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आदर्श हिंदू १/२३ बच गई

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आदर्श हिंदू। पहला भाग।  (1922) 
द्वारा मेहता लज्जाराम शर्मा
[ २३१ ]
 

प्रकरण―२३

बच गई।

गत प्रकरण की घटना से पाठक पाठिकाओं को निश्चय हो गया होगा कि माता का दुलार बालकों का जीवन बिगाड़ देता है। सुखदा की माता ने इसका कभी मन मैला न होने पावे इस विचार से अपनी हथेली थुँकवाया, उसने लाड़ चाव के लिये बेटी को माथे चढ़ा लिया और सुखदा के ऊधभ करने पर, उसके ऐबों पर और उसकी बुराइयों पर जब उसका पिता नाराज होता, मारने लगता अथवा फटकारता, धम- काता तब यह अपनी इकलौती बेटी का पक्ष करके पति से लड़ती। बस इसी का संक्षेप से वह परिणाम हुआ जो गत प्रकरण में लिखा गया है। हुआ वही जो वृंदावनविहारी ने अपनी गृहिणी से कह दिया था। बेटी की ढिठाई, उसकी बुराई, उसकी जिह, उसका बिगाड़, उसका चिड़चिड़ापन और उसका लड़ाकापन देख कर उन्होंने अपनी घरवाली से कह दिया था कि "तू इसे माथे चढ़ाती है तो चढ़ा। तू लाड़ में आकर मेरा कहना नहीं मानती है तो न मान। यह तेरे ही मुँह पर न थूकै तो मेरा नाम फेर देना। जो रहेगा सो देखेगा। मुझे क्या! मैं तो कुछ वर्षों का मेहमान हूँ।"

सुखदा की माता का नाम प्रेमदा था किंतु प्रेम उसके पास [ २३२ ]होकर नहीं फटकने पाता था। जब से वह घर की मालिकिन बन कर इनके पास घर में आई उसने पति की नस नस में तेल डाल दिया। "बोवै पेड़ बबूर को आम कहाँ ते होय।" इस लोकोक्ति के अनुसार ही उसकी बेटी निकली। माता से भी बेटी बढ़ कर। माता लड़ने झगड़ने पर भी घर से बाहर नहीं निकलती थी। पति को सताने पर भी किसी पर प्रगट नहीं होने देती थी कि "अपने आदमी से मेरी लड़ाई है।" बेटी उससे दो कदम आगे बढ़ निकली। जब बेटे बेटी मा बाप के गुण दोषों की बानगी हैं तब प्रेमदा की प्रशंसा में पवे रंगने की आवश्यकता नहीं। इसीलिये बड़े लोग कह गए हैं कि- "माता जैसा पूत और काता जैसा सूत।" मेरी समझ में माता के गुण दोषों का असर पुत्र की अपेक्षा लड़की पर अधिक होता है और इसीका नमूना कर्कशा प्रेमदा की महा कर्कशा सुखदा है।

खैर! जो कुछ होना था सो हो चुका। पति के चले जाने बाद, अपने घर की सारी पूँजी पसारा लुट जाने के अनंतर अब लाड़ली बेटी ने बचनवाणों का प्रहार करके प्रेमदा का हृदय बेध डाला तब उसकी आँखें खुली। सचमुच ही कष्ट अंतःकरण का जुल्लाब है। जैसे कुटकी जैसी कड़ुवी दवा लेने में चाहे रोगी को हजार दुःख हो किंतु शरीर के सारे विकार निकल कर उसकी फूल सी देह निकल आती है उसी तरह दुःख पड़ने से आदमी को अकल आती है। बुरे से भी [ २३३ ]बुरे स्वभाव के आदमियों को, भ्रष्ट से भी भ्रष्ट मनुष्यों को, नीच से नीच नर नारियों को कष्ट पाने पर अपने किए के लिये पछताते हुए, गिरने के बाद सँभलते हुए देखा गया है। बुढ़ापे में आकर घोर नास्तिक से आस्तिक बन जाते हैं। शराब, जुआ, व्यभिचार, चोरी और इस तरह के दुनिया में जितने ऐब हैं वे कष्ट पाने पर छूट सकते हैं। विपत्ति पड़ने पर अनेकों ने इन्हें छोड़ दिया है। दुनिया के इतिहास में इसके एक दो, नहीं हजारों उदाहरण हैं। बस यही दशा प्रेमदा की हुई। सुखदा के विषय में पति के कहे हुए बचन मानों उसकी लाँखों के सामने खड़े होकर उसे ताना देने लगे। अवश्य ही वह अपने कुकर्मों पर अब बहुत पछताई किंतु "अब पछताए होत का जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।"

