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कलम, तलवार और त्याग/९-गेरीबाल्डी

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कलम, तलवार और त्याग  (1939) 
द्वारा प्रेमचंद

[ १२४ ]ओजक्र गेरीबाल्डी जिसने इटली को गुलामी के गढ़े से निकाला, इतिहास के उन इने गिने महापुरुषों में हैं जो अपनी निस्वार्थ और साहस-भरी देशभक्ति के कारण अखिल विश्व के उपकारक माने गये हैं। वह स्वाधीनता का सच्चा पुजारी था, और जब तक जीत रहा, केवल अपने देश और जाति' को ही उन्नति के शिखर पर पहुँचाने के यत्न में नहीं लगा रहा, अन्य दलित, पीड़ित जातियों को भी अवनति के गर्त से निकालने की कोशिश करता रहा। गेरीबाल्डी का सा उदार और मानव-सहानुभूति से भरा हुआ हृदय रखनेवाले व्यक्ति इतिहास में बिरले ही दिखाई देते है। वह झोपड़े में पैदा हुआ, अपनी सच्ची देश- भक्ति और देशसेवा के उत्साह की बदौलत सारे राष्ट्र का प्यारा बना और आज सारा सभ्य-संसार एक स्वर से उसका गुणगान कर रहा हैं। इसमें संदेह नहीं कि उसमें कुछ कमजोरियाँ थीं-ऐसा कौन-सा मनुष्य है जो मानव-स्वभाव की दोष-त्रुटियों से सर्वथा मुक्त हो ? पर इन कमजोरियों से उसके यश और कीर्ति में तनिक भी कमी नहीं होने पाई। उसकी नेकनीयती और निस्वार्थता पर कभी किसी को संदेह करने का साहस नहीं हुआ। वह चाहता तो उस लोकप्रियता की बदौलत जो उसे प्राप्त थी, धन-वैभव की चोटी पर ही न पहुँच जाता, राजदण्ड और राजमुकुट भी धारण कर लेता। पर उसका अन्तःकरण ऐसी स्वार्थमय कामनाओं से निर्लिप्त था। उसका यत्न सफल हो गया। इटली ने पराधीनता के जुए को उतार फेंका, तो वह चुप- चाप अपने घर लौट आया और दुनिया के झगड़ों से अलग होकर शेष जीवन खेती-बारी में काट दिया। निस्संदेह, गेरीबाल्डी का-सा [ १२५ ]
शौर्य और साहस रखनेवाले और भी लोग दुनिया में हो गये हैं, पर जिस दुर्लभ गुण ने इटालियन जाति को सदा के लिए उसका ऋणी, बना दिया है वह है उसकी बेदाग नेकनीयती और निर्मल, निष्काम देशभक्ति।

गेरेबाल्डी का जन्म २२ जुलाई, १८७० ई० में नाइस नामक नगर में हुआ। उसका बाप एक छोटे दरजे का नाविक था, जो दिनों के फेर के कारण गरीबी की हालत में दिन काट रहा था। हाँ, उसकी मा बड़ी साध्वी सुशीला स्त्री थी। गरीबी वह बुरी बला है कि मनुष्य के बहुत-से गुणों पर परदा डाल देती है। पर इस अर्थ-कष्ट में भी यह महिला बड़े सन्तोष और शान्ति के साथ अपना निर्वाह करती थी। अच्छी माताओं की कोख से सदा ही सपूत जन्मे हैं। दुनिया के महान् पुरुषों में से अधिकतर ऐसे हैं जिनके हृदयों में उनकी माताओं के गुणों ने ही सद्गुणों, सदुद्देश्यों और ऊँचे आदर्शों के बीज बोये। गेरीबाल्डी भी अपनी मा के सद्गुणों से बहुत प्रभावित हुआ। वह खुद लिखता है-

वह विशुद्ध प्रेम जो मुझे अपने देश के साथ है और जिसने मुझे अपने अभागे देशवासियों के दुख-सुख का साथी बना दिया है, उसका बीज उस समय उगा था जब मैं अपनी गरीब मा को गरीबों के साथ हमदर्दी दिखाते और दुर्दशा-ग्रस्तों पर करुणा करते हुए देखता था। मैं असत् की पूजा करनेवाला अंधविश्वासी नहीं हूँ, पर मैं स्वीकार करता हूँ कि कठिन से कठिन विपत्ति के समय जब समुद्र मेरे जहाज को जलसमाधि देने पर तुला होता और उसे काग़ज़ की तरह उछालता होता था थी जब हवा की सनसनाहट की तरह बंदूकों की गोलियाँ मेरे कान के पास से सनसनाती हुई निकल जाती थीं और मेरे सिर पर गोले ओले की तरह बरसते होते थे, मैं अपनी स्नेहमयी माता को अपने बेटे के लिए भगवान से विनती करते हुए देखता। मेरा वह साहस और वीरता जिस पर बहुतो को अचरज होती है, इस अट्टल विश्वास [ १२६ ]
का ही फल है कि जब एक पुण्यशीला देवी-स्वरूपा महिला मेरे लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही है तब मुझ पर कोई विपत्ति नहीं आ सकती है।

