गबन/भाग 41

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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सहृदयता सैकड़ों धमकियों से कहीं कारगर हो जाती है। इंस्पेक्टर साहब ने मौका ताड़ लिया। उसका पक्ष लेकर डिप्टी से बोले हलफ से कहता हूं, आप लोग आदमी को पहचानते तो हैं। नहीं, लगते हैं रोब जमाने। इस तरह गवाही देना हर एक समझदार आदमी को बुरा मालूम होगा। यह कुदरती बात है। जिसे जरा भी इज्जत का खयाल है,वह पुलिस के हाथों की कठपुतली बनना पसंद न करेगा। बाबू साहब की जगह मैं होता तो मैं भी ऐसा ही करता; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह हमारे खिलाफ शहादत देंगे। आप लोग अपना काम कीजिए, बाबू साहब की तरफ से बेफिक्र रहिए, हलफ से कहता हूं।

उसने रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला-आप मेरे साथ चलिए,बाबूजी । आपको अच्छे-अच्छे रिकार्ड सुनाऊ।

रमा ने रूठे हुए बालक की तरह हाथ छुड़ाकर कहा-मुझे दिक न कीजिए इंस्पेक्टर साहब। अब तो मुझे जेलखाने में मरना है।

इंस्पेक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा-आप क्यों ऐसी बातें मुंह से निकालते हैं। साहब। जेलखाने में मरें आपके दुश्मन।

डिप्टी ने तसमा भी बाकी न छोड़ना चाहा। बड़े कठोर स्वर में बोला; मानो रमा से कभी का परिचय नहीं है-साहब, यों हम बाबू साहब के साथ सब तरह का सलूक करने को तैयार हैं, लेकिन जब वह हमारा खिलाफ गवाही देगा, हमारा जड़ खोदेगा, तो हम भी कार्रवाई करेगा। जरूर से करेगा। कभी छोड़ नहीं सकता।

इसी वक्त सरकारी एडवोकेट और बैरिस्टर मोटर से उतरे।

इकतालीस

रतन पत्रों में जालपा को तो ढांढस देती रहती थी पर अपने विषय में कुछ न लिखती थी। जो आप ही व्यथित हो रही हो, उसे अपनी व्यथाओं की कथा क्या सुनाती ! वही रतन जिसने रुपयों की कभी कोई हकीकत न समझी, इस एक ही महीने में रोटियों को भी मुहताज हो गई थी। उसका वैवाहिक जीवन सुखी न हो; पर उसे किसी बात का अभाव न था। मरियल घोड़े पर सवार होकर भी यात्रा पूरी हो सकती है अगर सड़क अच्छी हो; नौकर-चाकर, रुपये-पैसे और भोजन आदि की सामग्री साथ हो। घोड़ा भी तेज हो, तो पूछना ही क्या रतन की दशा उसी सवार की-सी थी। उसी सवार की भाँति यह मंदगति से अपनी जीवन-यात्रा कर रही थी। कभी-कभी वह घोड़े पर झुंझलाती होगी, दूसरे सवारों को उड़े जाते देखकर उसकी भी इच्छा होती होगी कि मैं भी इसी तरह उड़ती, लेकिन वह दुखी न थी, अपने नसीबों को रोती न थी। वह उस गाय की तरह थी, जो एक पतली-सी पगहिया के बंधन में पड़कर, अपनी नाद के भूसे-खली में मगन रहती है। सामने हरे-हरे मैदान हैं, उसमें सुगंधमय घासे लहरा रही हैं; पर वह पगहिया तुड़ाकर कभी उघर नहीं जाती। उसके लिए उस पगहिया और लोहे की जंजीर में कोई अंतर नहीं। यौवन को प्रेम की इतनी क्षुधा नहीं होती; जितनी आत्म-प्रदर्शन की। प्रेम की [ १८५ ]
क्षुधा पीछे आती है। रतन को आत्म-प्रदर्शन के सभी साधन मिले हुए थे। उसकी युवती आत्मा अपने शृगांर और प्रदर्शन में मग्न थी। हंसी-विनोद, सैर-सपाटा, खाना-पीना, यही उसको जीवन था, जैसा प्रायः सभी मनुष्यों का होता है। इससे गहरे जल में जाने की न उसे इच्छा थी, न प्रयोजन। संपन्नता बहुत कुछ मानसिक व्यथाओं को शांत करती है। उसके पास अपने दुःखों को भुलाने के कितने ही ढंग हैं–सिनेमा है, थिएटर है, देश-भ्रमण है, ताश है, पालतू जानवर हैं, संगीत है, लेकिन विपन्नता को भुलाने का मनुष्य के पास कोई साधन नहीं, इसके सिवा कि वह रोए, अपने भाग्य को कोसे या भंसार से विरक्त होकर आत्म-हत्या कर ले। रतन की तकदीर ने पलटा खाया था। सुख का स्वप्न भंग हो गया था और विपन्नता का कंकाल अब उसे ख़ड़ा घूर रहा था।

और यह सब हुआ अपने ही हाथों पंडितजी उन प्राणियों में थे, जिन्हें मौत की फिक्र नहीं होती। उन्हें किसी तरह यह भ्रम हो गया था कि दुर्बल स्वास्थ्य के मनुष्य अगर पथ्य और विचार से रहें, तो बहुत दिनों तक जी सकते हैं। वह पथ्य और विचार की सीमा के बाहर कभी न जाते। फिर मौत को उनसे क्या दुश्मनी थी, जो ख्वामख्वाह उनके पीछे पड़ती। अपनी वसीयत लिख डालने का खयाल उन्हें उस वक्त आया, जब वह मरणासन्न हुए; लेकिन रतन वसीयत का नाम सुनते ही इतनी शोकातुर, इतनी भयभीत हुई कि पंडितजी ने उस वक्त टाल जाना ही उचित समझा। तब से फिर उन्हें इतना होश न आया कि वसीयत लिखवाते।

पंडितजी के देहावसान के बाद रतन का मन इतना विरक्त हो गया कि उसे किसी बात को भी सुध-बुध न रही। यह वह अवसर था, जब उसे निशेष रूप से सावधान रहना चाहिए था। इस भांति सतर्क रहना चाहिए थी, मानो दुश्मनों ने उसे घेर रक्खा हो; पर उसने सब कुछ मणिभूषण पर छोड़ दिया और उसी मणिभूषण ने धीरे-धीरे उसकी सारी संपत्ति अपहरण कर ली। ऐसे-ऐसे षड्यंत्र रचे कि सरला रतन को उसके कपट-व्यवहार का आभास तक न हुआ। फंदा जब खूब कस गया, तो उसने एक दिन आकर कहा--आज बंगला खाली करना होगा। मैंने इसे बेच दिया है।

रतन ने जरा तेज होकर कहा- मैंने तो तुमसे कहा था कि मैं अभी बंगला न बेचूंगी।

मणिभूषण ने विनय का आवरण उतार फेंका और त्योरी चढ़ाकर बोला-आपमें बातें भूल जाने की बुरी आदत है। इसी कमरे में मैंने आपसे यह जिक्र किया था और आपने हामी भरी थी। जब मैंने बेच दिया, तो आप यह स्वांग खड़ा करती हैं। बंगला आज खाली करना होगा और आपको मेरे साथ चलना होगा।

मैं अभी यहीं रहना चाहती हूं।'

'मैं आपको यहां न रहने दूंगा।'

'मैं तुम्हारी लौंड़ी नहीं हूं।'

'आपकी रक्षा का भार मेरे ऊपर है। अपने कुल की मर्यादा-रक्षा के लिए मैं आपको अपने साथ ले जाऊंगा।'

रतन ने होंठ चबाकर कहा-मैं अपनी मर्यादा की रक्षा आप कर सकती हूं। तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं। मेरी मर्जी के बगैर तुम यहां कोई चीज नहीं बेच सकते। [ १८६ ]मणिभूषण ने वज्र-सा मारा-आपका इस घर पर और चाचाजी की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं। वह मेरी संपत्ति है। आप मुझसे केवल गुजारे का सवाल कर सकती हैं।

रतन ने विस्मित होकर कहा-तुम कुछ भंग तो नहीं खा गए हो?

मणिभूषण ने कठोर स्वर में कहा मैं इतनी भंग नहीं खाता कि बेसिर-पैर की बातें करने लगे। आप तो पढ़ी-लिखी हैं,एक बड़े वकील की धर्मपत्नी हैं। कानून की बहुत-सी बातें जानती होंगी। सम्मिलित परिवार में विधवा का अपने पुरुष की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता। चाचाजी और मेरे पिताजी में कभी अलगौझा नहीं हुआ। चाचाजी यहां थे,हम लोग इंदौर में थे,पर इससे यह नहीं सिद्ध होता कि हममें अलगौझा था। अगर चाचा अपनी संपत्ति आपको देना चाहते,तो कोई वसीयत अवश्य लिख जाते और यद्यपि वह वसीयत कानून के अनुसार कोई चीज न होती,पर हम उसका सम्मान करते। उनका कोई वसीयत न करता साबित कर रहा है कि वह कानून के साधारण व्यवहार में कोई बाधा न डालना चाहते थे। आज आपको बंगला खाली करना होगा। मोटर और अन्य वस्तुएं भी नीलाम कर दी जाएंगी। आपकी इच्छा हो, मेरे साथ चलें या रहें। यहां रहने के लिए आपको दस-ग्यारह रुपये का मकान काफी होगी गुजारे के लिए पचास रुपये महीने का प्रबंध मैंने कर दिया है। लेना-देना चुका लेने के बाद इससे ज्यादा की गुंजाइश ही नहीं।

रतन ने कोई जवाब न दिया। कुछ देर वह हतबुद्धि-सी बैठी रही, फिर मोटर मंगवाई और सारे दिन वकीलों के पास दौड़ती फिरी। पंडितजी के कितने ही वकील मित्र थे। सभी ने उसका वृत्तांत सुनकर खेद प्रकट किया और वकील साहब के वसीयत न लिख जाने पर हैरत करते रहे। अब उसके लिए एक ही उपाय था। वह यह सिद्ध करने की चेष्टा करे कि वकील साहब और उनके भाई में अलहदगी हो गई थी। अगर यह सिद्ध हो गया और सिद्ध हो जाना बिल्कुल आसान था, तो रतन उस संपत्ति की स्वामिनी हो जाएगी। अगर वह यह सिद्ध न कर सकी, तो उसके लिए कोई चारा न था।

अभागिनी रतन लौट आई। उसने निश्चय किया, जो कुछ मेरा नहीं है,उसे लेने के लिए मैं झूठ का आश्रय न लूंगी। किसी तरह नहीं। मगर ऐसा कानून बनाया किसने? क्या स्त्री इतनी नीच, इतनी तुच्छ,इतनी नगण्य है? क्यों?

दिन-भर रतन चिंता में डूबी, मौन बैठी रही। इतने दिनों वह अपने को इस घर की स्वामिनी समझती रही। कितनी बड़ी भूल थी। पति के जीवन में जो लोग उसका मुंह ताकते थे,वे आज उसके भाग्य के विधाता हो गए। यह घोर अपमान रतन-जैसी मानिनी स्त्री के लिए असह्य था। माना,कमाई पंडितजी की थी, पर यह गांव तो उसी ने खरीदा था,इनमें से कई मकान तो उसके सामने ही बने। उसने यह एक क्षण के लिए भी न खयाल किया था कि एक दिन यह जायदाद मेरी जीविका का आधार होगी। इतनी भविष्य-चिंता वह कर ही न सकती थी। उसे इस जायदाद के खरीदने में, उसके संवारने और सजाने में वही आनंद आता था,जो माता अपनी संतान को फलते-फूलते देखका पाती है। उसमें स्वार्थ का भाव न था,केवल अपनेपन का गर्व था,वही ममता थी,पर पति की आंखें बंद होते ही उसके पाले और गोद के खेलाए बालक भी उसकी गोद से छीन लिए गए। उसका उन पर कोई अधिकार नहीं। अगर वह [ १८७ ]
जानती कि एक दिन यह कठिन समस्या उसके सामने आएगी,तो वह चाहे रुपये को लुटा देती यो दान कर देती,पर संपत्ति की कील अपनी छाती पर न गाड़ती। पंडितजी की ऐसी कौन बहुत बड़ी आमदनी थी। क्या गर्मियों में वह शिमले न जा सकती थी? क्या दो-चार और नौकर न रक्खे जा सकते थे? अगर वह गहने ही बनवाती,तो एक-एक मकान के मूल्य का एक-एक गहना बनवा सकती थी,पर उसने इन बातों को कभी उचित सीमा से आगे न बढ़ने दिया। केवल यही स्वप्न देखने के लिए। यही स्वप्न। इसके सिवा और था ही क्या । जो कल उसका था उसकी ओर आज आंखें उठाकर वह देख भी नहीं सकता। कितना महंगा था वह स्वप्न! हां,वह अब अनाथिनी थी। कल तक दूसरों को भीख देती थी,आज उसे खुद भीख मांगनी पड़ेगी और कोई आश्रय नहीं । पहले भी वह अनाथिनी थी, केवल भ्रम-वश अपने को स्वामिनी समझ रही थी। अब उस भ्रम को सहारा भी नहीं रहा ।

सहसा विचारों ने पलटा खाया। मैं क्यों अपने को अनाथिनी समझ रही हूं क्यों दूसरों के द्वार पर भीख मांगू? संसार में लाखों ही स्त्रियां मेहनत-मजदूरी करके जीवन का निर्वाह करती हैं। क्या मैं कोई काम नहीं कर सकती? मैं कपड़ा क्या नहीं सी सकती? किसी चीज की छोटी-मोटी दुकान नहीं रख सकती? लड़के भी पढ़ा सकती हैं। यही न होगा, लोग हंसेंगे,मगर मुझे उस हंसी कि क्या परवा। वह मेरी हंसी नहीं है, अपने समाज की हंसी है।

शाम को द्वार पर कई ठेले वाले आ गए। मणिभूषण ने आकर कहा-चाचीजी, आप जोजो चीजें कहें लदवाकर भिजवा दें। मैंने एक मकान ठीक कर लिया है।

रतन ने कहा-मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं। न तुम मेरे लिए मकान लो। जिस चीज पर मेरा कोई अधिकार नहीं, वह मैं हाथ से भी नहीं छू सकती। मैं अपने घर से कुछ लेकर नहीं आई थी। उसी तरह लौट जाऊंगी।

मणिभूषण ने लज्जित होकर कहा-आपका सब कुछ है, यह आप कैसे कहती हैं कि आपका कोई अधिकार नहीं। आप वह मकान देख लें। पंद्रह रुपया किराया है। मैं तो समझता हुँ आपको कोई कष्ट न होगा। जो-जो चीजें आप कहें, मै वहां पहुंचा दूँ।

रतन ने व्यंग्यमय आंखों से देखकर कहा-तुमने पंद्रह रुपये का मकान मेरे लिए व्यर्थ लिया | इतना बड़ा मकान लेकर मैं क्या करूंगी ! मेरे लिए एक कोठरी काफी है, जो दो रुपये में मिल जायगी। सोने के लिए जमीन है ही। दया का बोझ सिर पर जितना कम हो, उतना ही अच्छा !

मणिभूषण ने बड़े विनम्र भाव से कहा-आखिर आप चाहती क्या हैं? उसे कहिए तो ।

रतन उत्तेजित होकर बोली-मैं कुछ नहीं चाहती। मैं इस घर का एक तिनका भी अपने साथ न ले जाऊंगी। जिस चीज पर मेरा कोई अधिकार नहीं, वह मेरे लिए वैसी ही है जैसी किसी गैर आदमी की चीज। मैं दया की भिखिरिणी न बनूंगी। तुम इन चीजों के अधिकारी हो, ले जाओ। मैं जरा भी बुरा नहीं मानती । दया की चीज न जबरदस्ती ली जा सकती है, न जबरदस्ती दी जा सकती है। संसार में हजारों विधवाएं हैं, जो मेहनत-मजूरी करके अपना निर्वाह कर रही हैं। मैं भी वैसे ही हूं। मैं भी उसी तरह मजूरी करूंगी और अगर न कर सकूंगी, तो किसी गड्ढे में डूब मरूंगी। जो अपना पेट भी न पाल सके, उसे जीते रहने का, [ १८८ ]
दूसरों का बोझ बनने का कोई हक नहीं है।

यह कहती हुई रतन घर से निकली और द्वार की ओर चली।

मणिभूषण में उसका रास्ता रोककर कहा-अगर आपकी इच्छा न हो,तो मैं बंगला अभी न बेचें।

रतन ने जलती हुई आँखों से उसकी ओर देखा। उसका चेहरा तमतमाया हुआ था। आंसुओं के उमड़ते हुए वेग को रोककर बोली- मैंने कह दिया,इस घर की किसी चीज से मेरा नाता नहीं है। मैं किराए की लौंड़ी थी। लौड़ी का घर से क्या संबंध है ! न जाने किस पापी ने यह कानून बनाया था। अगर ईश्वर कहीं है और उसके यहां कोई न्याय होता है,तो एक दिन उसी के सामने उस पापी से पूछूगी,क्या तेरे घर में मां-बहनें न थीं? तुझे उनका अपमान करते लज्जा न आई? अगर मेरी जबान में इतनी ताकत होती कि सारे देश में उसकी आवाज पहुंचती,तो मैं सब स्त्रियों से कहती-बहनो,किसी सम्मिलित परिवार में विवाह मत करना और अगर करना तो अब तक अपना घर अलग न बना लो,चैन की नींद मत सोना। यह मत समझो कि तुम्हारे पति के पीछे उस घर में तुम्हारा मान के साथ पालन होगा। अगर तुम्हारे पुरुष ने कोई तरका नहीं छोड़ा,तो तुम अकेली रहो चाहे परिवार में,एक ही बात है। तुम अपमान और मजूरी से नहीं बच सकतीं। अगर तुम्हारे पुरुष ने कुछ छोड़ा है तो अकेली रहकर तुम उसे भोग सकती हो,परिवार में रहकर तुम्हें उससे हाथ धोना पड़ेगा। परिवार तुम्हारे लिए फूलों की सेज नहीं,कांटों की शय्या है, तुम्हारा पार लगाने वाली नौका नहीं, तुम्हें निगल जाने वाला जंतु।

संध्या हो गई थी। गर्द से भरी हुई फागुन की वायु चलने वालों की आंखों में धूल झोंक रही थी। रतन चादर संभालती सड़क पर चली जा रही थी। रास्ते में कई परिचित स्त्रियों ने उसे टोका, कई ने अपनी मोटर रोक ली और उसे बैठने को कहा; पर रतन को उनकी सहृदयता इस समय बाण-सी लग रही थी। वह तेजी से कदम उठाती हुई जालपा के घर चली जा रही थी। आज उसका वास्तविक जीवन आरंभ हुआ था।

बयालीस


ठीक दस बजे जालपा और देवीदीन कचहरी पहुंच गए। दर्शकों को काफी भीड़ थी। ऊपर की गैलरी दर्शकों से भरी हुई थी। कितने ही आदमी बरामदों में और सामने के मैदान में खड़े थे। जालपा ऊपर गैलरी में जा बैठी। देवीदीन बरामदे में खड़ा हो गया।

इजलास पर जज साहब के एक तरफ अहलमद थी और दूसरी तरफ पुलिस के कई कर्मचारी खड़े थे। सामने कठघरे के बाहर दोनों तरफ के वकील खड़े मुकदमा पेश होने का इंतजार कर रहे थे। मुलजिमों की संख्या पंद्रह से कम न थी। सब कठघरे के बगल में जमीन पर बैठे हुए थे। सभी के हाथों में हथकड़ियां थीं, पैरों में बेड़ियां। कोई लेटा था,कोई बैठा था,कोई आपस में बातें कर रहा था। दो पंजे लड़ा रहे थे। दो में किसी विषय पर बहस हो रही थी। सभी प्रसन्न-चित्त थे। घबराहट,निराशा या शोक का किसी के चेहरे पर चिन्ह भी न था।

ग्यारह बजते-बजते अभियोग को पेशी हुई। पहले जाते की कुछ बातें हुई, फिर दो [ १८९ ]
एक पुलिस की शहादतें हुईं। अंत में कोई तीन बजे रमानाथ गवाहों के कठघरे में लाया गया। दर्शकों में सनसनी-सी फैल गई। कोई तंबोली की दुकान से पान खाता हुआ भागा, किसी ने समाचार-पत्र को मरोड़कर जेब में रखा और सब इजलास के कमरे में जमा हो गए। जालपा भी संभलकर बारजे में खड़ी हो गई। वह चाहती थी कि एक बार रमा की आंखें उठ जातीं और वह उसे देख लेती, लेकिन रमा सिर झुकाए खड़ा था, मान वह इधर-उधर देखते डर रहा हो। उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। कुछ सहमा हुआ, कुछ घबराया हुआ इस तरह खड़ा था, मानो उसे किसी ने बांध रखी है और भागने की कोई राह नहीं है। जालपा का कलेजा धकधक कर रहा था, मानो उसके भाग्य का निर्णय हो रहा हो।

रमा का बयान शुरू हुआ। पहला ही वाक्य सुनकर जालपा सिहर उठी, दूसरे वाक्य ने उसको त्योरियों पर बल डाल दिए, तीसरे वाक्य ने उसके चेहरे का रंग फीका कर दिया और चौथा वाक्य सुनते ही वह एक लंबी सांस खींचकर पीछे रखी हुई कुरसी पर टिक गई; मगर फिर दिल न माना। जंगले पर झुककर फिर उधर कान लगा दिए। वही पुलिस की सिखाई हुई शहादत थी जिसका आशय वह देवीदीन के मुंह से सुन चुकी थी। अदालत में सन्नाटा छाया हुआ था। जालपा ने कई बार खांसा कि शायद अब भी रमा की आंखें ऊपर उठ जाएं; लेकिन रमा का सिर और भी झुक गया। मालूम नहीं, उसने जालपा के खांसने की आवाज पहचान ली या आत्म-ग्लानि का भाव उदय हो गया। उसका स्वर भी कुछ धीमा हो गया।

एक महिला ने जो जालपा के साथ ही बैठी थी,नाक सिकोड़कर कहा-जी चाहता है,इस दुष्ट को गोली मार दें। ऐसे-ऐसे स्वार्थी भी इस देश में पड़े हैं जो नौकरी या थोड़े-से धन के लोभ में निरपराधों के गले पर छुरी फेरने से भी नहीं हिचकते !

जालपा ने कोई जवाब न दिया।

एक दूसरी महिला ने जो आंखों पर ऐनक लगाए हुए थी,निराशा के भाव से कहा इस अभागे देश का ईश्वर ही मालिक है। गवर्नरी तो लाला को कहीं नहीं मिल जाती ! अधिक-सेअधिक कहीं क्लर्क हो जाएंगे। उसी के लिए अपनी आत्मा की हत्या कर रहे हैं। मालूम होता है,कोई मरभुखा,नीच आदमी है; पल्ले सिरे का कमीना और छिछोरा।

तीसरी महिला ने ऐनक वाली देवी से मुस्कराकर पूछा-आदमी फैशनेबुल है और पढ़ालिखा भी मालूम होता है। भला,तुम इसे पा जाओ तो क्या करो?

ऐनकबाज देवी ने उदंडता से कहा-नाक काट लें । बस नकटा बनाकर छोड़ दें।

'और जानती हो, मैं क्या करूं?'

'नहीं ! शायद गोली मार दो ।'

'ना ! गोली न मारू। सरे बाजार खड़ा करके पांच सौ जूते लगवाऊं। चांद गंजी हो जाय !'

'उस पर तुम्हें जरा भी दया नहीं आयगी?'

'यह कुछ कम दया है? उसकी पूरी सजा तो यह है कि किसी ऊंची पहाड़ी से ढकेल दिया जाय ! अगर यह महाशय अमेरीका में होते, तो जिन्दा जला दिये जाते !'

एक वृद्धा ने इन युवतियों का तिरस्कार करके कहा-क्यों व्यर्थ में मुंह खराब करती हो? [ १९० ]
वह घृणा के योग्य नहीं, दया के योग्य है। देखती नहीं हो, उसका चेहरा कैसा पीला हो गया है,जैसे कोई उसका गला दबाए हुए हो। अपनी मां या बहन को देख ले,तो जरूर रो पड़े। आदमी दिल का बुरा नहीं है। पुलिस ने धमकाकर उसे सीधा किया है। मालूम होता है,एक-एक शब्द उसके हृदय को चीर-चीरकर निकल रहा हो।

ऐनक वाली महिला ने व्यंग किया—जब अपने पांव कांटा चुभता है, तब आह निकलती।

जालपा अब वहां न ठहर सकी। एक-एक बात चिंगारी की तरह उसके दिल पर फफोले डाले देती थी। ऐसा जी चाहता था कि इसी वक्त उठकर कह दे,यह महाशय बिल्कुल झूठ बोल रहे हैं, सरासर झूठ, और इसी वक्त इसका सबूत दे दे। वह इस आवेश को पूरे बल से दबाए हुए थी। उसका मन अपनी कायरता पर उसे धिक्कार रहा था। क्यों वह इसी वक्त सारा वृत्तांत नहीं कह सुनाती। पुलिस उसकी दुश्मन हो जायगी,हो जाय। कुछ तो अदालत को खयाल होगा। कौन जाने, इन गरीबों की जान बच जाय । जनता को तो मालूम हो जायगा कि यह झूठी शहादत है। उसके मुह से एक बार आवाज निकलते-निकलते रह गई। परिणाम के भय ने उसकी जबान पकड़ ली।

आखिर उसने वहां से उठकर चले आने ही में कुशल समझी।

देवीदीन उसे उतरते देखकर बरामदे में चला आया और दया से सने हुए स्वर में बोला-क्या घर चलती हो, बहूजी?

जालपा ने आंसुओं के वेग को रोककर कहा-हां, यहां अब नहीं बैठा जाता।

हाते के बाहर निकलकर देवीदीन ने जालपा को सांत्वना देने के इरादे से कहा-पुलिस ने जिसे एक बार बूटी सुंघा दी,उस पर किसी दूसरी चीज का असर नहीं हो सकता।

जालपा ने घृणा-भाव से कहा-यह सब कायरों के लिए है।

कुछ दूर दोनों चुपचाप चलते रहे। सहसा जालपा ने कहा-क्यों दादा, अब और तो कही अपील न होगी? कैदियों का यह फैसला हो जायगा।

देवीदीन इस प्रश्न का आशय समझ गया। बोला-नहीं,हाईकोर्ट में अपील हो सकती है।

फिर कुछ दूर तक दोनों चुपचाप चलते रहे। जालपा एक वृक्ष की छांह में खड़ी हो गई और बोली-दादा,मेरा जी चाहता है,आज जज साहब से मिलकर सारा हाल कह दूं। शुरू से जो कुछ हुआ,सब कह सुनाऊं। मैं सबूत दे दूंगी,तब तो मानेंगे?

देवीदीन ने आंखें फाड़कर कहा-जज साहब से । जालपा ने उसकी आंखों से आंखें मिलाकर कहा- हां !

देवीदीन ने दुविधा में पड़कर कहा-मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता, बहूजी । हाकिम का वास्ता। न जाने चित पड़े या पट।

जालपा बोली-क्या पुलिस वालों से यह नहीं कह सकता कि तुम्हारी गवाह बनाया हुआ है?

'कह तो सकता है।'

‘तो आज मैं उससे मिलूं। मिले तो लेता है?' [ १९१ ]
'चलो, दरियाफ्त करेंगे, लेकिन मामला जोखिम है।'

'क्या जोखिम है, बताओ?'

‘भैया पर कहीं झूठी गवाही का इल्जाम लगाकर सजा कर दे तो?'

'तो कुछ नहीं। जो जैसा करे,वैसा भोगे।'

देवीदीन ने जालपा की इस निर्ममता पर चकित होकर कहा-एक दूसरा खटका है। सबसे बड़ा डर उसी का है।

जालपा ने उद्धत भाव से पूछा-वह क्या?

