गबन/भाग 37

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प्रेमचंद रचनावली ५  (1936) 
द्वारा प्रेमचंद

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'कुछ नहीं, यों ही चला आया था। इस बंगले वाले आदमी क्या हुए?'

जंगली ने इधर-उधर देखकर कनबतियों में कहा-इसमें वही मुखबर टिका हुआ था। आज सब चले गए। सुनते हैं, पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, जब फिर हाइकोर्ट में मुकदमा पेस होगा। पढ़े-लिखे आदमी भी ऐसे दगाबाज होते हैं, दादा! सरासर झूठी गवाही दी। न जाने इसके बाल-बच्चे हैं या नहीं, भगवान् को भी नहीं डरा!

जालपा वहीं खड़ी थी। देवीदीन ने जंगली को और जहर उगलने का अवसर न दिया। बोला-तो पंद्रह-बीस दिन में आएंगे, खूब मालूम है?

जंगली-हां, वही पहरे वाले कह रहे थे।

'कुछ मालूम हुआ, कहां गए हैं?'

'वही मौका देखने गए हैं जहां वारदात हुई थी।'

देवीदीन चिलम पीने लगा और जालपा सड़क पर आकर टहलने लगी। रमा की यह निंदा सुनकर उसका हृदय टुकड़े-टुकड़े हुआ जाता था। उसे रमा पर क्रोध न आया, ग्लानि न आई, उसे हाथों का सहारा देकर इस दलदल से निकालने के लिए उसका मन विकल हो उठा। रमा चाहे उसे दुत्कार ही क्यों न दे, उसे ठुकरा ही क्यों न दे, वह उसे अपयश के अंधेरे खड्ड में न गिरने देगी।

जब दोनों यहां से चले तो जालपा ने पूछा-इस आदमी से कह दिया न कि जब वह आ जायं तो हमें खबर दे दे?

'हां, कह दिया।'

सैंतीस

एक महीना गुजर गया। गोपीनाथ पहले तो कई दिन कलकत्ते की सैर करता रहा, मगर चार-पांच दिन में ही यहां से उसका जी ऐसा उचाट हुआ कि घर की रट लगानी शुरू की। आखिर जालपा ने उसे लौटा देना ही अच्छा समझा। यहां तो वह छिप-छिप कर रोया करता था।

जालपा कई बार रमा के बंगले तक हो आई। वह जानती थी कि अभी रमा नहीं आए हैं। फिर भी वहां का एक चक्कर लगा आने में उसको एक विचित्र संतोष होता था।

जालपा कुछ पढ़ते-पढ़ते या लेटे-लेटे थक जाती, तो एक क्षण के लिए खिड़की के सामने आ खड़ी होती थी। एक दिन शाम को वह खिड़की के सामने आई, तो सड़क पर मोटरों की एक कतार नजर आई। कौतूहल हुआ, इतनी मोटरें कहां जा रही हैं! गौर से देखने लगी। छः मोटरें थीं। उनमें पुलिस के अफसर बैठे हुए थे। एक में सबसपाही थे। आखिरी मोटर पर जब उसकी निगाह पड़ी तो,मानो उसके सारे शरीर में बिजली की लहर दौड़ गई। वह ऐसी तन्मय हुई कि खिड़की से जीने तक दौड़ी आई, मानो मोटर को रोक लेना चाहती हो; पर इसी एक पल में उसे मालूम हो गया कि मेरे नीचे उतरते-उतरते मोटरें निकल जाएंगी। वह फिर खिड़की के सामने आयी। रमा अब बिल्कुल सामने आ गया था। उसकी आंखें खिड़की की ओर लगी हुई [ १७२ ]
थीं। जालपा ने इशारे से कुछ कहना चाहा; पर संकोच ने रोक दिया। ऐसा मालूम हुआ कि रमा की मोटर कुछ धीभी हो गई है। देवीदीन की आवाज भी सुनाई दी, मगर मोटर रुकी नहीं। एक ही क्षण में वह आगे बढ़ गई, पर रमा अब भी रह-रहकर खिड़की की ओर ताकता जाता था।

जालपा ने जीने पर आकर कहा-दादा !

देवीदीन ने सामने आकर कहा–भैया आ गए ! वह क्या मोटर जा रही है।

यह कहता हुआ वह ऊपर आ गया। जालपा ने उत्सुकता को संकोच से दबाते हुए कहा—तुमसे कुछ कहा?

देवीदीन-और क्या कहते, खाली राम-राम की। मैंने कुसल पूछी। हाथ से दिलासा देते चले गए। तुमने देखा कि नहीं?

जालपा ने सिर झुकाकर कहा-देखा क्यों नहीं? खिड़की पर जरा खड़ी थी।

'उन्होंने भी तुम्हें देखा होगा?' ।

'खिड़की की ओर ताकते तो थे।'

‘बहुत चकराएं होंगे कि यह कौन है।'

‘कुछ मालूम हुआ मुकदमा कब पेश होगा?

‘कल ही तो।'

'कल ही इतनी जल्दी तब तो जो कुछ करना है आज ही करना होगा। किसी तरह मेरा खत उन्हें मिल जाता, तो काम बन जाता।'

देवीदीन ने इस तरह ताका मानो कह रहा है, तुम इस काम को जितना आसान समझती हो उतना आसान नहीं है।

जालपा ने उसके मन का भाव तोड़कर कहा-क्या तुम्हें संदेह है कि वह अपना बयान बदलने पर राजी होंगे?

देवीदीन को अब इसे स्वीकार करने के सिवा और कोई उपाय न सूझा। बोला-हां, बहूजी, मुझे इसका बहुत अंदेसा है। और सच पूछो तो है भी जोखिम। अगर वह बयान बदल भी दें, तो पुलिस के पंजे से नहीं छूट सकते। वह कोई दूसरा इल्जाम लगा कर उन्हें पकड़ लेगी और फिर नया मुकदमा चलायेगी।

जालपा ने ऐसी नजरों से देखा, मानो वह इस बात से जरा भी नहीं डरती। फिर बोली-दादा, मैं उन्हें पुलिस के पंजे से बचाने का ठेका नहीं लेती। मैं केवल यह चाहती हूं कि हो सके तो अपयश से उन्हें बचा लें। उनके हाथों इतने घरों की बरबादी होते नहीं देख सकती। अगर वह सचमुच डकैतियों में शरीक होते, तब भी मैं यही चाहती की वह अंत तक अपने साथियों के साथ रहें और जो सिर पर पड़े उसे खुशी से झेलें। मैं यह कभी न पसंद करती कि वह दूसरों को दगा देकर मुखबिर बन जायं, लेकिन यह मामला तो बिल्कुल झूठ है। मैं यह किसी तरह नहीं बरदाश्त कर सकती कि वह अपने स्वार्थ के लिए झूठी गवाही दें। अगर उन्होंने खुद अपना बयान न बदला, तो मैं अदालत में जाकर सारा कच्चा चिट्ठा खोल दूगी, चाहे नतीजा कुछ भी हो। वह हमेशा के लिए मुझे त्याग दें, मेरी सूरत न देखें, यह मंजूर है, पर यह नहीं हो सकता कि वह इतना बड़ा कलंक माथे पर लगावें। मैंने अपने पत्र में सब लिख दिया है। [ १७३ ]देवीदीन ने उसे आदर की दृष्टि से देखकर कहा-तुम सब कर लोगी बहू, अब मुझे विश्वास हो गया। जब तुमने कलेजा इतना मजबूत कर लिया है, तो तुम सब कुछ कर सकती हो।

'तो यहां से नौ बजे चलें?"