इस तरह परमेश्वर ने प्रेमदा को सुबुद्धि दी तो दी किंतु अभी सुखदा का मिजाज ठिकाने नहीं आया। माता से कल एक हलकी सी झपट हो जाने के बाद प्रेमदा को रोती देख कर सुखदा को चाहिए था कि वह माता से क्षमा माँग लेती किंतु माफी माँगने के बदले उसने उसे अधिक अधिक चिढ़ाया, उसने माता से बोल चाल बंद कर दी और एक घर में रहने पर भी दोनों अपने अपने मुँह फुलाए रहने लगीं। अवश्य उसका ऐसा बर्ताव देख कर माता यदि कुढ़ती है तो उसे कुढ़ने दीजिए। उसका दिन अपनी अड़ोसिन पड़ोंसिनों से हँसने बोलने में, अपनी हमजोलियों से ठट्ठे दिल्लगी करने में, [ २३४ ]अपने बनाव सिंगार में और कभी कभी मथुरा से घंटों तक घुसपुस घुसपुस बातें करने में बीतता है। उस दिन की बात चीत पूरी सुन लेने पर भी, माता के आते ही इन दोनों की बातें बंद हो जाने पर भी अब किसी तरह से प्रेमदा को पता लग गया है कि यह हरामजादी मथुरा सुखदा का सत्यानाश करके दोनों कुलों की लाज धूल में मिला देना चाहती है। बस प्रेमदा को जितना दुःख पति परमेश्वर के वियोग का नहीं है, जितना कष्ट धन लुट कर दारिद्री हो जाने का नहीं है, उतना सुखदा की ओर से है, क्योंकि संसार का यह नियम ही है कि आदमी गए हुए की अपेक्षा होनहार से अधिक डरता है। इस कारण कहना पड़ता है कि सुखदा केवल अपनी ससुरालवालों के लिये ही दुखदा न निकली बरन अपनी प्यारी माता के लिये भी, उस जननी के लिये भी, जिसने बेटी का मन मैला न करने के लिये अपनी हथेली पर थुकाया था, दुखदा बन गई।

अब प्रेमदा दिन रात इसी चिंता में है कि किसी न किसी तरह सुखदा को उसकी ससुरालवाले लिवा ले जाँय तो मैं इसी घोर विपत्ति के समय भी मेहनत मजदूरी से अपना पेट पाल लूँ और ऐसे अपने घटते दिन पूरे कर लूँ। जब आदमी पर आपदा पर आपदा पड़ती है तब मौत माँगने पर भी कोसो दूर भाग जाती है। इसकी कई बार जहर नाकर मर मिटने की इच्छा होती है किंतु प्रथम तो मरने [ २३५ ]का हियाव नहीं और फिर बेटी का ढंग इसका हाथ पकड़ कर रोक देता है कि तेरे मरते ही निरंकुश होकर यह दोनों कुलों की लाज धूल में मिला देगी, क्योंकि जरा सा मेरा काँटा है सो भी निकल जायगा।