बचपन से ही गेरीबाल्डी की सहज निर्भीकता, स्वातंत्र्यप्रियता, और दीन-दुखियों के साथ सहानुभूति का परिचय मिलने लगा, आठ साल का भी न होने पाया था कि एक स्त्री को डूबते देखकर मर्दानगी के साथ नदी में कूद पड़ा और उसे काल के गाल से निकाल लाया। इसके कुछ साल बाद इसके कुछ मित्र नौका-विहार कर रहे थे कि भयानक तूफान आ गया और नाव के जल-निमग्न हो जाने की आशंका होने लगी। गेरीबाल्डी किनारे से यह अवस्था देख रहा था, तुरत हिम्मत बाँधकर पानी में कूद पड़ा, और नौका को सकुशल किनारे लाया। उसके साहस और मानव-सहानुभूति की सैकड़ों कथाएँ लोगों की जान पर हैं। यही गुण थे जिन्होंने बाद में उसे राष्ट्र का कर्णधार और उसके गर्व की वस्तु बना दिया।

मा-बाप यद्यपि निर्धन थे, पर बेटे की बुद्धि की तीक्ष्णता को देखकर उसे अच्छी शिक्षा दिलवाई। उनकी इच्छा थी कि वह वकालत को पेशा करे। पर एक ऐसे नवयुवक को जिस पर सैनिक और नाविक जीवन की धुन सवार थी, मुक़दमों के सबूत ढूँढने और पुरानी, दीमकों की चाटी हुई नज़रें तलाश करने में तनिक भी दिलचस्पी नहीं हो सकती थी। इसलिए उसने सार्डीनिया की जलसेना में नौकरी कर ली और कई साल तक उस चित्त की दृढ़ता और कष्टसहिष्णुता को अभ्यास करता रहा, जिसने आगे चलकर उसकी राष्ट्रीय आकांक्षाओं की पूर्ति में बड़ी सहायता की।

इटली की दशा उन दिनों बहुत बिगड़ रही थी। उत्तरी भाग आस्ट्रिया के अत्याचारों से चीख-चिल्ला रहा था। दक्षिण में नेपुल्स के उलीउनों की धूम थी, मध्य देश में पोप ने अंधेर मचा रखा था, और पच्छिम में पेडमांट के जोर-जुल्म का चक्र चल रहा था। पर चारों ओर राष्ट्रीय जागृति के चिह्न प्रकट हो रहे थे और युवकों के हृदयों में [ १२७ ]
अपने देश को विदेशियों के उत्पीड़नों से मुक्त करने, इटली को एक राष्ट्रीय राज्य के रूप में परिणत करने और दुनिया के सम्मानित राष्ट्र की श्रेणी में स्थान दिलाने की उमंगे उठ रही थीं। यह उत्साह केवल शिक्षित-वर्ग तक सीमित न था, साधारण जनता में भी आजादी का वह जोश पैदा हो चला था, जिसने फ्रांस के प्रभुत्व का ताना-बाना बिखेर दिया। देश-प्रेमियों ने 'यंग इटाली' (युवा इटली) नाम की एक संस्था स्थापित कर रखी थी, जिसका प्राण मेजिनी जैसा सच्चा देशभक्त था। अतः उद्देश्यसिद्धि के अनेक साधनों और उपायों पर विचार करने के बाद '८३२ ई० में यह निश्चय किया गया कि देश में राज्यों के विरुद्ध विप्लव कर दिया जाय और इसका आरंभ पेडमांट से हो। गेरीबाल्डी को यह समाचार सुनकर कब माने पर अधिकार रह सकता था। तुरत नौकरी से इस्तीफा देकर मेजिनी की मदद के लिए जा पहुँचा। पर संभवतः मसाला पक्का न था। भण्डा फूट गया और दल छिन्न-भिन्न हो गया। मेजिनी तो गिरफ्तार हो गया, पर गेरीबाल्डी किसी तरह भाग निकला, पर उसकी बेचैन तबियत को चैन कहाँ। सदा छिपे-छिपे पत्रों और संदेशवाहकों के द्वारा आग भड़काता रहता था। दो बरस बाद फिर एक दल तैयार किया। पर अबकी खूद गिरफ्तार हो गया। सामयिक शासक ने प्राण-दण्ड का अधिकारी ठह- राया। अपने सत्सङ्कल्प के लिए शहीद होने की समय आ ही पहुँच था कि प्राण-रक्षा का उपाय निकल आया। भागकर फ्रांस पहुंचा और ट्यूनिस होता हुआ दक्षिणी अमरीका में दाखिल हो गया। वहाँ उन दिनों कई जातियाँ स्वाधीनता के लिए अपने ऊपर शासन करनेवाली शक्तियों से लड़ने को तैयार थीं। गेरीबाल्डी ने बारी-बारी से उनकी सहायता की। छोटी-छोटी सेनाएँ लेकर बरसों तक जंगलों- अहा मैं लड़ता-भिड़ता रहा। उसकी पति-परायणा पत्नी अनीता इस सारे क्लेश-कष्ट में उसकी साथी थी। इस समय लड़ने-भिड़ने में वह इतना व्यस्त रहता था कि चार बरस तक एक दिन भी आराम से बिस्तर पर लेटना न नसीब हुआ। जब नींद दबाती तो,घोड़े की [ १२८ ]
पीठ पर सिर नीचा कर लेता। अधिक अवकाश हुआ तो वहीं ज़मीन पर लम्बा हो जाता। इससे भी सराहनीय अनीता का धैर्य और दृढ़ता है जो पति की खातिर यह सारी विपत्तियाँ और क्लेश झेलती और शिकायत में मुँह से एक शब्द न निकालती।