'हां, मैं तैयार हूं।'

अड़तीस



वह रमानाथ, जो पुलिस के भय से बाहर न निकलता था, जो देवीदीन के घर में चोरों की तरह पड़ा जिंदगी के दिन पूरे कर रहा था, आज दो महीनों से राजसी भोग-विलास में डूबा हुआ है। रहने को सुंदर सजा हुआ बंगला है, सेवा-टहल के लिए चौकीदारों का एक दल, सवारी के लिए मोटर। भोजन पकाने के लिए एक काश्मीरी बावरची है। बड़े-बड़े अफसर उसको मुंह ताका करते हैं। उसके मुंह से बात निकली नहीं कि पूरी हुई । इतने ही दिनों में उसके मिजाज में इतनी नफासत आ गई है, मानो वह खानदानी रईस हो। विलास ने उसकी विवेक-बुद्धि को सम्मोहित-सा कर दिया है। उसे कभी इसका खयाल भी नहीं आता कि मैं क्या कर रहा हूं और मेरे हाथों कितने बेगुनाहों का खून हो रहा है। उसे एकांत-विचार का अवसर ही नहीं दिया जाता। रात को वह अधिकारियों के साथ सिनेमा या थिएटर देखने जाता है, शाम को मोटरों की सैर होती है। मनोरंजन के नित्य नए सामान होते रहते हैं। जिस दिन अभियुक्तों को मजिस्ट्रेट ने सेशन सुपुर्द किया, सबसे ज्यादा खुशी उसी को हुई। उसे अपना सौभाग्य-सूर्य उदय होता हुआ मालूम होता था।

पुलिस को मालूम था कि सेशन जज के इजलास में यह बहार न होगी। संयोग से जज हिन्दुस्तानी थे और निष्पक्षता के लिए बदनाम। पुलिस हो या चोर, उनकी निगाह में बराबर था। वह किसी के साथ रू-रिआयत न करते थे। इसलिए पुलिस ने रमा को एक बार उन स्थानों की सैर कराना जरूरी समझा, जहां वारदातें हुई थीं। एक जमींदार की सजी-सजाई कोठी में डेरा पड़ा। दिन-भर लोग शिकार खेलते, रात को ग्रामोफोन सुनते, ताश खेलते और बजरों पर नदियों की सैर करते। ऐसा जान पड़ता था कि कोई राजकुमार शिकार खेलने निकला है।

इस भोग-विलास में रमा को अगर कोई अभिलाषा थी, तो यह कि जालपा भी यहां होती। जब तक वह पराश्रित था, दरिद्र था, उसकी विलासेंद्रियां मानो मूर्च्छित हो रही थीं। इन शीतल झोंकों ने उन्हें फिर सचेत कर दिया। वह इस कल्पना में मग्न था कि यह मुकदमा खत्म होते ही उसे अच्छी जगह मिल जायगी। तब वह जाकर जालपा को मना लावेगा और आनंद से जीवन-सुख भोगेगा। हां, वह नए प्रकार का जीवन होगा, उसकी मर्यादा कुछ और होगी,सिद्धांत कुछ और होंगे। उसमें कठोर संयम होगा और पक्का नियंत्रण । अब उसके जीवन को कुछ उद्देश्य होगा,कुछ आदर्श होगा। केवल खाना, सोना और रुपये के लिए हाय-हाय करना ही जीवन का व्यापार न होगा। इसी मुकदमे के साथ इस मार्ग-हीन जीवन का अंत हो जायगा।

[ १७४ ]दुर्बल इच्छा ने उसे यह दिन दिखाया था और अब एक नए और संस्कृत जीवन का स्वप्न दिखा रही थी। शराबियों की तरह ऐसे मनुष्य रोज ही संकल्प करते हैं, लेकिन उन संकल्प का अंत क्या होता है। नए-नए प्रलोभन सामने आते रहते हैं और संकल्प की अवधि भी बढ़ती चली आती है। नए प्रभात का उदय कभी नहीं होता।

एक महीना देहात की सैर के बाद रमा पुलिस के सहयोगियों के साथ अपने बंगले पर जा रहा था। रास्ता देवीदीन के घर के सामने से था; कुछ दूर ही से उसे अपना कमरा दिखाई दिया। अनायास ही उसकी निगाह ऊपर उठ गई। खिड़की के सामने कोई खड़ा था। इस वक्त देवीदीन वहां क्या कर रहा है? उसने जरा ध्यान से देखा। यह तो कोई औरत है!मगर औरत कहां से आई? क्यों देवीदीन ने वह कमरा किराए पर तो नहीं उठा दिया? ऐसा तो उसने कभी नहीं किया।

मोटर जरा और समीप आई तो उस औरत का चेहरा साफ नजर आने लगा। रमा चौंक पड़ा। यह तो जालपा है ! बेशक जालपा है ! मगर नहीं, जालपा यहां कैसे आयगी? मेरा पता-ठिकाना उसे कहां मालूम ! कहीं बुढ्ढे ने उसे खत तो नहीं लिख दिया? जालपा ही है। नायब दारोगा मोटर चला रही थी। रमा ने बड़ी मित्रता के साथ कहा-सरदार साहब, एक मिनट के लिए रुक जाइए। मैं जरा देवीदीन से एक बात कर लूं। नायब ने मोटर जरा धीमी कर दी, लेकिन फिर कुछ सोचकर उसे आगे बढ़ा दिया।

रमा ने तेज होकर कहा-आप तो मुझे कैदी बनाए हुए हैं।

नायब ने खिसियाकर कहा-आप तो जानते हैं, डिप्टी साहब कितनी जल्द जामे से बाहर हो जाते हैं।

बंगले पर पहुंचकर रमा सोचने लगा, जालपा से कैसे मिलें। वहां जालपा ही थी, इसमें अब उसे कोई शुबहा न था। आंखों को कैसे धोखा देता। हृदय में एक ज्वाला-सी उठी हुई थी,क्या करूं? कैसे जाऊं? उसे कपड़े उतारने की सुधि भी न रही। पंद्रह मिनट तक वह कमरे के द्वार पर खड़ा रहा। कोई हिकमत न सूझी। लाचार पलंग पर लेटा रहा।