देवीदीन-पुलिस वाले बड़े काफर होते हैं। किसी का अपमान कर डालना तो इनकी दिल्लगी है। जज साहब पुलिस कमिसनर को बुलाकर यह सब हाल कहेंगे जरूर। कमिसनर सोचेंगे कि यह औरत सारा खेल बिगाड़ रही है। इसी को गिरफ्तार कर लो। जज अंगरेज होता तो निडर होकर पुलिस की तंबीह करता। हमारे भाई तो ऐसे मुकदमों में चू करते डरते हैं कि कहीं हमारे ही ऊपर न बगावत का इल्जाम लग जाय। यही बात है। जज साहब पुलिस कमिसनर से जरूर कह सुनावेंगे। फिर यह तो न होगा कि मुकदमा उठा लिया जाय। यही होगा कि कलई न खुलने पावे। कौन जाने तुम्हीं को गिरफ्तार कर लें। कभी-कभी जब गवाह बदलने लगता है, या वर्ट खोलने पर उतारू हो जाता है,तो पुलिस वाले उसके घर वालों को दबाते हैं। इनकी माया अपरंपार है।

जालपा सहम उठी। अपनी गिरफ्तारी का उसे भय न था,लेकिन कहीं पुलिस वाले रमा पर अत्याचार न करें। इस भय ने उसे कातर कर दिया। उसे इस समय ऐसी थकान मालूम हुई मानो सैकड़ों कोस की मंजिल मारकर आई हो। उसका सारा सत्साहस बर्फ के समान पिघल गया।

कुछ दूर आगे चलने के बाद उसने देवीदीन से पूछा--अब तो उनसे मुलाकात न हो सकेगी?

देवीदीन ने पूछा-भैया से?

'हां।'

'किसी तरह नहीं। पहरा और कड़ा कर दिया गया होगा। चाहे उस बंगले को ही छोड़ दिया हो। और अब उनसे मुलाकात हो भी गई तो क्या फायदा | अब किसी तरह अपना बयान नहीं बदल सकते। दरोगहलफी में फंस जाएंगे।'

कुछ दूर और चलकर जालपा ने कहा-मैं सोचती हूं,घर चली जाऊं। यहां रहकर अब क्या करूंगी।

देवीदीन ने करुणा भरी हुई आंखों से उसे देखकर कहा-नही बहू। अभी मैं न जाने दूंगा। तुम्हारे बिना अब हमारा यहां पल-भर भी जी न लगेगा। बुढ़िया तो रो-रोकर पर ही दे देगी। अभी यहां रहो,देखो क्या फैसला होता है। भैया को मैं इतना कच्चे दिल का आदमी नहीं समझता था। तुम लोगों की बिरादरी में सभी सरकारी नौकरी पर जान देते हैं। मुझे तो कोई सौ रुपया भी तलब दे,तो नौकरी न करू। अपने रोजगार की बात ही दूसरी है। इसमें आदमी कभी थकता ही नहीं। नौकरी में जहां पांच से छ: घंटे हुए कि देह टूटने लगी, जम्हाइयां आने लगीं। [ १९२ ]
रास्ते में और कोई बातचीत न हुई। जालपा का मन अपनी हार मानने के लिए किसी तरह राजी न होता था। वह परास्त होकर भी दर्शक की भांति यह अभिनय देखने से संतुष्ट न हो। सकती थी। वह उस अभिनय में सम्मिलित होने और अपना पार्ट खेलने के लिए विवश हो रही थी। क्या एक बार फिर रमा से मुलाकात न होगी? उसके हृदय में उन जलते हुए शब्दों का एक सागर उमड़ रहा था, जो वह उससे कहना चाहती थी। उसे रमा पर जरा भी दया न आती थी,उससे रत्ती भर सहानुभूति न होती थी। वह उससे कहना चाहती थी-तुम्हारा धन और वैभव तुम्हें मुबारक हो,जालपा उसे पैरों से ठुकराती है। तुम्हारे खून से रंगे हुए हाथ के स्पर्श से मेरी देह में छाले पड़ जाएंगे। जिसने धन और पद के लिए अपनी आत्मा बेच दी, उसे मैं मनुष्य नहीं समझती। तुम मनुष्य नहीं हो तुम पशु भी नहीं,तुम कायर हो । कायर ।

जालपा का मुखमंडल तेजमय हो गया। गर्व से उसकी गर्दन तन गई। यह शायद समझते होंगे, जालपा जिस वक्त मुझे झब्बेदार पगड़ी बांधे घोड़े पर सवार देखेगी, फूली न समाएगी। जालपा इतनी नीच नहीं है। तुम घोड़े पर नहीं,आसमान में उड़ो,मेरी आंखों में हत्यारे हो, पूरे हत्यारे,जिसने अपनी जान बचाने के लिए इतने आदमियों की गर्दन पर छुरी चलाई । मैंने चलते-चलते समझाया था,उसका कुछ असर न हुआ । ओह,तुम इतने धन-लोलुप हो,इतने लोभी । कोई हजर नहीं। जालपा अपने पालन और रक्षा के लिए तुम्हारी मुहताज नहीं। इन्हीं संतप्त भावनाओं में डूबी हुई जालपा घर पहुंची।

तेंतालीस

एक महीना गुजर गया। जालपा कई दिन तक बहुत विकल रही। कई बार उन्माद-सा हुआ कि अभी सारी कथा किसी पत्र में छपवा दें,सारी कलई खोल दूं, सारे हवाई किले ढा दें पर यह सभी उद्वेग शांत हो गए। आत्मा को गहराइयों में छिपी हुई कोई शक्ति उसकी जबान बंद कर देती थी। रमा को उसने हृदय से निकाल दिया था। उसके प्रति अब उसे क्रोध न था,द्वेष न था, दया भी न थी, केवल उदासीनता थी। उसके मर जाने की सूचना पाकर भी शायद वह न रोती। हां,इसे ईश्वरीय विधान की एक लीला, माया का एक निर्मम हास्य, एक क्रूर क्रीड़ा समझकर थोड़ी देर के लिए वह दुखी हो जाती। प्रणय का वह बंधन जो उसके गले में दो ढाई साल पहले पड़ा था, टूट चुका था। पर उसका निशान बाकी था। रमा को इस बीच में उसने कई बार मोटर पर अपने घर के सामने से जाते देखी। उसकी आंखें किसी को खोजती हुई मालूम होती थीं। उन आंखों में कुछ लज्जा थी, कुछ क्षमा-याचना,पर जालपा ने कभी उसकी तरफ आंखें न उठाईं। वह शायद इस वक्त आकर उसके पैरों पर पड़ता,तो भी वह उसकी ओर न ताकती। रमा की इस घृणित कायरता और महान् स्वार्थपरता ने जालपा के हृदय को मानो चीर डाला था, फिर भी उस प्रणय-बंधन का निशान अभी बना हुआ था। रमा की वह प्रेम-विह्वल मूर्ति, जिसे देखकर एक दिन वह गद्गद हो जाती थी, कभी-कभी उसके हृदय में छाए हुए अंधेरे में क्षीण, मलिन, निरनिंद ज्योत्स्ना की भांति प्रवेश करती, और एक क्षण के लिए वह स्मृतियां विलाप कर [ १९३ ]
उठती। फिर उसी अंधकार और नीरवता का परदा पड़ जाता। उसके लिए भविष्य की मृदु स्मृतियां न थीं, केवल कठोर, नीरस वर्तमान विकराल रूप से खड़ा घूर रहा था।

वह जालपा, जो अपने घर बात-बात पर मान किया करती थी, अब सेवा, त्याग और सहिष्णुता की मूर्ति थी।जग्गो मना करती रहती, पर वह मुंह-अंधेरे सारे घर में झाडू लगा आती, चौका-बरतन कर डालती, आटा गंधकर रख देती, चूल्हा जला देती। तब बुढ़िया का काम केवल रोटियां सेंकना था। छूत-विचार को थी उसने ताक पर रख दिया था। बुढिया उसे ठेल-ठालकर रसोई में ले जाती और कुछ न कुछ खिला देती। दोनों में मां-बेटी का-सा प्रेम हो गया था।

मुकदमे की सब कार्रवाई समाप्त हो चुकी थी। दोनों पक्ष के वकीलों की बहस हो चुकी थी। केवल फैसला सुनाना बाकी था। आज उसकी तारीख थी। आज बड़े सबेरे घर के कामधंधों से फुरसत पाकर जालपा दैनिक-पत्र वाले की आवाज पर कान लगाए बैठी थी, मानो आज उसी का भाग्य-निर्णय होने वाला है। इतने में देवीदीन ने पत्र लाकर उसके सामने रख दिया। जालपा पत्र पर टूट पड़ी और फैसला पढ़ने लगी। फैसला क्या था, एक खयाली कहानी थी, जिसका प्रधान नायक रमा था। जज ने बार-बार उसकी प्रशंसा की थी। सारा अभियोग उसी के बयान पर अवलंबित था।

देवीदीन ने पूछा-फैसला छपा है?

जालपा ने पत्र पढ़ते हुए कहा-हां, है तो ।

'किसकी सजा हुई?'

'कोई नहीं छूटा। एक को फांसी की सजा मिली। पांच को दस-दस साल और आठ को पांच-पांच साल। उसी दिनेश को फांसी हुई।'

यह कहकर उसने समाचार-पत्र रख दिया और एक लंबी सांस लेकर बोली-इन बेचारों के बाल-बच्चों का न जाने क्या हाल होगा।

देवीदीन ने तत्परता से कहा-तुमने जिस दिन मुझसे कहा था, उसी दिन से मैं इन बातों का पता लगा रहा हूँ। आठ आदमियों को तो अभी तक ब्याह ही नहीं हुआ और उनके घर वाले मजे में हैं। किसी बात की तकलीफ नहीं है। पांच आदमियों का विवाह तो हो गया है, पर घर के खुश हैं। किसी के घर रोजगार होता है,कोई जमींदार है,किसी के बाप-चचा नौकर हैं। मैंने कई आदमियों से पूछा। यहां कुछ चंदा भी किया गया है। अगर उनके घर वाले लेना चाहें तो तो दिया जायेगा। खाली दिनेस तबाह है। दो छोटे-छोटे बच्चे हैं,बुढिया,मां और औरत। यहां किसी स्कूल में मास्टर था। एक मकान किराए पर लेकर रहता था। उसकी खराबी है।

जालपा ने पूछा-उसके घर का पता लगा सकते हो?

'हां, उसका पता कौन मुसकिल है?'

जालपा ने याचना-भाव से कहा-तो कब चलोगे? मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी। अभी तो वक्त है। चलो, जरा देखें।

देवीदीन ने आपत्ति करके कहा—पहले मैं देख तो आऊं। इस तरह उटक्करलैस मेरे साथ कहां-कहां दौड़ती फिरोगी?

जालपा ने मन को दबाकर लाचारी से सिर झुका लिया और कुछ न बोलो। देवीदीन चला गया। जालपा फिर समाचार-पत्र देखने लगी;पर उसका ध्यान दिनेश की [ १९४ ]
ओर लगा हुआ था। बेचारा फांसी पा जायेगा। जिस वक्त उसने फांसी का हुक्म सुना होगा, उसकी क्या दशा हुई होगी। उसकी बूढ़ी मां और स्त्री यह खबर सुनकर छाती पीटने लगी होंगी। बेचारा स्कूल-मास्टर ही तो था, मुश्किल से रोटियां चलती होंगी। और क्या सहारा होगा? उनकी विपत्ति की कल्पना करके उसे रमा के प्रति उत्तेजनापूर्ण घृणा हुई कि वह उदासीन न रह सकी। उसके मन में ऐसा उद्वेग उठा कि इस वक्त वह आ जाये तो ऐसा धिक्कारू कि वह भी याद करें। तुम मनुष्य हो । कभी नहीं। तुम मनुष्य के रूप में राक्षस हो, राक्षस ! तुम इतने नीच हो कि उसको प्रकट करने के लिए कोई शब्द नहीं है। तुम इतने नीच हो कि आज कमीने से कमीना आदमी भी तुम्हारे ऊपर थूक रहा है। तुम्हें किसी ने पहले ही क्यों न मार डाला। इन आदमियों की जान तो जाती ही; पर तुम्हारे मुंह में तो कालिख न लगती। तुम्हारा इतना पतन हुआ कैसे । जिसका पिता इतना सच्चा, इतना ईमानदार हो; वह इतना लोभी, इतना कायर ।

शाम हो गई, पर देवीदीन न आया। जालपा बार-बार खिड़की पर खड़ी हो-होकर इधर-उधर देखती थी; पर देवीदीन का पता न था। धीरे-धीरे आठ बज गए और देवी न लौटा। सहसा एक मोटर द्वार पर आकर रुकी और रमा ने उतरकर जग्गो से पूछा-सब कुशल-मंगल है। ने दादी ! दादा कहां गए हैं।

जग्गो ने एक बार उसकी ओर देखा और मुंह फेर लिया। केवल इतना बोलीं-कहीं गए होंगे; मैं नहीं जानती।

रमा ने सोने की चार चूड़ियां जेब से निकालकर जग्गो के पैरों पर रख दीं और बोला—यह तुम्हारे लिए लाया हूँ दादी, पहनो, ढीली तो नहीं हैं?

जागो ने चूड़ियां उठाकर जमीन पर पटक दीं और आंखें निकालकर बोली-जहां इतना पाप समा सकता है, वहां चार चूड़ियों की जगह नहीं है । भगवान् की दया से बहुत चूड़ियां पहन चुकी और अब भी सेर-दो सेर सोना पड़ा होगा, लेकिन जो खाया, पहना, अपनी मिहनत की कमाई से, किसी का गला नहीं दबाया, पाप की गठरी सिर पर नहीं लादी, नीयत नहीं बिगाड़ी। उस कोख में आग लगे जिसने तुम-जैसे कपूत को जन्म दिया। यह पाप की कमाई लेकर तुम बहू को देने आए होगे । समझते होगे, तुम्हारे रुपयों की थैली देखकर वह लट्टू हो जाएगी। इतने दिन उसके साथ रहकर भी तुम्हारी लोभी आंखें उसे न पहचान सकीं। तुम जैसे राक्षस उस देवी के जोग न थे। अगर अपनी कुसल चाहते हो, तो इन्हीं पैरों जहां से आए हो वहीं लौट जाओ, उसके सामने जाकर क्यों अपना पानी उतरवाओगे। तुम आज पुलिस के हाथों जख्मी होकर, मार खाकर आए होते, तुम्हें सजा हो गई होती, तुम जेहल में डाल दिए गए होते तो बहू तुम्हारी पूजा करती, तुम्हारे चरन धो-धोकर पीती। वह उन औरतों में है जो चाहे मजूरी करे, उपास करें, फटे-चीथड़े पहनें, पर किसी की बुराई नहीं देख सकतीं। अगर तुम मेरे लड़के होते, तो तुम्हें जहर दे देती। क्यों खड़े मुझे जला रहे रहे हो। चले क्यों नहीं जाते। मैंने तुमसे कुछ ले तो नहीं लिया है।

रमा सिर झुकाए चुपचाप सुनता रहा। तब हित स्वर में बोला-दादी,मैंने बुराई की है। और इसके लिए मरते दम तक लज्जिते रहूंगा; लेकिन तुम मुझे जितना नीच समझ रही हो,उतना नीच नहीं है। अगर तुम्हें मालूम होता कि पुलिस ने मेरे साथ कैसी-कैसी सख्तियां कीं, [ १९५ ]
मुझे कैसी-कैसी धमकियां दीं, तो तुम मुझे राक्षस न कहतीं।

जालपा के कानों में इन आवाजों की भनक पड़ी। उसने जीने से झांककर देखा। रमानाथ खड़ा था। सिर पर बनारसी रेशमी साफा था, रेशम का बढ़िया कोट, आंखों पर सुनहली ऐनक। इस एक ही महीने में उसकी देह निखर आई थी। रंग भी अधिक गोरा हो गया था। ऐसी कति उसके चेहरे पर कभी न दिखाई दी थी। उसके अंतिम शब्द जालपा के कानों में पड़ गए, बाज की तरह टूटकर धम-धमकरती हुई नीचे आई और जहर में बुझे हुए नेत्रबाणों का उस पर प्रहार करती हुई बोली-अगर तुम सख्तियों और धमकियों से इतना दब सकते हो, तो तुम कायर हो। तुम्हें अपने को मनुष्य कहने का कोई अधिकार नहीं। क्या सख्तियों की थीं? जरा सुनें । लोगों ने तो हंसते-हंसते सिर कटा लिए हैं, अपने बेटों को मरते देखा है, कोल्हू में पेले जाना मंजूर किया है, पर सच्चाई से जौ-भर भी नहीं हटे। तुम भी तो आदमी हो, तुम क्यों धमकी में आ मए? क्यों नहीं छाती खोलकर खड़े हो गए कि इसे गोली का निशाना बना लो, पर मैं झूठ न बोलूंगा। क्यों नहीं सिर झुका दिया? देह के भीतर इसीलिए आत्मा रक्खी गई है कि देह उसकी रक्षा करे। इसलिए नहीं कि उसका सर्वनाश कर दे। इस पाप का क्या पुरस्कार मिला? जरा मालूम तो हो ।

रमा न दबी हुई आवाज से कहा-अभी तो कुछ नहीं।

जालपा ने सर्पिणी की भांति हुंकारकर कहा-यह सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई। ईश्वर करे, तुम्हें मुंह में कालिख लगाकर भी कुछ न मिले। मेरी यह सच्चे दिल से प्रार्थना है, लेकिन नहीं, तुम-जैसे मोम के पुतलों को पुलिस वाले कभी नाराज न करेंगे। तुम्हें कोई जगह मिलेगी और शायद अच्छी जगह मिले; मगर जिस जाल में तुम फंसे हो, उसमें से निकल नहीं सकते। झूठी गवाही, झूठे मुकदमें बनाना और पाप का व्यापार करना हो तुम्हारे भाग्य में लिख गया। जाओ शौक से जिंदगी के सुख लूटो। मैंने तुमसे पहले ही कह दिया था और आज फिर कहती हूँ कि मेरा तुमसे कोई नाता नहीं है। मैंने समझ लिया कि तुम मर गए। तुम भी समझ लो कि मैं मर गई। बस, जाओ। मैं औरत हूं। अगर कोई धमकाकर मुझसे पाप कराना चाहे,तो चाहे उसे न मार सकू; अपनी गर्दन पर छुरी चला दूंगी। क्या तुममें औरतों के बराबर भी हिम्मत नहीं है?

रमा ने भिक्षुकों की भांति गिडगिड़ाकर कहा- तुम मेरा कोई उज़ न सुनोगी?

जालपा ने अभिमान से कहा-नहीं।

'तो मैं मुंह में कालिख लगाकर कहीं निकल जाऊ?'

'तुम्हारी खुशी ।

'तुम मुझे क्षमा न करोगी?'

'कभी नहीं, किसी तरह नहीं ।'

रमा एक क्षण सिर झुकाए खड़ा रहा,तब धीरे-धीरे बरामदे के नीचे जाकर जग्गो से बोला-दादी, दादा आएं तो कह देना, मुझसे जरा देर मिल लें। जहां कहें, आ जाऊँ?

जग्गों ने कुछ पिघलकर कहा–कल यहीं चले आना। रमा ने मोटर पर बैठते हए कहा-यहां अब न आऊंगा, दादी । मोटर चली गई तो जालपा ने कुत्सित भाव से कहा-मोटर दिखाने आए थे, जैसे [ १९६ ]
खरीद ही तो लाए हों।

जग्गो ने भर्त्सना की-तुम्हें इतना बेलगाम न होना चाहिए था, बहू'दिल पर चोट लगती है, तो आदमी को कुछ नहीं सूझता।

जालपा ने निष्ठुरता से कहा-ऐसे हयादार नहीं हैं,दादी । इसी सुख के लिए तो आत्मा बेची। उनसे यह सुख भला क्या छोड़ा जायगी। पूछा नहीं, दादा से मिलकर क्या करोगे? वह होते तो ऐसी फटकार सुनाते कि छठी का दूध याद आ जाता।

जग्गों ने तिस्कार के भाव से कहा-तुम्हारी जगह मैं होती तो मेरे मुंह से ऐसी बातें न निकलतीं। तुम्हारा हिया बड़ी कठोर है। दूसरा मर्द होता तो इस तरह चुपका-चुपका सुनता? मैं तो थर-थर कांप रही थी कि कहीं तुम्हारे ऊपर हाथ ने चला दे; मगर है बड़ा गमखोर।

जालपा ने उसी निष्ठुरता से कहा-इसे गमखोरी नहीं कहते दादी, यह बेहयाई है।

देवीदीन ने आकर कहा-क्या यहां भैया आए थे? मुझे मोटर पर रास्ते में दिखाई दिए थे।

जग्गो ने कहा-हां, आए थे। कह गए हैं, दादा मुझसे जरा मिल लें। देवीदीन ने उदासीन होकर कहा-मिल लूंगा। यहां कोई बातचीत हुई?

जग्गो ने पछताते हुए कहा–बातचीत क्या हुई, पहले मैंने पूजा की, मैं चुप हुई तो बहू ने अच्छी तरह फूल-माला चढ़ाई।

जालपा ने सिर नीचा करके कहा-आदमी जैसा करेगा, वैसा भोगेगा।

जग्गो-अपना ही समझकर तो मिलने आए थे।

जालपा-कोई बुलाने तो न गया था। कुछ दिनेश का पता चला, दादा !

देवीदीन-हां, सब पूछ आया। हाबड़े में घर है। पता-ठिकाना सब मालूम हो गया।

जालपा ने डरते-डरते कहा-इस वक्त चलोगे या कल किसी वक्त?

देवीदीन-तुम्हारी जैसी मरजी। जी जाहे इसी बखत चलो, मैं तैयार हूं। जालपा-थक गए होगे? देवीदीन-इन कामों में थकान नहीं होती बेटी।

आठ बज गए थे। सड़क पर मोटरों का तांता बंधा हुआ था। सड़क की दोनों पटरियों पर हजारों स्त्री-पुरुष बने-उने, हंसते-बोलते चले जाते थे। जालपा ने सोचा, दुनिया कैसी अपने राग-रंग में मस्त है। जिसे उसके लिए मरना हो मरे, वह अपनी टेव ने छोड़ेगी। हर एक अपना छोटा-सा मिट्टी का घरौंदा बनाए बैठा है। देश बह जाए, उसे परवा नहीं। उसका घरौंदा बच रहे । उसके स्वार्थ में बाधा न पड़े। उसका भोली-भाली हृदय बाजार को बंद देखकर खुश होता। सभी आदमी शोक से सिर झुकाए, त्योरियां बदले उन्मत्त-से नजर आते। सभी के चेहरे भीतर की जलन से लाल होते। वह न जानती थी कि इस जन-सागर में ऐसी छोटी-छोटी ककड़ियों के गिरने से एक हल्कोरा भी नहीं उठता, आवाज तक नहीं आती। [ १९७ ]

चवालीस


रमा मोटर पर चला, तो उसे कुछ सूझता न था, कुछ समझ में न आता था, कहां जा रहा है। जाने हुए रास्ते उसके लिए अनजाने हो गए थे। उसे जालपा पर क्रोध न था, जरा भी नहीं। जग्गों पर भी उसे क्रोध न था। क्रोध था अपनी दुर्बलता पर, अपनी स्वार्थलोलुपता पर, अपनी कायरता पर। पुलिस के वातावरण में उसका औचित्य-ज्ञाने भ्रष्ट हो गया था। वह कितना बड़ा अन्याय करने जा रहा है, उसका उसे केवल उस दिन खयाल आया था, जब जालपा ने समझाया था। फिर यह शंका मन में उठी ही नहीं। अफसरों ने बड़ी-बड़ी आशाएं बंधाकर उसे बहला रक्खा। वह कहते, अजी बीबी की कुछ फिक्र न करो। जिस वक्त तुम एक जड़ाऊ हार लेकर पहुंचोगे और रुपयों की थैली नजर कर दोगे, बेगम साहब का सारा गुस्सा भाग जाया। अपने सूबे में किसी अच्छी-सी जगह पर पहुंच जाओगे, आराम से जिंदगी कटेगी। कैसा गुस्सा ! इसकी कितनी ही आंखों-देखी मिसालें दी गई। रमा चक्कर में फंस गया। फिर उसे जालपा से मिलने का अवसर ही न मिला। पुलिस का रंग जमता गया। आज वह जड़ाऊ हार जेब में रखे जालपा को अपनी विजय की खुशखबरी देने गया था। वह जानता था जालपा पहले कुछ नाक-भौं सिकोड़ेगी, पर यह भी जानता था कि यह हार देखकर वह जरूर खुश हो जायगी। कल ही संयुक्त प्रांत के होम सेक्रेटरी के नाम कमिश्नर पुलिस का पत्र उसे मिल जाएगा। दोचार दिन यहां खूब सैर करके घर की राह लेगा। देवीदीन और जग्गो को भी वह अपने साथ ले जाना चाहता था। उनका एहसान वह कैसे भूल सकता था। यही मनसूबे मन में बांधकर वह जालपा के पास गया था, जैसे कोई भक्त फूल और नैवेद्य लेकर देवता की उपासना करने जाये, पर देवता ने वरदान देने के बदले उसके थाल को ठुकरा दिया, उसके नैवेद्य को पैरों से कुचल डाला । उसे कुछ कहने का अवसर ही न मिला। आज पुलिस के विषैले वातावरण से निकलकर उसने स्वच्छ वायु पाई थी और उसकी सुबुद्धि सचेत हो गई थी। अब उसे अपनी पशुता अपने यथार्थ रूप में दिखाई दी-कितनी विकराल, कितनी दानवी मूर्ति थी। वह स्वयं उसकी ओर ताकने का साहस न कर सकता था। उसने सोचा, इसी वक्त जज के पास चलें और सारी कथा कह सुनाऊ। पुलिस मेरी दुश्मन हो जाये, मुझे जेल में सड़ा डाले, कोई परवा नहीं। सारी कलई खोल दूंगा। क्या जज अपना फैसला नहीं बदल सकता? अभी तो सभी मुल्जिम हवालात में हैं। पुलिस वाले खूब दांत पीसेंगे, खूब नाचे-कूदेंगे, शायद मुझे कच्चा ही खा जायं। खा जाये । इसी दुर्बलता ने तो मेरे मुंह में कालिख लगा दी।

जालपा की वह क्रोधोन्मत्त मूर्ति उसकी आंखों के सामने फिर गई। ओह, कितने गुस्से में थी । मैं जानता कि वह इतना बिगड़ेगी, तो चाहे दुनिया इधर से उधर हो जाती, अपना बयान बदल देता। बड़ा चकमा दिया इन पुलिस वालों ने। अगर कहीं जज ने कुछ नहीं सुना और मुल्जिमों को बरी न किया, तो जालपा मेरा मुंह न देखेगी। मैं उसके पास कौन मुंह लेकर जाऊंगा। फिर जिंदा रहकर ही क्या करूंगा। किसके लिए?

