कपालकुण्डला/तृतीय खण्ड/६

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कपालकुण्डला  (1866) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद Not mentioned, tr. published in 1900.
[ ८४ ]

:६:

चरणोंमें

“काय मनः प्राण आमि संदिब तोमारे।
भुञ्ज आसि राजयोग दासीर आलये॥”
—वीराङ्गना काव्य

खेतमें बीज बो देनेसे आप ही उगता है। जब अंकुर पैदा होता है, तो न कोई जान पाता है न देख पाता है। लेकिन एक बार बीजके बो जानेपर बोने वाला चाहे कहीं भी रहे; वह अंकुर बढ़कर वृक्ष बनकर मस्तक ऊँचा करता है। अभी वह वृक्ष केवल एक अंगुल मात्रका है, तो देखकर भी देख नहीं सकता। क्रमशः तिल-तिल बढ़ रहा है। इसके बाद वह वृक्ष आधा हाथ, फिर एक हाथ, दो हाथ तक बढ़ा। फिर भी, उसमें यदि किसीका स्वार्थ न रहा तो उसे देखकर भी ख्याल नहीं करता। दिन बीतता है, महीने बीतते हैं, वर्ष बीतते हैं, इससे ऊपर दृष्टि जाती है। फिर उपेक्षाकी तो बात ही नहीं रहती—क्रमशः वह वृक्ष बड़ा होता है, अपनी छायामें दूसरे वृक्षोंको नष्ट करता है—फिर और चाहिये क्या, खेतमें एक मात्र वही रह जाता है।

लुत्फुन्निसाका प्रणय इसी तरह बढ़ा था। पहले एक दिन अकस्मात् प्रणय-भाजनके साथ मुलाकात हुई, उस समय प्रणय-संचार विशेष रूपसे परिलक्षित न हुआ। लेकिन अंकुर उसी समय आ गया। लेकिन इसके बाद फिर मुलाकात न हुई। लेकिन बिना मुलाकात हुए ही बारम्बार वह चेहरा हृदयमें खिलने लगा, याददाश्तमें उस चेहरेकी याद करना सुख कर जान पड़ने लगा, अंकुर बढ़ा। मूर्तिके प्रति फिर अनुराग पैदा हुआ। चित्तका यही धर्म है [ ८५ ]कि जो मानसिक कर्म जितनी बार अधिक किया जाये, उस कर्ममें उतनी ही अधिक प्रवृत्ति होती है; वह कर्म क्रमशः स्वभाव सिद्ध हो जाता है; लुत्फुन्निसा उस मूर्तिकी रात-दिन याद करने लगी। इससे दारुण दर्शनकी अभिलाषा उत्पन्न हुई। साथ ही साथ उसकी सहज स्पृहाका प्रवाह भी दुर्निवार्य हो उठा। दिल्लीकी सिंहासनलिप्सा भी उसके आगे तुच्छ जान पड़ी। मानों सिंहासन मन्मथशरजालसम्भूत अग्निशिखासे घिरा हुआ जान पड़ने लगा। राज्य, राजधानी राजसिंहासन सबका विसर्जन कर वह प्रिय-मिलनके लिए दौड़ पड़ी। वह प्रियजन नवकुमार है।

इसलिए लुत्फुन्निसा मेहरुन्निसाकी आशानाशिनी बात सुन कर भी दुखी हुई न थी। इसलिए आगरे पहुँच कर सम्पद-रक्षाकी भी उसे परवाह नहीं रही, इसीलिए उसने जीवन-पर्यन्तके लिए बादशाह से बिदा ली।

लुत्फुन्निसा सप्तग्राम में आई। राजपथसे निकट ही नगरीके बीचमें एक अट्टालिकामें उसने अपना डेरा डाला। राजपथके पथिकोंने देखा कि एकाएक वह अट्टालिका जरदोजी और किमखाबकी पोशाकोंसे सजे दास-दासियोंसे भर गई। हर कमरेकी शोभा हरम जैसी निराली थी। सुगन्धित वस्तुएँ, गुलाब, खस, केशर, कपूरादिसे सारा प्रांगण भर गया है। स्वर्ण, रौप्य, हाथीदाँत आदिके सामानोंसे मकान अपूर्व शोभा पाने लगा। ऐसे ही एक सजे हुए कमरेमें लुत्फुन्निसा अधोवदन बैठी हुई है। एक अलग आसन पर नवकुमार बैठे हुए हैं। सप्तग्राममें लुत्फुन्निसासे नवकुमारकी दो-एक बार और मुलाकात हो चुकी है। इन मुलाकातोंसे लुत्फुन्निसाका मनोरथ कहाँ तक सिद्ध हुआ है, वह इस वार्तासे ही प्रकट होगा।

कुछ देर तक चुप रहनेके बाद नवकुमारने कहा—“अब मैं जाता हूँ। फिर तुम मुझे न बुलाना।”

[ ८६ ]लुत्फुन्निसा बोली—“नहीं, अभी न जाओ। थोड़ा और ठहरो। मुझे अपना वक्तव्य पूरा कर लेने दो।”

नवकुमारने थोड़ी देर और प्रतीक्षा की, लेकिन लुत्फुन्निसा चुप ही रही। थोड़ी देर बाद नवकुमारने फिर पूछा—“और तुम्हें क्या कहना है?” लुत्फुन्निसाने कोई जवाब न दिया। वह चुपचाप रो रही थी।

यह देख कर नवकुमार उठ कर खड़े हो गये; लुत्फुन्निसाने उनका वस्त्र पकड़ लिया। नवकुमारने कुछ विरक्त होकर कहा—“क्या कहती हो, कहो न?”