जरा ही देर में वह फिर उठा और सामने सहन में निकल आया। सड़क पर उसी वक्त बिजली रोशन हो गई। फाटक पर चौकीदार खड़ा था। रमा को उस पर इस समय इतना क्रोध आया, कि गोली मार दे। अगर मुझे कोई अच्छी जगह मिल गई, तो एक-एक से समझेंगा। तुम्हें तो डिसमिस कराके छोडूंगा। कैसा शैतान की तरह सिर पर सवार है। मुंह तो देखो जरा। मालूम होता है बकरी की दुम है। वाह रे आपकी पगड़ी। कोई टेकरी होने वाली कुली है। अभी कुत्ता भूंक पड़े, तो आप दुम दबाकर भागेंगे; मगर यहां ऐसे डटे खड़े हैं मनो किसी किले के द्वार की रक्षा कर रहे हैं।

एक चौकीदार ने आकर कहा-इसपिट्टर साहब ने बुलाया है। कुछ नए तवे मंगवाए हैं।

रमा ने झल्लाकर कह—मुझे इस वक्त फुरसत नहीं है।

फिर सोचने लगा। जालपा यहां कैसे आई? अकेले ही आई है या और कोई साथ है? जालिम ने बुड्ढे से एक मिनट भी बात नहीं करने दिया। जालपा पूछेगी तो जरूर, कि क्यों भागे थे। साफ-साफ कह दूंगा, उस समय और कर ही क्या सकता था। पर इन थोड़े दिनों के कष्ट ने [ १७५ ]
जीवन का प्रश्न तो हल कर दिया। अब आनंद से जिंदगी कटेगी। कोशिश करके उसी तरफ अपना तबादला करवा लूंगा। यह सोचते-सोचते रमा को खयाल आया कि जालपा भी यहां मेरे साथ रहे, तो क्या हरज है। बाहर वालों से मिलने की रोक-टोक है। जालपा के लिए क्या रुकावट हो सकती है। लेकिन इस वक्त इस प्रश्न को छेड़ना उचित नहीं। कल इसे तय करूंगा। देवीदीन भी विचित्र जीव है। पहले तो कई बार आया, पर आज उसने भी सन्नाय खींच लिया। कम-से-कम इतना तो हो सकता था कि आकर पहरे वाले कांस्टेबल से जालपा के आने की खबर मुझे देता। फिर मैं देखता कि कौन जालपा को नहीं आने देता। पहले इस तरह की कैद जरूरी थी; पर अब तो मेरी परीक्षा पूरी हो चुकी। शायद सब लोग खुशी से राजी हो जाएंगे।

रसोइया थाली लाया। मांस एक ही तरह का था। रमा थाली देखते ही झल्ला गया। इन दिनों रुचिकर भोजन देखकर ही उसे भूख लगती थी। जब तक चार-पांच प्रकार का मांस न हो,चटनी-अचार न हो, उसकी तृप्ति न होती थी।

बिगड़कर बोला-क्या खाऊं तुम्हारा सिर? थाली उठा ले जाओ।

रसोइए ने डरते-डरते कहा- हुजूर,इतनी जल्द और चीजें कैसे बनाता । अभी कुल दो घंटे तो आए हुए हैं।

'दो घंटे तुम्हारे लिए थोड़े होते हैं।'

'अब हुजूर से क्या कहूं।"

'मत बको।'

'हुजूर'

‘मत बको ? डैम ।'

रसोइए ने फिर कुछ न कहा। बोतल लाया,बर्फ तोड़कर ग्लास में डाली और पीछे हटकर खड़ा हो गया।

रमा को इतना क्रोध आ रहा था कि रसोइए को नोंच खाए। उसका मिजाज इन दिनों बहुत तेज हो गया था।

शराब का दौर शुरू हुआ,तो रमा का गुस्सा और भी तेज हुआ। लाल-लाल आंखों से देखकर बोला-चाहूं तो अभी तुम्हारा कान पकड़कर निकाल दें। अभी, इसी दम । तुमने समझा क्या है।

उसका क्रोध बढ़ता देखकर रसोइया चुपके-से सरक गया। रमा ने ग्ला लिया और दो-चार लुकमे खाकर बाहर सहन में टहलने लगा। यही धुन सवार थी, कैसे यहां से निकल जाऊं।

एकाएक उसे ऐसा जान पड़ा कि तार के बाहर वृक्षों की आड़ में कोई है। हां,कोई खड़ा उसकी तरफ ताक रहा है। शायद इशारे से अपनी तरफ बुन्ग रहा है। रमानाथ का दिल धकड़ने लगा। कहीं षड्यंत्रकारियों ने उसके प्राण लेने की तो नहीं ठानी है। यह शंका उसे सदैव बनी रहती थी। इसी खयाल से वह रात को बंगले के बाहर बहुत कम निकलता था। आत्म-रक्षा के भाव ने उसे अंदर चले जाने की प्रेरणा की। उसी वक्त एक भोटर सड़क पर निकली। उसके प्रकाश में रमा ने देखा, वह अंधेरी छाया स्त्री है। उसकी साड़ी साफ नजर आ रही है। फिर उसे ऐसा मालूम हुआ कि वह स्त्री उसकी ओर आ रही है। उसे फिर शंका हुई, कोई मर्द यह वेश [ १७६ ]
बदलकर मेरे साथ छल तो नहीं कर रहा है। वह ज्यों-ज्यों पीछे हटता गया, वह छाया उसकी ओर बढ़ती गई,यहां तक कि तार के पास आकर उसने कोई चीज रमा की तरफ फेंकी। रमा चीख मारकर पीछे हट गया; मगर वह केवल एक लिफाफा था। उसे कुछ तस्कीन हुई। उसने फिर जो सामने देखा,तो वह छाया अंधकार में विलीन हो गई थी। रमा ने लपककर वह लिफाफा उठा लिया। भय भी था और कौतूहल भी। भय कम था,कौतूहल अधिक। लिफाफे को हाथ में लेकर देखने लगा। सिरनामा देखते ही उसके हृदय में फुरहरियां-सी उड़ने लगीं। लिखावट जालपा की थी। उसने फौरन लिफाफा खोला। जालपा ही की लिखावट थी। उसने एक ही सांस में पत्र पढ़ डाला और तब एक लंबी सांस ली। उसी सांस के साथ चिंता का वह भीषण भार जिसने आज छ: महीने से उसकी आत्मा को दबाकर रखा था,वह सारी मनोव्यथा जो उसका जीवन-रक्त चूस रही थी,वह सारी दुर्बलता, लज्जा,ग्लानि मानो उड़ गई, छूमंतर हो गई। इतनी स्फूर्ति, इतना गर्व, इतना आत्म-विश्वास उसे कभी न हुआ था। पहली सनक यह सवार हुई, अभी चलकर दारोगा से कह दूं, मुझे इस मुकदमे से कोई सरोकार नहीं है,लेकिन फिर खयाल आयी,बयान तो अब हो ही चुका,जितना अपयश मिलना था,मिल ही चुका,अब उसके फल से क्यों हाथ धोऊ। मगर इन सबों ने मुझे कैसा चकमा दिया है और अभी तक मुगालते में डाले हुए हैं। सब-के-सब मेरी दोस्ती का दम भरते हैं,मगर अभी तक असली बात मुझसे छिपाए हुए हैं। अब भी इन्हें मुझ पर विश्वास नहीं। अभी इसी बात पर अपना बयान बदल दें, तो आटे-दाल का भाव मालूम हो। यही न होगा, मुझे कोई जगह न मिलेगी। बला से, इन लोगों के मनसूबे तो खाक में मिल जाएंगे। इस दगाबाजी की सजा हो मिल जायगी। और, यह कुछ न सही, इतनी बड़ी बदनामी से तो कुछ जाऊंगा। यह सब शरारत जरूर करेंगे, लेकिन झूठा इल्जाम लगाने के सिवा और कर ही क्या सकते हैं। जब मेरा यहा रहना साबित ही नहीं तो मुझ पर दोष ही क्या लग सकती हैं। सके मुंह में कालिख लग जायगी। मुंह तो दिखाया न जाएगा मुकदमा क्या चलाएंगे।

