जायसी ग्रंथावली/आखिरी कलाम
आखिरी कलाम
पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥
दिन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दिन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥
दिन्हेसि नयन जोति, उजियारा । दिन्हेसि देखै कहँ संसारा ॥
दिन्हेसि स्रवन बात जेहि सुनै । दिन्हेसि बुद्धि, ज्ञान बहु गुनै ॥
दिन्हेसि नासिक लीजै बासा । दिन्हेसि सुमन सुगंध बिरासा ॥
दीन्हेसि जीभ बैन रस भाखै । दीन्हेसि भुगुति, साध सब राखै ॥
दीन्हेसि दसन, सुरंग कपोला । दीन्हेसि अधर जे रचै तँबोला ॥
दोहा
दीन्हेसि बदन सुरूप रँग, दिन्हेसि माथे भाग ।
देखि दयाल, 'मुहम्मद', सीस नाइ पद लाग ॥ १ ॥
दीन्हेसि कंठ बोल जेहि माहाँ । दीन्हेसि भुजादंड, बल बाहाँ ॥
दीन्हेसि हिया भोग जेहि जमा । दीन्हेसि पाँच भूत, आतमा ॥
दीन्हेसि बदन सीत औ घामू । दीन्हेसि सुक्ख नींद बिसरामू ॥
दीन्हेसि हाथ चाह जस कीजै । दीन्हेसि कर पल्लव गहि लीजै ॥
दीन्हेसि रहस कूद बहु तेरा । दीन्हेसि हरष हिया बहु मेरा ॥
दीन्हेसि बैठक आसन मारै । दीन्हेसि बूत जो उठैं सँभारै ॥
दीन्हेसि सबै सँपूरन काया । दीन्हेसि दोइ चलै कहँ पाया ॥
दोहा
दीन्हेसि नौ नौ फाटका, दिन्हेसि दसवँ दुवार ।
सो अस दानि 'मुहम्मद', तिन्ह कै हौं बलिहार ॥ २ ॥
मरम नैन कर अँधरै बूझा । तेहि बिहरै संसार न सूझा ॥
मरम स्रवन कर बहिरै जाना । जो न सुनै, किछु दीजै साना ॥
मरम जीभ कर गूँगै पावा । साध मरै, पै निकर न नावाँ ॥
मरम बाहँ कै लूलै चीन्हा । जेहि बिधि हाथन्ह पाँगुर दीन्हा ॥
मरम कया कै कुस्टी भेंटा । नित चिरकुट जो रहै लपेटा ॥
मरम बैठ उठ तेहि पै गुना । जो रे मिरिग कस्तूरी पहाँ ॥ ( ? )
मरम पावँ कै तेहि पै दीठा । होइ अपाय भुइँ चलै बईठा ॥
दोहा
अति सुख दीन्ह बिधातै, औ सब सेवक ताहि ।
आपन मरम 'मुहम्मद', अबहूँ समुझ कि नाहि ॥ ३ ॥
(१) बागा = पहनाव, पोशाक । बिरासा = बिलास । रचैं = रँग जाते हैं । (२) रहस = आनंद । मेर = मेल, भाँति । फाटका = नव द्वार । (३) बिहरै = फूटने पर । सान दीजै = इशारा कीजिए (तो समझैं) (अवधी) ।
चिरकुट = चीथड़ा । बिधातै = बिधाता ने । आखिरी कलाम
२९५
भा औतार मोर नौ सदी । तीस बरिस ऊपर कबि बदी ॥
आवत उधत चार बिधि ठाना । भा भूकंप जगत अकुलाना ॥
धरती भवाँइ दीन्ह चक्र बिधि लाई । फिरै अकास रहँट कै नाई ॥
गिरि पहार मेदिनि तस हाला । जस चाला चलनी भरि चाला ॥
मिरित लोक ज्यौं रचा हिंडोला । सरग पताल पवन खट डोला ॥
गिरि पहार परबत ढहि गए । मान समुद्र कीच मिलि भए ॥
धरती फाटि, सात भँहरानी । पुनि भइ सवा जौ सिस्टि समानी ॥
दोहा
जो अस खंभन्ह गाड़ कै, सहस जीभ गहिराई ।
सो अस कीन्ह 'मुहम्मद', तोहि अस बपुरे काई ॥ ४ ॥
सुरुज (अस) सेवक ताकर अहै । आठौ पहर फिरत जो रहै ॥
आयसु लिए रात दिन धावै । सरग पताल दुवौ फिरि आवै ॥
दगधि आगि महँ होइ अँगारा । तेहि कै आँच धिकै संसारा ॥
सो अस बपुरै गहनें लीन्हा । औ अरि बाँधि चंडालै दीन्हा ॥
भा अलोप होइ, भा अँधियारा । दीसै दिनहि सरग महँ तारा ॥