यद्यपि 'यंग इटाली’ (इटालियन युवक दल) और उसके अधिक तर सदस्य जिनमें मेजिनी भी शामिल था, निर्वासन के कष्ट भोग रहे थे, पर उनके विचार गुप्त परचों आदि के द्वारा जनसाधारण के हृदय में स्वाधीनता को प्रेम जगाते जाते थे। कई बार साधारण रूप में प्रकट होने के बाद अन्त में १८४८ ई० में यह जोश भड़क उठा। कई नगरों में जनता ने आजादी के झण्डे ऊँचे कर दिये। मिलान और जिनोवा में अस्ट्रिया की सेना ने हार भी खाई। पेडमांट के शासक शाह अलबर्ट ने पहले तो आस्ट्रिया के विरुद्ध किये गये इस विप्लव को बड़ी कड़ाई से दबा देने की कोशिश की; पर जब उसमें सफल न हुआ और जनता का जोश घटता ही गया; तो इस डर से कि कहीं उसकी प्रजा भी उपद्रव पर उद्यत न हो जाय, छिपे-छिपे बागियों की मदद करने लगा। पोप ने भी इसी में भलाई देखी कि प्रज्ञा का विरोध न किया जाय। इस विपल्व के दिल बढ़ानेवाले समाचार समुद्र को पार करके अमरीका पहुँचे तो उस परदेश में पड़े हुए देशभक्त के हृदय में फिर देशसेवा की उमङ्ग लहरें लेने लगी। उसके साथ उस समय ८३ आदमियों से अधिक न थे, इसी छोटे-से दल को लेकर वह स्वदेश के स्वाधीनता-संग्राम में जूझने को रवाना हो गया। प्रस्थान के समय उन ८३ 'आदमियों में से भी बहुतों की हिम्मत छुट गई और वे सोचने लगे कि कहाँ हम और कहाँ अस्ट्रिया और अन्य यूरोपीय राज्यों की संयुक्त शक्ति। अन्त में केवल ५६ आदमी बच रहे। पर गेरीबाल्डी का हौसला दबना जानता ही न था। उसका दृढ़ संकल्प तनिक भी विचलित न हुआ। उन्हीं ५६ आदमियों और थोड़ी-सी बन्दूकों के साथ वह एक जहाज़ पर इटली के लिए रवाना हो गया। यहाँ जिस उत्साह और उल्लास से उसका स्वागत किया गया, वह इस बात का [ १२९ ]
प्रमाण था कि जाति में नव-जीवन का संचार और सच्चे स्वाधीनता प्रेम का प्रसार हो गया है।

गैरीबाल्डी ने पहले पोप के दरबार में नौकरी की दरख्वास्त दी। उसने पोप के बारे में जो अफवाहें सुनी थीं उनसे उसको विश्वास था कि वह अवश्य मेरी सेवा स्वीकार करेगा। और मुझे अस्ट्रियावालों का सिर कुचलने का अच्छा मौका हाथ आयेगा। पर पोप के सदुद्देश्यों की पोल बहुत जल्दी खुछ गई। उसने गेरीबाल्डी को नौकर रखने से ही इनकार नहीं किया, कुछ ऐसी कार्रवाइयाँ भी की जिनसे प्रकट हो गया कि वह भी ‘चोर-चोर मौसेरे भाई ही हैं। यहाँ से निराश होकर गेरीबाल्डी ने पेडमांड के बादशाह के सामने अपनी तलवार पेश की। यह वही हज़रत थे जिन्होंने पहले गेरीबाल्डी को बगावत की साजिश करने के अपराध में देशनिकाले का दण्ड दिया था। पर अब जनता के भाव की विरोध करने में कुशल न देख खुले तौर पर आस्ट्रिया का विरोध आरंभ कर दिया था। पर संभवतः यह अधिकतर प्रजा को धोखे में डालने के लिए ही था। गैरीबाल्डी को यहाँ से भी कोरा जवाब मिला। इसी बीच जन-विप्लव से भयभीत होकर पोप ने गेरुवा बाना उतार फेंका और रोम से भाग निकला।

पोप के पलायन को खबर ज्यों ही मशहूर हुई कि निर्वासित देश-भक्त अपने-अपने गुप्त स्थानों से निकलकर रोम की ओर दौड़े। और वहाँ एक पार्लमेण्ट स्थापित हुई जो चन्दरोजी होने के कारण अस्थायी सरकार' कहलाती है। यह दिन इटली के इतिहास में बड़ा शुभ था । जनता खुशी से फूली न समाती थी। इस सरकार ने गेरीबाल्डी की सेवा सहर्ष स्वीकार की और वह स्वयं-सेवकों का एक दल लेकर सीधा उत्तर की ओर चला। यहाँ अपने अवसरों पर उसने साहस और वीरता के जो काम किये, उन पर वीर से वीर सैनिक को गर्व हो सकता है। सतत सफलता से उसका यश और सम्मान दिन दिन बढ़ता गया। उसकी आदत शत्रु की शक्ति का अन्दाज़ा करने की न थी, और अपने साथियों की संख्या का भी वह कुछ ख्याल न करता। उसकी राजनीति यह थी कि जहाँ [ १३० ]
दुश्मन को सामने देखा और टूट पड़ा। इसमें वह तनिक भी आगा-पीछा न करता। उसके आक्रमण में कुछ ऐसी बल होता था कि प्रायः सभी अवसरों पर उसकी यह युक्ति सफल हो जाती थी। अपने से दसगुनी सेना को, जो हरबे-हथियार से लैस होती थी, कितनी ही बार उसने अपने नौसिखिये, अनुभवहीन रंगरूटों से हरा दिया। इसका कारण यह था कि उसके दल का एक-एक आदमी राष्ट्रीयता के नशे में चूर होता था।