मगर नहीं, इन्होंने मुझसे चाल चली है, तो मैं भी इनसे वही चाल चलूं। कह दूंगा,अगर मुझे आज कोई अच्छी जगह मिल जाएगी, तो मैं शहादत दंगा,वरना साफ कह देगा,इस मामले से मेरा कोई संबंध नहीं। नहीं तो पीछे से किसी छोटे-मोटे थाने में नायब दारोगा बनाकर भेज दें और वहां सड़ा करू लुंग्गा इंस्पेक्टरी और कल दस बजे मेरे पास नियुक्ति का परवाना आ जाना चाहिए। वह चला कि इसी वक्त दारोगा से कह दूं, लेकिन फिर रुक गया। एक बार जालपा से मिलने के लिए उसके प्राण तड़प रहे थे। उसके प्रति इतना अनुराग, इसनी श्रद्धा उसे कमी न हुई थी, मानो वह कोई दैवी-शक्ति हो जिसे देवताओं ने उसकी रक्षा के लिए भेजा हो।

दस बज गए थे। रमानाथ ने बिजली गुल कर दी और बरामदे में आकर जोर से किवाड़ बंद कर दिए, जिसमें पहरे वाले सिपाही को मालूम हो, अंदर से किवाड़ बंद करके सो रहे हैं। वह अंधेरे बरामदे में एक मिनट खड़ा रहा। तब आहिस्ता से उतरा और कांटेदार फेंसिंग के पास आकर सोचने लगी, उस पार कैसे जाऊ? शायद् अभी जालपा बगीचे में हो। देवीदीन जरूर उसके साथ होगा। केवल यही तार उसकी राह रोके हुए था। उसे फांद जाना असंभव था। उसने तारों के बीच से लेकर निकल जाने का निश्चय किया। अपने सब कपले समेट लिए और कांटों [ १७७ ]
को बचाता हुआ सिर और कंधे को तार के बीच में डाला; पर न जाने कैसे कपड़े फंस गए। उसने हाथ से कपड़ों को छुड़ाना चाहा, तो आस्तीन कांटों में फंस गई। धोती भी उलझी हुई थी। बेचारा बड़े सकंट में पड़ा। न इस पार जा सकता था, न उस पार। जरा भी असावधानी हुई और कांटे उसकी देह में चुभ जाएंगे।

मगर इस वक्त उसे कपड़ों की परवा न थी। उसने गर्दन और आगे बढ़ाई और कपड़ों में लंबा चीरा लगाती उस पार निकल गया। सारे कपड़े तार-तार हो गए। पीठ में भी कुछ खरोंचे लगे; पर इस समय कोई बंदूक का निशाना बांधकर भी उसके सामने खड़ा हो जाता, तो भी वह पीछे न हटता। फटे हुए कुरते को उसने वहीं फेंक दिया; गले की चादर फट जाने पर भी काम दे सकती थी, उसे उसने ओढ़ लिया, धोती समेट ली और बगीचे में घूमने लगा। सन्नाटा था। शायद रखवाला खटिक खाना खाने गया हुआ था। उसने दो-तीन बार धीरे-धीरे जालपा का नाम लेकर पुकारा भी किसी की आहट न मिली;पर निराशा होने पर भी मोह ने उसका गला न छोड़ा। उसने एक पेड़ के नीचे जाकर देखा। समझ गया,जालपा चली गई। वह उन्हीं पैरों देवीदीन के घर की ओर चला। उसे जरा भी शोक न था। बला से किसी को मालूम हो जाय कि मैं बंगले से निकल आया हूं, पुलिस मेरा कर ही क्या सकती है। मैं कैदी नहीं हूं, गुलामी नहीं लिखाई है।

आधी रात हो गई थी। देवीदीन भी आध घंटा पहले लौटा था और खाना खाने जा रहा था कि एक नंगे- धड़गे आदमी को देखकर चौंक पड़ा। रमा ने चादर सिर पर बांध ली थी और देवीदीन को डराना चाहता था।

देवीदीन ने सशंक होकर कहा-कौन है?

सहसा पहचान गया और झपटकर उसकी हाथ पकड़ता हुआ बोला-तुमने तो भैया खूब भेस बनाया है? कपड़े क्या हुए? ।

रमानाथ-तार से निकल रहा था। सब उसके कांटों में उलझकर फट गए।

देवीदीन-राम राम । देह में तो कांटे नहीं चुभे?

रमानाथ-कुछ नहीं,दो-एक खरोंचे लग गए। मैं बहुत बचाकर निकला।

देवीदीन-बहू की चिट्ठी मिल गई न?

रमानाथ-हां,उसी वक्त मिल गई थी। क्या वह भी तुम्हारे साथ थी?

देवीदीन-वह मेरे साथ नहीं थीं,मैं उनके साथ था। जब से तुम्हें मोटर पर आते देखा,तभी से जाने-जाने लगाए हुए थीं।

रमानाथ–तुमने कोई खत लिखा था?

देवीदीन—मैंने कोई खत-पत्तर नहीं लिखा भैया!वह आईं तो मुझे आप हो अचंभा हुआ कि बिना जाने-बुझे कैसे आ गईं। पीछे से उन्होंने बताया। वह सतरंजे वाला नकसा उन्हीं ने पराग से भेजा था और इनाम भी वहीं से आया था।

रमा की आंखें फैल गई। जालपा की चतुराई ने उसे विस्मय में डाल दिया। इसके साथ ही पराजय के भाव ने उसे कुछ खिन्न कर दिया। यहां भी उसकी हार हुई। इस बुरी तरह !