उबतै भखि लीन्ह, धुप चाँपै । लाग सरग जिउ थर थर काँपै ॥
जिउ कहँ परे जान सब छूटै । तब होइ मोख गहन जौ छूटै ॥
दोहा
ताकहँ एता तरास, जो सेवक अस नित ।
अबहूँ न डरसि 'मुहम्मद', काह रहसि निहचिंत ॥ ५ ॥
ताकै अस्तुति कीन्हि न जाई । कौने जीभ मैं करौं बड़ाई ? ॥
जगत पताल जो सैंते कोई । लेखनी बिरिख, समुद मसि होई ॥
लागै लिखै सिस्टि मिलि जाई । समुद घटै, पै लिखि न सिराई ॥
साँचा सोइ और सब झूठे । ठावँ न कतहुँ ओहि कै रूठे ॥
आयसु इबलीस हु जौ टारा । नारद होइ नरक महँ पारा ॥
सौ दुइ कटक, कटक लखि घोरा । फरऊँ रोधि नील महँ बोरा ॥
जौ शदाद बैकुंठ सँवारा । पैठत पौरि बीच गहि मारा ॥
(४) उधत चार = उद्धतचार, उत्पात । आवत...अकुलाना = जान पड़ता है, जिस दिन मसिह मुहम्मद पैदा हुए थे उस दिन भारी भूकंप आया था भवाँइ दीन्ह = फिराया । चाला = छलनी में डाला हुआ अनाज । पवन खट = पवन खटोला । खंभन्ह = अर्थात् पहाड़ों को (धरती पहाड़ों से कीली कही गई है) । गहिराई = गहराई या पाताल में थामे हैं । (५) धिकै = तपता है । औ अरि...चंडालै दीन्हा = प्रवाद है कि सूर्य चंद्र डोमों या चंडालों के ऋणी हैं इसी से ग्रहण द्वारा बार बार सताए जाते हैं । धुप = अंधकार । (६) सैंते = इकट्ठी करे । सिराई = चुके, पूरा हो । इबलीस = फरिश्ता जो पीछे शैतान हुआ । फरऊँ = मिस्र का बादशाह जिसने इसराइल के वंश- वालों को सताया था । शदाद = शद्दा, एक प्रतापी बादशाह जिसने खुदाई का दावा किया था और बिहिश्त के नमूने पर 'इरम' नाम का बाग बनवाया था । यह बाग हजरमूत में बारह कोस लंबा था । इसमें अनेक प्रकार के सुंदर
जो ठाकुर अस दारुन, सेवक तहँ निरदोख ।
माया करै 'मुहम्मद', तौ पै होइहि मोख ॥ ६ ॥
रतन एक बिधनै अवतारा । नावँ 'मुहम्मद' जग उजियारा ॥
चारि मीत चहुँ दिसि गजमोती । माँझ दिपै मनु मानिक जोती ॥
जेहि हित सिरजा सात समुंदा । सातहु दीप भए एक बंदा ॥
तर पर चौदह भुवन उसारे । बिच बिच खंड बिखंड सँवारे ॥
धरती औ गिरि मेरु पहारा । सरग चाँद सूरज औ तारा ॥
सहस अठारह दुनिया सिरजैं । आवत जात जातरा करैं ॥
जेइ नहिं लीन्ह जनम महँ नाऊँ । तेहि कहँ कीन्ह नरक महँ ठाऊँ ॥
दोहा
सो अस दैउ न राखा, जेहि कारन सब कीन्ह ।
दहूँ तुम काह 'मुहम्मद' एहि पृथिवी चित दीन्ह ॥ ७ ॥
बाबर साह छत्रपति राजा । राज पाट उन कहँ बिधि साजा ॥
मुलुक सुलेमाँ कर ओहि दीन्हा । अदल दुनी ऊमर जस कीन्हा ॥
अली केर जस कीन्हेसि खाँड़ा । लीन्हेसि जगत समुद भरि डाँड़ा ॥
बल हमजा कर जैस सँभारा । जो बरियार उठा तेहि मारा ॥
पहलवान नाए सब आदी । रहा न कतहु बाद करि बादी ॥
बड परताप आप तप साधे । धरम के पंथ दई चित बाँधे ॥
दरब जोरि सब काहुहि दिए । आपुन बिरह आउ जस लिए ॥
दोहा
राजा होइ करै, सब, छाँड़ि, जगत महँ राज ।
तब अस कहँ 'मुहम्मद', वै कीन्हा किछु काज ॥ ८ ॥
मानिक एक पाएउँ उजियारा । सैयद असरफ पीर पियारा ॥
जहाँगीर चिस्ती निरमरा । कुल जग महँ दीपक बिधि धरा ॥
औ निहंग दरिया जल माहाँ । बूड़त कहँ धरि काढ़त बाहाँ ॥
समुद माहँ जो बोहति फिरई । लेतै नावँ सीधैं होइ तरई ॥