उसने मोटर रोकी और इधर-उधर देखने लगा। कुछ समझ में न आया, कहां आ गया। सहसा एक चौकीदार नजर आया। उसने उससे जज साहब के बंगले का पता पूछा। चौकीदार [ १९८ ]
हंसकर बोला- हुजूर तो बहुत दूर निकल आए। यहां से तो छ:-सात मील से कम न होगा, वह उधर चौरंगो की ओर रहते हैं।

रमा चौरंगी का रास्ता पूछकर फिर चला। नौ बज गए थे। उसने सोचा, जज साहब से मुलाकात न हुई,तो सारा खेल बिगड़ जाएगा। बिना मिले हटूंगा ही नहीं। अगर उन्होंने सुन लिया तो ठीक ही है,नहीं कल हाईकोर्ट के जजों से कहूंगा। कोई तो सुनेगा। सारा वृत्तांत समाचार-पत्रों में छपवा दूंगा, तब तो सबकी आंखें खुलेंगी।

मोटर तीस मील की चाल से चल रही थी। दस मिनट ही में चौरंगी आ पहुंची। यहां अभी तक वहीं चहल-पहल थी, मगर रेमा उसी जन्नाटे से मोटर लिए जाता था। सहसा एक पुलिसमैन ने लाल बत्ती दिखाई। वह रुक गया और बाहर सिर निकलकर देखा, तो वही दारोगाजी ।

दारोगा ने पूछा-क्या अभी तक बंगले पर नहीं गए? इतनी तेज मोटर ने चलाया कीजिए। कोई वारदात हो जायगी। कहिए, बेगम साहब से मुलाकात हुई? मैंने तो समझा था, वह भी आपके साथ होंगी। खुश तो खूब हुई होंगी।

रमा को ऐसा क्रोध आया कि मूंछेउखाड़ लें,पर बाते बनाकर बोला-जी हां, बहुत खुश हुई। बेहद । 'मैंने कहा था न, औरतों की नाराजी की वहीं दवा है। आप कांपे जाते थे।'

'मेरी हिमाकत थी।'

‘चलिए, मैं भी आपके साथ चलता हूं। एक बाजी ताश उड़े और जरा सरूर जमे। डिप्टी साहब और इंस्पेक्टर साहब आएंगे। जोहरा को बुलवा लेंगे। दो घड़ी की बहार रहेगी। अब आप मिसेज रमानाथ को बंगले ही पर क्यों नहीं बुला लेते। वहां उस खटिक के घर पड़ी हुई हैं।'

रमा ने कहा—अभी तो मुझे एक जरूरत से दूसरी तरफ जाना है। आप मोटर ले जाए। मैं पांव-पांव चला आऊंगा।

दारोगा ने मोटर के अंदर जाकर कहा-नही साहब, मुझे कोई जल्दी नहीं है। आप जहां चलना चाहें, चलिए। मैं जरा भी मुखिल न हूंगा।

रमा ने कुछ चिढ़कर कहा–लेकिन मैं अभी बंगले पर नहीं जा रहा है।

दारोगा ने मस्कराकर कहा-मैं समझ रहा हूं, लेकिन मैं जरा भी मुखिल न होगा। वहीं बेगम साहब

रमा ने बात काटकर कहा-जी नहीं,वहां मुझे नहीं जाना है।

दारोगा-तो क्या कोई दूसरा शिकार है? बंगले पर भी आज कुछ कम बहार न रहेगी। वहीं अपिके दिल-बहलाव का कुछ सामान हाजिर हो जायगा।

रमा ने एकबारगी आंखें लाल करके कहा-क्या आप मुझे शोहदा समझते हैं? मैं इतना जलील नहीं हूं।

दारोगा ने कुछ लज्जित होकर कहा-अच्छा साहब,गुनाह हुआ,माफ कीजिए। अब कभी ऐसी गुस्ताखी न होगी, लेकिन अभी आप अपने को खतरे से बाहर न समझें। मैं आपको किसी ऐसी जगह न जाने दूंगा,जहां मुझे पूरा इत्मीनान न होगा। आपको खबर नहीं,आपके [ १९९ ]
कितने दुश्मन हैं। मैं आप ही के फायदे के ख्याल से कह रहा हूं।

रमा ने होंठ चबाकर कहा-बेहतर हो कि आप मेरे फायदे का इतना खयाल न करें। आप लोगों ने मुझे मलियामेट कर दिया और अब भी मेरा गला नहीं छोड़ते। मुझे अब अपने हाल पर मरने दीजिए। मैं इस गुलामी से तंग आ गया हूं। मैं मां के पीछे-पीछे चलने वाला बच्चा नहीं बनना चाहता। आप अपनी मोटर चाहते हैं; शौक से ले जाइए। मोटर की सवारी और बंगले में रहने के लिए पंद्रह आदमियों को कुर्बान करना पड़ा है। कोई जगह पा जाऊं, तो शायद पंद्रह सौ आदमियों को कुर्बान करना पड़े। मेरी छाती इतनी मजबूत नहीं है। आप अपनी मोटर ले जाइए।

यह कहता हुआ वह मोटर से उतर पड़ा और जल्दी से आगे बढ़ गया। दारोगा ने कई बार पुकारा, जरा सुनिए, बात तो सुनिए, लेकिन उसने पीछे फिरकर देखा तक नहीं। जरा और आगे चलकर वह एक मोड़ से घूम गया। इसी सड़क पर जज का बंगला था। सड़क पर कोई आदमी न मिला। रमा कभी इस पटरी पर और कभी उसे पटरी पर जा-जाकर बंगलों के नंबर पढ़ता चला जाता था। सहसा एक नंबर देखकर वह रुक गया। एक मिनट तक खड़ा देखता रहा कि कोई निकले तो उससे पूछू साहब हैं या नहीं। अंदर जाने की उसकी हिम्मत न पड़ती थी। खयाल आया, जज ने पूछा, तुमने क्यों झूठी गवाही दी, तो क्या जवाब दूंगा। यह कहना कि पुलिस ने मुझसे अबस्ती गवाही दिलवाई, प्रलोभन दिया, मारने की धमकी दी, लज्जास्पद बात है। अगर वह पूछे कि तुमने केवल दो-तीन साल की सजा से बचने के लिए इतना बड़ी कलंक सिर पर ले लिया, इतने आदमियों की जान लेने पर उतारू हो गए, उस वक्त तुम्हारी बुद्धि कहां गई थी, तो उसका मेरे पास क्या जवाब है? ख्वामख्वाह लज्जित होना पड़ेगा। बेवकूफ बनाया जाऊंग; वह लौट पड़ा। इस लज्जा का सामना करने की उसमें सामर्थ्य न थी। लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है। जो काल से भी नहीं डरते, वे भी लज्जा के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते। आग में झुक जाना, तलवार के सामने खड़े हो जाना, इसकी अपेक्षा कहीं सहज है। लाज की रक्षा ही के लिए बड़े-बड़े राज्य मिट गए हैं, रक्त की नदियां बह गई हैं, प्राणों की होली खेल डाली गई है। उसी लाज ने आज रमा के पग भी पोछे हटा दिए। शायद जेल की सजा से वह इतना भयभीत न होता।

पैंतालीस

रमा आधी रात गए सोया, तो नौ बजे दिन तक नींद न खुली । वह स्वप्न देख रहा था—दिनेश को फांसी हो रही है। सहसा एक स्त्री तलवार लिए हुए फांसी की ओर दौड़ी और फांसी की रस्सी काट दी । चारों ओर हलचल मच गई । वह औरत जालपा थी । जालपा को लोग घेरकर पकड़ना चाहते थे; पर वह पकड़ में न आती थी। कोई उसके सामने जाने का साहस न कर सकता था। तब उसने एक छलांग मारकर रमा के ऊपर तलवार चलाई । रमा घबड़ाकर उठ बेता। देखा तो दारोगा और इंस्पेक्टर कमरे में खड़े हैं, और डिप्टी साहब आराम-कुर्सी पर लेटे हुए सिगार पी रहे हैं। [ २०० ] दारोगा ने कहा-आज तो आप खूब सोए बाबू साहब। कल कब लौटे थे?

रमा ने एक कुर्सी पर बैठकर कहा-जरा देर बाद लौट आया था। इस मुकदमे की अपील तो हाईकोर्ट में होगी न?

इंस्पेक्टर-अपील क्या होगी, जाब्ते की पाबंदी होगी। आपने मुकदमे को इतना मजबूत कर दिया है कि वह अब किसी के हिलाए हिल नहीं सकता। हलफ से कहता हूं, आपने कमाल कर दिया। अब आप उधर से बेफिक्र हो जाइए ! हां, अभी जब तक फैसला न हो जाय, यह मुनासिब होगा कि आपकी हिफाजत का खयाल रखा जाये। इसलिए फिर पहरे का इंतजाम कर दिया गया है। इधर हाईकोर्ट से फैसला हुआ, उधर आपको जगह मिली।

डिप्टी साहब ने सिगार का धुआं फेंककर कहा-यह डी० ओ० कमिश्नर साहब ने आपको दिया है, जिसमें आपको कोई तरह की शक न हो । देखिए, यू० पी० के होम सेक्रेटरी के नाम है । आप यहां ज्योंही यह डी० ओ० दिखाएंगे, वह आपको कोई बहुत अच्छी जगह दे देगा।

इंस्पेक्टर–कमिश्नर साहब आपसे बहुत खुश हैं, हलफ से कहता हूं।

डिप्टी-बहुत खुश हैं। वह यू० पी० को अलग डायरेक्ट भी चिट्ठी लिखेगा। तुम्हारा भाग्य खुल गया। | यह कहते हुए उसने डी. ओ. रमा की तरफ बढ़ा दिया। रमा ने लिफाफा खोलकर देखा और एकाएक उसको फाड़कर पुर्जे - पुर्जे कर डाला। तीनों आदमी विस्मय से उसका मुंह ताकने लगे । दारोगा ने कहा-रात बहुत पी गए थे क्या? आपके हक में अच्छा न होगा । इंस्पेक्टर-हलफ से कहता हूं, कमिश्नर साहब को मालूम हो जयगा, तो बहुत नाराज। होंगे। डिप्टी-इसका कुछ मतलब हमारे समझ में नहीं आया । इसका क्या मतलब है? रमानाथ-इसका यह मतलब है कि मुझे इस डी० ओ० की जरूरत नहीं है और न मै नौकरी चाहता हूं। मैं आज ही यहां से चला जाऊंगा। डिप्टी--जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जाय, तब तक आप कही नहीं जा सकता। रमानाथ-क्यों? डिप्टी - कमिश्नर साहब का यह हुक्म है। रमानाथ--मैं किसी का गुलाम नहीं हूँ। इंस्पेक्टर--बाबू रमानाथ, आप क्यों बना-बनाया खेल बिगाड़ रहे हैं? जो कुछ होना था, वह हो गया। दस-पांच दिन में हाईकोर्ट से फैसले की तसदीक हो जायगी आपकी बेहतरी इसी में है कि जो सिला मिल रहा है, उसे खुशी से लीजिए और आराम से जिंदगी के दिन बसर कीजिए। खुदा ने चाहा, तो एक दिन आप भी किसी ऊंचे ओहदे पर पहुंच जाएंगे। इससे क्या फायदा कि अफसरों को नाराज कीजिए और कैद की मुसीबतें झेलिए। हलफ से कहता हूँ, अफसरों की जरा-सी निगाह बदल जाये, तो आपका कहीं पता न लगे। हलफ से कहता हूं, एक इशारे में आपको दस साल की सजा हो जाय। आप हैं किस ख्याल में? हम आपके साथ शरारत [ २०१ ]
नहीं करना चाहते। हां, अगर आप हमें सख्ती करने पर मजबूर करेंगे, तो हमें सख्ती करनी पड़ेगी। जेल को आसान न समझिएगा। खुदा दोजख में ले जाए; पर जेल की सजा न दे। मार- धाड़, गाली-गुफ्ता, वह तो वहां की मामूली सजा है। चक्की में जोत दिया तो मौत ही आ गई। हलफ से कहता हूं, दोजख से बदतर है जेल ।

दारोगा--यह बेचारे अपनी बेगम से माजूर हैं। वह शायद इनके जान की गाहक हो रही हैं। उनसे इनकी कोर दबती है।

इंस्पेक्टर-क्या हुआ, कल तो वह हार दिया था न? फिर भी राजी नहीं हुई?

रमा ने कोट की जेब से हार निकालकर मेज पर रख दिया और बोला-वह हार यह रक्खा हुआ है।

इंस्पेक्टर--अच्छा,इसे उन्होंने नहीं कबूल किया।

डिप्टी-कोई प्राउड लेडी है।

इंस्पेक्टर-कुछ उनकी भी मिजाज-पुरसी करने की जरूरत होगी ।

दारोगा--यह तो बाबू साहब के रंग-ढंग और सलीके पर मुनहसर है। अगर आप ख्वामख्वाह हमें मजबूर न करेंगे, तो हम आपके पीछे न पड़ेंगे।

डिप्टी--उस खटिक से भी मुचलका ले लेना चाहिए । । रमानाथ के सामने एक नई समस्या आ खड़ी हुई, पहली से कहीं जटिल, कहीं भीषण। संभव था, वह अपने को कर्तव्य की वेदी पर बलिदान कर देता, दो-चार साल की सजा के लिए अपने को तैयार कर लेता। शायद इस समय उसने अपने आत्म-समर्पण का निश्चय कर लिया था; पर अपने साथ जालपा को भी संकट में डालने की साहस वह किसी तरह न कर सकता था। वह पुलिस के शिकंजे में कुछ इस तरह दब गया था कि अब उसे बेदाग निकल जाने का कोई मार्ग दिखाई न देता था। उसने देखा कि इस लड़ाई में मैं पेश नहीं पा सकता। पुलिस सर्वशक्तिमान् है, वह मुझे जिस तरह चाहे दबा सकती है। उसके मिजाज की तेजी गायब हो गई । विवश होकर बोला-आखिर आप लोग मुझसे क्या चाहते हैं?

इंस्पेक्टर ने दारोगा की ओर देखकर आंखें मारीं मानो कह रहे हों, 'आ गया पंजे में', और बोले-बस इतना ही कि आप हमारे मेहमान बने रहें, और मुकदमे के हाईकोर्ट में तय हो जाने के बाद यहां से रुखसत हो जाएं। क्योंकि उसके बाद हम आपको हिफाजत के जिम्मेदार न होंगे। अगर आप कोई सर्टिफिकेट लेना चाहेंगे, तो वह दे दी जाएगी, लेकिन उसे लेने या न लेने का आपको पूरा अख्तियार है। अगर आप होशियार हैं, तो उसे लेकर फायदा उठाएंगे, नहीं इधर-उधर के धक्के खाएंगे। आपके ऊपर गुनाह बेलज्जत की मसल सादिक आयेगी। इसके सिवा हम आपसे और कुछ नहीं चाहते । हलफ से कहता हूँ, हर एक चीज जिसकी आपको ख्वाहिश हो, यहां हाजिर कर दी जाएगी, लेकिन जब तक मुकदमा खत्म हो जाए, आप आजाद नहीं हो सकते।

रमानाथ ने दीनता के साथ पूछा-सैर करने तो जा सकेगा, या वह भी नहीं?

इंस्पेक्टर ने सूत्र रूप से कहा-जी नहीं !

दारोगा ने उस सूत्र की व्याख्या की—आपको वह आजादी दी गई थी; पर आपने उसका [ २०२ ]
बेजा इस्तेमाल किया। जब तक इसका इत्मीनान न हो जाय कि आप उसको जायज इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं, आप उस हक से महरूम रहेंगे।

दारोगा ने इंस्पेक्टर की तरफ देखकर मानो इस व्याख्या की दाद देनी चाही, जो उन्हें सहर्ष मिल गई।

तीनों अफसर रुखसत हो गए और रमा एक सिगार जलाकर इस विकट परिस्थिति पर विचार करने लगा।

छियालीस


एक महीना और निकल गया। मुकदमे के हाईकोर्ट में पेश होने की तिथि नियत हो गई है। रमा के स्वभाव में फिर वही पहले की-सी भीरुता और खुशामद आ गई है। अफसरों के इशारे पर नाचता है। शराब की मात्रा पहले से बढ़ गई है, विलासिता ने मानो पंजे में दबा लिया है। कभी कभी उसके कमरे में एक वेश्या जोहरा भी आ जाती है, जिसका गाना वह बड़े शौक से सुनता है।

एक दिन उसने बड़ी हसरत के साथ जोहरा से कहा-मैं डरता हूं, कहीं तुमसे प्रेम न बढ़ जाय। उसका नतीजा इसके सिवा और क्या होगा कि रो-रोकर जिंदगी काटूं। तुमसे वफा की उम्मीद और क्या हो सकती है। जोहरा दिल में खुश होकर अपनी बड़ी-बड़ी रतनारी आंखों से उसकी ओर ताकती हुई बोली-हां साहब, हम वफा क्या जानें, आखिर वेश्या ही तो ठहरी। बेवफा वेश्या भी कहीं वफादार हो सकती है?

रमा ने आपत्ति करके पूछा-क्या इसमें कोई शक है?

जोहरा-नहीं, जरा भी नहीं। आप लोग हमारे पास मुहब्बत से लबालब भरे दिल लेकर आते हैं, पर हम उसकी जरा भी कद्र नहीं करतीं। यही बात है न?

रमानाथ-बेशक।

जोहरा-मुआफ कीजिएगा, आप मरदों की तरफदारी कर रहे हैं। हक यह है कि वहां आप लोग दिल-बहलाव के लिए जाते हैं, महज गम गलत करने के लिए, महज आनंद उठाने के लिए। जब आपको वफा की तलाश ही नहीं होती, तो वह मिले क्यों कर? लेकिन इतना मैं जानती हूं कि हममें जितनी बेचारियां मरदों की बेवफाई से निरास होकर अपना आराम-चैन खो बैठती हैं, उनका पता अगर दुनिया को चले, तो आंखें खुल जायं। यह हमारी भूल है कि तमाशबीनों से वफा चाहते हैं, चील के घोंसले में मांस ढूंढते हैं, पर प्यासा आदमी अंधे कुएं की तरफ दौड़े, तो मेरे खयाल में उसका कोई कसूर नहीं।

उस दिन रात को चलते वक्त जोहरा ने दारोगा को खुशखबरी दी, आज तो हजरत खूब मजे में आए। खुदा ने चाहा तो दो-चार दिन के बाद बीवी का नाम भी न लें।

दारोगा ने खुश होकर कहा-इसीलिए तो तुम्हें बुलाया था। मजा तो जब है कि बीवी यहां [ २०३ ]

से चली जाए। फिर हमें कोई गम न रहेगा। मालूम होता है; स्वराज्यवालों ने उस औरत को मिला लिया है। यह सब एक ही शैतान हैं।

जोहरा की आमदोरफ्त बढ़ने लगी, यहां तक कि रमा खुद अपने चकमे में आ गया।

उसने जोहरा से प्रेम जताकर अफसरों की नजर में अपनी साख जमानी चाही थी; पर जैसे बच्चे खेल में रो पड़ते हैं, वैसे ही उसका प्रेमाभिनय भी प्रेमोन्माद बन बैठा। जोहरा उसे अब वफा और मुहब्बत की देवी मालूम होती थी। वह जालपा की-सी सुंदरी न सही, बातों में उससे कहीं चतुर, हाव-भाव में कहीं कुशल, सम्मोहन-कला में कहीं पटु थी। रमा के हृदय में नए-नए मनसूबे पैदा होने लगे। एक दिन उसने जोहरा से कहा-जोहरा, जुदाई का समय आ रहा है। दो-चार दिन में मुझे यहां से चला जाना पड़ेगा। फिर तुम्हें क्यों मेरी याद आने लगी? जोहरा ने कहा-मैं तुम्हें न जाने दूंगी। यहीं कोई अच्छी-सी नौकरी कर लेना। फिर हम- तुम आराम से रहेंगे। रमा ने अनुरक्त होकर कहा-दिल से कहती हो जोहरा? देखो, तुम्हें मेरे सिर की कसम, दगा मत देना। जोहरा–अगर यह खौफ हो तो निकाह पढ़ा लो। निकाह के नाम से चिढ़ हो, तो ब्याह कर लो। पंडितों को बुलाओ। अब इसके सिवा मैं अपनी मुहब्बत का और क्या सबूत दूं। रमा निष्कपट प्रेम का यह परिचय पाकर विह्वल हो उठा। जोहरा के मंह से निकलकर इन शब्दों की सम्मोहक-शक्ति कितनी बढ़ गई थी। यह कामिनी, जिस पर बड़े-बड़े रईस फिदा हैं, मेरे लिए इतना बड़ा त्याग करने को तैयार है। जिस खान में औरों को बालू ही मिलता है, उसमें जिसे सोने के डले मिल जायं, क्या वह परम भाग्यशाली नहीं है? रमा के मन में कई दिनों तक संग्राम होता रहा। जालपा के साथ उसका जीवन कितना नीरस, कितना कठिन हो जायगा। वह पग-पग पर अपना धर्म और सत्य लेकर खड़ी हो जाएगी और उसका जीवन एक दीर्घ तपस्या, एक स्थायी साधना बनकर रह जाएगा। सात्विक जीवन कभी उसका आदर्श नहीं रहा। साधारण मनुष्यों की भाति वह भी भोग-विलास करना चाहता था। जालपा की ओर से हटकर उसका विलासासक्त मन प्रबल वेग से जोहरा की ओर खिंचा। उसको व्रत-धारिणी वेश्याओं के उदाहरण याद आने लगे। उसके साथ ही चंचल वृत्ति की गृहिणियों की मिसालें भी आ पहुचीं। उसने निश्चय किया, यह सब ढकोसला है। न कोई जन्म से निर्दोष है, न कोई दोषी। यह सब परिस्थिति पर निर्भर है।

जोहरा रोज आती और बंधन में एक गांठ और देकर जाती । ऐसी स्थिति में संयमी युवक

का आसन भी डोल जाता। रमा तो विलासी था। अब तक वह केवल इसलिए इधर-उधर ने भटक सका था कि ज्योंही, उसके पंख निकले, जालिए ने उसे अपने पिंजरे में बंद कर दिया। कुछ दिन पिंजरे से बाहर रहकर भी उसे उड़ने का साहस न हुआ। अब उसके सामने एक नवीन दृश्य था, यह छोटा सा कुल्हियों वाला पिंजरा नहीं, बल्कि एक फूलों से लहराता हुआ बाग,

जहां की कैद में स्वाधीनता का आनंद था। वह इस बाग में क्यों न क्रीड़ा का आनंद उठाए । [ २०४ ]

सैंतालीस


रमा ज्यों-ज्यों जोहरा के प्रेम-पाश में फँसता जाता था, पुलिस के अधिकारी वर्ग उसकी ओर से निश्शंक होते जाते थे। उसके ऊपर जो कैद लगाई गई थी, धीरे-धीरे ढीली होने लगी। यहां तक कि एक दिन डिप्टी साहब शाम को सैर करने चले तो रमा को भी मोटर पर बिठा लिया। जब मोटर देवीदीन की दुकान के सामने से होकर निकली, तो रमा ने अपना सिर इस तरह भीतर खींच लिया कि किसी की नजर में पड़ जाय। उसके मन में बड़ी उत्सुकता हुई कि जालपा है या चली गई; लेकिन वह अपना सिर बाहर न निकाल सका। मन में वह अब भी यही समझता था कि मैंने जो रास्ता पकड़ा है, वह कोई बहुत अच्छा रास्ता नहीं है, लेकिन यह जानते हुए भी वह उसे छोड़ना न चाहता था। देवीदीन को देखकर उसका मस्तक आप-ही-आप लज्जा से झुक जाता, वह किसी दलील से अपना पक्ष सिद्ध न कर सकता। उसने सोचा, मेरे लिए सबसे उत्तम मार्ग यही है कि इनसे मिलना-जुलना छोड़ दूँ। उस शहर में तीन प्राणियों को छोड़कर किसी चौथे आदमी से उसका परिचय न था, जिसकी आलोचना या तिरस्कार का उसे भय होता।

मोटर इधर-उधर घूमती हुई हावड़ा-ब्रिज की तरफ चली जा रही थी, कि सहसा रमा ने एक स्त्री को सिर पर गंगा-जल का कलसा रक्खे घाटों के ऊपर आते देखा। उसके कपड़े बहुत मैले हो रहे थे और कृशांगी ऐसी थी कि कलसे के बोझ से उसकी गरदन दबी जाती थी। उसकी चाल कुछ-कुछ जालपा से मिलती हुई जान पड़ी। सोचा, जालपा यहां क्या करने आवेगी, मगर एक ही पल में कार और आगे बढ़ गई और रमा को उस स्त्री का मुंह दिखाई दिया। उसकी छाती धक-से हो गई। यह जालपा ही थी। उसने खिड़की के बगल में सिर छिपाकर गौर से देखा। बेशक जालपा थी, पर कितनी दुर्बल। मानो कोई वृद्धा, अनाथ हो। न वह कांति थी, न वह लावण्य, न वह चंचलता, न वह गर्व। रमा हृदयहीन न था। उसकी आंखें सजल हो गईं। जालपा इस दशा में और मेरे जीते जी! अवश्य देवीदीन ने उसे निकाल दिया होगा और वह टहलनी बनकर अपना निर्वाह कर रही होगी। नहीं, देवीदीन इतना बेमुरौबत नहीं है। जालपा ने खुद उसके आश्रय में रहना स्वीकार न किया होगा। मानिनी तो है ही। कैसे मालूम हो, क्या बात है?

मोटर दूर निकल आई थी। रमा की सारी चंचलता, सारी भोगलिप्सा गायब हो गई थी। मलिन वसना, दुःखिनी जालपा की वह मूर्ति आंखों के सामने खड़ी थी। किससे कहे? क्या कहे? यहां कौन अपना है? जालपा का नाम जबान पर आ जाय, तो सब-के-सब चौंक पड़े और फिर घर से निकलना बंद कर दें। ओह! जालपा के मुख पर शोक की कितनी गहरी छाया थी, आंखों में कितनी निराशा! आह, उन सिमटी हुई आंखों में जले हुए हृदय से निकलने वाली कितनी आहें सिर पीटती हुई मालूम होती थीं, मानो उन पर हंसी कभी आई ही नहीं, मानो वह कली बिना खिले ही मुरझा गई।

कुछ देर के बाद जोहरा आई, इठलाती, मुस्कराती, लचकती; पर रमा आज उससे भी कटा-कटा रहा। [ २०५ ]जोहरा ने पूछा-आज किसी की याद आ रही है क्या?

यह कहते हुए उसने अपनी गोल नर्म मक्खन-सी बांह उसकी गरदन में डालकर उसे अपनी ओर खींचा। रमा ने अपनी तरफ जरा भी जोर न किया। उसके हृदय पर अपना मस्तक रख दिया, मानो अब यही उसका आश्रय है।

जोहरा ने कोमलता में डूबे हुए स्वर में पूछा-सच बताओ, आज इतने उदास क्यों हो? क्या मुझसे किसी बात पर नाराज हो? ।

रमा ने आवेश से कांपते हुए स्वर में कहा -नहीं जोहरा, तुमने मुझ आभागे पर जितनी दया की है, उसके लिए मैं हमेशा तुम्हारा एहसानमंद रहूंगा। तुमने उस वक्त मुझे संभाला, जब मेरे जीवन की टूटी हुई किश्ती गोते खा रही थी। वे दिन मेरी जिंदगी के सबसे मुबारक दिन हैं और उनकी स्मृति को मैं अपने दिल में बराबर पूजता रहूंगा। मगर अभागों को मुसीबत बार-बार अपनी तरफ खींचती है ! प्रेम का बंधन भी उन्हें उस तरफ खिंच जाने से नहीं रोक सकता। मैंने जालपा को जिस सूरत में देखा है, वह मेरे दिल को भालों की तरह छेद रहा है। वह आज फटे- मैले कपड़े पहने, सिर पर गंगा-जल का कलसा लिए जा रही थी। उसे इस हालत में देखकर मेरा दिल टुकड़े-टुकड़े हो गया। मुझे अपनी जिंदगी में कभी इतना रंज न हुआ था। जोहरा, कुछ नहीं कह सकता, उस पर क्या बीत रही है।

जोहरा ने पूछा-वह तो उस बुड्ढे मालदार खटिक के घर पर थी?

