कला और आधुनिक प्रवृत्तियाँ/जीवन और कला

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कला और आधुनिक प्रवृत्तियाँ  (1958) 
द्वारा रामचंद्र शुक्ल
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जीवन और कला

संसार की सम्पूर्ण सभ्यताओं का आधार मनुष्य की सुख पाने की अभिलाषा है। सुख की खोज में ही मनुष्य इतना आगे बढ़ पाया है। इस खोज के लिए मनुष्य तन-मन-धन तथा अपनी सम्पूर्ण चेतनाओं से निरन्तर रत रहता है। मनुष्य का कोई भी ऐसा काम नहीं जिसमें उसके सुख की आकांक्षा न छिपी हो। मनुष्य अभिलाषाओं की एक गठरी है और इन सभी अभिलाषाओं की वह पूर्ति करना चाहता है। एक ओर जैसे-जैसे उसकी अभिलाषाएँ पूर्ण होती जातीं वैसे-वैसे उसे अधिक सुख मिलता जाता है, और दूसरी ओर उसकी गठरी की अभिलाषाएँ बढ़ती जाती हैं। यही है मनुष्य का नित्य-प्रति का कार्य। यही है उसका जीवन। मनुष्य की अभिलाषाओं का न तो कभी अन्त ही है और न उसकी सुख की लालसा ही समाप्त होती है। यह एक प्रकार की मृगतृष्णा हुई।

इसी प्रकार की मृगतृष्णा का यह संसार है जिसमें प्रत्येक प्राणी अपनी-अपनी प्यास बुझाने के लिए व्याकुल है। न प्यास ही समाप्त होती है, न पानी ही। इस मृगतृष्णा से लोहा लेने के दो ही मार्ग हो सकते हैं। एक तो यह कि इस प्यास को भुलाने का प्रयत्न किया जाय और दूसरा यह कि इस प्यास को दृढ़ता के साथ शान्त करने के प्रयत्न किये जायँ। हम इसको भुलानेवालों में संसार से मुख मोड़े संन्यासियों को कह सकते हैं जो संसार की ओर से आँख बन्द कर लेते हैं। संसार के अन्य प्राणी इस प्यास को बुझानेवाले हैं जिसमें हम और आप सम्मिलित हैं। इसे हम जीवित रहने की कला कह सकते हैं।

कला, काम करने की वह शैली है जिसमें हमें सुख या आनन्द मिलता है। वैसे तो कला का नाम लेने पर हमें ललित-कलाओं, संगीत-कला, चित्र-कला, काव्य-कला, नृत्य-कला, इत्यादि का बोध होता है, परन्तु ये सभी कलाएँ जीने की कला के अन्तर्गत है या हम यों कह सकते हैं कि जीने की कला इन सभी की माता है। जीने की कला में अच्छी तरह सफल होना हमारे जीवन का लक्ष्य है, और सब कलाएँ इसमें योग देती हैं, जिस प्रकार एक बड़ी नदी में छोटी-छोटी अनेकों नदियाँ आकर मिलती जाती हैं और अपना योग देती [ ५९ ] हैं। अगर छोटी नदियाँ आ-आकर बड़ी नदी में न मिलें तो बड़ी नदी उस तेजी से आगे नहीं बढ़ सकती जैसा कि उसे बढ़ना चाहिए।

जीने की कला के अन्तर्गत संसार के सभी साधन आ जाते हैं। दर्शन, विज्ञान, कला, राजनीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्म, शिक्षा, स्वास्थ्य-शिक्षा और दूसरी सभी विद्याएँ हैं। जीने की कला का लक्ष्य है सुख या आनन्द की प्राप्ति और यही लक्ष्य और सभी कलाओं का है।

