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चन्द्रकांता सन्तति 3/10.7

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चंद्रकांता संतति भाग 3  (1896) 
द्वारा देवकीनंदन खत्री
[ १०९ ]
7

मायारानी इस गुफा को साधारण और मामूली समझे हुए थी, मगर ऐसा न था। थोड़ी दूर जाने के बाद पूरा अंधकार मिला, जिससे वह घबड़ा गई, मगर दारोगा के ढाढ़स देने से उसका कपड़ा पकड़े हुए धीरे-धीरे रवाना हुई। लगभग सौ कदम जाने के बाद दारोगा रुका और बाईं तरफ घूम कर चलने लगा। अब मायारानी पहले की बनि- स्बत ज्यादा डरी और उसने घबड़ाकर दारोगा से पूछा, “क्या हम लोग चाँदनी में न पहुँचेंगे? कही ऐसा न हो कि कोई दरिन्दा जानवर मिल जाये और हम लोगों को फाड़ खाये।”

दारोगा—(जोर से हँस कर) क्या इतने ही में तेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया? तिलिस्म की रानी होकर इतना छोटा दिल, आश्चर्य है!

मायारानी―(अपने डरे हुए दिल को सम्हाल कर) नहीं-नहीं, मैं डरी और घबराई नहीं हूँ, हाँ भूख-प्यास और थकावट के कारण बेहाल हो रही हूँ इसी से मैंने पूछा कि यह गुफा जिसे सुरंग कहना चाहिए, किसी तरह समाप्त भी होगी या नहीं?

दारोगा―घवरा मत, अब हम लोग बहुत जल्द इस अँधेरे से निकल कर ऐसे दिलचस्प मैदान में पहुँचेंगे, जिसे देखकर तू बहुत ही खुश होगी।

मायारानी―इन्द्रदेव के मकान में जाने के लिए यही एक राह है या और भी कोई?

दारोगा―बस इस रास्ते के सिवाय और रास्ता नहीं है।

मायारानी―अगर ऐसा है तो मालूम होता है कि आपके इन्द्रदेव बहुत से दुश्मन रखते हैं जिनके डर से उन्हें इस तरह छिप कर रहना पड़ता है।

दारोगा—(हँसकर) नहीं-नहीं, ऐसा नहीं है, इन्द्रदेव इस योग्य हैं कि अपने दुश्मनों को बात-की-बात में बर्वाद कर दे। वह इस स्थान में जान कर नहीं रहता बल्कि मजबूर होकर उसे यहाँ रहना पड़ता है क्योंकि जिस तिलिस्म का वह दारोगा है, वह तिलिस्म भी इसी स्थान में है।

मायारानी–ठीक है, तो क्या इस तिलिस्म का कोई राजा नहीं है?

दारोगा―नहीं, जिस समय यह तिलिस्म तैयार हुआ था, उसी समय इसके मालिक ने इस बात का प्रबन्ध किया था कि उसके खानदान में जो कोई हो वह तिलिस्म का राजा नहीं बने वल्कि दारोगा की तरह रहे। उसी के खानदान में यह इन्द्रदेव है। इसे तिलिस्म की हिफाजत करने के सिवाय और किसी तरह का अधिकार तिलिस्म पर नहीं, मगर दौलत की इसे किसी तरह की कमी नहीं है।

मायारानी―अगर पुराने प्रबन्ध को तोड़कर वह तिलिस्मी चीजों पर अपना दख़ल जमावे तो उसे कौन रोक सकता है?

मोरोगा―रोकने वाला तो कोई नहीं है, मगर वह तिलिस्म का भेद कुछ भी नहीं जानता, न मालूम यह तिलिस्म इतना गुप्त किसलिए रखा गया है। [ ११० ]मायारानी-मैं तो अपने तिलिस्म से बहुत फायदा उठाती थी।

दारोगा-बेशक ऐसा ही है, मगर उस तिलिस्म में भी जो खास-खास अलभ्य वस्तुएँ हैं, उनका मालिक तिलिस्म तोड़ने वाले के सिवाय और कोई नहीं हो सकता। अच्छा, अब ठहर जा, हम लोग ठिकाने पहुंच गये हैं, यहाँ एक दरवाजा है जिसे खोलकर आगे चलना होगा।