रमानाथ-हां थीं तो, पर नहीं कह सकता, क्यों वहां से चली गई। इंस्पेक्टर साहब मेरे साथ थे। उनके सामने मैं उससे कुछ पूछ तक न सका। मैं जानता हूं, वह मुझे देखकर मुंह फेर लेती और शायद मुझे जलील समझती; मगर कम-से-कम मुझे इतना तो मालूम हो जाता कि वह इस वक्त इस दशा में क्यों है। जोहरा, तुम मुझे चाहे दिल में जो कुछ समझ रही हो, लेकिन मैं इस खयाल में मगन हूं कि तुम्हें मुझसे प्रेम है। और प्रेम करने वालों से हम कम-से-कम हमदर्दी की आशा करते हैं। यहां एक भी ऐसा आदमी नहीं, जिससे मैं अपने दिल का कुछ हाल कह सकूं। तुम भी मुझे रास्ते पर लाने ही के लिए भेजी गई थीं; मगर तुम्हें मुझ पर दया आई। शायद तुमने गिरे हुए आदमी पर ठोकर मारना मुनासिब न समझा। अगर आज हम और तुम किसी वजह से रूठ जायं, तो क्या कल तुम मुझे मुसीबत में देखकर मेरे साथ जरा भी हमदर्दी न करोगी? क्या मुझे भूखों मरते देखकर मेरे साथ उससे कुछ भी ज्यादा सलूक न करोगी, जो आदमी कुत्ते के साथ करता है? मुझे तो ऐसी आशा नहीं। जहां एक बार प्रेम ने वास किया हो, वहां उदासीनता और विराग चाहे पैदा हो जाय, हिंसा का भाव नहीं पैदा हो सकता। क्या तुम मेरे साथ जरा भी हमदर्दी न करोगी जोहरा? तुम अगर चाहो, तो जालपा का पूरा पता लगा सकती हो-वह कहां है, क्या करती है, मेरी तरफ से उसके दिल में क्या खयाल है, घर क्यों नहीं जाती, यहां कब तक रहना चाहती है? अगर किसी तरह जालपा को प्रयाग जाने पर राजी कर सको जोहरा, तो मैं उम्र भर तुम्हारी गुलामी करूंगा। इस हालत में मैं उसे नहीं देख सकता। शायद आज ही रात को मैं यहां से भाग जाऊं। मुझ पर क्या गुजरेगी, इसका मुझे जरा भी भय नहीं है। मैं बहादुर नहीं हूँ, बहुत ही कमजोर आदमी हूं। हमेशा खतरे के सामने मेरा हौसला पस्त हो जाता है; लेकिन मेरी बेगैरती भी यह चोट नहीं सह सकती।
[ २०६ ]
जोहरा वेश्या थी, उसको अच्छे-बुरे सभी तरह के आदमियों से साबिका पड़ चुका था। उसकी आंखों में आदमियों की परख थी। उसको इस परदेशी युवक में और अन्य व्यक्तियों में एक बड़ा फर्क दिखाई देता था । पहले वह यहां भी पैसे की गुलाम बनकर आई थी, लेकिन दो-चार दिन के बाद ही उसका मन रमा की ओर आकर्षित होने लगा। प्रौढ़ा स्त्रियां अनुराग की अवहेलना नहीं कर सकतीं। रमा में और सब दोष हों, पर अनुराग था। इस जीवन में जोहरा को यह पहला आदमी ऐसा मिला था जिसने उसके सामने अपना हदय खोलकर रख दिया, जिसने उससे कोई परदा न रक्खा। ऐसे अनुराग रत्न को वह खोना नहीं चाहती थी। उसकी बात सुनकर उसे जरा भी ईर्ष्या न हुई , बल्कि उसके मन में एक स्वार्थमय सहानुभूति उत्पन्न हुई। इस युवक को, जो प्रेम के विषय में इतना सरल था, वह प्रसन्न करके हमेशा के लिए अपना गुलाम बना सकती थी। उसे जालपा से कोई शंका न थी। जालपा कितनी ही रूपवती क्यों न हो, जोहरा अपने कला-कौशल से, अपने हाव-भाव से उसका रंग फीका कर सकती थी। इसके पहले उसने कई महान् सुंदरी खत्रानियों को रुलाकर छोड़ दिया था । फिर जालपा किस गिनती में थी।

जोहरा ने उसका हौसला बढ़ाते हुए कहा-तो इसके लिए तुम क्यों इतना रंज करते हो, प्यारे । जोहरा तुम्हारे लिए सब कुछ करने को तैयार है । मैं कल ही जालपा का पता लगाऊंगी और वह यहां रहना चाहेगी, तो उसके आराम के सब सामान कर दूंगी । जाना चाहेगी, तो रेल पर भेज दूंगी।

रमा ने बड़ी दीनता से कही–एक बार मैं उससे मिल लेता, तो मेरे दिल का बोझ उतर जाता।

जोहरा चिंतित होकर बोली-यह तो मुश्किल है प्यारे । तुम्हें यहां से कौन जाने देगा?

रमानाथ-कोई तदबीर बताओ।

जोहरा-मैं उसे पार्क में खड़ी कर आऊंगी। तुम डिप्टी साहब के साथ वहां जाना और किसी बहाने से उससे मिल लेना। इसके सिवा तो मुझे और कुछ नहीं सूझता।

रमा अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दारोगाजी ने पुकारा-मुझे भी खिलवत में आने की इजाजत है?

दोनों संभल बैठे और द्वार खोल दिया। दारोगाजी मुस्कराते हुए आए और जोहरा की बगल में बैठकर बोले-यहां आज सन्नाटा कैसा । क्या आज खजाना खाली है? जोहरा, आज अपने दस्ते-हिनाई से एक जाम भर कर दो। रमानाथ भाईजान नाराज न होना।

रमा ने कुछ तुर्श होकर कहा-इस वक्त तो रहने दीजिए, दारोगाजी। आप तो पिए हुए नजर आते हैं।

दारोगा ने जोहरा का हाथ पकड़कर कहा-बस, एक जाम जोहरा, और एक बात और, आज मेरी मेहमानी कबूल करो ।

रमा ने तेवर बदलकर कहा–दारोगाजी, आप इस वक्त यहां से जायं। मैं यह गवारा नहीं कर सकता।

दारोगा ने नशीली आंखों से देखकर कहा-क्या आपने पट्टा लिखा लिया है?
[ २०७ ]
रमा ने कड़ककर कहा-जी हां, मैंने पट्टा लिखा लिया है।

दारोगा--तो आपका पट्टा खारिज !

रमानाथ-मैं कहता हूं, यहां से चले जाइए।

दारोगा—अच्छा ! अब तो मेंढकी को भी जुकाम पैदा हुआ ! क्यों न हो । चलो जोहरा, इन्हें यहां बकने दो।

यह कहते हुए उन्होंने जोहरा का हाथ पकड़कर उठाया।

रमा ने उनके हाथ को झटका देकर कहा-मैं कह चुका, आप यहां से चले जाएं। जोहरा इस वक्त नहीं जा सकती। अगर वह गई, तो मैं उसकी और आपका-दोनों का खून पी जाऊंगा। जोहरा मेरी है, और जब तक मैं हूँ, कोई उसकी तरफ आंख नहीं उठा सकता।

यह कहते हुए उसने दारोगा साहब का हाथ पकड़कर दरवाजे के बाहर निकाल दिया और दरवाजा जोर से बंद करके सिटकनी लगा दी। दारोगाजी बलिष्ठ आदमी थे, लेकिन इस वक्त नशे ने उन्हें दुर्बल बना दिया था । बाहर बरामदे में खड़े होकर वह गालियां बकने और द्वार पर ठोकर मारने लगे।

रमा ने कहा-कहो तो जाकर बचा को बरामदे के नीचे ढकेल दें। शैतान का बच्चा ।

जोहरा–बकने दो, आप ही चला जायगा।

रमानाथ–चला गया।

जोहरा ने मगन होकर कहा-तुमने बहुत अच्छा किया, सुअर को निकाल बाहर किया। मुझे ले जाकर दिक करता। क्या तुम सचमुच उसे मारते?

रमानाथ-मैं उसकी जान लेकर छोड़ता। मैं उस वक्त अपने आपे में न था। न जाने मुझमें उस वक्त कहां से इतनी ताकत आ गई थी।

जोहरा-और जो वह कल से मुझे न आने दे तो?

रमानाथ-कौन, अगर इस बीच में उसने जरा भी भांजी मारी, तो गोली मार दूंगा । वह देखो, ताक परे पिस्तौल रक्खा हुआ है। तुम अब मेरी हो, जोहरा । मैंने अपना सब कुछ तुम्हारे कदमों पर निसार कर दिया और तुम्हारा सब कुछ पाकर ही मैं संतुष्ट हो सकता हूं। तुम मेरी हो, मैं तुम्हारा हूं। किसी तीसरी औरत या मर्द को हमारे बीच में आने का मजाज नहीं है जब तक मैं मर न जाऊं।

जोहरा की आंखें चमक रही थीं । उसने रमा की गरदन में हाथ डालकर कहा-ऐसी बात मुंह से न निकालो, प्यारे !

अड़तालीस

सारे दिन रमा उद्वेग के जंगलों में भटकता रहा। कभी निराशा की अंधकारमय घाटियां सामने आ जातीं, कभी आशा की लहराती हुई हरियाली । जोहरा गई भी होगी ? यहां से तो बड़े लंबे-चौड़े वादे करके गई थी। उसे क्या गरज है? आकर कह देगी, मुलाकात ही नहीं हुई। कहीं
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धोखा तो न देगी? जाकर डिप्टी साहब से सारी कथा कह सुनाए। बेचारी जालपा पर बैठे-बिठाए आफत आ जाय। क्या जोहरा इतनी नीच प्रकृति की हो सकती है? कभी नहीं, अगर जोहरा इतनी बेवफा, इतनी दगाबाज है, तो यह दुनिया रहने के लायक ही नहीं। जितनी जल्द आदमी मुंह में कालिख लगाकर डूब मरे, उतना ही अच्छा। नहीं, जोहरा मुझसे दगा न करेगी।

उसे वह दिन याद आए, जब उसके दफ्तर से आते ही जालपा लपककर उसकी जेब टटोलती थी और रुपये निकाल लेती थी। वही जालपा आज इतनी सत्यवादिनी हो गई । तब वह प्यार करने की वस्तु थी, अब वह उपासना की वस्तु है। जालपा ! मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूं। जिस ऊंचाई पर तुम मुझे ले जाना चाहती हो, वहां तक पहुंचने की शक्ति मुझमें नहीं है। यहां पहुंचकर शायद चक्कर खाकर गिर पडूं। मैं अब भी तुम्हारे चरणों में सिर झुकाता हूं। मैं जानता हूं, तुमने मुझे अपने हृदय से निकाल दिया है, तुम मुझसे विरक्त हो गई हो, तुम्हें अब मेरे डूबने का दुःख है न तैरने की खुशी; पर शायद अब भी मेरे मरने या किसी घोर संकट में फंस जाने की खबर पाकर तुम्हारी आंखों से आंसू निकल आएंगे। शायद तुम मेरी लाश देखने आओ। हा! प्राण ही क्यों नहीं निकल जाते कि तुम्हारी निगाह में इतना नीच तो न रहूँ।

रमा को अब अपनी उस गलती पर घोर पश्चात्ताप हो रहा था, जो उसने जालपा की बात न मानकर की थी। अगर उसने उसके आदेशानुसार जज के इजलास में अपना बयान बदल दिया होता, धमकियों में न आता, हिम्मत मजबूत रखता, तो उसकी यह दशा क्यों होती? उसे विश्वास था, जालपा के साथ वह सारी कठिनाइयां झेल जाता। उसकी श्रद्ध्य और प्रेम का कवच पहनकर वह अजेय हो जाता। अगर उसे फांसी भी हो जाती, तो वह हंसते-खेलते उस पर चढ़ जाता।

मगर पहले उससे चाहे जो भूल हुई, इस वक्त तो वह भूल से नहीं, जालपा की खातिर ही यह कष्ट भोग रहा था। कैद जब भोगना ही है, तो उसे रो-रोकर भोगने से तो यह कहीं अच्छा है कि हंस-हंसकर भोगा जाय। आखिर पुलिस-अधिकारियों के दिल में अपना विश्वास जमाने के लिए वह और क्या करता ! यह दुष्ट जालपा को सताते, उसका अपमान करते, उस पर झूठे मुकदमे चलाकर उसे सजा दिलाते। वह दशा तो और भी असह्य होती। वह दुर्बल था, सब अपमान सह सकता था, जालपा तो शायद् प्राण ही दे देती।

उसे आज ज्ञात हुआ कि वह जालपा को छोड़ नहीं सकता, और जोहरा को त्याग देना भी उसके लिए असंभव-सा जान पड़ता था। क्या वह दोनों रमणियों को प्रसन्न रख सकता था? क्या इस दशा में जालपा उसके साथ रहना स्वीकार करेगी? कभी नहीं। वह शायद उसे कभी क्षमा न करेगी। अगर उसे यह मालूम भी हो जाये कि उसी के लिए वह यह यातना भोग रहा है, तो वह उसे क्षमा न करेगी। वह कहेगी, मेरे लिए तुमने अपनी आत्मा को क्यों कलंकित किया? मैं अपनी रक्षा आप कर सकती थी।

वह दिन-भर इसी उधेड़-बुन में पड़ा रहा। आंखें सड़क की ओर लगी हुई थीं। नहाने का समय टल गया, भोजन का समय टल गया । किसी बात की परवा न थी। अखबार से दिल बहलाना चाहा, उपन्यास लेकर बैठा; मगर किसी काम में भी चित्त न लगा। आज दारोगाजी भी
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नहीं आए। या तो रात की घटना से रुष्ट या लज्जित थे। या कहीं बाहर चले गए। रमा ने किसी से इस विषय में कुछ पूछा भी नहीं।

सभी दुर्बल मनुष्यों की भांति रमा भी अपने पतन से लज्जित था। वह जब एकांत में बैठता, तो उसे अपनी दशा पर दुःख होता—क्यों उसकी विलासवृत्ति इतनी प्रबल है? यह इतना विवेक-शून्य न था कि अधोगति में भी प्रसन्न रहता; लेकिन ज्योहीं और लोग आ जाते, शराब की बोतल आ जाती, जोहरा सामने आकर बैठ जाती, उसका सारा विवेक और धर्म-ज्ञान भ्रष्ट हो जाता।

रात के दस बज गए; पर जोहरा का कहीं पता नहीं। फाटक बंद हो गया। रमा को अब उसके आने की आशा न रही ; लेकिन फिर भी उसके कान लगे हुए थे। क्या बात हुई? क्या जालपा उसे मिली ही नहीं या वह गई ही नहीं? उसने इरादा किया अगर कल जोहरा न आई, तो उसके घर पर किसी को भेजेंगे। उसे दो-एक झपकियां आईं और सबेरा हो गया। फिर वहीं विकलता शुरू हुई। किसी को उसके घर भेजकर बुलवाना चाहिए। कम-से-कम यह तो मालूम हो जाय कि वह घर पर है या नहीं।

दारोगा के पास जाकर बोला-रात तो आप आपे में न थे।

दारोगा ने ईर्ष्या को छिपाते हुए कहा-यह बात न थी। मैं महज आपको छेड़ रहा था।

रमानाथ--जोहरा रात आई नहीं । जरा किसी को भेजकर पता तो लगवाइए, बात क्या है। कहीं नाराज तो नहीं हो गई?

दारोगा ने बेदिली से कहा-उसे गरज होगा खुद आएगी। किसी को भेजने की जरूरत नहीं है।

रमा ने फिर आग्रह न किया। समझ गया, यह हज़रत रात बिगड़ गए। चुपके से चला आया। अब किससे कहे? सबसे यह बात कहना लज्जास्पद मालूम होता था। लोग समझेंगे, यह महाशय एक ही रसिया निकले। दारोगा से तो थोड़ी-सी घनिष्ठता हो गई थी।

एक हफ्ते तक उसे जोहरा के दर्शन न हुए। अब उसके आने की कोई आशा न थी। रमा ने सोचा, आखिर बेवफा निकली। उससे कुछ आशा करना मेरी भूल थी। या मुमकिन है, पुलिस अधिकारियों ने उसके आने की मनाही कर दी हो। कम-से-कम मुझे एक पत्र तो लिख सकती थी। मुझे कितना धोखा हुआ। व्यर्थ उससे अपने दिल की बात कही। कहीं इन लोगों से न कह दे, तो उल्टी आंतें गले पड़ जायं; मगर जोहरा बेवफाई नहीं कर सकती। रमा की अंतरात्मा इसकी गवाही देती थी । इस बात को किसी तरह स्वीकार न करती थी। शुरु के दस-पांच दिन तो जरूर जोहरा ने उसे लुब्ध करने की चेष्टा की थी। फिर अनायास ही उसके व्यवहार में परिवर्तन होने लगा था। वह क्यों बार-बार सजल-नेत्र होकर कहती थी, देखो बाबूजी, मुझे भूल न जाना। उसकी वह हसरत भरी बात याद आ-आकर कपट की शंका को दिल से निकाल देतीं। जरूर कोई न कोई नई बात हो गई है। वह अक्सर एकांत में बैठकर जोहरा की याद करके बच्चों की तरह रोता। शराब से उसे घृणा हो गई। दारोगाजी आते, इंस्पेक्टर साहब आते पर, रमा को उनके साथ दस-पांच मिनट बैठना भी अखरता। वह चाहता था, मुझे कोई न छेड़े, कोई न बोले। रसोइया खाने को बुलाने आता, तो उसे घुड़क देता। कहीं घूमने या सैर करने
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की उसकी इच्छा ही न होती। यहां कोई उसका हमदर्द न था, कोई उसका मित्र न था, एकांत में मन-मारे बैठे रहने में ही उसके चित्त को शांति होती थी। उसकी स्मृतियों में भी अब कोई आनंद न था। नहीं, वह स्मृतियां भी मानो उसके हृदय से मिट गईं थीं। एक प्रकार का विराग उसके दिल पर छाया रहता था।

सातवां दिन था। आठ बज गए थे। आज एक बहुत अच्छा फिल्म होने वाला था। एक प्रेम-कथा थी। दारोगाजी ने आकर रमा से कहा, तो वह चलने को तैयार हो गया। कपड़े पहन रहा था कि जोहरा आ पहुंची। रमा ने उसकी तरफ एक बार आंख उठाकर देखा, फिर आईने में अपने बाल संवारने लगा। न कुछ बोला, न कुछ कहा। हां, जोहरा का वह सादा, आभरणहीन स्वरूप देखकर उसे कुछ आश्च़र्य अवश्य हुआ। यह केवल एक सफेद साड़ी पहने हुए थी। आभूषण की एक तार भी उसकी देह पर न था। होंठ मुरझाए हुए और चेहरे पर क्रीडामय चंचलता की जगह तेजमय गंभीरता झलक रही थी। वह एक मिनट खड़ी रही, तब रमा के पास जाकर बोली-क्या मुझसे नाराज हो? बेकसूर, बिना कुछ पूछे-गछे?

रमा ने फिर भी कुछ जवाब न दिया। जूते पहनने लगा। जोहरा ने उसका हाथ पकड़कर कहा-क्या यह खफगी इसलिए है कि मैं इतने दिनों आई क्यों नहीं ।

रमा ने रूग्वाई से जवाब दिया-अगर तुम अब भी न आतीं, तो मेरा क्या अख्तियार था।

तुम्हारी दया थी कि चली आई।

यह कहने के साथ उसे खयाल आया कि मैं इसके साथ अन्याय कर रहा हूँ। लज्जित नेत्रों से उसकी ओर ताकने लगा।

जोहरा ने मुस्कराकर कहा-यह अच्छी दिल्लगी है। आपने ही तो एक काम सौंपा और जब वह काम करके लौटी तो आप बिगड़ रहे हैं। क्या तुमने वह काम इतना आसान समझा था कि चुटकी बजाने में पूरा हो जाएगा। तुमने मुझे उस देवी से वरदान लेने भेजा था, जो ऊपर से फूल है, पर भीतर से पत्थर, जो इतनी नाजुक होकर भी इतनी मजबूत है। रमा ने बेदिली से पूछा-है कहां? क्या करती है? जोहरा–उसी दिनेश के घर हैं, जिसको फांसी की सजा हो गई है। उसके दो बच्चे हैं, औरत है और मां है। दिन-भर उन्हीं बच्चों को खिलाती है, बुढ़िया के लिए नदी से पानी लाती है। घर का सारा काम-काज करती है और उनके लिए बड़े-बड़े आदमियों से चंदा मांग लाती है। दिनेश के घर में न कोई जायदाद थी, न रुपये थे। लोग बड़ी तकलीफ में थे। कोई मददगार तक न था, जो जाकर उन्हें ढाढस तो देता। जितने साथी-सोहबती थे, सब-के-सब मुंह छिपा बैठे। दो-तीन फाके तक हो चुके थे। जालपा ने जाकर उनको जिला लिया।

रमा की सारी बेदिली काफूर हो गई। जूता छोड़ दिया और कुर्सी पर बैठकर बोले-तुम खड़ी क्यों हो, शुरू से बताओ, तुमने तो बीच में से कहना शुरू किया। एक बात भी मत छोड़ना। तुम पहले उसके पास कैसे पहुंची? पता कैसे लगा?

जोहरा–कुछ नहीं, पहले उसी देवीदीन खटिक के पास गई। उसने दिनेश के घर का पता बता दिया। चटपट जा पहुंची।
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रमानाथ-तुमने जाकर उसे पुकारा? तुम्हें देखकर कुछ चौंकी नहीं? कुछ झिझकी तो जरूर होगी!

जोहरा मुस्कराकर बोली- मैं इस रूप में न थी। देवीदीन के घर से मैं अपने घर गई और ब्रह्म-समाजी लेडी का स्वांग भरा। न जाने मुझमें ऐसी कौन-सी बात है, जिससे दूसरों को फौरन पता चल जाता है कि मैं कौन हूं, या क्या हूं। और ब्रह्मो लेड़ियों को देखती हूं, कोई उनकी तरफ आंखें तक नहीं उठाता। मेरा पहनावा-ओढावा वही है, मैं भड़कीले कपड़े या फिजूल के गहने बिल्कुल नहीं पहनती। फिर भी सब मेरी तरफ आंखें फाड़-फाड़कर देखते हैं। मेरी असलियत नहीं छिपती। यही खौफ मुझे था कि कहीं जालपा भांप न जाय; लेकिन मैंने दांत खूब साफ कर लिए थे। पान का निशान तक न था। मालूम होता था किसी कॉलेज की लेडी टीचर होगी। इस शक्ल में मैं वहां पहुंची। ऐसी सूरत बना ली कि वह क्या, कोई भी न भांप सकता था। परदा ढंका रह गया। मैंने दिनेश की मां से कहा-मैं यहां यूनिवर्सिटी में पढ़ती हूं।  अपना घर मुंगेर बतलाया। बच्चों के लिए मिठाई ले गई थी। हमदर्द का पार्ट खेलने गई थी, और मेरा खयाल है कि मैंने खूब खेला। दोनों औरतें बेचारी रोने लगी। मैं भी जब्त न कर सकी। उनसे कभी-कभी मिलते रहने का वादा किया। जालपा इसी बीच में गंगाजल लिए पहुंची। मैंने दिनेश की मां से बंगला में पूछा-क्या यह कहारिन है? उसने कहा, नहीं, यह भी तुम्हारी ही तरह हम लोगों के दुःख में शरीक होने को आई है। यहां इनका शौहर किसी दफ्तर में नौकर है। और तो कुछ नहीं मालूम। रोज सबेरे आ जाती हैं और बच्चों को खेलाने ले जाती हैं। मैं अपने हाथ से गंगाजल लाया करती थी। मुझे रोक दिया और खुद लाती हैं। हमें तो इन्होंने जीवन-दान दिया। कोई आगे-पीछे न था। बच्चे दाने-दाने को तरसते थे। जब से यह आ गई हैं, हमें कोई कष्ट नहीं है। न जाने किस शुभ कर्म का यह वरदान हमें मिला है।

उस घर के सामने ही एक छोटा-सा पार्क है। मोहल्ले भर के बच्चे वहीं खेला करते हैं।

शाम हो गई थी, जालपा देवी ने दोनों बच्चों को साथ लिया और पार्क की तरफ चलीं। मैं जो मिठाई ले गई थी, उसमें से बूढी ने एक-एक मिठाई दोनों बच्चों को दी थी। दोनों कूद-कूदकर नाचने लगे। बच्चों की इस खुशी पर मुझे रोना आ गया। दोनों मिठाइयां पाते हुए जालपा के साथ हो लिए। जब पार्क में दोनों बच्चे खेलने लगे, तब जालपा से मेरी बातें होने लगीं।

रमा ने कुर्सी और करीब खींच ली, और आगे को झुक गया। बोला-तुमने किस तरह बातचीत शुरू की।

जोहरा-कह तो रही हूं। मैंने पूछा-जालपा देवी, तुम कहां रहती हो? घर की दोनों औरतों से तुम्हारी बड़ाई सुनकर तुम्हारे ऊपर आशिक हो गई हूं।

रमानाथ–यही लफ्ज़ कहा था तुमने?

जोहरा–हां, जरा मजाक करने की सूझी। मेरी तरफ ताज्जुब से देखकर बोली-तुम तो बंगालिन नहीं मालूम होतीं। इतनी साफ हिंदी कोई बंगालिन नहीं बोलती। मैंने कहा-मैं मुंगेर की रहने वाली हूं और वहां मुसलमानी औरतों के साथ बहुत मिलती-जुलती रही हूं। आपसे कभी-कभी मिलने का जी चाहता है। आप कहां रहती हैं। कभी-कभी दो घड़ी के लिए चली आऊंगी। आपके साथ घड़ी भर बैठकर मैं भी आदमीयत सीख जाऊंगी।
[ २१२ ]जालपा ने शरमाकर कहा—तुम तो मुझे बनाने लगीं । कहां तुम कॉलेज की पढ़ाने वाली,कहां मैं अपढ़ गंवार औरत। तुमसे मिलकर मैं अलबत्ता आदमी बन जाऊंगी। जब जी चाहे, यहीं चले आना। यही मेरा घर समझो।

मैंने कहा-तुम्हारे स्वामीजी ने तुम्हें इतनी आजादी दे रक्खी है। बड़े अच्छे खयालों के आदमी होंगे। किस दफ्तर में नौकर है?

जालपा ने अपने नाखूनों को देखते हुए कहा-पुलिस में उम्मेदवार हैं।

मैंने ताज्जुब से पूछा-पुलिस के आदमी होकर वह तुम्हें यहां आने की आजादी देते हैं?

जालपा इस प्रश्न के लिए तैयार न मालूम होती थी। कुछ चौंककर बोली-वह मुझसे कुछ नहीं कहते,मैंने उनसे यहां आने की बात नहीं कही वह घर बहुत कम आते हैं। वहीं पुलिस वालों के साथ रहते हैं।

उन्होंने एक साथ तीन जवाब दिए। फिर भी उन्हें शक हो रहा था कि इनमें से कोई जवाब इत्मीनान के लायक नहीं है। वह कुछ खिसियानी-सी होकर दूसरी तरफ ताकने लगी।

मैंने पूछा-तुम अपने स्वामी से कहकर किसी तरह मेरी मुलाकात उस मुखबिर से करा सकती हो, जिसने इन कैदियों के खिलाफ गवाही दी है?

रमानाथ की आंखें फैल गई और छाती धक्-धक् करने लगी।

जोहरा बोली- यह सुनकर जालपा ने मुझे चुभती हुई आंखों से देखकर पूछा- तुम उनसे मिलकर क्या करोगी?

मैंने कहा-तुम मुलाकात करा सकती हो या नहीं, मैं उनसे यही पूछना चाहती हूं कि तुमने इतने आदमियों को फंसाकर क्या पाया? देखूंगी वह क्या जवाब देते हैं?

जालपा का चेहरा सख्त पड़ गया। बोली-वह यह कह सकता है, मैंने अपने फायदे के लिए किया | सभी आदमी अपना फायदा सोचते हैं। मैंने भी सोचा। जब पुलिस के सैकड़ों आदमियों से कोई यह प्रश्न नहीं करता, तो उससे यह प्रश्न क्यों किया जाय? इससे कोई फायदा नहीं।

मैंने कहा-अच्छा,मान लो तुम्हारा पति ऐसी मुखबिरी करता,तो तुम क्या करतीं?

जालपा ने मेरी तरफ सहमी हुई आंखों से देखकर कहा—तुम मुझसे यह सवाल क्यों करती हो, तुम खुद अपने दिल में इसका जवाब क्यों नहीं ढूंढतीं?