तिन्ह घर हौं मुरीद, सो पीरू । सँवरत बिनु गुन लावै तीरू ॥
कर गहि धरमपंथ देखावा । गा भुलाइ तेहि मारग लावा ॥
जो अस पुरुपहि मन चित लावै । इच्छा पूजै , आस तुलावै ॥
दोहा
जौ चालिस दिन सेवै, बार बुहारै कोइ ।
दरसन होइ 'मुहम्मद', पाप जाइ सब धोइ ॥ ९ ॥
अनुपम वृक्ष और भवन थे । इसके तैयार हो जाने पर ज्योंहीं वह इसके भीतर घुसना चाहता था कि ईश्वर के कोप से दरवाजे पर ही उसके प्राण निकल गए । सेवक तहँ = अपने बंदों या भक्तों के लिये । निरदोख = अच्छे स्वभाव का, सुशील । (७) तर पर = नीचे ऊपर । उसारे = खड़े किए, स्थापित किए (८) ऊमर = खलीफा उमर । पहलवान = योद्धा, वीर । नाए = झुकाए । आदी = पूरे, बिलकुल । आउ जस = आयु भर की कीर्ति । (९) निहंग =
बिलकुल । बार = द्वार । आखिरी कलाम
२९७
जायस नगर मोर अस्थानू । नगर क नावँ आदि उदयानू ॥
तहाँ दिवस दस पहुने आएउँ । भा बैराग बहुत सुख पाएउँ ॥
सुख भा, सोचि एक दिन मानौं । ओहि बिनु जिवन मरन कै जानौं ॥
नैन रूप सो गएउ समाई ॥ रहा पूरि भर हिरदय छाई ॥
जहवाँ देखौं तहँवाँ सोई । और न आव दिसटि तर कोई ॥
आपुन देखि देखि मन राखौं । दूसर नाहि, सो कासों भाखौं ॥
सबै जगत दरपन कै लेखा । आपन दरसन आपुहि देखा ॥
दोहा
अपने कौकुत कारन, मीर पसारिन हाट ।
मलिक मुहम्मद बिहनै, होइ निकसिन तेहि बाट ॥ १० ॥
धूत एक मारग गनि गुना । कपट रूप नारद करि चूना ॥
'नावँ न साधु', साधि कहवावै । तेहि लगि चलै जौ गारी पावै ॥
भाव गाँठि अस मुख, कर भाँजा । कारिख तेल घालि मुख माँजा ॥
परतहि दीठि छरत मोहिं लेखे । दिनहिं माँझ अँधियर मुख देखे ॥
लीन्हे चंग राति दिन रहई । परपंच कीन्ह लोगन मह चहई ॥
भाइ बंधु महँ लाई लावै । बाप पूत महँ कहै कहावै ॥
मेहरी भैंस रैनि कै आवै । तरपड़ कै पूरुख ओनावै ॥
दोहा
मन मैली कै ठगि, ठगै, ठगै न पायौ काहु ।
बरजेउ सबहिं 'मुहम्मद', अस जिन तुम पतियाहु ॥ ११ ॥
अंग चढ़ावहु सूरी भारा । जाइ गहौ तब चंग अधारा ॥
जौ काहू सों आनि चिहूँटै । सुनहु मोर बिधि कैसे छूटै ॥
उहै नावँ करता कर लेऊ । पढ़ौ पलीता धूवाँ देऊ ॥
जौ यह धुवाँ नासिकहि लागै । मिनती करै औ उठि उठि भागै ॥
धरि बाई लट सीस झकोरै । करि पाँ तर, गहि हाथ मरोरै ॥
तवहि सँकोच अधिक ओहि होवै । 'छाँड़हु, छाँड़हु !' कहि कै रोवै ॥
घरि बाहीं लै थुवा उड़ावै । तासों डरे जो ऐस छोड़ावै ॥
दोहा
है नरकी औ पापी, टेढ़ बदन औ आँखि ।
चीन्हत उहै 'मुहम्मद', झूठ भगी सब साखि ॥ १२ ॥
(१०) उदयानू = 'जायस' का यही पुराना नाम वहाँ के लोग बतलाते हैं । कौकुत = कौतुक (अवध) । मीर = सरदार, यहाँ परमेश्वर । बिहनै = सबेरे सबेरे, प्रातकाल ही । (११) धूत = धूर्त । नारद = शैतान । नावँ न साधु = ईश्वर का नाम न जप । भाव गाँठि......भाँजा = मुँह पर ऐसा हाव बनाकर हाथ से ऐसे ऐसे इशारे करती है । कारिख = काजल, मिस्सी, तेल आदि स्त्रियों का श्रृंगार । अँधियर = अँधेरा । लाई लावै = झगड़ा लगाती है । मेहरी = स्त्री, जोरू । तरपड़ = नीचे । ओनावै = झुकाती है । कै ठगि = ठग करके । (१२) भारा = भाला । चिहूँटै = चिमटे, लगे । लेऊ = ले । देऊ = दे (अवधी) । थुवा उड़ावै = थू थू करे; थूके । साखि = विश्वास दिलाकर कहे हुए बचन ।