दारोगा की बात सुनकर मायारानी रुक गई, मगर अंधेरे में उसे यह न मालूम हुआ कि बाबाजी क्या कर रहे हैं। दस-बारह पल से ज्यादा देर न लगी होगी कि एक आवाज ठीक उसी प्रकार की आई जैसी लोहे का हल्का दरवाजा खुलने के समय आती है। बाबाजी ने मायारानी का हाथ पकड़ के उसे दो-तीन कदम आगे कर दिया तथा स्वयं पीछे रह गये और फिर उस दरवाजे के बन्द होने की आवाज आई, इसके बाद बाबाजी ने मोमबत्ती जलाई, जिसका सामान दरवाजे के पास ही किसी ठिकाने पर था।

बहुत देर तक अँधेरे में रहने के कारण मायारानी बहुत घबड़ा गई थी। अब रोशनी हो जाने से वह चैतन्य हो गई और आँखें फाड़ कर चारों तरफ देखने लगी। केवल उधर की तरफ जिधर से वह आई थी, लोहे का एक तख्ता दिखलाई दिया, जिसमें दरवाजे का कोई आकार न था, इसके अतिरिक्त सब तरफ पत्थर ही दिखाई पड़ता था और साफ मालूम होता था कि मानवीय उद्योग से पहाड़ काट कर यह रास्ता या सुरंग तैयार की गई है, मगर यह सुरंग इसी जगह पर नहीं समाप्त हुई थी बल्कि बाईं तरफ तीनचार सीढ़ियाँ नीचे उतर के और भी कुछ दूर तक गई हुई थी। मायारानी ने आश्चर्य से चारों तरफ देखने के बाद' बाबाजी से कहा, "यह लोहे की दीवार जो सामने दिखाई पड़ती है निःसन्देह दरवाजा है परन्तु इसमें दरवाजे का कोई आकार मालूम नहीं पड़ता, आपने इसे किस तरकीब से खोला या बन्द किया था?" इसके जवाब में दारोगा ने कहा, "इस दरवाजे को खोलने और बंद करने की तरकीब नियमानुसार इन्द्रदेव की आज्ञा बिना मैं नहीं बता सकता और यह मोमबत्ती भी मैंने इसलिए जलाई है कि (सीढ़ियों की तरफ इशारा करके) इन सीढ़ियों को तू अच्छी तरह देख ले जिसमें उतरने के समय ठोकर न लगे।" इतना कहते ही दारोगा ने मोमबत्ती बुझाकर उसे उसी ठिकाने रख दिया और मायारानी का हाथ पकड़ के सीढ़ियों के नीचे उतरा। मायारानी को अपनी बातों का जवाब न पाने से रंज हुआ, मगर वह कर ही क्या सकती थी, क्योंकि इस समय वह हर तरह से दारोगा के आधीन थी।

सीढ़ियाँ उतरने के साथ ही सामने की तरफ थोड़ी दूर पर उजाला दिखाई दिया और मालूम हुआ कि उस ठिकाने सुरंग समाप्त हुई है। आश्चर्य, डर, चिन्ता और आशा के साथ मायारानी ने यह रास्ता भी त किया और सुरंग के आखिरी दरवाजे के बाहर कदम रखने के साथ ही एक रमणीक स्थान की छटा देखने लगी।