मैंने कहा-मैं तो उनसे कभी न बोलती, न कभी उनकी सूरत देखती।

जालपा ने गंभीर चिंता के भाव से कहा- शायद मैं भी ऐसा ही समझती-या न समझती-कुछ कह नहीं सकती। आखिर पुलिस के अफसरों के घर में भी तो औरतें हैं, वे क्यों नहीं अपने आदमियों को कुछ कहतीं? जिस तरह उनके हृदय अपने मरदों के-से हो गए हैं,संभव है, मेरा हृदय भी वैसा ही हो जाता।

इतने में अंधेरा हो गया। जालपादेवी ने कहा-मुझे देर हो रही है। बच्चे साथ हैं। कल हो सके तो फिर मिलिएगा। आपकी बातों में बड़ा आनंद आता है।

मैं चलने लगी,तो उन्होंने चलते-चलते मुझसे कहा-जरूर आइएगा। वहीं मैं मिलूंगी। आपका इंतजार करती रहूंगी।
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लेकिन दस ही कदम के बाद फिर रुककर बोलीं-मैंने आपका नाम तो पूछा ही नहीं। अभी तुमसे बातें करने से जी नहीं भरा। देर न हो रही हो तो आओ; कुछ देर गपशप करें।

मैं तो यह चाहती ही थी। अपना नाम जोहरा बतला दिया।

रमा ने पूछा-सच।

जोहरा-हां, हरज क्या था। पहले तो जालपा भी जरा चौंकी, पर कोई बात न थी। समझ गई, बंगाली मुसलमान होगी। हम दोनों उसके घर गईं। उस जरा-से कठघरे में न जाने वह कैसे बैठती हैं। एक तिल भी जगह नहीं। कहीं मटके हैं, कहीं पानी, कहीं खाट, कहीं बिछावन। सौल और बदबू से नाक फटी जाती थी। खाना तैयार हो गया था। दिनेश की बहू बरतन धो रही थी जालपा ने उसे उठा दिया-जाकर बच्चों को खिलाकर सुला दो, मैं बरतन धोए देती हूं। और खुद बरतन मांजने लगीं। उनकी यह खिदमत देखकर मेरे दिल पर इतना असर हुआ कि मैं भी वहीं बैठ गई और मांजे हुए बरतनों को धोने लगी। जालपा ने मुझे वहां से हट जाने के लिए कहा; पर मैं न हटी। बराबर बरतन धोती रही। जालपा ने तब पानी का मटका अलग हटाकर कहा-मैं पानी न दूंगी,तुम उठ जाओ, मुझे बड़ी शर्म आती है,तुम्हें मेरी कसम,हट जाओ,यहां आना तो तुम्हारी सजा हो गई,तुमने ऐसा काम अपनी जिंदगी में क्यों किया होगा |मैंने कहा-तुमने भी तो कभी नहीं किया होगा,जब तुम करती हो,तो मेरे लिए क्या हरज है।

जालपा ने कहा-मेरी और बात है।

मैंने पूछा-क्यों? जो बात तुम्हारे लिए है, वही मेरे लिए भी है। कोई महरी क्यों नहीं रख लेती हो?

जालपा ने कहा-महरियां आठ-आठ रुपये मांगती हैं।

मैं बोली- मैं आठ रुपये महीना दे दिया करूंगी।

जालपा ने ऐसी निगाहों से मेरी तरफ देखा, जिसमें सच्चे प्रेम के साथ सच्चा उल्लास,सच्चा आशीर्वाद भरा हुआ था। वह चितवन । आह!कितनी पाकीजा थी,कितनी पाक करने वाली।उनकी इस बेगरज खिदमत के सामने मुझे अपनी जिंदगी कितनी जलन, कितनी काबिले नफरत मालूम हो रही थी। उन बरतनों के धोने में मुझे जो आनंद मिला, उसे मैं बयान नहीं कर सकती।

बरतन धोकर उठीं, तो बुढ़िया के पांव दबाने बैठ गईं। मैं चुपचाप खड़ी थी। मुझसे बोलीं- तुम्हें देर हो रही हो तो जाओ, कल फिर आना।

मैंने कहा-नहीं, मैं तुम्हें तुम्हारे घर पहुंचाकर उधर ही से निकल जाऊंगी।

गरज नौ बजे के बाद वह वहां से चलीं। रास्ते में मैंने कहा-जालपा, तुम सचमुच देवी हो।

जालपा ने छूटते ही कहा-जोहरा,ऐसा मत कहो। मैं खिदमत नहीं कर रही हूं,अपने पापों का प्रायश्चित कर रही हूं। मैं बहुत दु:खी हूं। मुझसे बड़ी अभागिनी संसार में न होगी।

मैंने अनजान बनकर कहा-इसका मतलब मैं नहीं समझी।

जालपा ने सामने ताकते हुए कहा—कभी समझ जाओगी। मेरा प्रायश्चित इस जन्म में न पूरा होगा। इसके लिए मुझे कई जन्म लेने पड़ेंगे।
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मैंने कहा--तुम तो मुझे चक्कर में डाले देती हो, बहन ! मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है। जब तक तुम इसे समझा न दोगी, मैं तुम्हारा गला ने छोडूंगी।

जालपा ने एक लंबी सांस लेकर कहा-जोहरा, किसी बात को खुद छिपाए रहना इससे ज्यादा आसान है कि दूसरों पर वह बोझ रखें।

मैंने आर्त कंठ से कहा-हां, पहली मुलाकात में अगर आपको मुझ पर इतना एतबार न हो, तो मैं आपको इल्जाम न दूंगी; मगर कभी न कभी आपको मुझ पर एतबार करना पड़ेगा। मैं आपको छोडूगी नहीं।

कुछ दूर तक हम दोनों चुपचाप चलती रहीं। एकाएक जालपा ने कांपती हुई आवाज में कहा-जोहरा, अगर इस वक्त तुम्हें मालूम हो जाय कि मैं कौन हूं, तो शायद तुम नफरत से मुंह फेर लोगी और मेरे साए से भी दूर भागोगी।

इन लफ्जों में न मालूम क्या जादू था कि मेरे सारे रोएं खड़े हो गए। यह एक रंज और शर्म से भरे हुए दिल की आवाज़ थी और इसने मेरी स्याह जिंदगी की सूरत मेरे सामने खड़ी कर दी। मेरी आंखों में आंसू भर आए। ऐसा जी में आया कि अपना सारा स्वांग खोल दें। न जाने उनके सामने मेरा दिल क्यों ऐसा हो गया था। मैंने बड़े-बड़े काइए और छूटे हुए शोहदों और पुलिस अफसरों को चपर-गटू बनाया है; पर उनके सामने मैं जैसे भीगी बिल्ली बनी हुई थी। फिर मैंने जाने कैसे अपने को संभाल लिया।

मैं बोली तो मेरा गला भी भरा हुआ था—यह तुम्हारा खयाल गलत है देवी ! शायद तब मैं तुम्हारे पैरों पर गिर पड़ूँगी। अपनी या अपनों की बुराइयों पर शर्मिंदा होना सच्चे दिलों को काम है।

जालपा ने कहा–लेकिन तुम मेरा हाल जानकर करोगी क्या। बस, इतना ही समझ लो कि एक गरीब अभागिन औरत हैं, जिसे अपने ही जैसे अभागे और गरीब आदमियों के साथ मिलने-जुलने में आनंद आता है।

'इसी तरह वह बार-बार टालती रही, लेकिन मैंने पीछा न छोड़ा। आखिर उसके मुंह से बात निकाल ही ली।'

रमा ने कहा—यह नहीं, सब कुछ कहना पड़ेगा।

जोहरा-अब आधी रात तक की कथा कहां तक सुनाऊ। घंटों लग जाएंगे। जब मैं बहुत पीछे पड़ी, तो उन्होंने आखिर में कहा-मैं उसी मुखबिर की बदनसीब औरत हूं, जिसने इन कैदियों पर यह आफत ढाई है। यह कहते-कहते वह रो पड़ीं। फिर जरा आवाज को संभालकर बोलीं-हम लोग इलाहाबाद के रहने वाले हैं। एक ऐसी बात हुई कि इन्हें वहां से भागना पड़ा। किसी से कुछ कहा न सुना, भाग आए। कई महीनों में पता चला कि वह यहां हैं।

रमा ने कहा—इसका भी किस्सा हैं। तुमसे बताऊंगा कभी। जालपा के सिवा और किसी को यह न सूझती।

जोहरा बोली-यह सब मैंने दूसरे दिन जान लिया। अब मैं तुम्हारे रग-रग से वाकिफ हो गई। जालपा मेरी सहेली है। शायद ही अपनी कोई बात उन्होंने मुझसे छिपाई हो। कहने लगीं-जोहरा, मैं बड़ी मुसीबत में फंसी हुई हूं। एक तरफ तो एक आदमी की
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जान और कई खानदानों की तबाही है, दूसरी तरफ अपनी तबाही है। मैं चाहूं, तो आज इन सबों की जान बचा सकती हूं। मैं अदालत को ऐसा सबूत दे सकती हूं कि फिर मुखबिर की शहादत की कोई हकीकत ही न रह जायगी, पर मुखबिर को सजा से नहीं बचा सकती। बहन, इस दुविधे में मैं पड़ी नरक का कष्ट झेल रही हूं। न यही होता है कि इन लोगों को मरने दें, और न यही हो सकता है कि रमा को आग में झोंक दें। यह कहकर वह रो पड़ीं और बोलीं-बहन, मैं खुद मर जाऊंगी, पर उनका अनिष्ट मुझसे न होगा। न्याय पर उन्हें भेंट नहीं कर सकती। अभी देखती हूं, क्या फैसला होता है। नहीं कह सकती, उस वक्त मैं क्या कर बैठूं। शायद वहीं हाईकोर्ट में सारा किस्सा कह सुनाऊं, शायद उसी दिन जहर खाकर सो रहूं।

इतने में देवीदीन का घर आ गया। हम दोनों विदा हुईं। जालपा ने मुझसे बहुत इसरार किया कि कल इसी वक्त फिर आना। दिन-भर तो उन्हें बात करने की फुरसत नहीं रहती। बस वहीं शाम को मौका मिलता था। वह इतने रुपये जमा कर देना चाहती हैं कि कम-से-कम दिनेश के घर वालों को कोई तकलीफ न हो। दो सौ रुपये से ज्यादा जमा कर चुकी हैं। मैंने भी पांच रुपये दिए। मैंने दो-एक बार जिक्र किया कि आप इन झगड़ों में न पड़िए, अपने घर चली जाइए, लेकिन मैं साफ-साफ कहती हु, मैंने कभी जोर देकर यह बात न कही। जब-जब मैंने इसका इशारा किया उन्होंने ऐसा मुंह बनाया, गोया वह यह बात सुनना भी नहीं चाहतीं। मेरे मुंह से पूरी बात कभी न निकलने पाई। एक बात है, कहो तो कहूं?

रमा ने मानो ऊपरी मन से कहा-क्या बात है?

जोहरा–डिप्टी साहब से कह दूं, वह जालपा को इलाहाबाद पहुंचा दें। उन्हें कोई तकलीफ न होगी। बस दो औरतें उन्हें स्टेशन तक बातों में लगा ले जाएंगी। वहां गाड़ी तैयार मिलेंगी, वह उसमें बैठा दी जाएंगी, या कोई और तदबीर सोचो।

रमा ने जोहरा की आंखों से आंख मिलाकर कहा-क्या यह मुनासिब होगा?

जोहरा ने शरमाकर कहा-मुनासिब तो न होगा।

रमा ने चटपट जूते पहन लिए और जोहरा से पूछा-देवीदीन के ही घर पर रहती है न?

जोहरा उठ खड़ी हुई और उसके सामने आकर बोली-तो क्या इस वक्त जाओगे?

रमानाथ–हां जोहरा, इसी वक्त चला जाऊंगा। बस, उनसे दो बातें करके उस तरफ चला जाऊंगा जहां मुझे अब से बहुत पहले चला जाना चाहिए था।

जोहरा-मगर कुछ सोच तो लो, नतीजा क्या होगा।

रमानाथ-सब सोच चुका, ज्यादा से ज्यादा तीन-चार साल की कैद दरोगबयानी के जुर्म में। बस अब रुखसते। भूल मत जाना जोहरा, शायद फिर कभी मुलाकात हो।

रमा बरामदे से उतरकर सहन में आया और एक क्षण में फाटक के बाहर था। दरबान ने कहा-हुजूर ने दारोगाजी को इत्तला कर दी है?

रमानाथ-इसकी कोई जरूरत नहीं।

चौकीदार-मैं जरा उनसे पूछ लूँ। मेरी रोजी क्यों ले रहे हैं, हुजूर?

रमा ने कोई जवाब न दिया। तेजी से सड़क पर चल खड़ा हुआ। जोहरा निस्पंद खड़ी उसे हसरत-भरी आंखों से देख रही थी। रमा के प्रति ऐसा प्यार, ऐसा विकल करने वाला प्यार
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उसे कभी न हुआ था। जैसे कोई वीरबाला अपने प्रियतम को समरभूमि की ओर जाते देखकर गर्व से फूली न समाती हो।

चौकीदार ने लपककर दारोगा से कही। वह बेचारे खाना खाकर लेटे ही थे। घबराकर निकले, रमा के पीछे दौड़े और पुकारा–बाबू साहब, जरा सुनिए तो, एक मिनट रुक जाइए, इससे क्या फायदा-कुछ मालूम तो हो, आप कहां जा रहे हैं? आखिर बेचारे एक बार ठोकर खाकर गिर पड़े। रमा ने लौटकर उन्हें उठाया और पूछा-कहीं चोट तो नहीं आई?

दारोगा कोई बात न थी, जरा ठोकर खा गया था। आखिर आप इस वक्त कहां जा रहे हैं? सोचिए तो इसका नतीजा क्या होगा?

रमानाथ-मैं एक घंटे में लौट आऊंगा। जालपा को शायद मुखालिफों ने बहकाया है कि हाईकोर्ट में एक अर्जी दे दे। जरा उसे जाकर समझाऊंगा।

दारोगा—यह आपको कैसे मालूम हुआ?

रमानाथ–जोहरा कहीं सुन आई है।

दारोगा-बड़ी बेवफा औरत है। ऐसी औरत का तो सिर काट लेना चाहिए।

रमानाथ-इसीलिए तो जा रहा हूं। या तो इसी वक्त उसे स्टेशन पर भेजकर आऊंगा, या इस बुरी तरह पेश आऊंगा कि वह भी याद करेगी। ज्यादा बातचीत का मौका नहीं है। रात भर के लिए मुझे इस कैद से आजाद कर दीजिए।

दारोगा-मैं भी चलता हूँ, जरा ठहर जाइए।

रमानाथ-जी नहीं, बिल्कुल मामला बिगड़ जाएगा। मैं अभी आता हूं।

दारोगा लाजवाब हो गए। एक मिनट तक खड़े सोचते रहे, फिर लौट पड़े और जोहरा से बातें करते हुए पुलिस स्टेशन की तरफ चले गए। उधर रमा ने आगे बढ़कर एक तांगा किया और देवीदीन के घर जा पहुँचा। जालपा दिनेश के घर से लौटी थी और बैठी जग्गों और देवीदीन से बातें कर रही थी। वह इन दिनों एक ही वक्त खाना खाया करती थी। इतने में रमा ने नीचे से आवाज दी। देवीदीन उसकी आवाज पहचान गया। बोला–भैया हैं सायत।

जालपा-कह दो, यहां क्या करने आए हैं। वहीं जायें।

देवीदीन-नहीं बेटी, जरा पूछ तो लें, क्या कहते हैं। इस बखत कैसे उन्हें छुट्टी मिली?

जालपा-मुझे समझाने आए होंगे और क्या ! मगर मुंह धो रक्खें।

देवीदीन ने द्वार खोल दिया। रमा ने अंदर आकर कहा-दादा, तुम मुझे यहाँ देखकर इस वक्त ताज्जुब कर रहे होंगे। एक घंटे की छुट्टी लेकर आया हूँ। तुम लोगों से अपने बहुत से अपराधों को क्षमा कराना था। जालपा ऊपर है?

देवीदीन बोला-हां, हैं तो। अभी आई हैं, बैठो, कुछ खाने को लाऊं !

रमानाथ—नहीं, मैं खाना खा चुका हूं। बस, जालपा से दो बातें करना चाहता हूं।

देवीदीन-वह मानेंगी नहीं, नाहक शर्मिंदा होना पड़ेगा। मानने वाली औरत नहीं है।

रमानाथ–मुझसे दो-दो बातें करेंगी या मेरी सूरत ही नहीं देखना चाहती? जरा जाकर पूछ लो।
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देवीदीन-इसमें पूछना क्या है, दोनों बैठी तो हैं, जाओ। तुम्हारा घर जैसे तब था वैसे अब भी है।

रमानाथ–नहीं दादा, उनसे पूछ लो। मैं यों न आऊंगा।

देवीदीन ने ऊपर जाकर कहा-तुमसे कुछ कहना चाहते हैं, बहू !

जालपा मुंह लटकाकर बोली-तो कहते क्यों नहीं, मैंने कुछ जबान बंद कर दी है?

जालपा ने यह बात इतने जोर से कही थी कि नीचे रमा ने भी सुन ली। कितनी निर्ममता थी ! उसकी सारी मिलन-लालसा मानो उड़ गई। नीचे ही से खड़े-खड़े बोला-वह अगर मुझसे नहीं बोलना चाहतीं, तो कोई जबरदस्ती नहीं। मैंने जज साहब से सारा कच्चा चिट्ठा कह सुनाने का निश्चय कर लिया है। इसी इरादे से इस वक्त चला हूं। मेरी वजह से इनको इतने कष्ट हुए, इसकी मुझे खेद है। मेरी अक्ल पर परदा पड़ा हुआ था। स्वार्थ ने मुझे अंधा कर रखा था। प्राणों के मोह ने, कष्टों के भय ने बुद्धि हर ली थी। कोई ग्रह सिर पर सवार था। इनके अनुष्ठानों ने उस ग्रह को शांत कर दिया। शायद् दो-चार साल के लिए सरकार की मेहमानी खानी पड़े। इसका भय नहीं। जीता रहा तो फिर भेंट होगी। नहीं मेरी बुराइयों को माफ करना और मुझे भूल जाना। तुम भी देवी दादा और दादी, मेरे अपराध क्षमा करना। तुम लोगों ने मेरे ऊपर जो दया की है, वह मरते दम त न भूलूंगा। अगर जीता लौटा, तो शायद तुम लोगों की कुछ सेवा कर सकें। मेरी तो जिंदगी सत्यानाश हो गई। न दीन का हुआ न दुनिया का। यह भी कह देना कि उनके गहने मैंने ही चुराए थे। सर्राफ को देने के लिए रुपये न थे। गहने लौटाना जरूरी था इसीलिए वह कुकर्म करना पड़ा। उसी का फल आज तक भोग रहा हूं और शायद जब तक प्राण न निकल जाएंगे, भोगता रहूंगा। अगर उसी वक्त सफाई से सारी कथा कह दी होती, तो चाहे उस वक्त इन्हें बुरा लगता, लेकिन यह विपत्ति सिर पर न आती। तुम्हें भी मैंने धोखा दिया था। दादा, मैं ब्राह्मण नहीं हूं, कायस्थ हूं, तुम-जैसे देवता से मैंने कपट किया। न जाने इसका क्या दंड मिलेगा। सब कुछ क्षमा करना। बस, यही कहने आया था।

रमा बरामदे के नीचे उतर पड़ा और तेजी से कदम उठाता हुआ चल दिया। जालपा भी कोठे से उतरी, लेकिन नीचे आई तो रमा का पता न था। बरामदे के नीचे उतरकर देवीदीन से बोली-किधर गए हैं दादा? देवीदीन ने कहा-मैंने कुछ नहीं देखा, बहू मेरीआंखें आंसू से भरी हुई थीं। वह अब न मिलेंगे। दौड़ते हुए गए थे।

जालपा कई मिनट तक सड़क पर निस्पंद-सी खड़ी रही। उन्हें कैसे रोक लूं! इस वक्त वह कितने दुखी हैं, कितने निराश हैं ! मेरे सिर पर न जाने क्या शैतान सवार था कि उन्हें बुला न लिया। भविष्य का हाल कौन जानता है। न जाने कब भेंट होगी। विवाहित जीवन के इन दो-ढाई सालों में कभी उसका हृदय अनुराग से इतना प्रकंपित न हुआ था। विलासिनी रूप में वह केवल प्रेम आवरण के दर्शन कर सकती थी। आज त्यागिन'बनकर उसने उसका असली रूप देखा, कितना मनोहर, कितना विशुद्ध, कितना विशाल, कितना तेजोमय। विलासिनी ने प्रेमोद्यान की दीवारों को देखा था, वह उसी में खुश थी। त्यागनी बनकर वह उस उद्यान के भीतर पहुंच गई थी-कितना रम्य दृश्य था, कितनी सुगंध, कितना वैचित्र्य, कितना विकास इसकी सुगंध में, इसकी रम्यता का देवत्व भरा हुआ था। प्रेम अपने उच्चतर स्थान पर पहुंचकर
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देवत्व से मिल जाता है। जालपा को अब कोई शंका नहीं है, इस प्रेम को पाकर वह जन्म-जन्मांतरों तक सौभाग्यवती बनी रहेगी।इस प्रेम ने उसे वियोग, परिस्थिति और मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया—उसे अभय प्रदान कर दिया। इस प्रेम के सामने अब सारा संसार और उसका अखंड वैभव तुच्छ है।

इतने में जोहरा आ गई। जालपा को पटरी पर खड़े देखकर बोली-वहां कैसे खड़ी हो, बहन। आज तो मैं न आ सकी। चलो, आज मुझे तुमसे बहुत-सी बातें करनी हैं।

दोनों ऊपर चली गई।

उनचास

दारोगा को भला कहां चैन? रमा के जाने के बाद एक घंटे तक उसका इंतजार करते रहे, फिर घोड़े पर सवार हुए और देवीदीन के घर जा पहुंचे। वहां मालूम हुआ कि रमा को यहां से गए आधा घंटे से ऊपर हो गया। फिर थाने लौटे। वहां रमा का अब तक पता न था। समझे देवीदीन ने धोखा दिया। कहीं उन्हें छिपा रक्खा होगा। सरपट साइकिल दौड़ाते हुए फिर देवीदीन के घर पहुंचे और धमकाना शुरू किया। देवीदीन ने कहा—विश्वास न हो, घर की खाना-तलाशी ले लीजिए और क्या कीजिएगा। कोई बहुत बड़ा घर भी तो नहीं है। एक कोठरी नीचे है,एक ऊपर।

दारोगा ने साइकिल से उतरकर कहा-तुम बतलाते क्यों नहीं, वह कहां गए?

देवीदीन–मुझे कुछ मालूम हो तब तो बताऊं साहब । यहां आए, अपनी घरवाली से तकरार की और चले गए।

दारोगा—वह कब इलाहाबाद जा रही हैं?

देवीदीन-इलाहाबाद जाने की तो बाबूजी ने कोई बातचीत नहीं की। जब तक हाईकोर्ट का फैसला न हो जायगा, वह यहां से न जाएंगी।

दारोगा-मुझे तुम्हारी बातों का यकीन नहीं आता।

यह कहते हुए दारोगा नीचे की कोठरी में घुस गए और हर एक चीज को गौर से देखा। फिर ऊपर चढ़ गए। वहां तीन औरतों को देखकर चौंके। जोहरा को शरारत सूझी, तो उसने लंबा-सा घूंघट निकाल लिया और अपने हाथ साड़ी में छिपा लिए। दारोगाजी को शक हुआ। शायद हजरत यह भेस बदले तो नहीं बैठे हैं।

देवीदीन से पूछा-यह तीसरी औरत कौन है?

देवीदीन ने कहा-मैं नहीं जानता। कभी-कभी बहू से मिलने आ जाती है।

दारोगा-मुझी से उड़ते हो बचा साड़ी पहनाकर मुलजिम को छिपाना चाहते हो ! इनमें कौन जालपा देवी हैं। उनसे कह दो, नीचे चली जायं। दूसरी औरत को यहीं रहने दो।

जालपा हट गई, तो दारोगाजी ने जोहरा के पास जाकर कहा-क्यों हजरत, मुझसे यह चालें ! क्या कहकर वहां से आए थे और यहां आकर मजे में आ गए। सारा गुस्सा हवा हो गया। अब यह भेस उतारिए और मेरे साथ चलिए, देर हो रही है।
[ २१९ ] यह कहकर उन्होंने जोहरा को घूघट उठा दिया। जोहरा ने ठट्टा मारा। दारोगाजी मानो फिसलकर विस्मय-सागर में पड़े । बोले-अरे, तुम हो जोहरा । तुम यहां कहाँ ?

जोहरा–अपनी ड्यूटी बजा रही हूँ।

'और रमानाथ कहां गए? तुम्हें तो मालूम ही होगा?

‘वह तो मेरे यहां आने के पहले ही चले गए थे। फिर मैं यहीं बैठ गई और जालपा देवी से बात करने लगी।'

'अच्छा, जरा मेरे साथ आओ। उनका पता लगाना है।'

जोहरा ने बनावटी कौतूहल से कहा-क्या अभी तक बंगले पर नहीं पहुंचे ?

'ना। न जाने कहां रह गए।'

रास्ते में दारोगा ने पूछा-जालपा कब तक यहां से जाएगी ?

जोहरा-मैंने खूब पट्टी पढ़ाई है। उसके जाने की अब जरूरत नहीं है। शायद रास्ते पर आ जाय। रमानाथ ने बुरी तरह डांटा है। उनकी धमकियों से डर गई है।

दारोगी-तुम्हें यकीन है कि अब यह कोई प्रारारत न करेगी?

जोहरा-हां, मेरा तो यही ख़याल है।

दारोगा तो फिर यह कहां गया?

जोहरा–कह नहीं सकती।

दारोगा-मुझे इसकी रिपोर्ट करनी होगी। इंस्पेक्टर साहब और डिप्टी साहब को इत्तला देना जरूरी है। ज्यादा पी तो नहीं गया था?

जोहरा–पिए हुए तो थे ।

दारोगा तो कहीं गिर-गिरा पड़ा होगा। इसने बहुत दिक किया तो मैं जरा उधर जाता हूं।

तुम्हें पहुंचा दें, तुम्हारे घर तक?

जोहरा–बड़ी इनायत होगी।

दारोगा ने जोहरा को मोटर साइकिल पर बिठा लिया और उसको जरा दर में घर के दरवाजे पर उतार दिया, मगर इतनी देर में मन चंचल हो गया। बोले-अब तो जाने को जी नहीं चाहता, जोहरा! चलो, आज कुछ गप-शप हो । बहुत दिन हुए, तुम्हारी करम की निगाह नहीं हुई।

जोहरा ने जीने के ऊपर एक कदम रखकर कहा-जाकर पहले इंस्पेक्टर साहब से इत्तला तो कीजिए। यह गप-शप का मौका नहीं है।

दारोगा ने मोटर साइकिल से उतरकर कहा-नहीं, अब न जाऊंगा, जोहरा ! सुबह देखी जायेगी। मैं भी आता है।

जोहरा-आप मानते नहीं हैं। शायद डिप्टी साहिब आते हों। आज उन्होंने कहला भेजा था।

दारोगा-मुझे चकमा दे रही हो जोहरा। देखो, इतनी बेवफाई अच्छी नहीं।

जोहरा ने ऊपर चढ़कर द्वार बंद कर लिया और ऊपर जाकर खिड़की से सिर निकालकर बोली-आदाब अर्ज। [ २२० ]

              पचास

दारोगा घर जाकर लेट रहे। ग्यारह बज रहे थे। नींद खुली, तो आठ बज गए थे। उठकर बैठे ही थे कि टेलीफोन पर पुकार हुई। जाकर सुनने लगे। डिप्टी साहब बोल रहे थे—इस रमानाथ ने बड़ा गोलमाल कर दिया है। उसे किसी दूसरी जगह ठहराया जायगा। उसका सब सामान कमिश्नर साहब के पास भेज देना होगा। रात को वह बंगले पर था या नहीं?

दारोगा ने कहा-जी नहीं, रात मुझसे बहाना करके अपनी बीवी के पास चला गया था?

टेलीफोन-तुमने उसको क्यों जाने दिया? हमको ऐसा डर लगता है, कि उसने जज से सब हाल कह दिया है। मुकदमों की जांच फिर से होगा। आपसे बड़ा भारी ब्लंडर हुआ है। सारा मेहनत पानी में गिर गया। उसको जबरदस्ती रोक लेना चाहिए था।

दारोगा-तो क्या वह जज साहब के पास गया था?