मनुष्य के इतिहास की ओर दृष्टि डालने से ज्ञात होता है कि सबसे पहले मनुष्य को इसी की चिन्ता हुई होगी कि वह सुखपूर्वक कैसे रह सकता है। सबसे पहले उसे अपनी सुरक्षा का ध्यान हुआ होगा जिसमें भूख पहली, दूसरी शरीर की रक्षा, तीसरी कुटुम्ब-निर्माण या समाज-निर्माण की लालसा। भूख के लिए अच्छे प्रकार के सुख और आनन्द देनेवाले खाद्य पदार्थों की खोज, शरीर की रक्षा के लिए सुख देनेवाले वस्त्रों, शस्त्रों, औषधियों की खोज, समाज-निर्माण के लिए सुख देनेवाले व्यवहारों की खोज, और सुख देनेवाली अनेकों वस्तुओं के निर्माण की धुन—यही प्रारम्भ से उसके जीवन का लक्ष्य रहा है। इसी के सुखदायक निर्वाह को हम जीवन की कला कहते हैं। सुख की प्राप्ति सुख देनेवाले ढंगों की खोज किये बिना नहीं हो सकती। अर्थात् सुख पाने के लिए कुछ नियम हो सकते हैं। इसलिए जो भी काम करना है उसे नियमित ढंग से ही करने में सुख की प्राप्ति होगी। जब हम किसी काम को नियमित ढंग से करते हैं तब हमें सुख मिलता है। जिस काम के करने में हमें सुख मिलता है उसी में हमें सौन्दर्य का दर्शन होता है। या हम यों कह सकते हैं, सुन्दरतापूर्वक कोई काम करने में हमें सुख मिलता है। इसलिए यदि हम किसी भी काम के करने में सुख की इच्छा करते हैं तो उसे सुन्दरतापूर्वक करना चाहिए। चित्रकला का ज्ञान हमें प्रत्येक कार्य को सुन्दरतापूर्वक करना सिखाता है। जीवन में यदि हम हर काम को सुन्दरतापूर्वक करें तो हमें सुख मिलेगा और यही सुख की प्राप्ति जीवन की कला का लक्ष्य है। इस तरह जीवन की कला में चित्रकला का कितना महान् योग है, यह बिलकुल स्पष्ट है। चित्र कला का ज्ञान प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यक है यदि वह अपने जीवन को सुखी बनाना चाहता है।

चित्रकला के विद्यार्थी का पहिला काम होता है प्रकृति निरीक्षण। चित्र बनाने से पहले उसे प्रकृति को देखना-सीखना पड़ता है। हर समय, चलते, उठते, बैठते, उसे अपने चारों ओर की वस्तुओं को रुचिपूर्वक देखना पड़ता है। प्रकृति की सुन्दरता का अध्ययन करना पड़ता है और प्रकृति का यह अध्ययन उसे जीवन पर्यन्त करना पड़ता है। प्रकृति अनन्त है, [ ६० ]उसकी सुन्दरता अनन्त है। इस अनन्त सुन्दरता का जो रसपान नहीं कर सकता वह चित्रकार हो ही नहीं सकता। एक बार प्रकृति की सुन्दरता का रसपान कर लेने पर उसके सामने सौन्दर्य का एक कोष खुल जाता है। उसमें से चित्रकार जितनी चाहे उतनी सुन्दरता अपनी रचना में भर सकता है। प्रकृति की सुन्दरता का निरन्तर रसपान करते रहने और उस सुन्दरता के आधार का पता लग जाने पर चित्रकार अपने चित्रों को भी सुन्दरता से भर सकता है।