इन समय मायारानी की आँखों के सामने पहाड़ी गुलबूर्टो से हरा-भरा एक चौखटा मैदान था, जिसकी लम्बाई चार सौ गज और चौड़ाई साढ़े तीन सौ गज से ज्यादा न होगी। यह मैदान चारों तरफ से ढलवाँ और सरसब्ज पहाड़ी से घिरा हुआ था जिस पर के पेड़ों और सुन्दर-सुन्दर लताओं के बीच से निकल कर नीरोग हवा के नर्म-नर्म [ १११ ] झपेटे आ रहे थे। सामने की तरफ पहाड़ी की आधी ऊंचाई से झरना गिर रहा था, जिसका बिल्लौर की तरह साफ जल नीचे आकर बारीक और पेचीली नालियों का सा आनन्द दिखलाता हुआ रमने के खुशनुमा कोमल और सुन्दर फूल-पत्तों वाले पौधों को तरी पहुँचा रहा था। खुशनुमा और मीठी बोलियों से दिल लुभा लेने वाली छोटी-छोटी चिड़ियों की सुरीली आवाजों में दबी हुई रसीले फूलों पर घूम-घूमकर बलाएँ लेते हुए मस्त भौंरों के परों की आवाज कमजोर उदास और मुरझाए दिल को ताकत और खुशी देने के साथ चैतन्य कर रही थी। इस स्थान के आधे हिस्से पर इस समय अपना दखल जमाए हुए सूर्य भगवान की कृपा ने धूप-छाँह की हुबाबी चादर इस ढंग से विछा रखी थी कि तरह-तरह की चिन्ताओं और खटकों से विकल मायारानी कोलाचार होकर मस्ती और मदहोशी के कारण थोड़ी देर के लिए अपने को भुला देना पड़ा और जब वह कुछ होश में आई तो सोचने लगी कि ऐसे अनूठे स्थान का अपूर्व आनन्द लेने वाला भी कोई यहाँ है या नहीं। इस विचार के साथ ही दाहिनी तरफ पहाड़ी पर बने हुए एक खुशनुमा बँगले पर उसकी निगाह जा पड़ी मगर उसे अच्छी तरह देखने भी न पाई थी कि दारोगा साहब हँस कर बोल उठे, "अब यहाँ कब तक खड़ी रहोगी, चलो आगे बढ़ो!"

जिस जगह मायारानी खड़ी थी उसकी ऊँचाई जमीन से लगभग बीस-पचीस गज के होगी। नीचे उतरने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियाँ बनी हई थीं जिन पर पहले दारोगा ने अपना मनहूस (अमंगल) कदम रखा और उसके पीछे-पीछे मायारानी रवाना ये दोनों उस खुशनुमा जमीन की कुदरती क्यारियों पर घूमते हुए उस पहाड़ी के नीचे पहँचे, जिस पर वह खूबसूरत बंगला बना हुआ था और उसी समय दो आदमियो को पहाड़ी से नीचे उतरते हुए देखा। बान-की-बात में ये दोनों आदमी दारोगा के पास आ पहँचे और दण्ड-प्रणाम के बाद बोले, "इन्द्रदेवजी ने आपको दूर ही से देखकर पहचान लिया, मगर मायारानी को न पहचान सके जो इस समय आपके साथ हैं।"

यह जानकर मायारानी को आश्चर्य हुआ कि यहाँ का हर एक आदमी उसे अच्छी तरह जानता और पहचानता है मगर इस विषय में कुछ पूछने का मौका न समझ कर वह चुप हो रही। बाबाजी ने दोनों ऐयारों से पूछा, "कहो कुशल तो है? इन्द्रदेव अच्छे हैं?"

एक-जी हाँ, बहुत अच्छे हैं। मगर यह तो कहिये आपने नाक पर यह पट्टी क्यों बांधी हुई है?

दारोगा-इसका हाल इन्द्रदेव के सामने कहूँगा, उसी समय तुम भी सुन लेना। चलो जल्द चलें, भूख-प्यास और थकावट से जी बेचैन हो रहा है।

ये चारों आदमी पहाड़ी के ऊपर चढ़ने लगे। यद्यपि इन सभी को बहुत ऊँचे नहीं चढ़ना था परन्तु मायारानी बहुत थकी और सुस्त हो रही थी। इसलिए बड़ी कठिनाई के साथ चढ़ी और ऊपर पहुँचने तक मामूली से बहुत ज्यादा देर लगी। ऊपर पहुँच कर मायारानी ने देखा कि वह बँगला छोटा और साधारण नहीं है बल्कि बहुत बड़ा और अच्छे ढंग का बना हुआ है मगर यहाँ पर इस मकान की बनावट तथा उसके सुन्दर-सुन्दर [ ११२ ] कमरों की सजावट का हाल न लिखकर मतलब की बातें लिखना उचित जान पड़ता है।

उस समय इन्द्रदेव अगवानी के लिए स्वयं बाहर निकल आया जब ये दोनों आदमी उस कमरे के पास पहुंचे, जिसमें वह रहता था। वह इन दोनों से बड़े तपाक से मिला और खातिर के साथ अन्दर ले जाकर बैठाया।

इन्द्रदेव-(दारोगा से) आपके और मायारानी के कष्ट करने का सबब पूछने के पहले मैं जानना चाहता हूँ कि आपने नाक पर पट्टी क्यों बाँध रखी है?