जिस मनुष्य पर विपत्ति पड़ती है उसकी रक्षा करने के लिये परमेश्वर उसे धैर्य भी दे देता है। इतना दुःख पड़ने पर भी वह घबड़ाई नहीं है। वह विपत्ति की चक्की में पिस कर चाहे सूखी जाती है किंतु रातों की नींद खोने पर भी वह दिन रात इसी उधेड़ बुन में लगी रहती है कि क्योंकर सुखदा की रक्षा की जाय। वह कई बार सोचती है कि "मथुरा की चोटी पकड़ कर घर से निकाल दूँ, क्योंकि न रहेगा बाँस और न बजैगी बाँसुरी।" किंतु वह अब रोग को असाध्य समझने लगी थी। उसे डर था कि मथुरा को निकालने के उद्योग में कहीं मैं ही कान पकड़ कर घर से न निकाल दी जाऊँ। घर में कुछ न बचने पर भी जो कुछ बचा खुचा था उसे चुरा चुरा कर सुखदा मथुरा को दे दिया करती थी और जो कुछ पाती उसे बेंच खोंच कर दोनों खाने पीने में उड़ा दिया करती थीं। प्रेमदा ने मथुरा को पकड़ कर चोरी के इल- जाम में फँसा देना चाहा परंतु घर की फजीहत होने के डर से उसकी ऐसा काम करने की हिम्मत न पड़ी। उसने सारे समाचार लिखकर दामाद को इस विपत्ति से उद्धार पाने के लिये बुलाना चाहा किंतु वह पढ़ी लिखी नहीं, दूसरे को [ २३६ ]अपना भेद देने में बदनामी और कांतानाथ यात्रा में। बस इसलिये यह मन मार कर रह गई।

जो सुख के समय भूल कर भी भगवान को नहीं भजते हैं उनको विपत्ति ईश्वर के चरण कमलों की ओर ढकेल देती है। इस घोर कष्ट के समय, विपत्ति सागर में डूबने की बिरियाँ द्रोपदी की लाज बचानेवाले, गजेंद्र की रक्षा करनेवाले और बड़े बड़े महापापियो का उद्धार करनेवाले परमदयालु परमात्मा की उसे याद आई। याद आते ही उसने―

"हरि जू मेरो मन हठ न तजै। टेक।
निसि दिन नाथ देऊँ सिख बहु बिध करत स्वभाव निजै।
ज्यों युवती अनुभवति प्रसव अति दारुण दुख उपजै॥
ह्वै अनुकूल बिसारि शूल शठ पुनि खल पतिहि भजै।
लोलुप भ्रमत गृह पशु ज्यों जहँ तहँ सिर पदवाण बजै॥
तदपि अहम बिचरत तेंहि मारण कबहुँ न मूढ़ लजै।
हौं हायो करि यत्न विविध विध अतिशय प्रबल आजै॥
तुलसिदास वश होइ तबै जब प्रेरक प्रभु बरजै।"

यह पद गाया। गाते ही इसे बेटी की फटकार देने का साहस हुआ। अब इसने पक्का मनसूबा कर लिया कि "चाहे जान ही क्यों न जाती रहे पर एक बार लड़की को नर्मी गर्मी से समझाना और अब जब कभी मथुरा आवे तो उसे चोटी पकड़ कर निकाल देना। मेरा घर है। मैं घर की मालकिन हूँ। जिस पर मेरा मन न माने उसे भले घर की बहू बेटी के पास [ २३७ ]न आने दूँ तो मेरा अधिकार है।" जिस समय प्रेमदा इस तरह का निश्चय कर चुकी थी होनहार से उसी समय मथुरा दुपट्टे में कुछ मिठाई, एक चिट्ठी और दवा की कोई पुड़िया छिपाए वहाँ आ पहुँची। सुखदा के पास पहुँच कर जिस समय उसकी आवभागत होने लगी प्रेमदा घसमसाती हुई दाल भात में मूसलचंद की तरह उनमें जा घुसी। उसकी उमर ढल जाने पर भी विपत्ति पर विपत्ति पड़ने पर भी उसकी पुरानी हड्डियों में अभी तक ताकत थी। उसके एक ही झटके से मिठाई धरती पर बिखर गई और लपका झपकी में पव और पुड़िया उसके हाथ आ गई। जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तब क्या जान सकती थी कि चिट्ठी में क्या है किंतु पुड़िया खोल कर देखते ही उसके तन मन में आग लग गई। वह कड़क कर बोली―