डिप्टी–हां साहब, वहीं गया था, और जज भी कायदा को तोड़ दिया। वह फिर से मुकदमा का पेशी करेगा। रमा अपना बयान बदलेगा। अब इसमें कोई डाउट नहीं है और यह सब आपका बंगलिग है। हम सब उस बाढ़ में बह जायगा। जोहरा भी दगा दिया।

दरोगा उसी वक्त रमानाथ का सब सामान लेकर पुलिस-कमिश्नर के बंगले की तरफ चले। रमा पर ऐसा गुस्सा आ रहा था कि पावें तो समूचा ही निगल जाएं। कमबख्त को कितना समझाया, कैसी-कैसी खातिर की; पर दगा कर ही गया। इसमें जोहरा की भी सांठ-गांठ है।

बीवी को डांट-फटकार करने का महज बहाना था। जोहरा बेगम की तो आज ही खबर लेता हूं। कहां जाती है। देवीदीन से भी समझूंगा।

एक हफ्ते तक पुलिस-कर्मचारियों में जो हलचल रही उसका जिक्र करने की कोई जरूरत नहीं। रात की रात और दिन के दिन इसी फिक्र में चक्कर खाते रहते थे। अब मुकदमे से कहीं ज्यादा अपनी फिक्र थी। सबसे ज्यादा घबराहट दारोगा को थी। बचने की कोई उम्मीद नहीं नजर आती थी। इंस्पेक्टर और डिप्टी--दोनों ने सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल दी और खुद बिल्कुल अलग हो गए।

इस मुकदमे की फिर पेशी होगी, इसकी सारे शहर में चर्चा होने लगी। अंगरेजी न्याय के इतिहास में यह घटना सर्वथा अभूतपूर्व थी। कभी ऐसा नहीं हुआ। वकीलों में इस पर कानूनी बहसें होतीं। जज साहब ऐसा कर भी सकते हैं? मगर जज दृढ़ था। पुलिसवालों ने बड़े-बड़े जोर लगाए, पुलिस कमिश्नर ने यहां तक कहा कि इससे सारा पुलिस विभाग बदनाम हो जायगा, लेकिन जज ने किसी की न सुनी। झूठे सबूतों पर पंद्रह आदमियों की जिंदगी बरबाद करने की जिम्मेदारी सिर पर लेना उसकी आत्मा के लिए असह्य था। उसने हाईकोर्ट को सूचना दी और गवर्नमेंट को भी।

इधर पुलिस वाले रात-दिन रमा की तलाश में दौड़-धूप करते रहते थे, लेकिन रमा न जाने कहां जा छिपा था कि उसका कुछ पता ही न चलता था। हफ्तों सरकारी कर्मचारियों में लिखा-पढ़ी होती रही। मानों कागज स्याह कर दिए गए। उधर समाचार-पत्रों में इस मामले पर नित्य आलोचना होती रहती थी। एक पत्रकार ने जालपा से मुलाकात की और उसका बयान छाप दिया। दूसरे ने जोहरा का बयान छाप दिया। इन दोनों [ २२१ ]औं ने पुलिस की बखिया उधेड़ दी। जोहरा ने तो लिखा था कि मुझे पचास रुपये रोज इस 1 दिए जाते थे कि रमानाथ को बहलाती रहूं और उसे कुछ सोचने या विचार करने का अव न मिले। पुलिस ने इन बयानों को पढ़ा, तो दांत पीस लिए। जोहरा और जालपा, दोनों कहीं : 'जा छिपीं, नहीं तो पुलिस ने जरूर उनकी शरारत का मजा चखाया होता। | | खिर दो महीने के बाद फैसला हुआ। इस मुकदमे पर विचार करने के लिए एक सिविलिः नियुक्त किया गया। शहर के बाहर एक बंगले में विचार हुआ, जिसमें ज्यादा भीड़-भाड़ है। फिर भी रोज दस-बारह हजार आदमी जमा हो जाते थे। पुलिस ने एड़ी-चोटी का जोर ले 1 कि मुलजिमों में कोई मुखबिर बन जाए, पर उसका उद्योग न सफल हुआ। दारोगाजी चे तो नई शहीदतें बना सकते थे; पर अपने अफसरों को स्वार्थपरता पर वह इतने खिन्न कि दूर से तमाशा देखने के सिवी और कुछ न किया। जब सारा यश अफसरों को मि । और सारा अपयश मातहतों को, तो दारोगाजी को क्या गरज पड़ी थी कि नई शहादतों की फि"सिर खपाते। इस मुआमले में अफरारों ने सारा दोष दारोगा ही के सिर मढ़ा। उन्हीं की बेपरवी.. ' रमानाथ हाथ से निकला। अगर ज्यादा सख्ती से निगरानी की जाती, तो जालपा कैसे उसे खत, 'सकती और वह कैसे रात को उससे मिल सकती थी। ऐसी दशा में मुकदमा उठा लेने पवा और क्या किया जा सकता था। तबेले की बला बंदर के सिर गई। दारोगा तन्जुल हो गए और 5, दारोगा का तराई में तबादला कर दिया गया। जिस दिन मुलजिमों को छोड़ा गया गधा शहर उनका स्वागत करने को जमी था। पुलिस ने दस बजे रात को उन्हें छोड़ा, पर दर्शक रमा हो ही गए। लोग जालपा को भी खींच ले गए। पीछे-पीछे देवीदीन भी पहुंचा। जालपा १ रनों की वर्षा हो रही थी और 'जालपादेवी की जय !' से आकाश गूंज रहा था। मगर रमानाथ की परीक्षा अभी समाप्त = } थी। उस पर दरोग-बयानी का अभियोग चलाने का निश्चय हो गया। इक वन उसी बंगले में ठीक दस बजे मुकदमा पेश ।। सावन की झड़ी लगी हुई थी। कलकत्ता दलदल हो रहा था, लेकिन दर्शकों का एक अपार समूह सामने मैदान में खड़ा था। महिलाओं में दिनेश की पत्नी और माता भी आई हुई थीं। पेशी से दस-पंद्रह मिनट पहले जालपा और जोहरा भी बंद गाड़ियों में से पहुंचीं। महिलाओं को अदालत के कमरे में जाने की आज्ञा मिल गई। पुलिस की शहादतें शुरू हुई। डिप्टी सुपरिटेंडेंट, इंस्पेक्टर, रोग, नायब दारोग–सभी के बयान हुए। दोनों तरफ के वकीलों ने जिरहें भी क; पर इन कार्रवाइयों में उल्लेखनीय कोई बात न थी। जाब्ते की पाबंदी की जा रही थी। रमानाथ का बयान हुआ; पर उसमें भी कोई नई बात न थी। उसने अपने जीवन के गत एक वर्ष का पूरा वृत्तांत कह सुनाया। कोई बात न छिपाई। वकील के फूछने पर उसने कहा-जालपा के त्याग, निष्ठा और सत्य-म ने मेरी आंखें खोली और उससे भी ज्यादा जोहरा के [ २२२ ] सौजन्य और निष्कपट व्यवहार ने। मैं इसे अपनो सौभाग्य समझता हूं कि मुझे उस तरफ से प्रकाश मिला जिधर औरों को अंधकार मिलता है। विष में मुझे सुधा प्राप्त हो गई।

इसके बाद सफाई की तरफ से देवीदीन, जालपा और जोहरा के बयान हुए। वकीलों ने इनसे भी सवाल किया; पर सच्चे गवाह क्या उखड़ते। जोहरा का बयान बहुत ही प्रभावोत्पादक था। उसने देखा, जिस प्राणी को जंजीरों से जकड़ने के लिए वह भेजी गई है, वह खुद दर्द से तड़प रहा है, उसे महरम की जरूरत है, जंजीरों को नहीं। वह सहारे का हाथ चाहता है, धक्के का झोंका नहीं। जालपादेवी के प्रति उसकी श्रद्धा, उसका अटल विश्वास देखकर मैं अपने को भूल गई। मुझे अपनी नीचता, अपनी स्वार्थता पर लज्जा आई। मेरा जीवन कितना अधम, कितना पतित है, यह मुझ पर उस वक्त खुला, और जब मैं जालपा से मिली, तो उसकी निष्काम सेवा, उसको उज्ज्वल तप देखकर मेरे मन के रहे-सहे संस्कार भी मिट गए। विलास-युक्त जीवन से मुझे घृणा हो गई। मैंने निश्चय कर लिया. इसी अंचल में मैं भी आश्रय लूंगी।

मगर उससे भी ज्यादा मार्क का बयान जालपा का था। उसे सुनकर दर्शकों की आंखों में आंसू आ गए। उसके अंतिम शब्द ये थे मेरे पति निर्दोष हैं । ईश्वर की दृष्टि में ही नहीं, नीति की दृष्टि में भी वह निर्दोष हैं। उनके भाग्य में मेरी विलासासक्ति का प्रायश्चित करना लिखा था, वह उन्होंने किया। वह बाजार से मुंह छुपाकर भागे। उन्होंने मुझ पर अगर कोई अत्याचार किया, तो वह यहीं कि मेरी इच्छओं को पूरा करने में उन्होंने सदैव कल्पना से काम लिया। मुझे प्रसन्न करने के लिए, मुझे सुखी रखने के लिए उन्हाने अपने ऊपर बड़े से बड़ा भार लेने में कभी संकोच नहीं किया। वह यह भूल गए कि विलास-वृत्ति संतोष करना नहीं जानती। जहां मुझे रोकना उचित था, वहां उन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया, और इस अवसर पर भी मुझे पूरा विश्वास है, मुझ पर अत्याचार करने की धमकी देकर ही उनकी जबान बँद की गई थी। अगर अपराधिनी हूं, तो मैं हूं, जिसके कारण उन्हें इतने कष्ट झेलने पड़े। मैं मानती हूं कि मैंने उन्हें अपना बयान बदलने के लिए मजबूर किया। अगर मुझे विश्वास होता कि वह डाकों में शरीक हुए, तो सबसे पहले मैं उनका तिरस्कार करती। मैं यह नहीं सह सकती थी कि वह निरपराधियों की लाश पर अपना भवन खड़ा करें। जिन दिनों यहां डाके पड़े, उन तारीखों में मेरे स्वामी प्रयाग में थे। अदालत चाहे तो टेलीफोन द्वारा इसकी जांच कर सकती है। अगर जरूरत हो, तो म्युनिसिपल बोर्ड के अधिकारियों का बयान लिया जा सकता है। ऐसी दशा में मेरा कर्तव्य इसके सिवा कुछ और हो ही नहीं सकता था, जो मैंने किया।

अदालत ने सरकारी वकील से पूछ-क्या प्रयाग से इस मुआपले की कोई रिपोर्ट मांगी गई थी?

वकील ने कहा-जी हां, मगर हमारा उसे विषय पर कोई विवाद नहीं है।

सफाई के वकील ने कहा-इससे यह तो सिद्ध हो जाता है कि मुलजिम’डाके में शरीक नहीं था। अब केवल यह बात रह जाती है कि वह मुखबिर क्यों बना?

वादी वकील–स्वार्थ-सिद्धि के सिवा और क्या हो सकता है। सफाई का वकील-मेरा कथन है, उसे धोखा दिया गया और जब उसे मालूम हो गया कि जिस भय से उसने पुलिस के हाथों की कठपुतली बनना स्वीकार किया था। वह उसका भ्रम था, तो उसे धमकियां दी गई। [ २२३ ]अब सफाई का कोई गवाह न था। सरकारी वकील ने बहस शुरू की-योर ऑनर, आज आपके सम्मुख एक ऐसा अभियोग उपस्थित हुआ है जैसा सौभाग्य से बहुत कम हुआ करती है। आपको जनकपुर की डकैती का हाल मालूम है। जनकपुर के आसपास कई गांवों में लगातार डाके पड़े और पुलिस डकैतों की खोज करने लगी। महीनों पुलिस कर्मचारी अपनी जान हथेलियों पर लिए, डकैतों को ढूंढ निकालने की कोशिश करते रहे। आखिर उनकी मेहनत सफल हुई और डाकुओं की खबर मिली। यह लोग एक घर के अंदर बैठे पाए गए। पुलिस ने एकबारगी सबों को पकड़ लिया, लेकिन आप जानते हैं, ऐसे मामलों में अदालत के लिए सबूत पहुंचाना कितना मुश्किल होता है। जनता इन लोगों से कितना डरती है। प्राणों के भय से शहादत देने पर तैयार नहीं होती। यहां तक कि जिनके घरों में डाके पड़े थे, वे भी शहादत देने का अवसर आया तो साफ निकल गए।

महानुभावो, पुलिस इसी उलझन में पड़ी हुई थी कि एक युवक आता है और इन डाकुओं का सरगना होने का दावा करता है। वह उन डकैतियों का ऐसा सजीव, ऐसा प्रमाणपूर्ण वर्णन करता है कि पुलिस धोखे में आ जाती है। पुलिस ऐसे अवसर पर ऐसा आदमी पाकर गैबी मदद समझती है। यह युवक इलाहाबाद से भाग आया था और यहां भूखों मरता था। अपने भाग्य-निर्माण र ऐमा सुअवसर पाकर उसने अपना स्वार्थ-सिद्ध करने का निश्चय कर लिया। मुखबिर बनकर सजा का तो उसे कोई भय था ही नहीं, पुलिस की सिफारिश से कोई अच्छी नौकरी पा जाने का विश्वास था। पुलिस ने उसकी खूब आदर-सत्कार किया और उसे अपना मुखबिर बना लिया। बहुत संभव था कि कोई शहीदत न पाकर पुलिस इन मुलजिमों को छोड़ देती और उन पर कोई मुकदमी न चलाती; पर इस युवक के चकमे में आकर उसने अभियोग चलाने का निश्चय कर लिया। उसमें चाहे और कोई गुण हो या न हो, उसकी रचना-शक्ति की प्रखरता से इनकार नहीं किया जा सकता। उसने डकैतियों का ऐसा यथार्थ वर्णन किया कि जंजीर की एक कड़ी भी कहीं से गायब न थी। अंकुर से फल निकलने तक की सारी बातों की उसने कल्पना कर ली थी। पुलिस ने मुकदमा चला दिया।

पर ऐसा मालूम होता है कि इस बीच में उसे स्वभाग्य-निर्माण का इससे भी अच्छा अवसर मिल गया। बहुत संभव है, सरकार को विरोधिनी संस्थाओं ने उसे प्रलोभन दिए हों और उन प्रलोभनों ने उसे स्वार्थ सिद्धि का यह नया रास्ता सुझा दिया हो, जहां धन के साथ यश भी था, वाहवाही भी थी, देश-भक्ति का गौरव भी था। वह अपने स्वार्थ के लिए सब कुछ कर सकता है। वह स्वार्थ के लिए किसी के गले पर छुरी भी चला सकता है और साधु-केश भी धारण कर सकती है;यही उसके जीवन का लक्ष्य है। हम खुश हैं कि उसकी सद्बुध्दि ने अंत में उस पर विजय पाई, चाहे उनका हेतु कुछ भी क्यों न हो। निरपराधियों को दंड देना पुलिस के लिए उतनी ही आपत्तिजनक है,जितना अपराधियों को छोड़ देना। वह अपनी कारगुजारी दिराने के लिए ही ऐसे मुकदमे नहीं चलाती। न गवर्नमेंट इतनी न्याय-शून्य है कि वह पुलिस के बहकावे में आकर सारहीन मुकदमे चलाती फिरे लेकिन इस युवक की चकमेबाजिर्यों से पुलिस की जो बदनामी हुई और सरकार के हजारों रुपये खर्च हो गए, इसका जिम्मेदार कौन है? ऐसे आदमी को आदर्श दंड मिलना चाहिए, ताकि फिर किसी को ऐसी चकमेबाजी का साहस न हो। ऐसे मिथ्या की संसार रचने वाले प्राणी के लिए मुक्त रहकर समाज [ २२४ ] को ठगने का मार्ग बंद कर देना चाहिए। उसके लिए इस समय सबसे उपयुक्त स्थान वह है, जहां उसे कुछ दिन आत्म-चिंतन का अवसर मिले। शायद वहां के एकांतवास मेंउसको अंतरिक जागृति प्राप्त हो जाय। आपको केवल यह विचार करना है कि उसने पुलिस को धोखा दिया था नहीं। इस विषय में अब कोई संदेह नहीं रह जाता कि उसने धोखा दिया। अगर धमकियां दी गई थीं, तो वह पहली अदालत के बाद जज की अदालत में अपना बयान वापस ले सकता था, पर उस वक्त भी उसने ऐसा नहीं किया। इससे यह स्पष्ट है कि धमकियों का आक्षेप मिथ्या है। उसने जो कुछ किया, स्वेच्छा से किया। ऐसे आदमी को यदि दंड न दिया गया, तो उसे अपनी कुटिल नीति से काम लेने का फिर साहस होश और उसकी हिंसक मनोवृत्तियां और भी बलवान हो जाएंगी।

फिर सफाई के वकील ने जवाब दिया-यह मुकदमा अंगरेजी इतिहास ही में नहीं,शायद सर्वदेशीय न्याय के इतिहास में एक अद्भुत घटना है। रमानाथ एक साधारण युवक है। उसकी शिक्षा भी बहुत मामूली हुई है। वह ऊंचे विचारों का आदमी नहीं है। वह इलाहाबाद के म्युनिसिपल आफिस में नौकर है। वहां उसका काम चुंगी के रुपये वसूल करना है। वह व्यापारियों से प्रथानुसार रिश्वत लेता है और अपनी आमदनी को परवा न करता हुआ अनाप- शनाप खर्च करता है। आखिर एक दिन मीज्ञान में गलती हो जाने से उसे शक होता है कि उससे कुछ रुपये उठ गए। वह इतना घबड़ा जाता है कि किसी से कुछ नहीं कहता, बस घर से भाग खड़ा होता है। वहां दफ्तर में उस पर शुबह होता है और उसके हिसाब की जांच होती है। तब मालूम होता है कि उसने कुछ गबन नहीं किया, सिर्फ हिसाब की भूल थी।

फिर रमानाथ के पुलिस के पंजे में फंसने, फरजी मुखबिर बनने और शहादत देने का जिक्र करते हुए उसने कहा- अब रमानाथ के जीवन में एक नया परिवर्तन होता है, ऐसा परिवर्तन जो एक विलास-प्रिय, पद-लोलुप युवक को धर्मनिष्ठ और कर्तव्यशील बना देता है। उसकी पत्नी जालपा, जिसे देवी की जाए तो अतिशयोक्ति न होगी, उसकी तलाश में प्रयाग से यहां आती है और यहां जब उसे मालम होता है कि रमा एक मुकदमे में पुलिस का मुखबिर हो गया है, तो वह उससे छिपकर मिलने आती है। रमा अपने बंगले में आराम से पड़ा हुआ है। फाटक पर संतरी पहरा दे रहा है। जालपा को पति से मिलने में सफलता नहीं होती। तब वह एक पत्र लिखकर उसके सामने फेंक देती है और देवीदीन के घर चली जाती है। रमी यह पत्र पढ़ता है और उसकी आंखों के सामने से परदा हट जाता है। वह छिपकर जालपा के पास जाता है। जालपा उससे सारा वृत्तांत कह सुनाती है और उससे अपना बयान वापस लेने पर जोर देती है। रमा पहले शंकाएं करता है, पर बाद को राजी हो जाता है और अपने बंगले पर लौट जाता है। वहां वह पुलिस-अफसरों से साफ कह देता है, कि मैं अपना बयान बदल दूंगा। अधिकारी उसे तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं, पर जब इसका रमा पर कोई असर नहीं होता और उन्हें मालूम हो गया है कि उस पर गबन का कोई मुकदमा नहीं है, तो वे उसे जालपा को गिरफ्तार करने की धमकी देते हैं। रमा की हिम्मत टूट जाती है। वह जानता है, पुलिस जो चाहे कर सकती है,इसलिए वह अपना इरादा तबदील कर देता है और वह जज के इजलास में अपने बयान का समर्थन कर देता है। अदालत में रमा से सफाई ने कोई जिरह नहीं की थी। यहां उससे जिरहें [ २२५ ]
की गई, लेकिन इस मुकदमे से कोई सरोकार न रखने पर भी उसने जिरहों के ऐसे जवाब दिए कि जज को भी कोई शक न हो सका और मुलजिमों को सजा हो गई। रमानाथ की और भी खातिरदारियां होने लगीं। उसे एक सिफारिश खत दिया गया और शायद उसकी यू०पी० गवर्नमेंट से सिफारिश भी की गई।

फिर जालपादेवी ने फांसी की सजा पाने वाले मुल्जिम दिनेश के बाल-बच्चों का पालन-पोषण करने का निश्चय किया। इधर-उधर से चंदे मांग-मांगकर वह उनके लिए जिंदगी की जरूरतें पूरी करती थीं। उसके घर का काम-काज अपने हाथों करती थीं। उसके बच्चों को खिलाने को ले जाती थीं।

एक दिन रमानाथ मोटर पर सैर करता हुआ जालपा को सिर पर एक पानी का मटका रक्खे देख लेता है। उसकी आत्म-मर्यादा जाग उठती है। जोहरा को पुलिस-कर्मचारियों ने रमानाथ के मनोरंजन के लिए नियुक्त कर दिया है। जोहरा युवक को मानसिक वेदना देखकर द्रवित हो जाती है और वह जालपा का पूरा समाचार लाने के इरादे से चली जाती है। दिनेश के घर उसकी जालपा से भेंट होती है। जालपा का त्याग, सेवा और साधना देखकर इस वेश्या का हृदय इतना प्रभावित हो जाता है कि वह अपने जीवन पर लज्जित हो जाती है और दोनों में बहनापा हो जाता है। वह एक सप्ताह के बाद जाकर रमा से सारा वृत्तांत कह सुनाती है। रमा उसी वक्त वहां से चल पड़ता है और जालपा से दो-चार बातें करके जज के बंगले पर चला जाता है। उसके बाद जो कुछ हुआ, वह हमारे सामने है।

मैं यह नहीं कहता कि उसने झूठी गवाही नहीं दी, लेकिन उस परिस्थिति और उन प्रलोभनों पर ध्यान दीजिए, तो इसे अपराध की गहनता बहुत कुछ घट जाती है। उस झूठी गवाही का परिणाम अगर यह होता, कि किसी निरपराध को सजा मिल जाती तो दूसरी बात थी। इस अवसर पर तो पंद्रह युवकों की जान बच गई। क्या अब भी वह झूठी गवाही का अपराधी है? उसने खुद ही तो अपनी झूठी गवाही का इकबाल किया है। क्या इसका उसे दंड मिलनी चाहिए? उसकी सरलता और सज्जनता ने एक वेश्या तक को मुग्ध कर दिया और वह उसे बहकाने और बहलाने के बदले उसके मार्ग का दीपक बन गएँ। जालपादेवी को कर्तव्यपरायणतो क्या दंड के योग्य है? जालपा ही इस ड्रामा की नायिका है। उसके सदनुराग,उसके सरल प्रेम, उसकी धर्मपरायणता, उसकी पतिभक्ति, इसके स्वार्थ-त्याग, उसकी सेवा-निष्ठा, किस-किस गुण की प्रशंसा की जाये। आज वह रंगमंच पर न आती, तो पंद्रह परिवारों के चिराग भूल हो जाते। उसने पंद्रह परिवारों को अभयदान दिया है। उसे मालूम था कि पुलिस का साथ देने से सांसारिक भविष्य कितना उज्ज्वल हो जाएगा, वह जीवन की कितनी ही चिंताओं से मुक्त हो जायगी। संभव है, उसके पास भी मोटरकरि हो जायगी, नौकर-चाकर हो जायंगे, अच्छा-सा घर हो जायगा, बहुमूल्य आभूषण होंगे। क्या एक युवती रमणी के हृदय में इन सुखों का कुछ भी मूल्य नहीं है? लेकिन वह यह यातना सहने के लिए तैयार हो जाती है। क्या यही उसके धर्मानुराग का उपहार होगा कि वह पति-चत होकर जीवन-पथ पर भटकती फिरे? एक साधारण स्त्री में,जिसने उच्चकोटि की शिक्षा नहीं पाई, क्या इतनी निष्ठा, इतना त्याग, इतना विमर्श किसी दैवी प्रेरणा का परिचायक नहीं है? क्या एक पतिता का ऐसे कार्य [ २२६ ]<br-> में सहायक हो जाना कोई महत्व नहीं रखता? मैं तो समझता हूं, रखता है। ऐसे अभियोग रोज नहीं पेश होते। शायद आप लोगों को अपने जीवन में फिर ऐसा अभियोग सुनने का अवसर न मिले। यहां आप एक अभियोग का फैसला करने बैठे हुए हैं, मगर इस कोर्ट के बाहर एक और बहुत बड़ा न्यायालय है, जहां आप लोगों के न्याय पर विचार होगा। जालपा का वही फैसला न्यायानुकूल होगा जिसे बाहर का विशाल न्यायालय स्वीकार करे। वह न्यायालय कानूनों की बारीकियों में नहीं पड़ता जिनमें उलझकर, जिनकी पेचीदगियों में फंसकर, हम अकसर पथ-भ्रष्ट हो जाया करते हैं, अकसर दूध का पानी और पानी का दूध कर बैठते हैं। अगर आप झूठ पर पश्चात्ताप करके सच्ची बात कह देने के लिए, भोग-विलासयुक्त जीवन को ठुकराकर फटेहालों जीवन व्यतीत करने के लिए किसी को अपराधी ठहराते हैं, तो आप संसार के सामने न्याय का कोई ऊंचा आदर्श नहीं उपस्थित कर रहे हैं।

सरकारी वकील ने इसका प्रत्युत्तर देते हुए कहा-धर्म और आदर्श अपने स्थान पर बहुत ही आदर की चीजें हैं, लेकिन जिस आदमी ने जान-बूझकर झूठी गवाही दी, उसने अपराध अवश्य किया और इसका उसे दंड मिलना चाहिए। यह सत्य है कि उसने प्रयाग में कोई गबन नहीं किया था और उसे इसका प्रम-मात्र था, लेकिन ऐसी दशा में एक सच्चे आदमी का यह कर्तव्य था कि वह गिरफ्तार हो जाने पर अपनी सफाई देता। उसने सजा के भय से झूठी गवाही देकर पुलिस को क्यों धोखा दिया? यह विचार करने की बात है। अगर आप समझते हैं कि उसने अनुचित काम किया, तो आप उसे अवश्य दंड देंगे।

अब अदालत के फैसला सुनाने की बारी आई। सभी को रमा से सहानुभूति हो गई थी,पर इसके साथ ही यह भी मानी हुई बात थी कि उसे सजा होगी। क्या सजा होगी, यही देखना था। लोग बड़ी उत्सुकता से फैसला सुनने के लिए और सिमट आए, कुर्सियां और आगे खींच ली गई, और कनबतियां भी बंद हो गईं।

'मुआमला केवल यह है कि एक युवक ने अपनी प्राण-रक्षा के लिए पुलिस का आश्रय लिया और जब उसे मालूम हो गया कि जिस भय से वह पुलिस को आश्रय ले रहा है, वह सर्वथा निर्मूल है, तो उसने अपना बयान वापस ले लिया। रमानाथ में अगर सत्यनिष्ठा होती; तो वह पुलिस को आश्रय ही क्यों लेता, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि पुलिस ने उसे रक्षा का यह उपाय सुझाया और इस तरह उसे झूठी गवाही देने का प्रलोभन दिया। मैं यह नहीं मान सकता कि इस मुआमले में गवाही देने का प्रस्ताव स्वत: उसके मन में पैदा हो गया। उसे प्रलोभन दिया गया, जिसे उसने दंड-भय से स्वीकार कर लिया। उसे यह भी अवश्य विश्वास दिलाया गया होगा कि जिन लोगों के विरुद्ध उसे गवाही देने के लिए तैयार किया जा रहा था, वे वास्तव में अपराधी थे। क्योंकि रमानाथ में जहां दंड का भय है, वहां न्यायभक्ति भी है। वह उन पेशेवर गवाहों में नहीं है, जो स्वार्थ के लिए निरपराधियों को फंसाने से भी नहीं हिचकते। अगर ऐसी बात न होती, तो वह अपनी पत्नी के आग्रह से बयान बदलने पर कभी राजी न होता। यह ठीक है कि पहली अदालत के बाद ही उसे मालूम हो गया था कि उस पर गबन का कोई मुकदमा नहीं है और जज की अदालत में वह अपने बयान को वापस न ले सकता था। उस वक्त उसने यह इच्छा प्रकट भी अवश्य की; पर पुलिस की धमकियों ने फिर उस पर विजय [ २२७ ]
पाई। पुलिस को बदनामी से बचने के लिए इस अवसर पर उसे धमकियां देना स्वाभाविक है,क्योंकि पुलिस को मुलजिमों के अपराधी होने के विषय में कोई संदेह न था। रमानाथ धमकियों में आ गया, यह उसकी दुर्बलता अवश्य है; पर परिस्थिति को देखते हुए क्षम्य है। इसलिए मैं रमानाथ को बरी करता हूं।'

                बावन

चैत्र की शीतल, सुहावनी, स्फूर्तिमयी संध्या, गंगा का तट, टेसुओं से लहलहाता हुआ ढाक का मैदान, बरगद का छायादार वृक्ष, उसके नीचे बंधी हुई गाएं, भैंसे, कद्दू और लौकी की बेलों से लहराती हुई झोंपड़ियां, न कहीं गर्द न गुबार, न शोर न गुल, सुख और शांति के लिए क्या इससे भी अच्छी जगह हो सकती है? नीचे स्वर्णमयीं गंगा लाल, काले, नीले आवरण से चमकती हुई, मंद स्वरों में गाती, कहीं लपकती, कहीं झिझकती, कहों चपल, कहीं गंभीर, आनंत अंधकार की ओर चली जा रही है, मानो बहुरंजित बालस्मृति क्रीड़ा और विनोद की गोद में खेलती हुई, तामय, संघर्षमय, अंधकारमय भविष्य की ओर चली जा रही हो। देवी और रमा ने यहीं, प्रयाग के समीप आकर आश्रय लिया है। यतीन साल गुजर गए हैं, देवीदीन ने जमीन ली, बाग लगाया, खेती जमाई, गाय-भैंसें खरीदीं और कर्मयोग में, अविरत उद्योग में सुख, संतोष और शांति का अनुभव कर रहा है। उसके मुख पर अब वह जर्दी, झुर्रियां नहीं हैं, एक नई स्फूर्ति, एक नई कांति झलक रही है। शाम हो गई है, गाएं-भैंसे हार से लौटीं। जग्गो ने उन्हें खूटे से बांधा और थोड़ा-थोड़ा भूसा लाकर उनके सामने डाल दिया। इतने में देवी और गोपी भी बैलगाड़ी पर डांठे लादे हुए आ पहुंचे। दयानाथ ने बरगद के नीचे जमीन साफ कर रखी है। वहीं डांटें उतारी गईं। यही इस छोटी-सी बस्ती का खलिहान है। दयानाथ नौकरी से बरखास्त हो गए थे और अब देवी के असिस्टेंट हैं। उनको समाचार-पत्रों से अब भी वही प्रेम है, रोज कई पत्र आते हैं, और शाम को फुर्सत पाने के बाद मुंशीजी पत्रों को पढ़कर सुनाते और समझाते हैं। श्रोताओं में बहुधा आसपास के गांवों के दस-पांच आदमी भी आ जाते हैं और रोज एक छोटी-मोटी सभा हो जाती है।

रमा को तो इस जीवन से इतना अनुराग हो गया है कि अब शायद उसे थानेदारी ही नहीं, चुंगी की इंस्पेक्टरी भी मिल जाय, तो शहर का नाम न ले। प्रात:काल उठकर गंगा-स्नान करता है, फिर कुछ कसरत करके दूध पीता है और दिन निकलते-निकलते अपनी दवाओं का संदूक लेकर आ बैठता है। उसने वैद्यक की कई किताबें पढ़ ली हैं और छोटी-मोटी बीमारियों की दवा दे देता है। दस-पांच मरीज रोज आ जाते हैं और उसक कीर्ति दिन-दिन बढ़ती जाती है। इस कोम से छुट्टी पाते ही वह अपने बगीचे में चला जाता है। वहां कुछ साग- भाजी भी लगी हुई है, कुछ फल-फूलों के वृक्ष हैं और कुछ जड़ी-बूटियां हैं। अभी तो बाग से केवल तरकारी मिलती है, पर आशा है कि तीन-चार साल में नींबू, अमरूद, बेर, नारंगी, आम, केले, आंवले, कटहल, बेल आदि फलों की अच्छी आमदनी होने लगेगी। [ २२८ ] देवी ने बैलों को गाड़ी से खोलकर खूटे से बांध दिया और दयानाथ से बोला-अभी भैया नहीं लौटे?