बुढ़िया ऊपर गई हुई थी। देवीदीन ने जीने के पास जाकर कहा-अरे क्या करती है? बहू [ १७८ ]
से कह दे। एक आदमी उनसे मिलने आया ।

यह कहकर देवीदीन ने फिर रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला-चलो, अब सरकारमें तुम्हारी पेसी होगी। बहुत भागे थे। बिना वारंट के पकड़े गए। इतनी आसानी से पुलिस भी न पकड़ सकती।

रमा का मनोल्लास द्रवित हो गया था। लज्जा से गड़ा जाता था। जालपा के प्रश्नों का उसके पास क्या जवाब था। जिस भय से वह भागा था, उसने अंत में उसका पीछा करके उसेपरास्त ही कर दिया। वह जालपा के सामने सीधी आंखें भी तो न कर सकता था। उसने हाथछुड़ा लिया और जीने के पास ठिठक गया।

देवीदीन ने पूछा-क्यों रुक गए?

रमा ने सिर खुजलाते हुए कहा-चलो, मैं आता हूं।

बुढ़िया ने ऊपर ही से कहा-पूछो, कौन आदमी है, कहां से आया है?

देवीदीन ने विनोद किया-कहता है, मैं जो कुछ कहूंगा, बहू से ही कहूंगा।

'कोई चिठी लाया है?'

'नहीं।

सन्नाटा हो गया। देवीदीन ने एक क्षण के बाद पूछा-कह दूं, लौट जाय?

जालपा जीने पर आकर बोली-कौन आदमी है, पूछती तो हूं।

'कहता है, बड़ी दूर से आया हूं।'

'है कहां?'

'यह क्या खड़ा है।'

"अच्छा, बुला लो।

रमा चादर ओढ़े, कुछ झिझकता, कुछ झेंपता, कुछ डरता, जीने पर चढ़ा। जालपा ने उसेदेखते ही पहचान लिया। तुरंत दो कदम पीछे हट गई। देवीदीन वहां न होता तो वह दो कदम और आगे बढ़ी होती।

उसकी आंखों में कभी इतना नशा न था, अंगों में कभी इतनी चपलता न थी, कपोलकभी इतने न दमके थे, हृदय में कभी इतना मृदु कंपन न हुआ था। आज उसकी तपस्या सफल हुई।

उनतालीस

वियोगियों के मिलन की रात बटोहियों के पड़ाव की रात है, जो बातों में कट जाती है। रमा औरजालपा, दोनों ही को अपनी छ: महीने की कथा कहनी थी। रमा ने अपना गौरव बढ़ाने के लिए अपने कष्टों को खूब बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया। जालपा ने अपनी कथा में कष्टों की चर्चा तक न आने दी। वह डरती थी इन्हें दुःख होगा, लेकिन रमा को उसे रुलाने में विशेष आनंद आ रहा था। वह क्यों भागा, किसलिए भागा, कैसे भागा, यह सारी गाथा उसने करुण शब्दों में कही और जालपा ने सिसक-सिसककर सुनी। वह अपनी बातों से उसे प्रभावित करना चाहता था। [ १७९ ]अब तक सभी बातों में उसे परास्त होना पड़ा था। जो बात उसे असूझ मालूम हुई, उसे जालपा ने चुटकियों में पूरा कर दिखाया। शतरंज वाली बात को वह खूब नमक-मिर्च लगाकर बयान कर सकता था; लेकिन वहां भी जालपा ही ने नीचा दिखाया। फिर उसकी कीर्ति-लालसा को इसके सिवा और क्या उपाय था कि अपने कष्टों की राई को पर्वत बनाकर दिखाए।

जालपा ने सिसककर कहा-तुमने यह सारी आफतें झेली, पर हमें एक पत्र तक न लिखा। क्यों लिखते, हमसे नाता ही क्या था ! मुंह देखे की प्रीति थी ! आंख ओट पहाड़ ओट।

रमा ने हसरत से कहा-यह बात नहीं थी जालपा, दिल पर जो कुछ गुजरती थी दिल ही जानता है, लेकिन लिखने का मुंह भी तो हो। जब मुंह छिपाकर घर से भाग्म,तो अपनी विपत्ति-कथा क्या लिखने बैठता ! मैंने तो सोच लिया था, जब तक खूब रुपये न कमा लेगा, एक शब्द भी न लिखेगा।

जालपा ने आंसू-भरी आंखों में व्यंग्य भरकी कहा–ठीक ही था, रुपये आदमी से ज्यादा प्यारे होते ही हैं ! हम तो रुपये के यार हैं, तुम चाहे चोरी करो, डाका मारो, जाली नोट बनाओ, झूठी गवाही दो या भीख मांगो,किसी उपाय से रुपये लाओ। तुमने हमारे स्वभाव को कितना ठीक समझा है, के वाह ! गोसाईं जी भी तो कह गए हैं-स्वारथ लाइ करहिं सब प्रीतिः ।

रमा ने झेंपते हुए कहा-नहीं-नहीं प्रिये, यह बात न थी। मैं यही सोचता था कि इन फटे-हालों जाऊंगा कैसे। सच कहता हूं, मुझे सबसे ज्यादा डर तुम्हीं से लगता था। सोचता था, तुम मुझे कितना कपटी, झूठा, कायर समझ रही होगी। शायद मेरे मन में यह पाया था कि रुपये की थैली देखकर तुम्हारी हदय कुछ तो नर्म होगा।

जालपा ने व्यथित कंठ से कहा- मैं शायद उस थैली को हाथ से छूती भी नहीं। आज मालूम हो गया, तुम मुझे कितनी नीच, कितनी स्वार्थिनी, कितनी लोभिन समझते हो! इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, सरासर मेरा दोष है। अगर मैं भली होती, तो अन यह दिन ही क्यों आता। जो पुरुष तीस-चालीस रुपये का नौकर हो, उसकी स्त्री अगर दो-चार रुपये रोज खर्च करे, हजार-दो हजार के गहने पहनने की नीयत रक्खे, तो वह अपनी और उसकी तबाही का सामान कर रही है। अगर तुमने मुझे इतना धनलोलुप समझा, तो कोई अन्याय नहीं किया। मगर एक बार जिस आग में जल चुकी, उसमें फिर न कूदेंगी। इन महीनों में मैंने उन पापों का कुछ प्रायश्चित किया है और शेष जीवन के अंत समय तक करूंगी। यह मैं नहीं कहती कि भोग-विलास से मेरा जी भर गया, या गहने-कपड़े से मैं ऊब गई, या सैर-तमाशे से मुझे घृणा हो गई। यह सब अभिलाषाएं ज्यों की त्यों है। अगर तुम अपने पुरुषार्थ से, अपने परिश्रम से, अपने सदुद्योग से उन्हें पूरा कर सको तो क्या कहना; लेकिन नीयत खोटी करके, आत्मा को कलुषित करके एक लाख भी लाओ, तो मैं उसे ठुकरा दूंगी। जिस · क्त मुझे मालूम हुआ कि तुम पुलिस के गवाह बन गए हो, मुझे इतना दुःख हुआ कि मैं उसी वक्त दादा को साथ लेकर तुम्हारे बंगले तक गई; मगर उसी दिन तुम बाहर चले गए थे और आज लौटे हो। मैं इतने आदमियों का खून अपनी गर्दन पर नहीं लेना चाहती। तुम अदालत में साफ-साफ कह दो कि मैंने पुलिस के चकमे में आकर गवाही दी थी. मेरा इस मुआमले से कोई संबंध नहीं है।