नौ सै बरस छतीस जो भए । तब एहि कथा क आखर कहे ॥
देखौं जगत धुंध कलि माहाँ । उवत धूप धरि आवत छाहाँ ॥
यह संसार पवन कर लेखा । माँगत बदन नैन भरि देखा ॥
लाभ, दिए बिनु भोग, न पाउब । परिहि डाँड़ जहँ मर गँवाउब ॥
राति क सपन जागि पछिताना । ना जानौं कब होइ बिहाना ॥
अस मन जानि बेसाहहु सोई । मूर न घटै, लाभ जेहि होई ॥
ना जानेहु बाढ़त दिन जाई । तिल तिल घटै आउ नियराई ॥
दोहा
अस जिन जानेहु बढ़त है, दिन आवत नियरात ।
कहै सो बूझि 'मुहम्मद', फिर न कहाँ असि बात ॥ १३ ॥
अबहिं अंत कर परलै आई । धरमी लोग रहैं ना पाई ॥
जबही सिद्ध साधु गए पारा । तबहीं चलै चोर बटपारा ॥
जाइहि मया मोह सब केरा । मच्छ रूप कै आवहिं बेरा ॥
उठिहैं पंडित बेद पुराना । दत्त सत्त दोउ करिहिं पयाना ॥
धूम बरन सूरज होइ जाई । कृस्न बरन सब सिस्टि दिखाई ॥
दधा पुरुष दिसि उवहै जहाँ । पुनि फिरि आइ अथवहै तहाँ ॥
चढ़ि गदहा निकसै धरि जालू । हाथ खाँड होइ, आवै कालू ॥
दोहा
जो रे मिलै तेहि मारै, फिर फिरि आइ कै गाज ।
सबही मारि 'मुहम्मद', भूज अरहिता राज ॥ १४ ॥
पुनि धरती कहँ आयसु होई । उगिलै दरब, लेइ सब कोई ॥
'मोर मोर' करि उठिहैं भारी । आपु आपु महँ करिहैं गारी ॥
अस न कोइ आवै मन माहाँ । जो यह साँचा अहै सो कहाँ ॥
सेंति सेंति लेइ लेइ घर भरहीं । रहस कूद अपने जिउ करहीं ॥
खनहिं उतंग, खनहिं फिर सांतो । नितहि हुलंब उठै बहु भाँती ॥
पुनि एक अचरज मँजरै आई । नावँ 'मजारी' भँवै बिलाई ॥
ओहि कै सूंघे जियै न कोई । जो न मरै तेहि भक्खै सोई ॥
दोहा
सब संसार फिराइ औ, लावै गाहिरी धात ।
उनहूँ कहँ 'मुहम्मद', बार न लागिहि जात ॥ १५ ॥
(१३) माँगत......देखा = सबको मुँह से माँगते ही देखा । (१४) आई = आइहि, आएगा । मच्छ रूप......बेरा = जैसे बड़ी मछलियाँ छोटी मछलियों को पकड़कर खा जाती हैं, वैसा ही व्यवहार मनुष्यों के बीच हो जायगा । दत्त सत्त = दान और सत्य । दधा = जला हुआ । खाँड = खाँड़ा । भूज = भोगेगा । अरहिता = निर्जन, निष्कंटक । (१५) भारी = सब के सब, बिलकुल । साँचा = संचित किया, जुटाया । सेंति = समेटकर, सहेजकर । उतंग = उभार, जोर शोर । सांतो = शांति । हुलंब = हुल्लड़, हल्ला, हलचल । भँवै = फिरती है । बिलाई = बिल्ली । फिराइँ = फिरते हैं । उनहूँ कहँ =
उनको भी । आखिरी कलाम
२९९
पुनि मैकाइल आयसु पाए । उन बहु भाँति मेघ बरसाए ॥
पहिले लागै परै अँगारा । धरती सरग होइ उजियारा ॥
लागी सबै पिरथिवीं जरै । पाछे लागे पाथर परै ॥
सौ सौ मन कै एक एक सिला । चलैं पिंड घुटि आवैं मिला ॥
बजर गोट तस छूटैं भारी । टूटैं रूख बिरुख सब झारी ॥
परत धमाकि धरति सब हालै । उधिरत उठै सरग लौं सालै ॥
अधाधार बरसें बहु भाँती । लागि रहै चालिस दिन राती ॥
दोहा
जिया जंतु सब मरि घटे, जित सिरजा संसार ।
कोइ न रहै 'मुहम्मद', होइ बीता संसार ॥ १६ ॥
जिबरईल पाउब फरमानू । आइ सिस्टि देखब मैदानू ॥