मिलान की जनता ने आस्ट्रिया का जोरों से विरोध किया था, इसलिए वह खास तौर से आस्ट्रिया के कोप का भाजन बना हुआ था। गैरीबाल्डी उसकी रक्षा के यत्न में लगा हुआ था कि रोम से डरावनी खबरें आईं। मेजिनी भी स्विट्जरलैंड से स्वदेश को लौट रहा था। मिलान मैं दोनों देशभक्तों का भरत-मिलाप' हुआ और दोनों साथ-साथ रोम की ओर चले कि वहाँ पहुँचफ़र पार्लमेंट का विधान बनायें और देश को अव्यवस्था और अराजकता की मुसी- बतों से बचायें। रोम पर उस समय सब ओर से विपत्तियाँ टूट रही थीं। राष्ट्रीय सरकार के पाँव अभी जमने न पाये थे कि एक ओर से नेपुल्स के बादशाह और दूसरी ओर से बोनापार्ट की सेनाएँ उसका गला घोंटने के लिए आ पहुँचीं। इसके सिवा पोप के जासूसों और पाद- रियों ने जनसाधारण के अंध-विश्वास का लाभ उठाकर राष्ट्रीय सरकार की ओर से उन्हें भड़काना शुरू कर दिया। गेरीववबाल्डी इन सारी विरोधी शक्तियों का सामना करने के लिए तैयार था। पहले नेपुल्स के बादशाह से उसकी मुठभेड़ हुई। उसके साथि १५ हजार पक्के, अनेक लड़ाइयाँ देखे हुए सिपाही थे। पर इस बड़ी सेना को उसने पलक मारते छिन्न-भिन्न कर दिया और बहुत दूर तक पीछा करता चला गया। उसका विचार था कि नेपुल्स पर चढ़ जाय, पर फ्रांसीसियों के आ उपहुँचने की खबर सुनकर लौट पड़ा, फ्रांसीसी सिपाही जो अफ्रीका के मैदानो से ताजा-ताज़ा लौटे थे, बड़ी दृढ़ता से लड़े और क़रीब था कि शहर में घुस पदें कि इतने में गेरीबाल्डी अपने एक हजार [ १३१ ]
स्वयंसेवकों के साथ आ पहुंचा और घमासान युद्ध के बाद ८ हजार अनुभवी फ्रांसीसी सैनिको के पाँव उखाड़ दिये। फ्रांसीसी जेनरल ऐसा घबराया कि संधि की प्रार्थना की। गेरीबाल्डी इसके विरुद्ध था, क्योकि वह जानता था कि शत्रु केवल कुमक की प्रतीक्षा करने के लिए मुहलत चाहता है। पर मेजिनी ने सुलह कर लेना ही अधिक उचित समझा। आखिर इस अदूरदर्शिता का परिणाम यह हुआ कि फ्रांसीसियों ने धोखा देकर रोम पर कब्जा कर लिया और गैरीबाल्डी को बड़ी परीशानी के साथ वहाँ से भागना पड़ा।