रमा ने चिंतित होकर कहा--जब से तुम्हारा खत मिला, तभी से मैं इस प्रश्न पर विचार [ १८० ]
कर रहा हूं, लेकिन समझ में नहीं आता क्या करू। एक बात कहकर मुकर जाने का साहस मुझमें नहीं है।

'बयान तो बदलना ही पड़ेगा।'

‘आखिर कैसे?'

‘मुश्किल क्या है। जब तुम्हें मालूम हो गया कि म्युनिसिपैलिटी तुम्हारे ऊपर कोई मुकदमा नहीं चला सकती, तो फिर किस बात का डर ?'

'डर न हो, झेंप भी तो कोई चीज है। जिस मुंह से एक बात कही, उसी मुंह से मुकर जाऊ, यह तो मुझसे न होगा। फिर मुझे कोई अच्छी जगह मिल जाएगी। आराम से जिंदगी बसर होगी। मुझमें गली-गली ठोकर खाने का बूता नहीं है।

जालपा ने कोई जवाब न दिया। वह सोच रही थी, आदमी में स्वार्थ की मात्रा कितनी अधिक होती है।

रमा ने फिर धृष्टता से कहा-और कुछ मेरी ही गवाही पर तो सारा फैसला नहीं हुआ जाता। मैं बदल भी जाऊं, तो पुलिस कोई दूसरा आदमी खड़ा कर देगी। अपराधियों की जान तो किसी तरह नहीं बच सकती। हां, मैं मुफ्त में मारा जाऊंगा।

जालपा ने त्योरी चढ़ाकर कहा–कैसी बेशर्मी की बातें करते हो जी क्या तुम इतने गए बीते हो कि अपनी रोटियों के लिए दूसरों का गला काटो। मैं इसे नहीं सह सकती। मुझे मजदूरी करना, भूखों मर जाना मंजूर है, बड़ी-से-बड़ी विपत्ति जो संसार में है, वह सिर पर ले सकती हूं, लेकिन किसी का अनभल करके स्वर्ग का राज भी नहीं ले सकती।

रमा इस आदर्शवाद से चिढ़कर बोला-तो क्या तुम चाहती कि मैं वहां कुलीगीरी करूं?

जालपा नहीं, मैं यह नहीं चाहती, लेकिन अगर कुलीगीरी भी करनी पड़े तो यह खून से तर रोटियां खाने से कहीं बढ़कर है।

रमा ने शांत भाव से कहा-जालपा, तुम मुझे जितना नीच समझ रही हो, मैं उतना नीच नहीं हैं। बुरी बात सभी को बुरी लगती है। इसका दु:ख मुझे भी है कि मेरे हाथों इतने आदमियो का खून हो रहा है, लेकिन परिस्थिति ने मुझे लाचार कर दिया है। मुझमें अब ठोकरें खाने की शक्ति नहीं है। न मैं पुलिस से रार मोल ले सकता हूं। दुनिया में सभी थोड़े ही आदर्श पर चलते हैं। मुझे क्यों उस ऊंचाई पर चढ़ाना चाहती हो, जहां पहुंचने की शक्ति मुझमें नहीं है।

जालपा ने तीक्ष्ण स्वर में कहा—जिस आदमी में हत्या करने की शक्ति हो, उसमें हत्या न करने की शक्ति का न होना अचंभे की बात है। जिसमें दौड़ने की शक्ति हो, उसमें खड़े रहने की शक्ति न हो इसे कौन मानेगा। जब हम कोई काम करने की इच्छा करते हैं, तो शक्ति आप ही आप आ जाती है। तुम यह निश्चय कर लो कि तुम्हें बयान बदलना है, बस और बातें आप आ जायेगी। रमा सिर झुकाए हुए सुनता रहा।

जालपा ने और आवेश में आकर कहा–अगर तुम्हें यह पाप की खेती करनी है, तो मुझे आज ही यहां से विदा कर दो। मैं मुंह में कालिख लगाकर यहां से चली जाऊंगी और फिर तुम्हें दिक करने में आऊंगी। तुम आनंद से रहा। मैं अपना पेट मेहनत-मजूरी करके भर लेगी। अभी [ १८१ ]
प्रायश्चित पूरा नहीं हुआ है, इसीलिए यह दुर्बलता हमारे पीछे पड़ी हुई है। मैं देख रही हूं, यह हमारा सर्वनाश करके छोड़ेगी।

रमा के दिल पर कुछ चोट लगी। सिर खुजलाकर बोला-चाहता तो मैं भी हूं कि किसी तरह इस मुसीबत से जान बचे।।

‘तो बचाते क्यों नहीं। अगर तुम्हें कहते शर्म आती हो, तो मैं चलें। यही अच्छा होगा। मैं भी चली चलेंगी और तुम्हारे सुपरंडंट साहब से सारा वृत्तांत साफ-साफ कह दूंगी।'

रमा का सारा पसोपेश गायब हो गया। अपनी इतनी दुर्गति वह न कराना चाहता था कि उसकी स्त्री जाकर उसकी वकालत करे। बोला-तुम्हारे चलने की जरूरत नहीं है जालपा, मैं उन लोगों को समझा दूंगा।

जालपा ने जोर देकर कहा-साफ बताओ, अपना बयान बदलोगे या नहीं? रमा ने मानो कोने में दबकर कहा-कहता तो हूं, बदल दूंगा।

'मेरे कहने से या अपने दिल से?'