लुत्फुन्निसा बोली—“तुम क्या चाहते हो? क्या पृथ्वीकी कोई भी चीज तुम्हें न चाहिये? धन, सम्पद, मान, प्रणय, राग-रङ्ग, पृथ्वीमें जिन-जिन चीजोंको सुख कह सकते हैं, सब दूँगी, उसके बदलेमें कुछ भी नहीं चाहती; केवल तुम्हारी दासी होना चाहती हूँ। तुम्हारी धर्मपत्नी बननेका गौरव मुझे नहीं चाहिये, सिर्फ दासी बनना चाहती हूँ।”

नवकुमारने कहा—“मैं दरिद्र ब्राह्मण हूँ, इस जन्ममें दरिद्र ब्राह्मण ही रहूँगा। तुम्हारे दिये हुए धन-सम्पदको लेकर यवनी-जार बन नहीं सकता।”

यवनी-जार!—नवकुमार अबतक जान न सके, कि यही रमणी उनकी पत्नी है। लुत्फुन्निसा सर नीचा किये रह गयी। नवकुमारने उसके हाथसे अपना कपड़ा छुड़ा लिया। लुत्फुन्निसाने फिर उनका वस्त्र पकड़ कर कहा—“अच्छा, यह भी जाने दो। विधाताकी यदि ऐसी ही इच्छा है, तो सारी चित्तवृत्तिको अतल जलमें समाधि दे दूँगी। और कुछ नहीं चाहती; केवल जब इस राहसे हो कर जाना, दासी जानकर एक बार दर्शन दे दिया करना, केवल आँख ठण्डी कर लिया करूँगी।”

[ ८७ ]नव०—“तुम मुसलमान हो—परायी औरत हो—तुम्हारे साथ इस तरह बात करनेमें भी मुझे दोष है। अब तुम्हारे साथ मेरी मुलाकात न होगी।”

थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा। लुत्फुन्निसाके हृदय में तूफान बह रहा था। वह पत्थरकी मूर्तिकी तरह अचल रही। नवकुमारका वस्त्र उसने छोड़ दिया, बोली—“जाओ।”

नवकुमार चले। जैसे ही वह दो-चार कदम बढ़े थे कि वायु द्वारा उखाड़ कर फेंकी गई लता की तरह लुत्फुन्निसा एकाएक उनके पैरोंपर आ गिरी। अपनी बाहुलतासे चरणोंको पकड़ बड़े ही कातर स्वरमें उसने कहा—“निर्दय! मैं तुम्हारे लिए आगराका शाही तख्त छोड़कर आई हूँ। तुम मेरा त्याग न करो।”

नवकुमार बोले—“तुम फिर आगरे लौट जाओ। मेरी आशा छोड़ दो।”

“इस जन्ममें नहीं।” तीरकी तरह उठकर खड़ी हो सदर्प लुत्फुन्निसाने कहा—“इस जन्ममें तुम्हारी आशा त्याग नहीं सकती।” मस्तक उन्नत और बहुत हल्की टेढ़ी गर्दन किये, अपने आयत नेत्र नवकुमार पर जमाये वह राजराज-मोहनी खड़ी रही। जो अदमनीय गर्व हृदयाग्निमें लग गया था, उसकी ज्योति फिर छिटकने लगी। जो अजेय मानसिक शक्ति भारत राज्य-शासन की कल्पना से भी डरी नहीं, वह शक्ति फिर उस प्रणय दुर्बल देहमें चौंक पड़ी। ललाट पर नसें फूलकर अपूर्व शोभा देने लगीं, ज्योतिर्मयी अाँखें समुद्र जलमें पड़नेवाली रविरश्मिकी तरह झलझला उठीं। नाक का अग्रभाग उत्तेजनासे काँपने लगा। लहरों पर नाचने वाली राजहंसी गतिरोध करने वाले को जैसे देखती है, दलितफण फणिनी जैसे फन उठाकर ताकती है, वैसे ही वह [ ८८ ]उन्मादिनी यवनी अपना मस्तक उन्नत किये देखती रही। बोली—“इस जन्ममें नहीं, तुम मेरे ही होगे।”

उस कुपित फणिनीकी मूर्ति देख कर नवकुमार सहम गये। लुत्फुन्निसाकी अनिवर्चनीय देह महिमा जैसी इस समय दिखाई दी, वैसी देहमें कभी दिखाई न दी थी। लेकिन उस सौन्दर्यको वज्रसूचक विद्युत् की तरह मनोमोहिनी देखकर भय हुआ। नवकुमार जाना ही चाहते थे, लेकिन सहसा उन्हें एक और मूर्तिका ख्याल हो आया। एक दिन नवकुमार अपनी प्रथम पत्नी पद्मावती के प्रति विरक्त होकर उसे अपने कमरे से निकालने पर उद्यत हुए थे। द्वादशवर्षीया बालिका उस समय जिस दर्दसे मुड़कर उनकी तरफ खड़ी हुई थी, ठीक उसी तरह उसके नेत्र चमक उठे थे, ललाट पर ऐसी ही रेखाएँ खिंच गयी थीं, नासारंध्र इसी प्रकार काँपे थे। बहुत दीनोंसे उस मूर्तिका ख्याल आया न था। ऐसा ही सादृश्य अनुभूत हुआ। संशयहीन होकर धीमे स्वर में नवकुमार ने पूछा—“तुम कौन हो?” यवनीकी आँखें और विस्फारित हो गयीं। उसने कहा—“मैं वही हूँ—पद्मावती।”

उत्तरकी प्रतीक्षा किये बिना ही लुत्फुन्निसा दूसरे कमरे में चली गयी। नवकुमार भी अनमनेसे और शंकित हृदयसे अपने घर लौट आये।