दारोगा-तुमसे विदा होकर मैंने जो कुछ तकलीफें उठाई हैं यह उसी का नमूना है। जब मैं जरा दम लेने के बाद अपना किस्सा तुमसे कहूँगा, तब सब हाल मालूम हो जायगा, इस समय भूख-प्यास और थकावट से जी बेचैन हो रहा है।

दारोगा का जवाब सुनकर इन्द्रदेव चुप हो रहा और फिर कुछ बातचीत न हुई। दारोगा और मायारानी के खाने-पीने का उत्तम प्रबन्ध कर दिया गया और उन दोनों ने कई घण्टे तक आराम करके अपनी थकावट दूर की। जब संध्या होने में थोड़ी देर बाकी थी तव इन्द्रदेव स्वयं उस कमरे में आया जिसमें दारोगा का डेरा पड़ा हुआ था। वह कमरा इन्द्रदेव के कमरे के बगल ही में था और उसमें जाने के लिए केवल एक मामूली दरवाजा था। उस समय मायारानी दारोगा के पास बैठी अपना दुखड़ा रो रही थी। इन्द्रदेव के आते ही वह चुप हो गई और बाबाजी ने खातिर के साथ इन्द्रदेव को अपनी बगल में बैठाया।

इन्द्रदेव-मैं समझता हूँ कि इस समय आप अपना हाल बखूबी कह सकेंगे, जिसके सुनने के लिए मेरा जी बेचैन हो रहा है।

दारोगा-वह कहने के लिए इस समय मैं स्वयं ही तुम्हारे पास आने वाला था, अच्छा हुआ कि तुम आ गये।

दारोगा ने अपना और मायारानी का हाल जो कुछ हम ऊपर लिख आये हैं, इन्द्रदेव से पूरा-पूरा बयान किया। इन्द्रदेव चुपचाप सुनता रहा, पर अन्त में जब नागर द्वारा बाबाजी की नाक काटने का हाल सुना तो उसे यकायक क्रोध चढ़ आया। उसका चेहरा लाल हो गया, होठ हिलने लगे, और वह बिना कुछ कहे बाबाजी के पास से उठ कर चला गया। यह हाल देखकर मायारानी को ताज्जुब मालूम हुआ और उसने दारोगा से पूछा, "क्या आप कह सकते हैं कि इन्द्रदेव आपकी बातों का कोई जवाब दिये बिना ही क्यों चला गया?"

दारोगा-मालूम होता है कि मेरा हाल सुनकर उसे हद से ज्यादा क्रोध चढ़ आया और वह कोई कार्रवाई करने के लिए चला गया है।

मायारानी-इन्द्रदेव नागर को जानता है?

दारोगा-बहुत अच्छी तरह, बल्कि नागर का जितना भेद इन्द्रदेव को मालूम है उतना तुमको भी मालूम न होगा।

मायारानी-सो कैसे?

दारोगा—जिस जमाने में नागर रण्डियों की तरह बाजार में बैठती थी और मोतीजान के नाम से मशहूर थी उस जमाने में इन्द्रदेव भी कभी-कभी उसके पास भेष बदल [ ११३ ] कर गाना सुनने की नीयत से जाया करता था और उसकी हर एक बात की इसे खबर थी, मगर इन्द्रदेव का ठीक-ठीक हाल बहुत दिनों तक सोहबत करने पर भी नागर को मालूम न हुआ, वह इन्द्रदेव को केवल एक सरदार और रुपये वाला ही जानती थी।

आधे घण्टे तक इसी किस्म की बातें होती रही और इसके बाद इन्द्रदेव के ऐयार सूर्यसिंह ने कमरे के अन्दर आकर कहा, "इन्द्रदेवजी आपको बुलाते हैं, आप अकेले जाइये और नजरबाग में मिलिये जहाँ वह भी अकेले टहल रहे हैं।"