दयानाथ ने डांठों को समेटते हुए कहा-अभी तो नहीं लौटे। मुझे तो अब इनके अच्छे होने की आशा नहीं है। जमाने का फेर है। कितने सुख से रहती थीं, गाड़ी थी, बंगला था, दरजनों नौकर थे। अब यह हाल है। सामान सब मौजूद है, वकील साहब ने अच्छी संपत्ति छोड़ी थी, मगर भाई-भतीजों ने हड़प ली।

देवीदीन-भैया कहते थे. अदालत करतीं तो सब मिल जाता; पर कहती हैं, मैं अदालत में झूठ न बोलूंगी। औरत बड़े ऊंचे विचार की है।

सहसा जागेश्वरी एक छोटे-से शिशु को गोद में लिए हुए एक झोंपड़े से निकली और बच्चे को दयानाथ की गोद में देती हुई देवीदीन से बोली-भैया, जरा चलकर रतन को देखो,जाने कैसी हुई जाती है। जोहरा और बहू, दोनों रो रही हैं। बच्चा न जाने कहां रह गए।

देवीदीन ने दयानाथ से कहा-चलो लाली, देखें।

जागेश्वरी बोली—यह जाकर क्या करेंगे, बीमार को देखकर तो इनकी नानी पहले ही मर जाती है।

देवीदीन ने रतन की कोठरी में जाकर देखा। रतन बांस की एक खाट पर पड़ी थी। देह सूख गई थी। व सूर्यमुखी का-सा खिला हुआ चेहरा मुरझाकर पीला हो गया था। वह रंग जिन्होंने चित्र को जीवन और स्पंदन प्रदान कर रखा था, उड़ गए थे, केवल आकार शेष रह गया था। वह श्रवण-प्रिय, प्राणप्रद, विकास और आह्लाद में डूबा हुआ संगीत मानो आकाश में विलीन हो गया था, केवल उसकी क्षीण उदास प्रतिध्वनि रह गई थी। जोहरा उसके ऊपर झुकी उसे करुण, विवश, कातर, निराश तथा तृष्णामय नेत्रों से देख रही थी। आज साल - भर से उसने रतन की सेवा-शुश्रूषा में दिन को दिन और रात को रात न समझा था। रतन ने उसके साथ जो स्नेह किया था, उस अविश्वास और बहिष्कार के वातावरण में जिस खुले नि:संकोच भाव से उसके साथ बहनापा निभाया था, उसका एहसान वह और किस तरह मानती। जो सहानुभूति उसे जालपा से भी न मिली, वह रतन ने प्रदान की। दु:ख और परिश्रम ने दोनों को मिला दिया,दोनों की आत्माएं संयुक्त हो गईं। यह घनिष्ठ स्नेह उसके लिए एक नया ही अनुभव था,जिसकी उसने कभी करना भी ने की थी। इस मैत्री में उमर्क वेचित हदय ने पति- प्रेम और पुत्र-स्नेह दोनों ही पा लिया।

देवीदीन ने रतन के चेहरे की ओर सचिंत नेत्रों से देखा, तब उसकी नाड़ी हाथ में लेकर पूछा-कितनी देर से नहीं बोलीं?

जालपा ने आंखें पोंछकर कही-अभी तो बोलती थीं। एकाएक आंखें ऊपर चढ़ गईं और बेहोश हो गईं। वैद्यजी को लेकर अभी तक नहीं आए?

देवीदीन ने कहा-इनकी दवा वैद्य के पास नहीं है।

यह कहकर उसने थोड़ी-सी राख़ ली, रतन के सिर पर हाथ फेरा, कुछ मुंह में बुदबुदाया और एक चुटकी राख उसके माथे पर लगा दी। तब पुकारा–रतन बेटी, आंखें खोलो।

रतन ने आंखें खोल दीं और इधर-उधर सकपकाई हुई आंखों से देखकर बोली-मेरी [ २२९ ]< br>मोटर आई थीं न? कहां गया वह आदमी? उससे कह दो, थोड़ी देर के बाद लाए। जोहरा, आज मैं तुम्हें अपने बगीचे की सैर कराऊंगी। हम दोनों झूले पर बैठेंगी।

जोहरा फिर रोने लगी। जालपा भी आंसुओं के वेग को न रोक सकी। रतन एक क्षण तक छत की ओर देखती रही। फिर एकाएक जैसे उसकी स्मृति जाग उठी हो, वह लज्जित होकर एक उदास मुस्कराहट के साथ बोली- मैं सपना देख रही थी, दादा।

लोहित आकाश पर कालिमा का परदा पड़ गया था। उसी वक्ते रतन के जीवन पर मृत्यु ने परदा डाल दिया।

रमानाथ वैद्यजी को लेकर पहर रात को लौटे, तो यहां मौत का सन्नाटा छाया हुआ था। रतन की मृत्यु का शोक वह शोक न था, जिसमें आदमी हाय-हाय करता है, बल्कि वह शोक था जिसमें हम मूक रुदन करते हैं, जिसकी याद कभी नहीं भूलती, जिसका बोझ कभी दिल से नहीं उतरती।

रतन के बाद जोहरा अकेली हो गई। दोनों साथ सोती थीं, साथ बैठती थीं, साथ काम करती थीं। अकेले जोहरा का जो किसी काम में न लगता। कभी नदी-तट पर जाकर रहने को याद करती और रोती, कभी उस आम के पौधे के पास जाकर घंटों खड़ी रहती, जिसे उन दोनों ने लगाया था। मानो उसका सुहाग लुट गया हो। जालपा को बच्चे के पालन और भोजन बनाने से इतना अवकाश न मिलता था कि उसके साथ बहुत उठती-बैठती, और बैठती भी तो रतन की चर्चा होने लगती और दोनों रोने लगतीं।

भादों का महीना था। पृथ्वी और जल में रण छिड़ा हुआ था। जल की सेनाएं वायुयान पर चढ़कर आकाश से जल-शरों की वर्षा कर रही थीं। उसकी थल-सेनाओं ने पृथ्वी पर उत्पात मचा रखा था। गंगा गांवों और कस्बों को निगल रही थी। गांव के गांव बहते चले जाते थे। जोहरा नदी के तट पर बाढ़ का तमाशा देखने लगी। वह कृशांगी गंगा इतनी विशाल हो सकती है, इसका वह अनुमान भी न कर सकती थी। लहरें उन्मत्त होकर गनीं, मुंह से फेन निकालती, हाथों उछल रहीं थीं। चतर फेकैतों की तरह पैंतरे बदल रही थीं। कभी एक कदम आतीं, फिर पीछे लौट पड़ती और चक्कर खाकर फिर अगै को लपकतीं। कहीं कोई झोंपडा डगमगाता तेजी से बहा जा रहा था, मानो कोई शराबी दौड़ा जाता हो। कहीं कोई वृक्ष डाल-पत्तों समेत डूबता-उतराता किसी पाषाणयुग के जंतु की भाँति तैरता चला जाता था। गाएं और भैंसें, खाट और तख्ते मानो तिलस्मी चित्रों की भाँति आंखों के सामने से निकले जाते थे।

सहसा एक किश्ती नजर आई। उस पर कई स्त्री-पुरुष बैठे थे। बैठे क्या थे, चिमटे हुए थे। किश्ती कभी ऊपर जाती, कभी नीचे आती। बस यहीं मालूम होता था कि अब उलटी, अब उलटी, पर वाह रे साहस ! सब अब भी 'गंगा माता की जय !' पुकारते जाते थे। स्त्रियां अब भी गंगा के यश के गीत गाती थीं । जीवन और मृत्यु का ऐसा है; र्ष किसने देखा होगा। दोनों तरफ के आदमी किनारे पर, एक तनाव की दशा में हृदय को दबाए खड़े थे। जब किश्ती करवट लेतीं, तो लोगों के दिल उछल-उछलकर ओठों तक आ जाते। रस्सियां फेंकने की कोशिश की जाती, पर रस्सी बीच ही में गिर पड़ती थी। एकाएक एक बार किश्ती उलटे ही गई। सभी प्राणी लहरों में समा गए। एक क्षण कई स्त्री-पुरुष डूबते-उतराते दिखाई दिए, फिर निगाहों से [ २३० ]
ओझल हो गए। केवल एक उजली-सी चीज किनारे की ओर चली आ रही थी। वह एक रेले में तट से कोई बीस गज तक आ गई। समीप से मालूम हुआ, स्त्री है। जोहरा, जालपा और रमा–तीनों खड़े थे। स्त्री की गोद में एक बच्चा भी नजर आता था। दोनों को निकाल लाने के लिए तीनों विकल हो उठे, पर बीस गज तक तैरकर उस तरफ जाना आसान न था। फिर रमा तैरने में बहुत कुशल न था। कहीं लहरों के जोर में पांव उखड़ जाएं, तो फिर बंगाल की खाड़ी के सिवा और कहीं ठिकाना न लगे।

जोहरा ने कहा-मैं जाती हूं।

रमा ने लजाते हुए कहा-जाने को तो मैं तैयार हूं, लेकिन वहां तक पहुंच भी सकूंगा,इसमें संदेह है। कितना तोड़ है।

जोहरा ने एक कप पानी में रखकर कहा-नहीं, मैं अभी निकाल लाती हूं।

वह कमर तक पानी में चली गई। रमा ने सशंक होकर कहा-क्यों नाहक जान देने जाती हो। वहां शायद एक गड्ढा है। मैं तो जा ही रहा था।

जोहरा ने हाथों से मना करते हुए कहा-नहीं-नहीं, तुम्हें मेरी कसम, तुम न आना। मैं अभी लिए आती हूं। मुझे तैरना आता है।

जालपा ने कहा-लाश होगी और क्या ।

रमानाथ–शायद अभी जान हो।

जालपा-अच्छा, तो जोहरी तो तैर भी लेती है। जभी हिम्मत हुई।

रमा ने जोहरा की ओर चिंतित आंखों से देखते हुए कहा-हां, कुछ-कुछ जानती तो हैं। ईश्वर करे लौट आएं। मुझे अपनी कायरता पर लज्जा आ रही है।

जालपा ने बेहयाई से कहा-इसमें लज्जा की कौन-सी बात है। मरी लाश के लिए जान को जोखिम में डालने से फायदा? जीती होती, तो मैं खुद तुमसे कहती, जाकर निकाल लाओ।

रमा ने आत्म-धिक्कार के भाव से कहा यहां से कौन जान सकता है, जान है या नहीं। सचमुच बाल-बच्चों वाला आदमी नामर्द हो जाता है। मैं खड़ा रहो और जोहरा चली गई।

सहसा एक जोर की लहर आई और लाश को फिर धारा में बहा ले गई। जोहरा लाश के पास पहुंच चुकी थी। उसे पकड़कर खींचना ही चाहती थी कि इस लहर ने उसे दूर कर दिया। जोहरा खुद उसके जोर में आ गई और प्रवाह की ओर कई हाथ बह गई। वह फिर संभली, पर एक दूसरी लहर ने उसे फिर ढकेल दिया।

रमा व्यग्र होकर पानी में कूद पड़ा और जोर-जोर से पुकारने लगा–जोहरा! जोहरा! मैं आता हूँ।

मगर जोहरों में अब लहरों से लड़ने की शक्ति न थी। वह वेग से लाश के साथ ही धारे में बही जा रही थी। उसके हाथ-पांव हिलना बंद हो गए थे।

एकाएक एक ऐसा रेला आया कि दोनों ही उसमें समा गईं। एक मिनट के बाद जोहरा के काले बाल नजर आए। केवल एक क्षण तक । यही अंतिम झलक थी। फिर वह नजर न आई।

रमा कोई सौ गज तक जोरों के साथ हाथ-पांव मारता हुआ गया, लेकिन इतनी ही दूर में लहरों के वेग के कारण उसका दम फूल गया। अब आगे जाय कहां? जोहरा का तो कहीं पता भी न था। वहीं आखिरी झलक आंखों के सामने थी।

किनारे पर जालपा खड़ी हाय-हाय कर रही थी। यहां तक कि वह भी पानी में कूद पड़ी। [ २३१ ]रमा अब आगे न बढ़ सका। एक शक्ति आगे खींचती थी, एक पीछे। आगे की शक्ति में अनुराग था, निराशा थी, बलिदान था। पीछे की शक्ति में कर्तव्य था, स्नेह थी, बंधन था। बंधन ने रोक ने लिया। वह लौट पड़ा।

कई मिनट तक जालपा और रमा घुटनों तक पानी में खड़े उसी तरफ ताकते रहे। रमा की जबान आत्म-धिक्कार ने बंद कर रक्खी थी, जालपा की, शोक और लज्जा ने।

आखिर रमा ने कहा-पानी में क्यों खड़ी हो? सर्दी हो जाएगी।

जालपा पानी से निकलकर तट पर खड़ी हो गई, पर मुंह से कुछ न बोली-मृत्यु के इस आघात ने उसे पराभूत कर दिया था। जीवन कितना अस्थिर है, यह घटना आज दूसरी बार उसकी आंखों के सामने चरितार्थ हुई। रतन के मरने की पहले से आशंका थी। मालूम था कि वह थोड़े दिनों की मेहमान है; मगर जोहरा की मौत तो वज्राघात के समान थी। अभी आध घड़ी पहले तीनों आदमी प्रसन्नचित्त, जल-क्रीड़ा देखने चले थे। किसे शंका थी कि मृत्यु की ऐसी भीषण क्रीड़ा उनको देखनी पड़ेगी।

इन चार सालों में जोहरा ने अपनी सेवा, आत्मत्याग और सरल स्वभाव से सभी को मुग्ध कर लिया था। उसके अतीत को मिटाने के लिए, अपने पिछले दागों को धो डालने के लिए, उसके पास दम्-शिवा और क्या साधन था ! उसकी सारी कामनाएं, सारी वासनाएं सेवा में लीन हो गईं। कलकत्ते में वह विलास और मनोरंजन की वस्तु थी। शायद कोई भला आदमी उसे अपने घर में न घुसने देता है यहां सभी उसके साथ घर के प्राणी का-सा व्यवहार करते थे। दयानाथ और जागेश्वरी को यह कहकर शांत कर दिया गया था कि वह देवीदीन की विधवा बहू है। जोहरा ने कलकत्ते में जालपा से केवल उसके साथ रहने की भिक्षा मांगी थी। अपने जीवन से उसे घृणा हो गई थी। जालपा की विश्वासमय उदारता ने उसे आत्मशुद्धि के पथ पर डाल दिया। रतन का पवित्र, निष्काम जीवन उसे प्रोत्साहित किया करता था।

थोड़ी देर के बाद रमा भी पानी से निकला और शोक में डूबा हुआ घर की ओर चला। मगर अकसर वह और जालपा नदी के किनारे आ बैठते और जहां जोहरा डूबी थी उस तरफ घंटों देखा करते। कई दिनों तक उन्हें यह आशा बनी रही कि शायद जोहरा बच गई हो और किसी तरफ से चली आए, लेकिन धीरे-धीरे यह क्षीण आशा भी शोक से अंधकार में खो गई। मगर अभी तक जोहरा की सूरत उनकी आंखों के सामने फिर करती है। उसके लगाए हुए पौधे, उसकी पाली हुई बिल्ली, उसके हाथों के सिले हुए कपड़े, उसका कमरा, यह सब उसकी स्मृति के चिह्न हैं और उनके पास जाकर रमी की आंखों के सामने जोहरा की तस्वीर खड़ी हो जाती है।

                        ●●● [ २३२ ] [ २३३ ]
प्रेमचंद रचनावली ५.pdf
कर्मभूमि

प्रकाशनकाल : नवम्बर, 1932

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[ २३४ ].:49

४१:

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कर्मभूमि प्रेमचन्द श सरस्वती-प्रेस, बनारस सिटी । st conn:,# t iguza 22lL""""DIHtullulinn i प्रथम संरक्षण तीन ईप । gation Powerupon on (प्रथम संस्करण का मुख पृष्ठ) [ २३५ ]

एक

हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फीस का दाखिला होना अनिवार्य है। या तो फीस दीजिए, या नाम कटवाइए, या जब तक फीस न दाखिल हो, रोज कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं-कहीं ऐसा भी नियम है कि उसी दिन फीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख को दुगुनी फीस न दी तो नाम कट जाता है। काशी के क्वीन्स कॉलेज में यही नियम था। सातवीं तारीख को फीस न दो, तो इक्कीसवीं तारीख को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी, या नाम कट जाता था। ऐसे कठोर नियमों का रद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था, कि गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएं? वही हदयहीन दफ्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे शिक्षालयों में भी है। वह किसी के साथ रियायत नहीं करता। चाहे जहांँ से लाओ, कर्ज लो, गहने गिरवी रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फीस जरूर दो, नहीं दूनी फीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जाएगा। जमीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रियायत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता। वहां स्थायी रूप से मार्शल- लों का व्यवहार होता है। कचहरी में पैसे का राज है, हमारे स्कूलों में भी पैसे का राज है, उससे कहीं कठोर, कहीं निर्दय। देर में आइए तो जुर्माना; न आइए तो जुर्माना; सबक न याद हो तो जुर्माना; किताबें न खरीद सकिए तो जुर्माना; कोई अपराध हो जाए तो जुर्माना: शिक्षालय क्या है, जुर्मानालय है। यही हमारी पश्चिमी शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफा के पुल बांधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों से पैसे पर जान देने वाले. पैसे के लिए गरीबों का गला काटने वाले, पैसे के लिए अपनो आत्मा बेच देने वाले छात्र निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या है?

आज वही वसूली की तारीख है। अध्यापकों की मेजों पर रुपयों के ढेर लगे हैं। चारों तरफ खनाखन की आवाजें आ रही हैं। सराफे में भी रुपये को ऐसी झंकार कम सुनाई देती है। हरेक मास्टर तहसील का चपरासी बना बैठा हुआ है। जिस लड़के का नाम पुकारा जाता है, वह अध्यापक के सामने आता है, फीस देता है और अपनी जगह पर आ बैठता है। मार्च का महीना है। इसी महीने में अप्रैल, मई और जून की फीस भी वसूल की जा रही है। इम्तहान की फीस भी ली जा रही है। दसवें दर्जे में तो एक-एक लङके को चालीस रुपये देने पड़ रहे हैं।

अध्यापक ने बीसवें लड़के का नाम पुकारा--अमरकान्त !

अमरकान्त गैरहाजिर था।

अध्यापक ने पूछा-क्या अमरकान्त नहीं आया? [ २३६ ]एक लड़के ने कहा-आए तो थे, शायद बाहर चले गए हों।

"क्या फीस नहीं लाया है?"

किसी लड़के ने जवाब नहीं दिया।

अध्यापक की मुद्रा पर खेद की रेखा झलक पड़ी। अमरकान्त अच्छे लड़कों में था। बोले-शायद फीस लाने गया होगा। इस घंटे में न आया, तो दूनी फीस देनी पड़ेगी। मेरा क्या अख्तियार है? दूसरा लड़का चले-गोवर्धनदास |

सहसा एक लड़के ने पूछा- अगर आपकी इजाजत हो, तो मैं बाहर जाकर देखू?

अध्यापक ने मुस्कराकर कहा-घर की याद आई होगी। खैर, जाओ, मगर दस मिनट के अंदर आ जाना। लड़कों को बुला-बुलाकर फीस लेना मेरा काम नहीं है।

लड़के ने नम्रता से कहा-अभी आता हूं। कसम ले लीजिए, जो हाते के बाहर जाऊं।

यह इस कक्षा के संपन्न लड़कों में था, बड़ा खिलाड़ी, बड़ा बैठकबाजा। हाजिरी देकर गायब हो जाता, तो शाम की खबर लाता। हर महीने फीस की दूनी रकम जुर्माना दिया करता था। गोरे रंग का, लंबा, छरहरा शौकीन युवक था। जिसके प्राण खेल में बसते थे। नाम था मोहम्मद सलीम।

सलीम और अमरकान्त दोनों पास-पास बैठते थे। सलीम को हिसाब लगाने या तर्जुमा करने में अमरकान्त से विशेष सहायता मिलती थी। उसकी कापी से नकल कर लिया करता था। इससे दोनों में दोस्ती हो गई थी। सलीम कवि था। अमरकान्त उसकी गजलें बड़े चाव से सुनता था। मैत्री का यह एक और कारण था।

सलीम ने बाहर जाकर इधर-उधर निगाह दौड़ाई, अमरकान्त का कहीं पता न था। जरा और आगे बढ़े, तो देखा, वह एक वृक्ष की आड़ में खड़ा है। पुकारा --अमरकान्त । ओ बुद्ध लाल । चलो, फीस जमा कर। पंडितजी बिगड़ रहे हैं।

अमरकान्त ने अचकन दामन से आंखें पोंछ ली और सलीम की तरफ आता हुआ बोला-क्या मेरा नंबर आ गया।

सलीम ने उसके मुंह की तरफ देखा, तो उसकी आंखें लाल थीं। वह अपने जीवन में शायद ही कभी रोया हो । चौंककर बोला-अरे , तुम रो रहे हो क्या बात है।

अमरकान्त सांवले रंग का, छोटा-सा, दुबला-पतला कुमार था। अवस्था बीम की हो गई थी, पर अभी मसें भी न भीगी थीं। चौदह-पंद्रह साल का किशोर-सा लगता था। उसके मुख पर एक वेदनामय दृढ़ता, जो निराशा से बहुत कुछ मिलती-जुलती थी, ओंकत हो रही थी, मानो संसार में उसका कोई नहीं है। इसके साथ ही उसकी मुद्रा पर कुछ ऐसी प्रतिभा, कुछ ऐसी मनस्विता थी कि एक बार उसे देखकर फिर भूल जाना कठिन था।

उसने मुस्कराकर कहा-कुछ नहीं जी, रोता कौन है?

आप रोते हैं, और कौन रोता है। सच बताओ क्या हुआ?"

अमरकान्त की आंखें फिर भर आई। लाख यत्न करने पर भी आंसू न रुक सके। सलीम समझ गया। उसका हाथ पकड़कर बोला-क्या फीस के लिए रो रहे हो? भले आदमी, मुझसे क्यों न कह दिया? तुम मुझे भी गैर समझते हो। कसम खुदा की, बड़े नालायक आदमी हो तुम। ऐसे आदमी को गोली मार देनी चाहिए। दोस्तों से भी यह गैरियत । चलो क्लास में,
[ २३७ ]
मैं फीस दिए देता हूं। जरा-सी बात के लिए घंटे भर से रो रहे हो। वह तो कहो मैं आ गया, नहीं तो आज जनाब का नाम ही कट गया होता।

अमरकान्त को तसल्ली तो हुई, पर अनुग्रह के बोझ से उसकी गर्दन दब गई। बोला -पंडितजी आज मान न जाएंगे?

सलीम ने खड़े होकर कहा-पंडितजी के बस की बात थोड़े ही है। यही सरकारी कायदा है। मगर हो तुम बड़े शैतान, वह तो खैरियत हो गई, मैं रुपये लेता आया था, नहीं खूब इम्तहान देते। देखो, आज एक ताजा गजल कही है। पीठ सहला देना :

आपको मेरी वफा याद आई,

खैर है आज यह क्या याद आई।

अमरकान्त का व्यथित चित्त इस समय गजल सुनने को तैयार न था; पर सुने बगैर काम भी तो नहीं चल सकता। बोला-नाजुक चीज है। खूब कहा है। मैं तुम्हारी जबान की सफाई पर जान देता हूं।

सलीम--यही तो खास बात है, भाई साहब। लफ्जों की झंकार का नाम गजल नहीं है। दुसरा शेर सुनो :

फिर मेरे सीने में एक हूक उठी,

फिर मुझे तेरी अदा याद आई।

अमरकान्त ने फिर तारीफ की-लाजवाब चीज है। कैसे तुम्हें ऐसे शेर जाते हैं?

सलीम हंसा-उसी तरह, जैसे तुम्हें हिसाब और मजमून सूझ जाते हैं। जैसे एसोसिएशन में स्पीचं दे लेते हो। आओ, पान खाते चलें।

दोनों दोस्तों ने पान खाए और स्कूल की तरफ चले। अमरकान्त ने कहा-पंडितजी बड़ी डांट बताएंगे।

"फीस ही तो लेंगे।"

"और जो पूछे, अब तक कहां थे?"