'तुम्हारे कहने से नहीं, अपने दिल से। मुझे खुद ही ऐसी बातों से घृणा है। सिर्फ जरा हिचक थी, वह तुमने निकाल दी।'

फिर और बातें होने लगीं। कैसे पता चला कि रमा ने रुपये उड़ा दिए हैं? रुपये अदा कैसे हो गए? और लोगों को गबन की खबर हुई या घर ही में दबकर रह गई? रतन पर क्या गुजरी? गोपी क्यों इतनी जल्द चला गया? दोनों कुछ पढ़ रहे हैं या उसी तरह आवारा फिरा करते हैं? आखिर में अम्मां और दादा का जिक्र आया। फिर जीवन के मनसुबे बांधे जाने लगे। जालपा ने कहा-घेरे चलकर रतन से थोड़ी-जमीन ले लें और आनंद से खेती-बारी करें। रमा ने कहा-कहीं उससे अच्छा है कि यहां चाय की दुकान खोलें। इस पर दोनों में मुबहसा हुआ। आखिर रमा को हार माननी पड़ी। यहां रहकर वह घर की देखभाल न कर सकता था, भाइयों को शिक्षा न दे सकता था और न माता-पिता का सेवा-सत्कार कर सकता था। उधर घरवालों के प्रति भी तो उसका कुछ कर्तव्य है। रमा निरुत्तर हो गया।

चालीस

रमा मुंह-अंधेरे अपने बंगले जा पहुंचा। किसी को कानों-कान खबर न हुई। | नाश्ता करके रमा ने खत साफ किया, कपड़े पहने और दारोगा के पास जा पहुंचा। त्योरियां चढ़ी हुई थीं। दारोगा ने पूछा-खैरियत तो है, नौकरों ने कोई शरारत तो नहीं की।

रमा ने खड़े-खड़े कहा–नौकरों ने नहीं, आपने शरारत की है, आपके मातहतों,अफसरों और सब ने मिलकर मुझे उल्लू बनाया है।

दारोगा ने कुछ घबड़ाकर पूछा-आखिर बात क्या है,कहिए तो? ।

रमानाथ–बात यही है कि इस मुआमले में अब कोई शहादत न दूंगा। उससे मेरा ताल्लुक नहीं। आप लोगों ने मेरे साथ चाल चली और वारंट की धमकी देकर मुझे शहादत देने पर मजबूर [ १८२ ]
किया। अब मुझे मालूम हो गया कि मेरे ऊपर कोई इल्जाम नहीं। आप लोगों को चकमा था। पुलिस की तरफ से शहादत नहीं देना चाहता, मैं आज जज साहब से साफ कह दूंगा। बेगुनाहों का खून अपनी गर्दन पर न लूंगा।

दारोगा ने तेज होकर कहा-आपने खुद गबन तस्लीम किया था।

रमानाथ-मीजान की गलती थी। गबन न था। म्युनिसिपैलिटी ने मुझ पर कोई मुकदमा नहीं चलाया। |'यह आपको मालूम कैसे हुआ?'

'इससे आपको कोई बहस नहीं। मैं शहादत न दूंगा। साफ-साफ कह दूंगा, पुलिस ने मुझे धोखा देकर शहादत दिलवाई है। जिन तारीखों का वह वाकया है, उन तारीखों में मैं इलाहाबाद में था। म्युनिसिपल आफिस में मेरी हाजिरी मौजूद है।'

दारोगा ने इस आपत्ति को हंसी में उड़ाने की चेष्टा करके कहा-अच्छा साहब, पुलिस ने घोखा ही दिया, लेकिन उसका खातिरख्वाह इनाम देने को भी तो हाजिर है। कोई अच्छी जगह मिल जाएगी, मोटर पर बैठे हुए सैर करोगे। खुफिया पुलिस में कोई जगह मिल गई, तो चैन ही चैन है। सरकार की नजरों में इज्जत और रुसूख कितना बढ़ गया, यों मारे-मारे फिरते। शायद किसी दफ्तर में क्लर्को मिल जाती, वह भी बड़ी मुश्किल से। यहां तो बैठे-बिठाए तरक्की का दरवाजा खुल गया। अच्छी तरह कारगुजारी होगी, तो एक दिन रायबहादुर मुंशी रमानाथ डिप्टी सुपरिंटेंडेंट हो जाओगे। तुम्हें हमारा एहसान मानना चाहिए और आप उल्टे खफा होते हैं।

रमा पर इस प्रलोभन का कुछ असर न हुआ। बोला-मुझे क्लर्क बनना मंजूर है, इस तरह की तरक्की नहीं चाहता। यह आप ही को मुबारक रहे।

इतने में डिप्टी साहब और इंस्पेक्टर भी आ पहुंचे। रमा को देखकर इंस्पेक्टर साहब ने फरमाया-हमारे बाबू साहब तो पहले ही से तैयार बैठे हैं। बस इसी की कारगुजारी पर वारान्यारा है। रमा ने इस भाव से कहा, मानो मैं भी अपना नफा-नुकसान समझता हूं-जी हां, आज वारी-न्यारा कर दूंगा। इतने दिनों तक आप लोगों के इशारे पर चला, अब अपनी आंखों से देखकर चलूंगा।

इंस्पेक्टर ने दारोगा का मुंह देखा, दारोगा ने डिप्टी का मुंह देखा, डिप्टी ने इंस्पेक्टर की मुंह देखा। यह कहता क्या है? इंस्पेक्टर साहब विस्मित होकर बोले-क्या बात है? हलफ से कहता हूं, आप कुछ नाराज मालूम होते हैं।

रमानाथ-मैंने फैसला किया है कि आज अपना बयान बदल दूंगा। बेगुनाहों का खून नहीं कर सकता।

इंस्पेक्टर ने दया-भाव से उसकी तरफ देखकर कहा-आप बेगुनाहों का खून नहीं कर रहे हैं, अपनी तकदीर की इमारत खड़ी कर रहे हैं। हलफ से कहता हूं, ऐसे मौके बहुत कम आदमियों को मिलते हैं। आज क्या बात हुई कि आप इतने खफा हो गए? आपको कुछ मालूम है, दारोगा साहब? आदमियों ने तो कोई शोखी नहीं की? अगर किसी ने आपके मिजाज के खिलाफ कोई काम किया हो, तो उसे गोली मार दीजिए, हलफ से कहता हूं। [ १८३ ]दारोगा-मैं अभी जाकर पता लगाता हूं।

रमानाथ-आप तकलीफ न करें। मुझे किसी से शिकायत नहीं है। मैं थोड़े से फायदे के लिए अपने ईमान का खून नहीं कर सकता।

एक मिनट सन्नाटा रहा। किसी को कोई बात न सूझी। दारोगा कोई दूसरा चकमा सोच रहे थे, इंस्पेक्टर कोई दूसरा प्रलोभन। डिप्टी एक दूसरी ही फिक्र में थी। रूखेपन से बोली-रमा बाबू, यह अच्छा बात न होगा।

रमा ने भी गर्म होकर कहा-आपके लिए न होगी। मेरे लिए तो सबसे अच्छी यही बात है।

डिप्टी-नहीं,आपका वास्ते इससे बुरा दोसरा बात नहीं है। हम तुमको छोड़ेगा नहीं, हमारा मुकदमा चाहे बिगड़ जाय; लेकिन हम तुमको ऐसा लेसन दे देगा कि तुम उमर भर न भूलेगा। आपको वही गवाही देना होगा जो आप दिया। अगर तुम कुछ गड़बड़ करेगा, कुछ भी गोलमाल किया तो हम तोमारे साथ दोसरा बर्ताव करेगा। एक रिपोर्ट में तुम यों (कलाइयों को ऊपर-नीचे रखकर) चला जायेगा।

यह कहते हुए उसने आंखें निकालकर रमा को देखा, मानो कच्चा ही खा जाएगा। रमा सहम उठा। इन आतंक से भरे घाब्दों ने उसे विचलित कर दिया। यह सब कोई झूठा मुकदमा चलाकर उसे फंसा दें, तो उसकी कौन रक्षा करेगा। उसे यह आशा न थी कि डिप्टी साहब को शील और विनय के पुतले बने हुए थे,एकबारगी यह रुद्र रूप धारण कर लेंगे; मगर वह इतनी आसानी से दबने वाला न था। तेज होकर बोला-आप मुझसे जबरदस्ती शहादत दिलाएंगे?