इस सन्देश को सुनकर दारोगा उठ खड़ा हुआ और मायारानी को अपने कमरे में जाने के लिए कह इन्द्रदेव के पास चला गया।

इस मकान के पीछे की तरफ एक छोटा-सा नजरबाग था जो अपनी खुशनुमा क्यारियों और गुलबूटों की बदौलत बहुत ही भला मालूम पड़ता था। जब दारोगा वहाँ पहुँचा तो उसने इन्द्रदेव को उसी जगह टहलते हुए पाया।

इन्द्रदेव-भाई साहब, आज आपकी जुबान से मैंने वह बात सुनी है जिसके सुनने की कदापि आशा न थी।

दारोगा--बेशक नागर की बदमाशी का हाल सुनकर आपको बहुत ही रंज हुआ होगा।

इन्द्रदेव-नहीं, मेरा इशारा नागर की तरफ नहीं है। इसमें तो कोई सन्देह नहीं नागर ने आपके साथ जो किया बहुत बुरा किया और मैं उसे गिरफ्तार कर लेने के लिए एक ऐयार और कई सिपाही रवाना भी कर चुका हूँ मगर मैं उन बातों की तरफ इशारा कर रहा हूँ जो राजा गोपालसिंह से सम्बन्ध रखती हैं। मुझे इस बात का गुमान भी न था कि राजा गोपालसिंह अभी तक जीते हैं! मुझे स्वप्न में भी इस बात का ध्यान नहीं आ सकता था कि मायारानी वास्तव में गोपालसिंह की स्त्री नहीं है और आपकी कपा से लक्ष्मीदेवी की गद्दी पर जा बैठी है! ओफ ओह, दुनिया भी अजब चीज है, और उसमें विहार करने वाले दुनियादार भी कैसे-कैसे मनसूबे गाँठते हैं?

इन्द्रदेव की बातें सुनकर दारोगा चौक पड़ा और उसे विश्वास हो गया कि हमारी आशालता में अब कोई नये ढंग का फूल खिलना चाहता है। उसने घबरा कर इन्द्रदेव की तरफ देखा जिसका जमीन की तरफ झुका हुआ चेहरा इस समय बहुत ही उदास हो रहा था।

दारोगा--बेशक मायारानी को लक्ष्मीदेवी बनाने में मेरा कसूर था और मगर राजा गोपालसिंह के बारे मैं निर्दोष हूँ। मुझे इस बात का गुमान भी न था कि राजा साहब को माया रानी ने कैद कर रक्खा है, मैं वास्तव में उन्हें मरा हुआ समझता था।

इन्द्रदेव--(इस ढंग से जैसे दारोगा की बात उसने सुनी ही नहीं, क्या आप कह सकते हैं कि राजा गोपालसिंह ने आपके साथ कोई बुराई की थी?

दारोगा- नहीं-नहीं, उस बेचारे ने मेरे साथ कोई बुराई नहीं की।

इन्द्रदेव-क्या आप कह सकते हैं कि गोपालसिंह के बाद आप विशेष धनी हो गए हैं?

दारोगा नहीं। [ ११४ ]इन्द्रदेव - क्या आप इतना भी कह सकते हैं कि राजा साहब के समय की बनिस्बत आज ज्यादा प्रसन्न हैं?

दारोगा—(ऊँची साँस लेकर) हाय, प्रसन्नता तो मानो मेरे लिए सिरजी ही नहीं गई!

इन्द्रदेव-नहीं-नहीं, आप ऐसा कदापि नहीं कह सकते, बल्कि ऐसा कहिये कि ईश्वर की दी हुई प्रसन्नता को आपने लात मार कर घर से निकाल दिया।