जियत न रहा जगत केउ ठाढ़ा । मारा झोरि कचरि सब गाढ़ा ॥
मरि गंधाहि, साँस नहिं आवै । उठे बिगंध, सड़ाईंध भावै ॥
जाइ दैउ से करहु बिनाती । कहब जाइ जस देखत भाँती ॥
देखहु जाइ सिस्टि बेवहारू । जगत उजाड़ सून संसारू ॥
अस्ट दिसा उजारि सब मारा । कोइ न रहा नावँ लेनिहारा ॥
मारि माछ जस पिरथिवीं पाटी । परै पिछानि न, दीखै माटी ॥
दोहा
सून पिरथिवीं होइ गई, दहूँ धरती सब लीप ।
जेतनी सिस्टि 'मुहम्मद', सबै भाइ जल दीप ॥ १७ ॥
मकाईल पुनि कहब बुलाई । बरसहुँ मेघ पिरथिवीं जाई ॥
उनै मेघ भरि उठिहैं पानी । गरजि गरजि बरसहिं अ्रतवानी ॥
झरी लागि चालिस दिन राती । घरी न निबुसै एकहु भाँती ॥
छूटि पानि परलय की नाईं । चढ़ा छापि सगरिउँ दुनियाईं ॥
बूड़हिं परबत मेरु पहारा । जल हुलि उमड़ि चलै असरारा ॥
जहँ लगि मगर माछ जित होई । लेइ बहाइ जाहि भुइँ धोई ॥
दोहा
सून पिरथिवीं होइहि, बूझे हँसै उठाइ ।
एतनि जो सिस्टि 'मुहम्मद', सो कहँ गई हेराइ ॥ १८ ॥
पुनि इसराफीलहिं फरमाए । फूँकै, सब संसार उड़ाए ॥
दै मुख सूर भरै जो साँसा । डोलै धरती, लपत अकासा ॥
(१६) मैकाइल = मकाईल नामक फरिश्ता । घुटि = जमकर । गोट = गोले । उधिरत उठै = उधड़ती या उचटती जाती है । (१७) जिबरईल = एक फरिश्ता । केउ = कोई (अवधी) । बिगंध = दुर्गंध । भाड = भासित होती है, जान पड़ती है । जल दीप = नदी या समुद्र के बीच पड़ा सुनसान टापू । (१८) मकाईल = एक फरिश्ता । अ्रत- वानी = (?) । निबुसै = (मेह) थमता है, निकलता है । हुलि = ठिलकर । असरारा = लगातार । (१६) इसराफील = एक फरिश्ता । सूर = तुरही बाजा (अरबी) ।
भुवन चौदहो गिरि मनु डोला । जानौ घालि झुलाव हिंडोला ॥
पहिले एक फूँक जो आई । ऊँच नीच एक सम होइ जाई ॥
नदी नार सब जैहैं पाटी । अस होइ मिलै ज्यौं ठाढ़ो माटी ॥
दूसरि फूँक जो मेरु उड़ैहैं । परबत समुद एक होइ जैहैं ॥
चाँद सुरुज तारा घट टूटै । परतहि खंभ सेस घट फूटै ॥
दोहा
तिसरे बजर महाउब, अस भुइँ लेब महाइ ।
पूरब पछिउँ 'मुहम्मद', एक रूप होइ जाइ ॥ १९ ॥
अजराइल कहँ बेगि बोलावै । जीउ जहाँ लगि सबै लियावै ॥
पहिले जिउ जिबरैल क लेई । लोटि जीउ मैकाइल देई ॥
पुनि जिउ देइहि इसराफीलू । तीनिहु कहँ मारै अजराईल ॥
काल फिरिस्तन केर जौ होई । कोइ न जागै, निसि असि होई ॥
पुनि पूछब जम ? सब जिउ लीन्हा । एकौ रहा बाँचि जो दीन्हा ? ॥
सुनि अजराइल आगे होइ आउब । उत्तर देब, सीस भुइँ नाउब ॥
आयसु होइ करौ अब सोई । की हम, की तुम, और न कोई ॥
दोहा
जौ जम आन जिउ लेत हैं, संकर तिन्हहु कर जिउ लेब ।
सो अवतरें 'मुहम्मद', देखु तहूँ जिउ देब ॥ २० ॥
पुनि फरमाए आपु गोसाईं । तुमहूँ दैउ जिवाइहि नाहीं ॥
सुनि आयसु पाछे कहँ ढाए । तिसरी पौरि नाँघि नहिं पाए ॥
परत जीउ जब निसरन लागै । होइ बड़ कस्ट, घरी एक जागै ॥
प्रान देत सँवरै मन माहाँ । उवत धूप धरि आवत छाहाँ ॥
जस जिउ देत मोहिं दुख होई । ऐसे दुखै अहा सब कोई ॥
जी जनत्यों अस दुख जिउ देता । तौ जिउ काहू केर न लेता ॥
लौटि काल तिन्हहूँ कर होवै । आइ नींद, निधरक होइ सोवै ॥
दोहा
