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आनन्द मठ/3.9

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आनन्द मठ  (1922) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद ईश्वरीप्रसाद शर्मा

[ १३४ ]

नवां परिच्छेद

अँगरेजोंकी तोपें "धायं धायं” करके गरज उठीं। वह शब्द उस विशाल काननको कंपाता हुआ गूंज उठा, नदीके किनारे-किनारे चलकर वह धायं-धायं शब्द दूरस्थ आकाश-प्रान्तसे टकरा उठा। नदीके उस पार दूरस्थ काननमें प्रवेशकर वही ध्वनि फिर 'धायं धायं' कर उठी [ १३५ ] सत्यानन्दने कहा-"तुम लोग जाकर देखो, कि ये किसकी तोपें छूट रही हैं।" यह सुन; कई व्यक्ति घोड़ेपर सवार हो, अनुसन्धान करने चले; पर वे जंगलसे बाहर निकल कुछ ही दूर गये होंगे, कि उनपर सावनको धाराकी तरह गोले बरसने लगे। बस, सबके सब घोड़े समेत वहीं ढेर हो गये।

सत्यानन्दने दूर-ही-से यह दृश्य देखा। उन्होंने कहा-“वृक्षकी ऊँची डालपर चढ़ कर देखना चाहिये, कि क्या बात है।"

उनके कहनेके पहलेसे ही जीवानन्द वृक्षपर चढ़कर सवेरेकी सूर्यकिरणोंका आनन्द ले रहे थे। वे ऊपर-ही-से चिल्लाकर बोले-"तो अगरेजोंकी है।"

सत्यानन्दने पूछा-"सब पैदल हैं या घुड़सवार?"

जीवानन्द-"दोनों ही।"

सत्या० -"कितने हैं?"

जीवा०-"मैं कुछ अनुमान नहीं कर सकता। अभीतक वे लोग धीरे-धीरे जंगलकी आड़से बाहर निकलते ही जाते हैं।"

सत्या०-“गोरे भी हैं या सब देशी ही सिपाही हैं?"

जीवा-"गोरे भी हैं।"

तब सत्यानन्दने जीवानन्दसे कहा-“अच्छा, तुम नीचे उतरो।” जीवानन्द पेड़से नीचे उतर पड़े। सत्यानन्दने कहा-"इस समय दस हजार सन्तान यहां उपस्थित हैं। अब इनकी सहायतासे तुम जो कुछ कर सको, कर दिखाओ। आजके लिये मैंने तुम्हें ही सेनापति बनाया।"

जीवानन्द हथियार बाँधे लपककर एक घोड़ेपर सवार हो गये। उन्होंने एक बार आंखोंके इशारेसे नवीनानन्द गोस्वामीसे न जाने कौन-सी बात कही, कोई इस इशारेको न समझ सका। नवीनानन्दने भी इशारेसे ही उसका जवाब दिया, पर इस इशारे को भी कोई न समझ सका। केवल उन्हीं दोनों आदमियोंने [ १३६ ] अपने मन-ही-मन समझ लिया, कि यही देखादेखी शायद अन्तिम है, अब फिर इस जीवनमें देखादेखी न होगी। नवीनानन्दने अपनी दाहिनी भुजा ऊपर उठाये हुए सबसे कहा-भाइयो! बस, अब इस समय केवल 'जय जगदीश हरे' गाओ।" फिर क्या था? एक साथ ही दस हजार सन्तान सुरमें सुर मिलाये, नदी, कानन और आकाशको प्रतिध्वनित करते, तोपोंकी आवाजको डुबाते हुए, हजारों भुजायें ऊपर उठाये गाने लगे:-

"जय जगदीश हरे!
म्लेच्छनिबहनिधने कलयसि करवालम्।”

इसी समय अँगरेजोंकी तोपोंसे छूट-छूटकर गोले उस जंगलमें जमा हुए सन्तानोंपर पड़ने लगे। किसोका सिर उड़ गया, किसीकी बाँह कट गयी, किसीका कलेजा छिद गया लोग धरती चूमने लगे, पर तोभी किसीने गाना बन्द नहीं किया। सभी 'जय जगदीश हरे!' गाते रहे। गीत समाप्त होनेपर सबके सब एक साथ ही चुप हो गये। वह घनघोर जङ्गल, वह नदीकी रेत, वह अनन्त निर्जन स्थान एकबारगी निस्तब्ध हो गया, केवल वही तोपोंकी अत्यन्त भयानक गर्जन और दूरसे सुनायी पड़नेवाली गोरोंके हथियारोंकी झनझनाहट और पैरोंकी आहट सुनायी देती थी।

तब सत्यानन्दने उस गहरे सन्नाटेको तोड़ते हुए ऊँचे स्वरमें कहा--"जगत के स्वामी हरिने तुम लोगोंपर कृपा की। बोलो, तो कितनी दूरपर हैं?"