इस प्रकार पराजित होकर गेरीबाल्डी अपने पक्के साथियों के साथ, जो डेढ़ हजार के लगभग थे, ईश्वर का नाम ले चल खड़ा हुआ। उसकी पतिप्राणा पत्नी भी उसके साथ थी। बहुत दिनों तक वह देश में मारा-मारा फिरता रहा। सथी दिन-दिन घटते जाते थे, न रक्षा का कोई सामान था, न हरवे-हथियार का कोई प्रबन्ध। शत्रु उसकी एक-एक हरकत की जाँच पड़ताल किया करते थे और उसे इतनी मुहलत न देते थे कि जनता को भड़काकर कुछ करा सके। आज यहाँ है, कल वहाँ है। नित्य ही शत्रु के घाबे होते थे। गेरीबाल्डी के इस जीवन का वृत्तान्त बहुत ही मनोरंजक कहानी है। सच है, स्वदेश की सेवा सहज काम नहीं है। उसके लिए ऊँचा हौसला, फौलाद की दृढ़ता, दिन-रात मरने-पिसने का अभ्यास और हर समय जान हथेली पर लिये रहने की आवश्यकता है। जब तक यह गुण अपने स्वभाव में समा न जायँ, स्वदेश-सेवा का व्रत लेना जबानी ढकोसला है। अन्त में एक मौके पर आस्ट्रिया की सेना ने उसे घेर लिया कि कहीं से निकल भागने का रास्ता न दिखाई देता था। उसके साथियों ने जान बचाने का कोई उपाय न देख हिम्मत हार दी, और लगभग ५०० आदमियों ने हथियार रखकर शत्रु से प्राण-भिक्षा माँगी। पर आस्ट्रिया की सेना का हृदय इतना कलुषित हो रहा था कि उसे इन अभागो की दशी पर तनिक भी दया न आई, और उस रियायत के बदले जो युद्ध के नियमों के अनुसार आत्म-समर्पण करनेवालों पर की [ १३२ ]
जानी चाहिए, उसने इन लोगों को कैद करके निर्वासित कर दिया। कितनों ही के कोड़े भी लगवाये। गेरीबाल्डी के साथ कुल ३०० आदमी थे। परीक्षा का समय बुरा होती है, पर उसकी दृढ़ता में तनिक भी अन्तर न पड़ा और न तनिक भी डरा-घबराया। उस छोटी-सी सेना के साथ शत्रु के घेरे से लड़ता भिड़ता निकल पड़ा और उनकी पाँतों को चीरता-फाड़ता समुद्र के किनारे आ पहुँचा। यहाँ १५ नावें तैयार थीं। उनमें बैठकर वेनिस की ओर चल पड़ा। थोड़ी दूर गया था कि आस्ट्रिया के जहाज पीछा करते हुए दिखाई दिये और देखते-देखते उसके साथ की १३ नावें उनके हाथ में पड़ गई। केवल दो जिनमें गेरीबाल्डी, उसकी पत्नी और कुछ साथी सवार थे, एक टापू के किनारे आ लगीं। यहाँ वह घटना घटित हुई जो गैरीबाल्डी के जीवन का सबसे अधिक करुण अध्याय है। बेचारी अनीता गर्भवती थी और दिन-रात दौड़ते-भागते फिरने के कष्टों से घबरा गई थी। थकावट और रोग की प्रबलता ने उसे चलने-फिरने में भी असमर्थ बना दिया था। गेरीबाल्डी ने कोई उपाय न देख साथियों को छोड़ दिया और पत्नी को गोद में लेकर चला। तीन दिन के बाद उसने एक किसान का दरवाजा खटखटाया और पानी माँगा। अनीता को बड़े ज़ोर की प्यास लगी हुई थी। पर वह मौत की प्यासी थी जो शरबते मर्ग के चखने ही से बुझी। गेरीबाल्डी उसके मुँह में पानी की बूंदे टपका रहा था कि उसके प्राणपखेरू उड़ गये। गेरीबाल्डी के हृदय पर यह घाव आजीवन बना रहा, यहाँ तक कि अन्तिम क्षण में भी अपनी प्यारी पत्नी ही का नाम उसको जबान पर था। बहुत रोया, पीटा। पर वहाँ रोने को भी अवकाश न था। दुश्मन क्लब अ पहुँचा था। लाचार वहाँ से भागकर वेनिस पहुँचा और वहाँ से जिनेवा की ओर चला। पर कहीं अभीष्ट-सिद्धि का कोई उपाय न दिखाई दिया। जिनेवा से ट्यूनिस होता हुआ जिन्नादर पहुँचा। पर यहाँ भी उसे चैन न मिल सका। सरकार उसके नाम से घबड़ाती थी। यहाँ तक कि जिब्राल्टर में भी, जो अँग्रजी अमलदारी है, उसे रहने की इजाजत [ १३३ ]
न मिली। लाचार वहाँ ने लिवरपूछ (इंगलैड) आया और वहाँ से संयुक्त राष्ट्र अमरीका की राह ली। वहाँ कोई और उद्द्म न पाकर उसने एक ब्रिटिश साबुन के कारखाने में नौकरी कर ली। आश्चर्य है। कि ऐसे-ऊँचे विचार और आकांक्षा रखनेवाले पुरुष की ऐसे छोटे धंधे की ओर क्योंकर प्रवृत्ति हुई। संभवतः जीविका की आवश्यकता ने विवश कर रखा होगा, क्योंकि उसकी आर्थिक अवस्था बहुत ही हीन हो रही थी। कुछ दिन यहाँ बिताने के बाद उसने एक जहाज़ की नौकरी कर ली और अरसे तक चीन, आस्ट्रेलिया अदि में नाविक की कार्य करता रहा। कई साल तक इस प्रकार भटकने के बाद एक बार न्यूकैसल आया। यहाँ जनता ने बड़े हर्षोल्लास से इसका स्वागत किया और एक तलवार और एक दूरबीन उसे भेंट की। उस अवसर पर किये गये भाषण के उत्तर में गेरीबाल्डी ने कहा-

'अमर तुम्हारे देश ग्रेट ब्रिटेन को कभी किसी सहायक की आवश्यकता हो तो ऐसा कौन अभागा इटालियन है जो मेरे साथ उसकी मदद को तैयार न हो जाय। तुम्हारे देश ने आस्टट्रियावालों को वह चाबुक लगाया है जिसे वह कभी भूल न सकेंगे। अगर इंगलैण्ड को कभी किसी जायज मामले में मेरे शन्नों की आवश्य- कता पड़े तो मैं उस बहुमूल्य तलवार को जो तुमने मुझे उपहार रूप में दिया है, बड़े गर्व के साथ स्थान से बाहर केहँगा।