भंजन, गढ़न सँवारन, जिन खेला सब खेल ।
सब कहँ टारि 'मुहम्मद', अब होइ रहा अकेल ॥ २१ ॥
चालिस बरस जबहिं होइ जैहैं । उठिहि मया, पछिले सब ऐहैं ॥
मया मोह कै किरपा आए । आपहि काढ़ि आप फरमाए ॥
मैं संसार जो सिरजा एता । मोर नावँ कोई नहिं लेता ॥
लपत = लपता है । खंभ = स्तंभ रूप पर्वत । बजर = बज्र । महाउब = मथाएगा । (२०) अजराईल = मारनेवाला फरिश्ता । पुनि पूछब = खुदा फिर पूछेगा । बाँचि जो दीन्हा = जिसको बचा दिया । की हम की तुम = अब तो बस हम हैं ! या तुम हो । जम = यमराज जो पैगंबरी मजहबों में अजराईल कहलाता है । संकर = शंकर, शिव जो महाकाल हैं । तहूँ = तू भी । (२१) ढाए = ढह पड़े, गिर पड़े । उवत धूप छाहाँ = अंत समय में जब ज्ञान होता है तब मृत्यु
का अंधकार घेर लेता है । आखिरी कलाम
जेतने परे सब सबहिं उठावौं । पुल सरात कर पंथ रँगावौं ॥
पाछे जिए पूछौं अब लेखा । नैन माहँ जेता हौं देखा ॥
जस जाकर स्रवन मैं सुना । धरम पाप, गुन औगुन गुना ॥
कै निरमल कौसर अन्हवावौं । पुनि जीउन्ह बैकुंठ पठावौं ॥
दोहा
मरन गँजन घन होइ जस, जस दुख देखत लोग ।
तस सुख होइ 'मुहम्मद', दिन दिन मानै भोग ॥ २२ ॥
पहिले सेवक चारि जियाउब । तिन्ह सब काजै काज पठाउब ॥
जिबरईल औ मैकाईलू । असराफील औ अजराईलू ॥
जिबरईल पिरथिवीं महँ आए । आइ मुहम्मद कहँ गोहराए ॥
जिबरईल जग आइ पुकारब । नावँ मुहम्मद लेत हँकारब ॥
होइहैं जहाँ मुहम्मद नाऊँ । कहउ लाख बोलिहैं एक ठाऊँ ॥
ढूँढ़त रहै, कतहुँ नहिं पावै । फिरि कै जाइ मारि गोहरावै ॥
कहै 'गोसाँईं ! कहाँ वै पावौं । लाखन बोलैं जौ रे बोलावौं ॥
दोहा
सब धरती फिरि आएउँ, जहाँ नावँ सो लेउँ ॥
लाखन उठैं मुहम्मद, केहि कहँ उत्तर देउँ ?' ॥ २३ ॥
जिबराइल पुनि आयसु पावै । सूँघै जगत ठाँव सो पावै ॥
बास सुबास लेउ है जहाँ । नावँ रसूल पुकरसि तहाँ ॥
जिबराइल फिरि पिरथिवीं आए । सूँघत जगत ठाँव सो पाए ॥
उठहु मुहम्मद, होहु बड़ नेगी । दैन जोहार बोलावहिं बेगी ॥
बेगि हँकारेउ उमत समेता । आवहु तुरत साथ सब लेता ॥
एतने बचन ज्योहिं मुख काढ़े । सुनत रसूल भए उठि ठाढ़े ॥
जहँ लगि जीव मुकहि सब पाए । अपने अपने पिंजरे आए ॥
दोहा
कइउ जुगन के सोवत, उठे लोग मनो जागि ।
अस सब कहैं 'मुहम्मद', नैन पलक ना लागि ॥ २४ ॥
उठत उमत कहँ आलस लागै । नींद भरी सोवत नहिं जागै ॥
पौढ़त बार न हम कहँ भएऊ । अबहिंन अवधि आइ कब गएऊ ॥
जिबराइल तब कहब पुकारी । अबहूँ नींद न गई तुम्हारी ॥
सोवत तुमहि कइउ जुग बीते । ऐसे तौ तुम मोहे, न चीते ॥
(२२) पुल सरात = वह पुल जिसे कयामत के दिन सब जीवों को पार करना पड़ेगा और जो पुण्यात्माओं के लिये खास चौड़ा और पापियों के लिये बाल बराबर पतला हो जायगा । कौसर = बिहिश्त (स्वर्ग) की एक नदी या चश्मा । गँजन = गंजन, पीड़ा, क्लेश । (२३) काजै काज = एक एक काम पर । गोहराए = पुकारा । मारि गोहरावै = बहुत पुकारता है (अवधी) (२४) नेगी = प्रसाद या इनाम पानेवाले । जुहार देन = बंदगी के लिये । उमत = उम्मत, पैगंबर के अनुयायियों का समूह । मुकहि पाए = कब्रों से छूट पाए । पिंजरे = अर्थात् शरीर । (२५) पौढ़त = लेटते या सोते । बार = देर । अबहिन = अभी ही; इतनी जल्दी ।