डिप्टी ने पैर पटकते हुए कहा-हां, जबरदस्ती दिलाएगा !

रमानाथ-यह अच्छी दिल्लगी है।

डिप्टी-तोम पुलिस को धोखा देना दिल्लगी समझता है। अभी दो गवाह देकर साबित कर सकता है कि तुम राजद्रोह की बात कर रहा था। बस चला जायगा सात पाल के लिए। चक्की पीसते-पीसते हाथ में घट्टा पड़ जायगा। यह चिकना चिकना गाल नहीं रहेगा।

रमा जेल से डरता था। जेल-जीवन की कल्पना ही से उसके रोएं खड़े होते थे। जेल ही के भय से उसने यह गवाही देनी स्वीकार की थी। वही भय इस वक्त भी उसे कातर करने लगा। डिप्टी भाव-विज्ञान का ज्ञाता था। आसन का पता पा गया। बोला-वहां हलवा पूरी नहीं पायगा। धूल मिला हुआ आटा की रोटी, गोभी के सड़े हुए पत्तों का रसा, और अरहर के दाल का पानी खाने को पावेगा। काल-कोठरी का चार महीना भी हो गया, तो तुम बच नहीं सकता। वहीं मर जायगा। बात-बात पर वार्डर गाली देगा; जूतों से पीटेगा, तुम समझता क्या है।

रमा का चेहरा फीका पड़ने लगा। मालूम होता था प्रतिक्षण उसका खून सूखा चला जाता है। अपनी दुर्बलता पर उसे इतनी ग्लानि हुई कि वह रो पड़ा। कांपती हुई आवाज से बोला-आप लोगों की यह इच्छा है, तो यही सही ! भेज दीजिए जेल। मर ही जाऊंगा न, फिर तो आप लोगों से मेरा गला छूट जायगी। जब आप यहां तक मुझे तबाह करने पर आमादा हैं, तो मैं भी मरने को तैयार हूं। जो कुछ होना होगा, होगा।

उसका मन दुर्बलता की उस दशा को पहुंच गया था, जब जरा-सी सहानुभूति, जरा-सी [ १८४ ]
सहृदयता सैकड़ों धमकियों से कहीं कारगर हो जाती है। इंस्पेक्टर साहब ने मौका ताड़ लिया। उसका पक्ष लेकर डिप्टी से बोले हलफ से कहता हूं, आप लोग आदमी को पहचानते तो हैं। नहीं, लगते हैं रोब जमाने। इस तरह गवाही देना हर एक समझदार आदमी को बुरा मालूम होगा। यह कुदरती बात है। जिसे जरा भी इज्जत का खयाल है,वह पुलिस के हाथों की कठपुतली बनना पसंद न करेगा। बाबू साहब की जगह मैं होता तो मैं भी ऐसा ही करता; लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह हमारे खिलाफ शहादत देंगे। आप लोग अपना काम कीजिए, बाबू साहब की तरफ से बेफिक्र रहिए, हलफ से कहता हूं।

उसने रमा का हाथ पकड़ लिया और बोला-आप मेरे साथ चलिए,बाबूजी । आपको अच्छे-अच्छे रिकार्ड सुनाऊ।

रमा ने रूठे हुए बालक की तरह हाथ छुड़ाकर कहा-मुझे दिक न कीजिए इंस्पेक्टर साहब। अब तो मुझे जेलखाने में मरना है।

इंस्पेक्टर ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा-आप क्यों ऐसी बातें मुंह से निकालते हैं। साहब। जेलखाने में मरें आपके दुश्मन।

डिप्टी ने तसमा भी बाकी न छोड़ना चाहा। बड़े कठोर स्वर में बोला; मानो रमा से कभी का परिचय नहीं है-साहब, यों हम बाबू साहब के साथ सब तरह का सलूक करने को तैयार हैं, लेकिन जब वह हमारा खिलाफ गवाही देगा, हमारा जड़ खोदेगा, तो हम भी कार्रवाई करेगा। जरूर से करेगा। कभी छोड़ नहीं सकता।

इसी वक्त सरकारी एडवोकेट और बैरिस्टर मोटर से उतरे।

इकतालीस

रतन पत्रों में जालपा को तो ढांढस देती रहती थी पर अपने विषय में कुछ न लिखती थी। जो आप ही व्यथित हो रही हो, उसे अपनी व्यथाओं की कथा क्या सुनाती ! वही रतन जिसने रुपयों की कभी कोई हकीकत न समझी, इस एक ही महीने में रोटियों को भी मुहताज हो गई थी। उसका वैवाहिक जीवन सुखी न हो; पर उसे किसी बात का अभाव न था। मरियल घोड़े पर सवार होकर भी यात्रा पूरी हो सकती है अगर सड़क अच्छी हो; नौकर-चाकर, रुपये-पैसे और भोजन आदि की सामग्री साथ हो। घोड़ा भी तेज हो, तो पूछना ही क्या रतन की दशा उसी सवार की-सी थी। उसी सवार की भाँति यह मंदगति से अपनी जीवन-यात्रा कर रही थी। कभी-कभी वह घोड़े पर झुंझलाती होगी, दूसरे सवारों को उड़े जाते देखकर उसकी भी इच्छा होती होगी कि मैं भी इसी तरह उड़ती, लेकिन वह दुखी न थी, अपने नसीबों को रोती न थी। वह उस गाय की तरह थी, जो एक पतली-सी पगहिया के बंधन में पड़कर, अपनी नाद के भूसे-खली में मगन रहती है। सामने हरे-हरे मैदान हैं, उसमें सुगंधमय घासे लहरा रही हैं; पर वह पगहिया तुड़ाकर कभी उघर नहीं जाती। उसके लिए उस पगहिया और लोहे की जंजीर में कोई अंतर नहीं। यौवन को प्रेम की इतनी क्षुधा नहीं होती; जितनी आत्म-प्रदर्शन की। प्रेम की