्त पानी पाल को नुकसान पहुंचाए बिना बह जाएगा। कभी यह शब्द 'निसृष्ट' या 'निस्तरण" या 'निस्तार' रहा होगा। तालाब बनाने वालों की जीभ से कटते-कटते यह घिस कर 'नेष्टा" के रूप में इतना मज़बूत हो गया कि पिछले कुछ सैंकड़ों वर्षों से इसकी एक भी मात्रा टूट नहीं पाई है।

नेष्टा पाल की ऊंचाई से थोड़ा नीचा होगा, तभी तो पाल को तोड़ने से पहले ही पानी को बहा सकेगा। ज़मीन से इसकी ऊंचाई, पाल की ऊंचाई के अनुपात में तय होगी। अनुपात होगा कोई १० और ७ हाथ का।

पाल और नेष्टा का काम पूरा हुआ और इस तरह बन गया तालाब का आगर। आगौर का सारा पानी आगर में सिमट कर आएगा। अभ्यस्त अांखें एक बार फिर आगौर और आगर को तौल कर देख लेती हैं। आगर की क्षमता आगौर से आने वाले पानी से कहीं अधिक तो नहीं, कम तो नहीं। उत्तर हां में नहीं आता।

आखिरी बार डुगडुगी पिट रही है। काम तो पूरा हो गया है पर आज फिर सभी लोग इकट्ठे होंगे, तालाब की पाल पर। अनपूछी ग्यारस को


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आज भी खरे हैं तालाब
 
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जो संकल्प लिया था, वह आज पूरा हुआ है। बस आगौर में स्तम्भ लगना और पाल पर घटोइया देवता की प्राण प्रतिष्ठा होना बाकी है। आगर के स्तम्भ पर गणेशजी बिराजे हैं और नीचे हैं सर्पराज। घटोइया बाबा घाट पर बैठ कर पूरे तालाब की रक्षा करेंगे।

आज सबका भोजन होगा। सुन्दर मज़बूत पाल से घिरा तालाब दूर से एक बड़ी थाली की तरह ही लग रहा है। जिन अनाम लोगों ने इसे बनाया है, आज वे प्रसाद बांट कर इसे एक सुन्दर-सा नाम भी देंगे। और यह नाम किसी कागज पर नहीं लोगों के मन पर लिखा जाएगा।

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चुनकरों के काम को पक्का करती गरट

लेकिन नाम के साथ काम खत्म नहीं हो जाता है। जैसे ही हथिया नक्षत्र उगेगा, पानी का पहला झला गिरेगा, सब लोग फिर तालाब पर जमा होंगे। अभ्यस्त आंखें आज ही तो कसौटी पर चढ़ेगी। लोग कुदाल, फावड़े, बांस और लाठी लेकर पाल पर घूम रहे हैं। खूब जुगत से एक-एक हैं आसार उठी पाल भी पहले झले का पानी पिए बिना मज़बूत नहीं होगी। हर कहीं से पानी धंस सकता है। दरारें पड़ सकती हैं। चूहों के बिल बनने में भी कितनी देरी लगती है भला! पाल पर चलते हुए लोग बांसों से, लाठियों से इन छेदों को दबा-दबा कर भर रहे हैं।

कल जिस तरह पाल धीरे-धीरे उठ रही थी, आज उसी तरह आगर में पानी उठ रहा है। आज वह पूरे आगौर से सिमट-सिमट कर आ रहा है:

सिमट-सिमट जल भरहि तलावा।
जिमी सदगुण सज्जन पहिं आवा॥

अनाम हाथों की मनुहार पानी ने स्वीकार कर ली है।

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