कइउ करोरि बरस भुइँ परे । उठहु न बेगि मुहम्मद खरे ॥
सुनि कै जगत उठिहि सब भारी । जेतना सिरजा पुरुष औ नारी ॥
नँगा नाँग उठिहैं संसारू । नैना होइहैं सब के तारू ॥
कोइ न केहु तन हेरै, दिसटि सरग सब केरि ।
ऐसे जतन 'मुहम्मद', सिस्टि चलै सब घेरि ॥ २५ ॥
पुनि रसूल जैहैं होइ आगे । उम्मत चलि सब पाछे लागै ॥
अंध गियान होइ सब केरा । ऊँच नीच जहँ होइ अभेरा ॥
सबहीं जियत चहैं संसारा । नैनन नीर चलै असरारा ॥
सो दिन सँवरि उमत सब रोवै । ना जानौं आगे कस होवै ॥
जो न रहै, तेहि का यह संगा ? । मुख सूखै तेहि पर यह दंगा ॥
जेहि दिन कहँ नित करत डरावा । सोइ दिवस अब आगे आवा ॥
जौ पै हमसे लेखा लेबा । का हम कहब, उत्तर का देबा ॥
एत सब सँवरि कै मन महँ, चहैं जाइ सो भूलि ।
पैगहि पैग 'मुहम्मद', चित्त रहै सब भूलि ॥ २६ ॥
पुल सरात पुनि होइ अभेरा । लेखा लेब उमत सब केरा ॥
एक दिसि बैठि मुहम्मद रोइहैं । जिबरईल दूसर दिसि होइहैं ॥
बार पार किछु सूझत नाहीं । दूसर नाहिं, को टेकै बाहीं ? ॥
तीस सहस कोस कै बाटा । अस साँकरि जेहि चलै न चींटा ॥
बारह तें पतरा अस भीना । खड़ग धार से अधिकौ पैना ॥
दोउ दिसि नरक कुंड है भरे । खोज न पाउब तिन्ह महँ परे ॥
देखत काँपै लागै जाँघा । सो पथ कैसे जैहै नाँघा ॥
तहाँ चलत सब परखब, को रे पूर, को ऊन ।
अवहि को जान 'मुहम्मद', भरे पाप औ पून ॥ २७ ॥
जो धरमी होइहि संसारा । चमकि बीजु अस जाइहि पारा ॥
बहुतक जनौं तुरँग भल धइहैं । बहुतक जानु पखेरु उड़इहैं ॥
बहुतक चाल चलै महँ जइहैं । बहुतक मरि मरि पाँव उठइहैं ॥
बहुतक जानु पखेरु उड़इहैं । पवन कै नाईं तेहि महँ जइहैं ॥
बहुतक जानौं रेंगहिं चींटी । बहुतक बहैं दाँत धरि माटी ॥
बहुतक नरक कुंड महँ गिरहीं । बहुतक रकत पीब महँ परहीं ॥
जेहि के जाँघ भरोस न होई । सो पंथी निभरोसी रोई ॥
खरे = खड़े । तारू = तालू में । केहु तन = किसी की ओर । ऐसे जतन = इस ढंग से, इस प्रकार । (२६) असरारा = लगातार । चित्त भूलि रहै = मन में बार बार आया करता है । (२७) अभेरा = सामना । चींटा = चींटी । खोज = पता, निशान । ऊन = त्रुटिपूर्ण, ओछा । (२८) बीजु =
बिजली । चाल चलै महँ = मनुष्य की साधारण चाल से । तरास = त्रास । आखिरी कलाम
परै तरास जो नाँघत, कोइ रे वार, कोइ पार ।
कोइ तिर रहा 'मुहम्मद', कोइ बूड़ा मझधार ॥ २८ ॥
लौटि हँकारब वह तब भानू । तपै कहैं होइहि फरमानू ॥
पूछब कटक जेता है आवा । को सेवक, को बैठे खावा ? ॥
जेहि जस आउ जियन मैं दीन्हा । तेहि तस संबर चाहौं लीन्हा ॥
अब लगि राज देस कर भूजा । अब दिन आइ लेखा कर पूजा ॥
छह मास कर दिन करौं आजू । आउ क लेउँ औ देखौं साजू ॥
से चौराहै बैठे आवै । एक एक जन कें पूछि पकरावै ॥
नीर खीर हुँत काढ़ब छानी । करब निनार दूध औ पानी ॥
धरम पाप फरियाउब, गुन औगुन सब जोख ।
दुखी न होहु 'मुहम्मद', जोखि लेब धरि जोख ॥ २९ ॥
पुनि कस होइहि दिसव छ भासू । सूरज आइ तपहिं होइ पासू ॥