आज का जीवन इतना व्यस्त है कि हमें प्रकृति की सुन्दरता का रसपान करने का समय ही नहीं मिलता। परन्तु प्रकृति की सुन्दरता का निरन्तर निरीक्षण करते रहने पर उसकी सुन्दरता का मंत्र चित्रकार को मिल जाता है। फिर वह उस प्यासे की भाँति जिसकी प्यास कभी बुझती ही नहीं, दिन-रात प्रकृति सुन्दरी के महासागर में गोते लगाता रहता है। और उसी से प्रभावित होकर अपनी रचना भी करता जाता है और तभी उसकी रचना भी महान् हो पाती है। वह जानता है फूलों में सुन्दरता कहाँ से आयी, कल-कल करती हुई नदियों को सुन्दरता कहाँ से मिली, आकाश में, पृथ्वी पर, जल में, वृक्षों में, पक्षियों में, जीव-जन्तुओं में, कीड़े-मकोड़ों में, उमड़ते-घमड़ते बादलों में, सूर्य की किरणों में, चाँद की चाँदनी में और मनुष्य में सुन्दरता कहाँ छिपी है। यह बृहत् ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही चित्रकार महान् हो पाता है और महान् रचना कर पाता है। चित्रकला का कार्य बिना इस ज्ञान के आगे बढ़ नहीं सकता। चित्रकार को प्रकृति का प्रेमी बनना पड़ता है और ऐसा प्रेमी जो पल भर के लिए भी अपनी प्रेयसी को भुला नहीं सकता।

जब चित्रकार और प्रकृति का सम्बन्ध प्रेमी और प्रेयसी का है तो प्रेमी अपनी प्रेयसी को क्षण भर के लिए भी आँखों से ओझल नहीं कर सकता और अकस्मात् यदि उसकी प्रेयसी को दुःख होता है, चोट पहुंचती है, तो वह उसे कदापि नहीं सहन कर सकता। उसकी प्रेयसी को चोट उसके ही भाई-बन्धु लगा सकते हैं। जापान में एटम बम गिरा। हिरोशिमा की सारी प्रकृति नष्ट-भ्रष्ट हो गयी। पिछले महायुद्ध में करोड़ों मनुष्य काल-कवलित हुए, घायल हए और कुरूप हो गये। बीमारी, महामारी, भूख और तड़प ने लोगों को जर्जर कर दिया। सुकुमार बच्चों, कोमल युवतियों और अनेकों प्राणियों की सुन्दरता छिन गयी। यह सब किसने किया? मनुष्य ने अपनी सुन्दरता को अपने आप बिगाड़ लिया। कोई कलाकार क्या कभी ऐसा कर सकता है? या सोच सकता है? वह इसे कभी सहन नहीं कर सकता और यदि सब में यही कलाकार की भावना हो तो ऐसे कुरूप दृश्य देखने का कदाचित् ही किसी को अवसर मिले।

आज हमारा समाज कुरूप और विकृत हो चुका है। ऊँच-नीच का भाव, आपस का [ ६१ ]कलह और मनमुटाव, एक-दूसरे को क्षति पहुँचाने की भावना, एक को दबाकर स्वयं ऊपर बढ़ने का प्रयत्न, लालच, झुठाई, अमानुषिक व्यवहार इतने बढ़ गये हैं कि उनका प्रतिरोध कठिन हो गया है। देश के नेता, सुधारक, उच्च पदाधिकारी, इस भयानक बाढ़ को अपने भाषणों, लेखों इत्यादि से दूर करने के लिए कटिबद्ध हैं, परन्तु इस कार्य में जो सफलता मिल रही है वह भी हमारे सामने है।