"क्यों री राँड! हरामजादी! मुझे मारने के लिये यह संखिया लाई है? निकल मेरे घर में से। खबरदार फिर कभी मेरी चौखट पर पैर रक्खा तो तेरे पैर काट डालूँगी। राँड मेरी भोली बेटी को बिगाड़ने आई है।" अपनी जननी के मुख से ऐसे बचन सुनते ही लज्जित होने की जगह सुखदा आग बबूला हो गई। उसने पत्र और पुड़िया मा के हाथ में से छीनते हुए "आवेगी हमारे पास। बीच खेत आवेगी। देखूँ तो इसे रोकनेवाली कौन है?" कह कर खूब ही गालियों की पक्ष पुष्पांजलि से अपनी जन्मदावी जननी का पूजन किया। माता ने क्रोध को आवेश में जब [ २३८ ]गालियों का बदला गालियों से चुकाना चाहा तब उसने एक एक की दस दस सुनाईं। वह बोली―

"राँड डायन! तू ही मेरे बच्चे को खा गई। तेरे ही दुःख से मेरा बाप भाग गया और अब तू मुझे भी दुःख दे दे कर मारना चाहती है तो ले मैं खुद ही मरती हूँ। अब मुझे मार कर राजी होना। मैं मर जाऊँगी तब ही तू सुख की नींद सोवेगी।" यह कहते हुए ज्यों ही सुखदा उस पुड़िया को खोल कर अपने मुँह में डालने लगी अकस्मात् किसी आदमी ने अपने ब्रज से हाथों से इसे पकड़ा। वह एक हाथ से इसकी गर्दन और दूसरे हाथ से इसके दोनो हाथ पकड़ कर जकड़ते हुए कड़क कर बोला―

"ले राँड! तू मरना चाहती है तो मैं ही तेरा काम तमाम किए देता हूँ।"

"हैं हैं! मरी! मारो मत! मैं तुम्हारी गौ हूँ! हाथ जोड़ती हूँ। हा हा खाती हूँ। हाय रे मैं मरी। अजी मारो मत" कह कह कर, चिल्ला चिल्ला कर जब वह रोने लगी तब उस आने वाले ने उसका गला छोड़ कर और दवा हाथ में छीन कर अपनी जेब में डालते हुए मथुरा की अपने मालदार बूटों से खूद ही खबर ली। उसकी सहेली की तरह सुखदा को भी जब वह खूब पीट चुका तब उसने मथुरा को चोटी पकड़ कर घसी- टते घसीटरो घर की चौखट तक पहुँचाया और उसे सौगंद खिया कर छोड़ा कि अब इस घर में सुखदा के पास कभी [ २३९ ]न आऊंगी। इसके बाद उसने सुखदा को भी खूब ही मिहीं मार से जिससे उसकी जान का खतरा न हो जिससे उसके कहीं खून न निकलने पावे इस तरह खूब ही मारा और इस तरह मारते मारते उसका भूत निकाल कर तब वह बोला―

"अब कहो मा जी मुझको क्या आज्ञा है? इस हरामजादी के लिये मैं अपनी यात्रा छोड़ कर दौड़ा आया हूँ!"

"लाला! आज्ञा क्या मेरी विनती यही है कि बुरी और भली जैसी है तुम्हारी है। तुम इसे अपने घर ले जाओ। मैं इसे एक पल भी अब अपने पास न रक्खूँगी। मैं इससे तंग आगई। मैंने उनका (अपने पति के लिये) कहना न मान कर फल पा लिया।"

"मा, मैं तेरी गौ हूँ। तेरे हाहा! खाती हूँ। मुझे इनके साथ न भेज, नहीं तो यह किसी दिन मेरी जान ले डालेंगे। हाय मरी! मैं किससे कहूँ! कोई सुननेवाला भी नहीं!"

"नहीं मैं इसे हरगिज न ले जाऊँगा। अब तक इसके लिये निश्चय न कर लूँ कि यह बिगड़ी नहीं है तब तक इसे घर में घुसने लक न दँगा।"

इतना कह कर काँतानाथ ने पुड़िया की दवा देखी और पत्र पढ़ा। दोनों को देख कर वे बड़े विचार में पड़ गए। इल दोनों में से किसी ने जाना कि इनके मन में क्या है? केवल इतना ही क्यों? ये इस बात को भी न जान सकीं कि [ २४० ]यह एकाएक यहाँ कैले आ पहुँचे और इनको किसने खबर दी?