ऊपरसे किसीने कहा-"इस जगलके बहुत ही पास। एक छोटेसे मैदानके उस पार।"

सत्यानन्दने पूछा,-"तुम कौन हो?"

उपरसे जवाब मिला-"मैं हूं नवीनानन्दा” तब सत्यानन्दने कहा" तुम लोग दस हजार सन्तान हो। तुम्हारी जय आज अवश्य होगी। बस जाओ, जाकर उनकी तोपें छीन लो।", [ १३७ ] यह सुन, सबसे आगे घोड़ेपर सवार जीवानन्दने कहा "चलो, आओ।"

बस, वे दसों हजार सन्तान, कोई पैदल और कोई घोड़े पर सवार हो, जीवानन्दके पीछे-पीछे चले। पैदल चलनेवालोंके कन्धे पर बन्दूक, कमरमें तलवार और हाथमें भाला था। जंगलसे बाहर निकलते ही लगातार उनपर गोले बरसने लगे, जिससे वे छिन्न-भिन्न होने लगे। अनेक सन्तान तो बिना लड़े-भिड़े ही मारे गये। एकने जीवानन्दसे कहा-“जीवानन्द! व्यर्थ इतने आदमियोंकी जाने लेनेसे क्या लाभ है?"

जीवानन्दने धूमकर देखा कि भवानन्द हैं। जीवानन्दने कहा-"तुम्हीं कहो, क्या करूँ?

भवा०-"जंगलके भीतर, पेड़ोंके झुरमुटमें छिपकर, हम अपनी जान भी बचा सकते हैं और बहुत देरतक युद्ध भी कर सकते हैं। नहीं तो सरपट मैदानमें बिना तोपके ये सन्तान तोपोंके सामने घड़ीभर भी न ठहर सकेंगे।"

जीवा०-"तुम्हारा कहना बहुत ठीक है, पर प्रभुकी आज्ञा है कि तोपें छीन लो। इसलिये हमलोग तो छीननेके लिये अवश्य ही आगे बढ़ेंगे।"

भवा०-"भला किसका सामर्थ्य है, जो उनसे तो छीन लेगा? खैर, यदि जाना ही है तो तुम चुपचाप बैठो। मैं ही जाता हूं।"

जीवा०-"नहीं भवानन्द! यह नहीं होनेका। आज मेरे मरनेका दिन है।"

भवाo--"नहीं, आज मेरे मरनेका दिन है।"

जीवा--"मुझे तो प्रायश्चित्त करना है।"

भवा०-"नहीं, नहीं, तुम्हें तो पाप छू भी नहीं गया, तुम्हारा प्रायश्चित्त कैसा? मेरा चित्त कलुषित है। मुझे ही मरने दो। तुम रहो, मैं जाता हूं।" [ १३८ ] जीवा -"भवानन्द! तुमने क्या पाप किया है, यह तो मैं नहीं जानता; पर हाँ, इतना जानता हूं कि तुम्हारे जीते रहनेसे सन्तानोंका कार्य सिद्ध हो जायगा। मैं चलता हूं।

भवानन्द कुछ देर चुप रहे। अन्तमें बोले। “यदि मरनेका प्रयोजन होगा तो आज मैं ही मरूंगा, नहीं तो जिस दिन प्रयोजन होगा उसी दिन मरूंगा। मृत्युके लिये समय कुलमयका विचार कैसा?”

जीवा०-"तब आओ, चले आओ।"

इसके बाद भवानन्द उसके आगे चले आये। उस समय ढेर-के-ढरे गोले पड़कर सन्तानोंके सैन्यका संहार कर रहे थे। इससे लोग भागने लगे, कहीं औंधे सीधे गिरने लगे, कहीं शत्रुओं के बन्दूकधारी सिपाहियोंने अपने अचूक निशानेसे ढेर-के-ढेर सन्तानोंको मारकर जमीनमें गिरा दिया। इसी समय भवानन्दने कहा--"अब तो सन्तानोंको इस तरङ्गमें कूदना ही पड़ेगा। बोलो, भाइयो! कौन-कौन कूदनेको तैयार हैं? गाओ, वन्देमातरम्।” उस समय ऊचे कण्ठसे मेघमल्लार रागमें सारे सन्तान तोपोंकी आवाजके तालपर "वन्देमातरम्” गान गाने लगे।