समाज की यह बर्बरता लेखों और भाषणों से इस तरह दूर नहीं की जा सकती। जब तक समाज एक सुन्दर समाज नहीं बन जाता, जब तक समाज का एक-एक व्यक्ति समाज को सुन्दर बनाने में योग नहीं देगा, जब तक समाज के प्रत्येक प्राणी को सौन्दर्य प्राप्ति का मार्ग नहीं मालूम हो जायगा, जब तक उसको प्रकृति से प्रेम न हो जायगा, तब तक, न उसके विचार ही बदलेंगे, न वह अपनी हरकत से बाज आयेगा। यदि सचमुच हमें अपने समाज को सुन्दर, सुगठित, सुदृढ़ बनाना है, तो हमें ध्वंसात्मक वृत्तियों का दमन कर रचनात्मक वृत्तियों का स्वागत करना सीखना होगा और सिखाना होगा। यह ध्रुव सत्य है, कि अगर एक बार मनुष्य को रचना या सृष्टि का आनन्द मिल गया तो फिर वह स्वप्न में भी ध्वंसात्मक वृत्ति की भावना नहीं ला सकता। उसका सम्पूर्ण समय, उसकी पूरी शक्ति, उसका तन, मन, धन, सभी रचना के कार्य में लगेगा और फिर यह असम्भव है कि वह निर्माण के बदले ध्वंस करने की सोचे। जिस काम में उसने अपने को निछावर कर दिया है उसे नष्ट-भ्रष्ट होते वह कैसे देख सकता है?

निर्माण की इस प्रवृत्ति को हमें अपने में फिर से जगाना होगा। निर्माण के ही आधार पर हम अपने समाज तथा जीवन को पुनः सुन्दर बना सकते हैं। आज आवश्यकता है कि भारत का बच्चा-बच्चा, युवक-युवतियाँ, वृद्धवृद्धाएँ, रचना के कार्य में संलग्न हो जायँ। विद्यालयों में, गृह-उद्योगों पर, रचना के कार्य पर, अधिक ध्यान देना इस समय हमारा मुख्य प्रयोजन होना चाहिए। रचना का ही दूसरा नाम कला है।

प्रत्येक मनुष्य के सम्मुख, जो संसार में आया है, सबसे जटिल समस्या अपने चारों ओर के वातावरण से हाथापाई करना रही है। यह भी बिलकुल सत्य है कि इस वातावरण का सामना अकेले करना उसके लिए कठिन है। उसका जीवन इतना छोटा है कि अगर वह केवल अपने अनुभव से ही इस संसार को समझना चाहे और उसी के अनुसार बिना दूसरों की सहायता के जीवित रहना चाहे, तो उसका सारा समय समाप्त हो जायगा और इस अपरिमित संसार के एक छोर का भी उसे पता न लग सकेगा। ऐसी स्थिति में उसके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह दूसरों के अनुभव का भी सहारा ले और [ ६२ ] उससे लाभ उठाये। वह दूसरों के अनुभवों को ग्रहण करता है और उन्हीं अनुभवों को अपने अनुभव की नींव बनाता है। इस प्रकार अनुभव की मंजिल ऊपर ऊठती चली जाती है। यही है समाज की उन्नति का ढंग।

इस प्रकार समाज का यह नियम है कि प्रत्येक मनुष्य पहले समाज के अनुभवों को ग्रहण करता है, फिर उन्हीं के सहारे वह स्वयं अनुभव करता है और अन्त में समाज की उन्नति के लिए वह अपने अनुभवों को समाज को दान करता है। संसार में रहनेवाले हर व्यक्ति के लिए ये तीन बातें नितान्त आवश्यक हैं, चाहे वह योद्धा हो, पण्डित हो, व्यवसायी हो या मजदूर हो। चित्रकार भी इन्हीं में से एक है। उसको भी इन तीन नियमों का पालन करना आवश्यक है।

चित्रकार भी पहले समाज के अनुभवों को ग्रहण करता है और अपने अनुभवों को चित्रों में रखता है। चित्र बनने तक उसने समाज के दो नियमों का पालन किया। अब तीसरा नियम समाज को अपने अनुभव का दान करना बाकी रह गया। वह चित्रकार तभी कर सकता है जब अपने चित्रों को समाज के सम्मुख रखे। इसलिए चित्रकार अपने चित्रों का प्रदर्शन करता है, उसके चित्र प्रदर्शनियों में, पत्र-पत्रिकाओं में और अन्य जो भी माध्यम हो सकते हैं, उनके द्वारा वह अपने चित्रों का प्रदर्शन करता है।


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