"कह देना, फीस लाना भूल गया था।"

"मुझसे न कहते बनेगा! मैं साफ-साफ कह दूंगा।"

"तो तुम पिटोगे भी मेरे हाथ से।"

संध्या समय जब छुट्टी हुई और दोनों मित्र घर चले, अमरकान्त ने कहा-तुमने आज मुझ पर जो एहसान किया है

सलीम ने उसके मुंह पर हाथ रखकर कहा-बस खबरदार, जो मुंह से एक आवाज भी निकाली। कभी भूलकर भी इसका जिक्र न करना।

"आज जलसे में आओगे?"

"मजमून क्या है, मुझे तो याद नहीं?"

"अजी वही पश्चिमी सभ्यता है।"

"तो मुझे दो-चार प्वाइंट बता दो, नहीं तो मैं वहां कहूंगा क्या?"

"बताना क्या है? पश्चिमी सभ्यता की बुराइयां हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।" [ २३८ ]"तुम जानते होगे, मुझे तो एक भी नहीं मालूम।"

एक तो यह तालीम ही है। जहां देखो वहीं दूकानदारी। अदालत की दूकान, इल्म को सेहत की दूकान। इस एक प्वाइंट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है।"

"अच्छी बात है, आऊंगा।"


दो

अमरकान्त के पिता लाला समरकान्त बड़े उद्योगी पुरुष थे। उनके पिता केवल एक झोंपड़ी छोड़कर मरे थे, मगर समरकान्त ने अपने बाहुबल से लाखों की संपत्ति जमा कर ली थी। पहले उनको एक छोटी-सी हल्दी की आढ़त थी। हल्दी से गुड़ और चावल की बारी आई। तीन बरस तक लगातार उनके व्यापार का क्षेत्र बढ़ता ही गया। अब आढ़तें बंद कर दी थी। केवल लेन-देन करते थे। जिसे कोई महाजन रुपये न दे, उसे वह बेखटके दे देते और वसूल भी कर लेते। उन्हें आश्चर्य होता था कि किसी के रुपये मारे कैसे जाते हैं? ऐसा मेहनती आदमी भी कम होगा। घड़ी रात रहे गंगा-स्नान करने चले जाते और सूर्योदय के पहले विश्वनाथजी के दर्शन करके दूकान पर पहुंच जाते। वहां मुनीम को जरूरी काम समझाकर तगादे पर निकल जाते और तीसरे पहर लौटते। भोजन करके फिर दूकान आ जाते और आधी रात तक डटे रहते। थे भी भीमकाय भोजन तो एक ही बार करते थे, पर खूब डटकर। दो-ढाई सौ मुग्दर के हाथ अभी तक फेरते थे। अमरकान्त की माता का उसके बचपन ही में देहांत हो गया था। समरकान्त ने मित्रों के कहने-सुनने से दूसरा विवाह कर लिया था। उस सात साल के बालक ने नई मां का बड़े प्रेम से स्वागत किया, लेकिन उसे जल्द मालूम हो गया कि उसकी नई माता उसकी जिद और शरारतों को उस क्षमा- दृष्टि में नहीं देखती जैसे उसकी मां देखती थीं। वह अपनी मां का अकेला लाडला लड़का था, बड़ा जिद्दी, बड़ा नटखट। जो बात मुंह से निकल जाती, उसे पूरा करके ही छोड़ता। नई माताजी बात-बात पर डांटती थीं। यहां तक कि उसे माता से द्वेष हो गया। जिस बात को वह मना करती उसे वह अदबदाकर करता। पिता से भी ढीठ हो गया। पिता और पुत्र में स्नेह का बंधन न रहा। लालाजी जो काम करते, बेटे को उससे अरुचि होती। वह मलाई के प्रेमी थे, बेटे को मलाई से अरुचि थी। वह पूजा-पाठ बहुत करते थे, लड़का इसे ढोंग समझता था। वह परले सिरे के लोभी थे, लड़का पैसे को ठीकरा समझता था।

मगर कभी-कभी बुराई से भलाई पैदा हो जाती है। पुत्र सामान्य रीति से पिता का अनुगामी होता है। महाजन का बेटा महाजन, पंडित का पंडित, वकील का वकील, किसान का किसान होता है, मगर यहां इस द्वेष ने महाजन के पुत्र को महाजन का शत्रु बना दिया। जिस बात का पिता ने विरोध किया, वह पुत्र के लिए मान्य हो गई, और जिसको सराहा, वह त्याज्य। महाजनी के हथकंडे और षड्यंत्र उसके सामने रोज ही रचे जाते थे। उसे इस व्यापार से घृणा होती थी। इसे चाहे पूर्व संस्कार कह लो, पर हम तो यही कहेंगे कि अमरकान्त के चरित्र का निर्माण पिता-द्वेष के हाथों हुआ। [ २३९ ]खैरियत यह हुई कि उसके कोई सौतेला भाई न हुआ। नहीं शायद वह घर से निकल गया होता। समरकान्त अपनी संपत्ति को पुत्र से ज्यादा मूल्यवान समझते थे। पुत्र के लिए तो संपत्ति की कोई जरूरत न थी, पर संपत्ति के लिए पुत्र की जरूरत थी। विमाता की तो इच्छा यही थी कि उसे वनवास देकर अपनी चहेती नैना के लिए रास्ता साफ कर दे, पर समरकान्त इस विषय में निश्चल रहे। मजा यह था कि नैना स्वयं भाई से प्रेम करती थी, और अमरकान्त के हृदय में अगर घर वालों के लिए कहीं कोमल स्थान था, तो वह नैना के लिए था। नैना की सूरत भाई से इतनी मिलती-जुलती थी, जैसे सगी बहन हो। इस अनुरूपता ने उसे अमरकान्त के और भी समीप कर दिया था। माता-पिता के इस दुर्व्यवहार को वह इस स्नेह के नशे में भुला दिया करता था। घर में कोई बालक न था और नैना के लिए किसी साथी का होना अनिवार्य था। माता चाहती थीं, नैना भाई से दूर-दूर रहे। वह अमरकान्त को इस योग्य न समझती थीं कि वह उनकी बेटी के साथ खेले। नैना की बाल-प्रकृति इस कूटनीति के झुकाए न झुकी। भाई-बहन में यह स्नेह यहां तक बढ़ा कि अंत में विमातृत्व ने मातृत्व को भी परास्त कर दिया। विमाता ने नैना को भी आंखों से गिरा दिया और पुत्र की कामना लिए संसार से विदा हो गई।

अब नैन घर में अकेली रह गई। समरकान्त बाल-विवाह की बुराइयां समझते थे। अपना विवाह भी न कर सके। वृद्ध-विवाह की बुराइयां भी समझते थे। अमरकान्त का विवाह करना जरूरी हो गया। अब इस प्रस्ताव का विरोध कौन करता?

अमरकान्त की अवस्था उन्नीस साल से कम न थी, पर देह और बुद्धि को देखते हुए, अभी किशोरावस्था ही में था। देह का दुर्बल, बुद्धि का मंद। पौधे को कभी मुक्त प्रकाश न मिला, कैसे बढ़ता, कैसे फैलता? बढ़ने और फैलने के दिन कुसंगति और असंयम में निकल गए। दस साल पढ़ते हो गए थे और अभी ज्यों-त्यों आठवें में पहुंचा था। किंतु विवाह के लिए यह बातें नहीं देखी जाती। देखा जाता है धन, विशेषकर उस बिरादरी में, जिसका उद्यम ही व्यवसाय हो। लखनऊ के एक धनी परिवार से बातचीत चल पङी। समरकान्त को तो लार टपक पड़ी। कन्या के घर में विधवा माता के सिवा निकट का कोई संबंधी न था, और धन की कहीं थाह नहीं। ऐसी कन्या बड़े भागों से मिलती है। उसकी माता ने बेटे की साध बेटी से पूरी की थी। त्याग की जगह भोग, शील की जगह तेज, कोमल की जगह तीव्र का संस्कार किया था। सिकुड़ने और सिमटने का उसे अभ्यास न था। और वह युवक- प्रकृति की युवती ब्याही गई युवती-प्रकृति के युवक से, जिसमें पुरुषार्थ का कोई गुण नहीं। अगर दोनों के कपड़े बदल दिए जाते, तो एक-दूसरे के स्थानापन्न हो जाते। दबा हुआ पुरुषार्थ ही स्त्रीत्व है।

विवाह हुए दो साल हो चुके थे, पर दोनों में कोई सामंजस्य न था। दोनों अपने-अपने मार्ग पर चले जाते थे। दोनों के विचार अलग, व्यवहार अलग, संसार अलग। जैसे दो भिन्न जलवायु के जंतु एक पिंजरे में बंद कर दिए गए हों। हां, तभी अमरकान्त के जीवन में संयम और प्रयास को लगन पैदा हो गई थी। उसकी प्रकृति में जो ढीलापन, निर्जीवता और संकोच था वह कोमलता के रूप में बदलता जाता था। विद्याभ्यास में उसे अब रुचि हो गई थी। हालाकि लालाजी अब उसे घर में धंधे के लगाना चाहते थे-वह तार-वार पढ़ लेता था और
[ २४० ]इससे अधिक योग्यता की उनकी समझ में जरूरत न थी-पर अमरकान्त उस पथिक की भांति, जिसने दिन विश्राम में काट दिया हो, अब अपने स्थान पर पहुंचने के लिए दूने वेग से कदम बढ़ाए चला जाता था।


तीन

स्कूल से लौटकर अमरकान्त नियमानुसार अपनी छोटी कोठरी में जाकर चरखे पर बैठ गया। उस विशाल भवन में, जहां बारात ठहर सकती थी, उसने अपने लिए यही छोटी-सी कोठरी पसंद की थी। इधर कई महीने से उसने दो घंटे रोज सूत कातने की प्रतिज्ञा कर ली थी और पिता के विरोध करने पर भी उसे निभाए जाता था।

मकान था तो बहुत बड़ा, मगर निवासियों की रक्षा के लिए उतना उपयुक्त न था. जितना धन की रक्षा के लिए। नीचे के तल्ले में कई बड़े-बड़े कमरे थे, जो गोदाम के लिए बहुत अनुकूल थे। हवा और प्रकाश का कहीं रास्ता नहीं। जिस रास्ते से हवा और प्रकाश आ सकता है, उसी रास्ते से चोर भी तो आ सकता है। चोर की शंका उसकी एक-एक ईंट से टपकती थी। ऊपर के दोनों तल्ले हवादार और खुले हुए थे। भोजन नीचे बनता था। सोना-बैठना ऊपर होता था। सामने सड़क पर दो कमरे थे। एक में लालाजी बैठने थे, दूसरे में मुनीम। कमरों के आगे एक सायबान था, जिसमें गाय बंधती थी। लालाजी पक्के गोभक्त थे।

अमरकान्त सूत कातने में मग्न था कि उसकी छोटी बहन नैना आकर बोली- क्या हुआ भैया, फीस जमा हुई या नहीं? मेरे पास बीस रुपये हैं, यह ले लो। मैं कल और किमी से मांग लाऊंगी।

अमर ने चरखा चलाते हुए कहा--आज ही तो फीस जमा करने की तारीख थी। नाम कट गया। अव रुपये लेकर क्या करूंगा।

नैना रूप-रंग में अपने भाई से इतनी मिलती थी कि अमरकान्त उसकी साड़ी पहन लेता, तो यह बतलाना मुश्किल हो जाता कि कौन यह है कौन वह । हां, इतना अतर अवश्य था कि भाई की दुर्बलता यहां सुकुमारता बनकर आकर्षक हो गई थी।

अमर ने दिल्लगी की थी, पर नैनाके चेहरे रंग उड़ गया। बोली-तुमने कहा नही, नाम न काटो, मैं दो-एक दिन में दे दूंगा?

अमर ने उसकी घबराहट का आनंद उठाते हुए कहा-कहने को तो मैंने सब कुछ कहा, लेकिन सुनता कौन था?

नैना ने रोष के भाव से कहा तो तुम्हें अपने कड़े दे रही थी, क्यों नहीं लिए?

अमर ने हंसकर पूछा-और जो दादा पूछते, तो क्या होता?

"दादा से बतलाती ही क्यों?"

अमर ने मुंह लंबा करके कहा--मैं चोरी से कोई काम नहीं करना चाहता, नैना । अब खुश हो जाओ, मैंने फीस जमा कर दी। [ २४१ ]नैना को विश्वास न आया, बोलो-फीस नहीं, वह जमा कर दी। तुम्हारे पास रुपये कहां थे?

"नहीं नैना, सच कहता हूं, जमा कर दी।"

"रुपये कहां थे?"

"एक दोस्त से ले लिए।"

"तुमने मांगे कैसे?"

"उसने आप-ही-आप दे दिए, मुझे मांगने न पड़े।"

"कोई बड़ा सज्जन होगा।"

"हां, है तो सज्जन, नैना । जब फीस जमा होने लगी तो मैं मारे शर्म के बाहर चला गया। न जाने क्यों उस वक्त मुझे रोना आ गया। सोचता था, मैं ऐसा गया-बीता हूं कि मेरे पास चालीस रुपयें नहीं। वह मित्र जरा देर में मुझे बुलाने आया। मेरी आंखें लाल थीं। समझ गया। तुरंत जाकर फीस जमा कर दी। तुमने कहां पाए ये बीस रूपये?

"यह न बताऊंगी।"

नैना ने भाग जाना चाहा। बारह बरस की यह लज्जाशील बालिका एक साथ ही सरल भी थी और चतुर भी। उस ठगना सहज न था। उससे अपनी चिताओं को छिपाना कठिन था।

अमर ने लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- जब तक बताआगों नहीं, मै जाने न दूंगा। किसी से कहूंगा नहीं, सच कहता हूँ।

नैना झंपती हुई बोली-दादा से लिए।

अमरकान्त ने बेदिली के साथ कहा- --तुमने उनसे नाहक मांगे, नैना । जब उन्होंने मुझे इतनी निर्दयता से दुत्कार दिया, तो मैं नहीं चाहता कि उनसे एक पैसा भी मांगू। मैंने तो समझा था, तुम्हारे पास कहीं पड़े होंगे, अगर मैं जानता कि तुम भी दादा से ही मांगोगी तो साफ कह देता. मुझे रुपये की जरूरत नहीं। दादा क्या बोले?

नैना सजल नेत्र होकर बोली- बोले तो नहीं। यही कहते रहे कि करनी-वरनी तो कुछ नहीं, रोज रुपये चाहिए, कभी फीस, कभी किताब, कभी चंदा। फिर मुनीमजी से कहा, बीस रुपये दे दो। बीस रुपये फिर देना।

अमर ने उत्तेजित होकर कहा-तुम रुपये लौटा देना, मुझे नहीं चाहिए।

नैना सिसक सिसककर रोने लगी। अमरकान्त ने रुपये जमीन पर फेंक दिए थे और वह सारी कोठरी में बिखरे पड़े थे। दोनों में से एक भी चुनने का नाम न लेता था। सहसा लाला समरकान्त आकर द्वार पर खड़े हो गए। नैना की सिसकियां बंद हो गई और अमरकान्त माना तलवार की चोट खाने के लिए अपने मन को तैयार करने लगा। लाला जी दोहरे बदन के दीर्घकाय मनुष्य थे। सिर से पांव तक सेठ–वही खल्वा मस्तक, वही फूले हुए कपोल, वही निकली हुई तोंद। मुख पर संयम का तेज था, जिसमे स्वार्थ की गहरी झलक मिली हुई थी। कठोर स्वर में बोले-चरखा चला रहा है। इतनी देर में कितना सूत काता? होगा हो -चार रुपये का?

अमरकान्त ने गर्व से कहा--चरखा रुपये के लिए नहीं चलाया जाता। [ २४२ ]"और किसलिए चलाया जाता है।"

"यह आत्म-शुद्धि का एक साधन है।"

समरकान्त के घाव पर जैसे नमक पड़ गया। बोले-यह आज नई बात मालूम हुई। तब तो तुम्हारे ऋषि होने में कोई संदेह नहीं रहा, भगर साधना के साथ कुछ घर-गृहस्थी का काम भी देखना होता है। दिन-भर स्कूल में रहो, वहां स लौटो तो चरखे पर बैठो, रात को तुम्हारी स्त्री-पाठशाला खुले, संध्या समय जलसे हों, तो घर का धंधा कौन करे? मैं बैल नहीं हूं। तुम्ही लोगों के लिए इस जंजाल में फंसा हुआ हूं। अपने ऊपर लाद न ले जाऊंगा। तुम्हें कुछ तो मेरी मदद करनी चाहिए। बड़े नीतिवान बनते हो, क्या यह नीति है कि बूढ़ा बाप मरा करे और जवान बेटा उसकी बात भी न पूछे?

अमरकान्त ने उदंडता से कहा-मैं तो आपसे बार-बार कह चुका, आप मेरे लिए कुछ न करें। मुझे धन की जरूरत नहीं। आपकी भी वृद्धावस्था है। शांतचित्त होकर भगवत् - भजन कीजिए।

समरकान्त तीखे शब्दों में बोले-धन न रहेगा लाला, तो भीख मांगोगे। यों चैन से बैठकर चरखा न चलाओगे। यह तो न होगा, मेरी कुछ मदद करो, पुरुषार्थहीन मनुष्यों की तरह कहने लगे, मुझे धन की जरूरत नहीं। कौन है, जिसे धन की जरूरत नहीं? साधु- संन्यासी तक तो पैसों पर प्राण देते हैं। धन बड़े पुरुषार्थ से मिलता है। जिसमें पुरुषार्थ नही, वह क्या धन कमाएगा? बड़े-बड़े तो धन की उपेक्षा कर ही नहीं सकते, तुम किस खेत की मूली हो ।

अमर ने उसी वितडा भाव से कहा-संसार धन के लिए प्राण दे, मुझे धन की इच्छा नहीं। एक मजूर भी धर्म और आत्मा की रक्षा करते हुए जीवन का निर्वाह कर सकता है। कम-से-कम मैं अपने जीवन में इसकी परीक्षा करना चाहता हूं।

लालाजी को वाद-विवाद का अवकाश न था। हारकर बोले-अच्छा बाबा, कर लो खूब जी भरकर परीक्षा, लेकिन रोज-राज रुपये के लिए मेरा सिर न खाया करो। मैं अपनी गाढ़ी कमाई तुम्हारे व्यसन के लिए नहीं लुटाना चाहता।

लालाजी चले गए। नैना कहीं एकांत में जाकर खूब रोना चाहती थी, पर हिल न सकती थी, और अमरकान्त ऐसा विरक्त हो रहा था, मानो जीवन उसे भार हो रहा है।

उसी वक्त महरी ने ऊपर से आकर कहा - भैया, तुम्हें बहूजी बुला रही है।

अमरकान्त ने बिगड़कर कहा जा कह दे, फुर्सत नहीं है। चली वहां से- बहूजी बुला रही हैं।

लेकिन जब महरी लोटने लगी, तो उसने अपने तीखेपन पर लज्जित होकर कहा मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा है सिल्लो | कह दो, अभी आता हूं। तुम्हारी रानीजी क्या कर रही है?

सिल्ला का पूरा नाम था कौशल्या। सीतला में पति, पुत्र और एक आंख जाती रही थी, तब में विक्षिप्त-सी हो गई थी। रोने की बात पर हंसती, हंसने की बात पर रोती। घर के और सभी प्राणी, यहां तक की नौकर-चाकर तक उसे डाटते रहते थे। केवल अमरकान्त उसे मनुष्य समझता था। कुछ स्वस्थ होकर बोली-बैठो कुछ लिख रही हैं। लालाजी चीखते थे इसी से तुम्हें बुला भेजा। [ २४३ ]अमर जैसे गिर पड़ने के बाद गर्द झाड़ता हुआ, प्रसन्न मुख ऊपर चला। सुखदा अपने कमरे के द्वार पर खड़ी थी। बोली-तुम्हारे तो दर्शन ही दुर्लभ हो जाते हैं। स्कूल से आकर चरखा ले बैठते हो। क्यों नहीं मुझे घर भेज देते? जब मेरी जरूरत समझना, बुला भेजना। अबकी आए मुझे छः महीने हुए। मीयाद पूरी हो गई। अब तो रिहाई हो जानी चाहिए।

यह कहते हुए उसने एक तश्तरी में कुछ नमकीन और कुछ मिठाई लाकर मेज पर रख दी और अमर का हाथ पकड़ कमरे में ले जाकर कुरसी पर बैठा दिया।

यह कमरा और सब कमरों से बड़ा, हवादार और सुसज्जित था। दरी का फर्श था, उस पर करीने से कई गद्देदार और सादी कुरसियां लगी हुई थीं। बीच में एक छोटी-सी नक्काशीदार गोल मेज थी। शीशे की आल्मारियों में सजिल्द पुस्तकें सजी हुई थीं। आलों पर तरह-तरह के खिलौने रखे हुए थे। एक कोने में मेज पर हारमोनियम रखा हुआ था। दीवारों पर धुरंधर, रवि वर्मा और कई चित्रकारों की तस्वीरें शोभा दे रही थीं। दो-तीन पुराने चित्र भी थे। कमरे की सजावट से सुरुचि और संपन्नता का आभास होता था।

अमरकान्त का सुखदा से विवाह हुए दो साल हो चुके थे। सुखदा दो बार तो एक- एक महीना रहकर चली गई थी। अबकी उसे आए छ: महीने हो गए थे; मगर उनका स्नेह अभी तक ऊपर ही उपर था। गहराइयों में दोनों एक-दूसरे से अलग-अलग थे। सुखदा ने कभी अभाव न जाना था, जीवन की कठिनाइयां न सही थीं। वह जान-माने मार्ग को छोड़कर अनजान रास्ते पर पांव रखते डरती थी। भोग और विलास को वह जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु समझती थी और उसे हृदय से लगाए रहना चाहती थी। अमरकान्त को वह घर के कामकाज की ओर खींचने का प्रयास करती रहता थी। कभी समझाती थी, कभी रूठती थी, कभी बिगड़ती थी। सास के न रहने से वह एक प्रकार से घर की स्वामिनी हो गई थी। बाहर के स्वामी लाला समरकान्त थे, पर भीतर का संचालन सुखदा ही के हाथों में था। किंतु अमरकान्त उसकी बातों को हंसो में टाल देता। उस पर अपना प्रभाव डालने की कभी चेष्टा न करता। उसकी विलासप्रियता मानो खेतों में हौवे की मावि उसे डराती रहती थी। खेत में हरियाली थी, दाने थे, लेकिन वह हौवा निश्चल भाव से दोनों हाथ फैलाए खड़ा उसकी ओर घूरता रहता था। अपनी आशा और दुराशा, हार और जीत को वह सुखदा में बुराई की भांति छिपाता था। कभी-कभी उसे घर लौटने में देर हो जातो, तो सुखदा व्यंग्य करने से बाज न आती थी- हां, यहां कौन अपना बैठा हुआ है । बाहर के भजे घर में कहां ! और यह तिरस्कार, किसान की कड़े-कड़े की भांति हौवे के भय को और भी उत्तेजित कर देती थी। वह उसकी खुशामद करता, अपने सिद्धांतों की लंबी-से-लंबी रस्सी देता, पर सुखदा इसे उसकी दुर्बलता समझकर ठुकरा देती थी। वह पति को दया- भाव से देखती थी, उसकी त्यागमयी प्रवृत्ति का अनादर न करती थी, पर इसका तथ्य न समझ सकती थी। वह अगर सहानुभूति की भिक्षा मांगता, उसके सहयोग के लिए हाथ फैलाता, तो शायद वह उसकी उपेक्षा न करती। अपनी मुट्ठी बंद करके, अपनी मिठाई आप खाकर, वह उसे रुला देता। वह भी अपनी मुट्ठी बंद कर लेती थी और अपनी मिठाई आप खाती थी। दोनों आपस में हंसते-बोलते थे, साहित्य और इतिहास को चर्चा करते थे, लेकिन जीवन के गूढ व्यापारों में पृथक थे। दूध और पानी का मेल नहीं, रेत और पानी का मेल था, जो एक क्षण के लिए
[ २४४ ]
मिलकर पृथक् हो जाता था।

अमर ने इस शिकायत की कोमलता या तो समझी नहीं, या समझकर उसका रस न ले सका। लालाजी ने जो आघात किया था, अभी उसकी आत्मा उस वेदना से तड़प रही थी। बोला--मैं भी यही उचित समझता हूं। अब मुझे पढ़ना छोड़कर जीविका की फिक्र करनी पड़ेगी।

सुखदा ने खीझकर कहा- हां, ज्यादा पढ़ लेने से सुनती हूं, आदमी पागल हो जाता है।

अमर ने लड़ने के लिए यहां भी आस्तीने चढ़ा लीं-तुम यह आक्षेप व्यर्थ कर रही हो। पढ़ने से मैं जी नहीं चुराता; लेकिन इस दशा में पढ़ना नहीं हो सकता। आज स्कूल में मुझे जितना लाज्जित होना पड़ा, वह मैं ही जानता हूं। अपनी आत्मा की हत्या करके पढ़ने से भूखा रहना कहीं अच्छा है।

सुखदा ने भी अपने शस्त्र संभाले। बोली-मैं तो समझती हूं कि घड़ी-दो घड़ी दूकान पर बैठकर भी आदमी बहुत कुछ पढ़ सकता है। चरखे और जलसों में जो समय देते हो, वह दूकान पर दो, तो कोई बुराई न होगी। फिर जब तुम किसी से कुछ कहोगे नहीं तो कोई तुम्हारे दिल की बातें कैसे समझ लेगा? मेरे पास इस वक्त भी एक हजार रुपये से कम नहीं। वह मेरे रुपये हैं, मैं उन्हें उड़ा सकती हूं। तुमने मुझसे चर्चा तक न की। मैं बुरी सही, तुम्हारी दुश्मन नहीं। आज लालाजी की बातें सुनकर मेरा रक्त खौल रहा था। चालीस रुपये के लिए इतना हंगामा । तुम्हें जितनी जरूरत हो, मुझसे लो, मुझमे लेते तुम्हारे आत्म सम्मान को चोट लगती हो, अम्मां से लो। वह अपने को धन्य समझेंगी। उन्हें इसका अरमान ही रह गया कि तुम उनसे कुछ मांगते। मैं तो कहती हैं, मुझे लेकर लखनऊ चले चलो और निश्चित होकर पढ़ों! अम्मां तुम्हें इंग्लैंड भेज देंगी। वहां से अच्छी डिग्री ला सकते हो।

सुखदा ने निष्कपट भाव से यह प्रस्ताव किया था। शायद पहली बार उसने पति से अपने दिल की बात कही, अमरकान्त को बुरा लगा। बोला-मुझे डिग्री इतनी प्यारी नहीं है कि उसके लिए ससुराल को रोटियां तोड़ू, अगर मैं अपने परिश्रम से धनोपार्जन करके पढ़ सकूँगा, तो पढूंगा, नहीं कोई धंधा देखूगा। मैं अब तक व्यर्थ ही शिक्षा के मोह में पड़ा हुआ था। कॉलेज के बाहर भी अध्ययनशील आदमी बहुत-कुछ सीख सकता है। मैं अभिमान नहीं करता; लेकिन साहित्य और इतिहास की जितनी पुस्तकें इन दो-तीन सालों में मैंने पढ़ी हैं, शायद ही मेरे कॉलेज में किसी ने पढ़ी हों ।

सुखदा ने इस अप्रिय विषय का अंत करने के लिए कहा - अच्छा, नाश्ता तो कर लो। आज तो तुम्हारी मीटिंग है। नौ बजे के पहले क्यों लौटने लगे? मैं तो टाकीज में जाऊंगी! अगर तुम ले चलो, तो मैं तुम्हारे साथ चलने को तैयार हूं।

अमर ने रूखेपन से कहा- मुझे टाकीज जाने की फुरसत नहीं है। तुम जा सकती हो।

"फिल्मों से भी बहुत-कुछ लाभ उठाया जा सकता है।"

"तो मैं तुम्हें मना तो नहीं करता।"

"तुम क्यों नहीं चलते?"

"जो आदमी कुछ उपार्जन न करता हो, उसे सिनेमा देखने का अधिकार नहीं। मैं