दारोगा-बेशक ऐसा ही है।

इन्द्रदेव-(जोर देकर) और आज नाक कटा कर भी दुनिया में मुँह दिखाने के लिए आप तैयार हैं और पिछली बातों पर जरा भी अफसोस नहीं करते! जिस कम्बख्त मायारानी ने अपना धर्म नष्ट कर दिया, जो मायारानी लोक-लाज को एकदम तिलांजलि दे बैठी, जिस दुष्टा ने अपने सिरताज राजा गोपालसिंह के साथ ऐसा घात किया, जिस पिशाचिनी ने अपने माता-पिता की जान ली, जिसकी बदौलत आपको कारागार (कैदखाने) का मजा चखना पड़ा और जिसके सतसंग से आप अपनी नाक कटा बैठे, आज पुनः उसी की सहायता करने के लिए आप तैयार हुए हैं और इस पाप में मुझसे सहायता लेकर मुझे भी नष्ट करना चाहते हैं! वाह भाई साहब वाह, आपने गुरु का अच्छा नाम रोशन किया और मुझे भी अच्छा उपदेश कर रहे हैं! बड़े अफसोस की बात है कि आप सा एक अदना आदमी, जो एक रंण्डी के हाथ से अपनी नाक नहीं बचा सका, राजा वीरेन्द्रसिंह ऐसे प्रतापी राजा का नामो-निशान मिटाने के लिए तैयार हो जाय! मैंने तो राजा वीरेन्द्रसिंह का केवल इतना ही कसूर किया कि आपको उनके कैदखाने से निकाल लाया और अब इसी अपराध को क्षमा कराने के उद्योग में लगा हूँ, मगर आप, जिनकी दौलत मैं अपराधी हुआ हूँ, अब फिर...

इतना कहते-कहते इन्द्रदेव रुक गया क्योंकि पल-पल भर में बढ़ते जानेवाले क्रोध ने उसका कंठ बन्द कर दिया।उसका चेहरा लाल हो रहा था और होंठ काँप रहे थे। दारोगा का चेहरा जर्द पड़ गया, पिछले पापों ने उसके सामने आकर अपनी भयानक मूर्ति दिखाके डराना शुरू किया और वह दोनों हाथों से अपना मुँह ढाँककर रोने लगा।

थोड़ी देर तक सन्नाटा रहा इसके बाद इन्द्रदेव ने फिर कहना शुरू किया--

इन्द्रदेव-हाय, मुझे रह-रह कर वह जमाना याद आता है जिस जमाने में दयावान और धर्मात्मा राजा गोपालसिंह की बदौलत आपकी कदर और इज्जत होती थी। जब कोई सौगात उनके पास आती थी तब वह 'लीजिए बड़े भाई' कह कर आपके सामने रखते थे। जब कोई नया काम करना होता था तो 'कहिए बड़े भाई, आप क्या आज्ञा देते हैं?' कह कर आपसे राय लेते थे, और जब उन्हें क्रोध चढ़ता था और उनके सामने जाने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी तब आप की सूरत देखते ही सिर अका लेते थे और बड़े उद्योग से अपने क्रोध को दबा कर हँस देते थे। क्या कोई कह सकता है कि आपसे डर कर या दब कर वे ऐसा करते थे? नहीं, कदापि नहीं, इसका सबब केवल प्रेम था। वे आपको चाहते थे और आप पर विश्वास रखते थे कि स्वामीजी [ ११५ ] ने (जिनके आप शिष्य हैं) आपको अच्छी दीक्षा और शिक्षा दी होगी। उन्हें यह मालूम न था कि आप इतने बड़े विश्वासघाती हैं! हाय उनके साथ आपका ऐसा बर्ताव! छि:छिः, धिक्कार है ऐसी जिन्दगी पर! किसके लिए? किस दुनिया में मुँह दिखाने के लिए? क्या आप नहीं जानते कि ईश्वर भी कोई वस्तु है! खैर जाइये, इस समय मैं विशेष बात नहीं कर सकता। आप यह न समझिये कि मैं अपने घर में से चले जाने के लिए आपसे कहता हूँ बल्कि यह कहता हूँ कि अपने कमरे में जाकर आराम कीजिये। आपको चार दिन की मोहलत दी जाती है इस बीच में अच्छी तरह सोच लीजिये कि किस तरह से आपकी भलाई हो सकती है और आपको किस रास्ते पर चलना उचित है, मगर खबरदार, इस समय जो कुछ बातें हुई हैं, उनका जिक्र मायारानी से न कीजिएगा और इस चार दिन के अन्दर मुझसे मिलने की भी आशा न रखिएगा।