पेडमांट के राज्य में अब शान्ति स्थापित हो चुकी थी, इस लिए गैरीबाल्डी से कचरेरा नामक टापू खरीद लिया और उसे बसाकर खेती का धन्धा करने लगा। खेती की पैदावार को आस-पास के बाजारों में ले जाकर बेचा करता था। वह तो यहाँ बैठा हुआ खेती-बारी में उत्साह से लग रहा था, उधर इटली की अवस्था में बड़ी तेजी से परिवर्तन हो रही थी। यहाँ तक कि अस्ट्रिया के अत्याचारों से ऊबकर पेडमांद की सरकार ने फ्रांस की सहायता से इसके साथ युद्ध की घोषणा कर दी। अब गेरीबाल्डी की आवयकता अनुभव की गई, और प्रधान मन्त्री केयूर ने अप्रैल [ १३४ ]
१८३९ ई० में उस देश की सहायता करने को निमन्त्रित किया। गेरीबाल्डी तुरत अपने शान्तिकुटीर से निकल पड़ा। छोटे-बड़े सबके हृदयों: में उसके लिए इतना आदर था, और वह अपनी नीयत का इत्ता सच्चा और भला था कि दूसरे सैनिक अधिकारी जो-इस विप्लव से स्वार्थ-साधन करने के फेर में थे, उससे बुरा मानने लगे। परन्तु नवयुवक नरेश विक्टर इमानुएल ने जो गेरीबाल्डी के गुण-स्वभाव से भली-भाँति परिचित था, उससे कहा----‘आप जहाँ चाहें जायँ, जो चाहें करें, मुझे केवल इस बात का दुःख हैं कि मैं मैदान में आपकी बराल में रहकर अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर सकता।

इस प्रकार बादशाह से यथामति कार्य करने को अधिकार पाकर गेरीबाल्डी ने आस्ट्रिया के विरुद्ध उन छोटी-छोटी लड़ाइयों का सिलसिला शुरू किया जो इतिहास में अपना जोड़ नहीं रखतीं। उसके साथ १७ हजार आदमी थे और ये सब नवयुवक स्वयं-सेवक थे जिन्होंने देशहित पर अपने प्राणों को उत्सर्ग कर देने को सङ्कल्प कर लिया था। उनकी सहायता से उसने कितनी ही लड़ाइयाँ मारी, कोमो और बरगाओ छीन लिया, और अन्त में उत्तर इटली से शत्रु को निकाल बाहर किया। उधर पेडमांट और फ्रांस की संयुक्त सेना ने भी आस्ट्रियावालों को कई मारको में हराया और लुबांडी छीन लिया। पर जीतों का यह सिलसिला अधिक दिन न चलने पाया। सम्राट नेपोलियन ने पेडमांड का बल अधिक बढ़ते देख लड़ाई बन्द कर देने का हुक्म दिया। आस्ट्रिया ने भी मौका गनीमत जाना और कुछ देर दम ले लेना मुनासिब समझा। गेरीबाल्डी शुरू से कहता आता था कि राष्ट्र बाहरी शक्तियों की सहायता से कभी स्वाधीनता नहीं प्राप्त कर सकता। वह फ्रांस की सहायता स्वीकार करने के एकदम विरुद्ध था, पर पेडमांट-सरकार ने उसकी सलाह के खिलाफ काम किया था, और अब उसे अपनी अदूरदर्शिता का फल भुगतना पड़ा। उस समय थोड़े ही दिनों तक लड़ाई और जारी रहती तो इटली से आस्ट्रिया की सत्ता की जड़ उखड़ जाती, पर लड़ाई के बन्द हो जाने से उसे फिर शक्ति-संचय का अवसर मिल, [ १३५ ]
गया। अन्त में गैरीबाल्डी ने नाराज होकर इस्तीफा दे दिया, पर शाह इमानुएल ने ऐसे नाजुक वक्त में उसका इस्तीफा मंजूर करना मुनासिक ना समझा। अतः गैरीबाल्डी ने अपने ही स्वयंसेवकों से स्वतंत्र रूप में, युद्ध जारी रखने का जिम्मा लिया, पर उस पर चौतरफा से प्रत्यक्ष रूप में ऐसे दबाव पड़ने लगे कि अन्त में हताश होकर उसने फिर इस्तीफा दे दिया, और अबकी बार वह स्वीकार कर लिया गया, यद्यपि राष्ट्र ने इसका प्रबल विरोध किया।