इसके अनंतर सास दामाद की क्या क्या बातें हुईं सो कहने से कुछ मतलब नहीं और न इस बात से प्रयोजन है कि पति के संन्यास ग्रहण कर लोने बाद क्योंकर प्रेमदा ने अपने पेट का पालन किया। आज पीछे उसने अवश्य ही कभी अपनी बेटी को भूल कर भी याद किया। हाँ वह अपने जीवनसर्वस्व स्वामी को सताने और उसी के दुःख से उनके चले जाने पर रोती पछताती शार्माती और अपने आपे को कोसती रही। दामाद के बहुत आग्रह करने पर भी उसने अधर्म बतला कर कभी अपनी बेटी दामाद से एक पाई की सहायता ग्रहण न की और सीने पिरोने से अपने घटते दिन पूरे कर लिये। इसके अनंतर न तो प्रेमदा का इस किस्से से कुछ लगाव रहा और न इस लिये उसके विषय में कुछ लिखने की आवश्यकता है।

हाँ! बहुत सोच बिचार के बाद पंडित कांतानाथ अपनी दुखदा को लेकर अपने घर आ गए। ऐसी दशा में उन्होंने यात्रा करना उचित न समझ कर बड़े भाई को इस घटना की खबर दे दी और उनके वापिस आने तक वह घर पर ही बने रहे। यद्यपि उन्होंने दुखदा के बहुत चिरौरी करने पर भी उसके हाथ का बनाया हुआ भोजन करने की जगह अपने ही हाथ से चार टिक्कड़ सेंक कर संतोष किया, यद्यपि उसके [ २४१ ]हज़ार कसमें खाने पर भी उसकी बात का भरोसा न करके उक्षे निर्दोष न समझा और इसलिये एक व्यभिचारिणी स्त्री के लिये प्राचीनों के घर में रखकर जिस तरह का दंड देने की विधि बतलाई है उसी तरह का उसके साथ बर्ताव किया, किंतु उस दिन उसे पीटने पर पछताए भी वह कम नहीं। कई बार उन्होंने "चयार की देवी की जूतों से पूजा" कहकर संतोष भी किया किंतु मथुरा जैसी कुलटा कुटनी का स्पर्श करने और सुखदा को पीटने की ग्लानि बाहुत काल तक उसके हृदय में चक्कर लगाती रही।

अस्तु! वह इस अवसर में चुपके चुपके इस बात की अवश्य थाह लगाते रहे कि दुखदा का दोष किस दर्जे तक पहुँच गया है। निश्चय करके उन्होंने पूरी बातों का पता भी पा लिया किंतु भाई भौजाई की आज्ञा बिना उन्होंने जितना कर दिया उसके सिवाय और कुछ भी न करना चाहा। हाँ उन्होंने इतना कर दिया कि जिस दशा में वह रक्खी गई है उससे अधिक उसे कष्ट न होने पावे। आठ पहर में एक बार बिना लवण मोटा झोटा खाना, मोटा कपड़ा पहनना, चटाई पर सोना और किसी तरह का श्रृंगार करना-उसकी दिन चर्या। सोने खाने के सिवाय दिन रात राम राम जपना ही उसका काम। एक बार उसने इनके चरणों में सिर देकर कहा भी कि―

"मुझे अब बहुत सजा मिल चुकी। मेरा मन जरूर विगड़ [ २४२ ]गया था। उस दिन आप आते तो शायद मैं आपको दिखाई भी न देती पर मैं कसम खा कर कहती हूँ कि राम जी ने मुझे बचा लिया। अब मारो चाहे निवाजो। तुम्हारी दासी हूँ। तुम्हारे चरणों की रज हूँ। अब मुझ से सहा नहीं जाता। फिर कभी मुझ से कसूर बन आवे तो काट कर मेरे टुकड़े उड़ा देना। तुम्हारी गौ हूँ। इस बार माफ करो।" "भाई भौजाई के आने पर उनकी आज्ञा से जो कुछ होता होगा सो हो जायगा। अभी जो प्रायश्चित बतलाया है सो कर। अपने कुकर्मों के लिये पश्चाताप कर।" के सिवाय कभी एक शब्द भी उन्होंने उससे नहीं कहा और वह भी "अच्छा" कहकर आज्ञा पालने लगी।



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