पर स्वाधीनता के पुजारी और स्वदेश के सच्चे प्रेमी से कब चुप बैठा जाता था। लेखों और भाषणों से वह जनता को स्वाधीनता प्राप्ति के लिए उभारता रहता था। गुप्त रूप से वितरित पर्चो और पुस्तकों के द्वारा उसके राष्ट्रीय भाव उत्तेजित किये जाते, बराबर घोषणाएँ प्रकाशित की जाती थीं, जिनमें उद्देश्य-सिद्धि के साधनों और उपायों पर जोरदार शब्दों में बहस की जाती थी। गैरीबाल्डी का मत था कि जब तक देश मैं १० लाख बंदूके' और १० लाख निशानेबाज न हो जायेंगे, राष्ट्र स्वाधीन न हो सकेगा। इन घोषणाओं का प्रभाव अन्त में यह हुआ कि अमरीकावालों ने सहायता-रूप में चौबीस हजार बंदूके' एक जहाज में लदवाकर गैरीबाल्डी के पास भेजीं। कई हजार नौजवान अपने को राष्ट्र पर कुरबान कर देने को तैयार हो गये और गेरीबाल्डी २ हजार जवानों को लेकर सिसली की ओर चला। यहाँ नेपुल्स के बादशाह ने प्रजा को सता सताकर विप्लव के लिए तैयार कर रखा था। इन उत्पीड़ित ने ज्यों ही सुना किं मेरीबाल्डी उनकी सहायता को आ रहा है, अपनी-अपनी तैयारियों में। लग गये और बड़े उत्साह से उसका स्वागत किया। मसाला तैयार था ही, गेरीबाल्डी ने आते ही आते पल्रमो पर ऐसा जोर का धावा किया कि शाही फौज किला-बन्द हो गई और उसने प्राणभिक्षा माँगी। जनता का उस पर ऐशा विश्वास था कि उसने उसे अपना उद्धारक मानकर सिसली के अधिनायक की उपाधि दी। शाह इमानुएल पहले ही से इस युद्ध के विरुद्ध थे, इस डर से कि नेपुल्स-नरेश आस्ट्रिया से [ १३६ ]
मेल करके कहीं हमारे मुल्क पर हमला न कर बैठे, इस विजय का समाचार मिला तो गेरीबाल्डी से अनुरोध किया कि अब आप नेपुल्स सरकार को और ज्यादा हैरान न करें जिसमें वह संयुक्त इटली का अंग बन सके। पर गेरीबाल्डी ने अपनी राय न बदली। पहले तो उसने सिसली से शाही फौज को निकाला, फिर इटली के दक्षिणी समुद्र तट पर उतर पड़ा। इसकी खबर पाते ही चारों ओर से जनता उसके दल में सम्मिलित होने के लिए टूटने लगी। मानो वह इसी की प्रतीक्षा में थी। अधिकतर स्थानों में नई अस्थायी सरकारें स्थापित हो गई और. ३१ अगस्त को जनता ने उभय सिसली के अधिनायक' (डिक्टेटर) की उपाधि जो नेपुल्स-नरेश को प्राप्त थी, गेरीबाल्डी को प्रदान कर दी। फ्रांसिस के होश उड़ गये। गेरीबाल्डी के विरुद्ध युद्ध घोषणा कर दी। पर तीन लड़ाइयों में से एक को भी परिणाम उसके लिए अच्छा न हुआ। ८ सितम्बर को गेरीबाल्डी नेपुल्स में दाखिल हुआ। इसके दूसरे दिन विक्टर इमानुएल वहाँ का बादशाह घोषित किया गया और सारे राज्य की प्रजा की सहमति से सिसली और नेपुल्स दोनों पेडमांट के राज्य में सम्मिलित कर दिये गये।

राष्ट्र की इस महत्त्वपूर्ण सेवा के बाद जो उसके जीवन को आधा कार्य कहा जा सकता है, गेरीबाल्डी ने अपनी सेना को तोड़ दिया और अपने जज़ीरे को लौट आया। अब केवल रोम और वेनिस वह स्थान थे, जो अभी कुछ पोप और अस्ट्रिया के पंजे में कैंसे हुए थे। दो साल तक वह अपने शान्तिकुटीर में बैठा हुआ इन उत्पीड़ित लोग में स्वाधीनता के भाव भरता रहा। अंत में उसकी कोशिशों का जादू चल गया और वेनिसवाले भी स्वाधीनता-प्राप्ति के प्रयास के लिए तैयार हो गये। अब क्या देर थी। गेरीबाल्डी तुरत चुने हुए वीरों की छोटी-सी सेना लेकर चल खड़ा हुआ। पर विक्टर इमानुएल को उसकी यह धृष्टता बुरी लगीं। प्रधान मन्त्री केयूर के मर जाने से इसके मन्त्रियों में कोई धीर साहसी पुरुष न रह गया था। सब के सब डर गये कि कहीं आस्ट्रियावाले हमारे पीछे न पड़ जायँ। इसलिए [ १३७ ]
गेरीबाल्डी को रोकने के लिए सेना भेजी। वह अपने देशवासियों से लड़ना न चाहता था। जहाँ तक हो सका बचता रहा, पर अन्त में घिर गया। और युद्ध अनिवार्य हो गया। संभव थी कि वह यहाँ से भी साफ़ निकल जाता, पर कई ऐसे गहरे घाव लगे कि लाचार हो घर लौट आया और कई महीने तक खाट सेता रहा।

सन् १८६४ ई० में गेरीबाल्डी इंगलैण्ड की सैर को गया। यहाँ जिस धूमधाम से उसका स्वागत किया गया, जिस ठाट से उसकी सवारी निकली, सम्राटों के आगमन के अवसरों पर भी वह मुशकिल से दिखाई दे सकती है। जो भीड़ गली-कूचों और खास ख़ास जगहो पर उसके दर्शन के लिए इकट्ठी हुई, वैसा जनसमुद्र कभी देखने में नहीं आया। यहाँ वह १० दिन तक रहा। सैकड़ों संस्थाओं ने मानपत्र दिये। कितने ही नगरों ने तलवारें और उपाधियाँ भेंट की। २२ अप्रैल को वह फिर अपने जज़ीरे को लौट आया।

इसी बीच आस्ट्रिया और प्रुशिया में युद्ध छिड़ गया। गेरीबाल्डी ने शत्रु को उधर फँसा देखकर अपनी उद्देश्य सिद्धि के उपाय सोच लिये। ११ जून १८६६ ई० का वह अचानक जिनेवा में आ पहुँचा और आस्ट्रिया के विरुद्ध विश्व खड़ा कर दिया। पर पहली ही लड़ाई में उसकी रान मैं ऐसा गहरा घाव लगा कि उसके योद्धाओ को पीछे हटना पड़ा। घाव भर जाने के बाद उसने कोशिश की कि फ्रांस के राज्य में चला जाय और उधर से शत्रु पर हमला करे। पर आस्ट्रिया की सेना ने यहाँ उसे फिर रोका और बड़ा घमासान युद्ध हुआ जिसमें विपक्ष ने करारी हार खाई। चुँकि आस्ट्रिया के लिए अकेले प्रुसिया से ही निबटना आसान न था, इसलिए दक्षिण के युद्ध की अपेक्षा उत्तर की ओर ध्यान देना उसे अधिक आवश्यक जान पड़ा। अतः सुलह की बातचीत होने लगी और युद्ध की शुभ समाप्ति हुई। सुदीर्घ काल के बाद वेनिसवालों की कामना पूर्ण हुई और वह भी इटली का एक प्रान्त बन गया [ १३८ ]१८६७ ई० में गेरीबाल्डी ने फिर रोम पर हमला करने की तैयारियाँ शुरू की। इटलीसरकार ने उसके रास्ते में बहुत रुकावटें डाली और उसे कैद भी कर दिया, पर वह इन सब विघ्न-बाधाओं को पार करता हुआ अन्त में फ्लोरेंस में आ पहुचा। इटली में अब पोप ही का राज्य ऐसा खण्ड रह गया था जहाँ राष्ट्रीय शासन न हो, और गेरीबाल्डी की आत्मा को तब तक शान्ति नहीं मिल सकती थी, जब तक कि वह इटली की एक-एक अंगुल जमीन को विदेशी शासन से मुक्त न कर ले। यद्यपि उसने दो बार रोम को. पोप के पंजे से निकालने का महाप्रयत्न किया, पर दोनों बार विफल रहा। ज्यों ही इसके फ्लोरेंस में आ पहुँचने की खबर मशहूर हुई, जनता में जोश फैल गया और कुछ ही दिनों में स्वयंसेवकों की खासी सेना उसके साथ हो गई। पोप की सेना भी तैयार थी। युद्ध आरंभ हो गया और यद्यपि पहली जीत गेरीबाल्डी के हाथ रही, पर दूसरी लड़ाई में फ्रांस और पोप की ख़ातिर तोप-बन्दूक का सामना करता है। और उसे प्रुशिया के पंजे में पड़ने से बचा लेता है।

फ्रांस और प्रुशिया में संधि हो जाने के बाद गेरीबाल्डी अपने घर लौट आया और चूँकि जाति को अब उसकी सामरिक योग्यता की आवश्यकता न थी, इसलिए अपने कुटुम्ब के साथ शान्ति से बुढ़ापे के दिन बिताने लगा। पर इस अवस्था में भी देश की ओर से उदासीन न रहता था, किंतु उसके शिल्प और उद्योग की उन्नति के उपाय सोचने में लगा रहता था। १८७५ ई० में वह बाल-बच्चों के साथ रोम की यात्रा को रवाना हुआ। यहाँ जिस ठाट से उसका स्वागत हुआ वह दुनिया के इतिहास मैं बेजोड़ घटना है। जब वह यहाँ से वापस चला तो २० हजार आदमी पैदल, राष्ट्रीय गीत गाते- बजाते उसे विदा करने आये। उसके सारे जीवन के आत्म-त्यागों के बदले में यही एक दृश्य पर्याप्त था।

गेरीबाल्डी का शेष जीवन कपरेरा मैं व्यतीत हुआ। यहाँ वह अपने बाल-बच्चों के साथ शाँन्ति से जीवन-यापन करता रहा। उसकी [ १३९ ]
इन्द्रियाँ शिथिल हो गई थीं, स्वास्थ्य और बल भी विदा हो चुकी थी; परन्तु श्रम से कुछ ऐसा सहज प्रम था कि अन्तिम क्षण तक कुछ न कुछ करता रहा। और जब सब शक्तियाँ जवाब दे चुकीं, तो बैठा उपन्यास लिखवाया करता। अन्त में १८८४ ई० में थोड़े दिन बीमार रहकर इस नश्वर जगत् से विदा हो गया। और एक ऐसे पुरुष की स्मृति छोड़ गया जो स्वदेश की सच्चा भक्त और राष्ट्र का ऐसा सेवक था, जिसने अपने अस्तित्व को उसके अस्तित्व में निमज्जित कर दिया था, और जो न केवल इटली का, किन्तु अखिल मानवजाति का मित्र और हितचिन्तक था। आज इसका नाम इटालियन जाति के एक-एक बच्चे की जबान पर है। इसके साहस, उदारता, ऊँचे हौसले और सौजन्य की सैकड़ों कथाएँ साधारण चर्चा का विषय हैं। शायद ही कोई शहर हो जिसने उसकी प्रतिमा स्थापित कर अपनी कृतज्ञता का परिचय न दिया हो। पर उसकी कार्यावली का सबसे बड़ा स्मारक वह विस्तृत राज्य है जो आल्प्स पर्वत से लेकर सिसली तक फैला हुआ है और वह राष्ट्र है जो आज इटालियन के नाम से प्रसिद्ध है।