कै सउहँ नियरे रथ हाँकै । तेहिकै आँच गूद सिर पाकै ॥
बजरागिन अस लागै तैसे । बिलखैं लोग पियासन वैसे ॥
उनै अगिन अस बरसै घामू । भूँज देह, जरि आवै चामू ॥
जेइ किछु धरम कीन्ह जग माहाँ । तेहि सिर पर किछु आवै छाहाँ ॥
धरमिहि आनि पियाउब पानी । पापी बपुरहि छाहँ न पानी ॥
जो राजता सो काज न आवै । इहाँ क दीन्ह उहाँ सो पावै ॥
जो लखपती कहावै, लहै न कौड़ी आधि ।
चौदह धजा 'मुहम्मद' ठाढ़ करहिं सब बाँधि ॥ ३० ॥
सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाए तेते ॥
एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥
घामै दुखी उमत जेहि केरी । सो का मानै सुख अबसेरी ? ॥
दुखी उमत तौ पुनि मैं दुखी । तेहि सुख होइ तौ पुनि मैं सुखी ॥
पुनि करता कै आयसु होई । उमत हँकारु लेखा मोहि देई ॥
कहब रसूल कि आयसु पावौं । पहिले सब धरमी लै आवौं ॥
होइ उतर 'तिन्ह हौं ना चाहौं । पापी घालि नरक मह बाहौं ॥
(२९) तपै कहै तपन को (अवध) । संबर सामान, कमाई । भूजा भोग किया । से वह; सूर्य । एक एक....पकरावै एक एक प्राणी से सवाल जवाब करके उसे पकड़ाए । कै कहूँ, को । जोख तराजू । (३०) सउहँ सामने । गूद सिर पाकै खोपड़ी का गूदा पक जाता है तैसे बैठे । बपुरहि बेचारे को । राजता राजत्व, राजापन । चौदह धजा चौदह ध्वजियों या बंधनों से । (३१) पाए पाए या आसन पर । अबसेरी दुःख से व्यग्र, चिंताग्रस्त । बाहौं फेकूँ, डालूँ ।
पाप पुन्नि कै तखरी, होइ चाहत है जोख ।
अस मन जानि 'मुहम्मद', हिरदै मानेउ सोच ॥ ३१ ॥
पुनि जैहैं आदम के पासा । 'पिता ! तुम्हारि बहुत मोहि आसा ॥
'उमत मोरि गाढ़े है परी । भा न दान; लेखा का धरी ? ॥
'दुखिया पूत होत जो अहै । सब दुख पै बापें सों कहै ॥
'बाप बाप कै जो कछु खाँगै । तुमहिं छाँड़ि कासों पुनि माँगै ? ॥
'तुम जठेर पुनि सबहिन्ह केरा । अहौं संतति, मुख तुम्हरै हेरा ॥
'जेठ जठेर जो करिहैं बिनती । ठाकुर तबहीं सुनिहैं मिनती ॥
'जाइ दैउ सो बिनवौं रोई । मुख दयाल दाहिन तोहि होई ॥
'कहहु जाइ अस देखेउ, जेहि होवै उदघाट ।
'बहु दुख दुखी 'मुहम्मद', बिधि ! संकट तेहि काट' ॥ ३२ ॥
'सुनहु पूत , आपन दुख कहऊँ । हौं अपने दुख बाउर रहऊँ ॥
'होइ बैकुंठ जो आयसु ठेलेउँ । दूत के कहे मुख गोहूँ मेलेउँ ॥
'दुखिया पेट लागि सँग धावा । काढ़ि बिहिस्त से मैल ओढ़ावा ॥
'परलै जाइ मंडल संसारा । नैन न सूझै, निसि अँधियारा ॥
'सकल जगत मैं फिरि फिरि रोवा । जीउ अजान बाँधि कै खोवा ॥
'भएँ उजियार पिरथिवीं जइहौं । औ गोसाई कै अस्तुति कहिहौं ॥
'लौटि मिलै जौ हौवा आई । तौ जिउ कहँ धीरज होइ जाई ॥
'तेहि हुत लाजि उठै जिउ, मुँह न सकौं दरसाइ ।
'सो मुँह लेइ, 'मुहम्मद' ! बात कहौं का जाइ' ? ॥ ३३ ॥
पुनि जैहैं मूसा क दोहाई । 'ऐ बंधू ! मोहिं उपकरु आई ॥
तुम कह बिधिना आयसु दीन्हा । तुम नेरे होइ बातैं कीन्हा ॥
'उम्मत मोरि बहुत दुख देखा । भा न दान, माँगत है लेखा ॥
'अब जौ भाइ मोर तुम अहौ । एक बात मोहिं कारन कहौ ॥
'तुम अस ठटै बात का कोई । सोई कहौ बात जेहि होई ॥
'गाढ़े मीत ! कहौं का काहू ? । कहहु आइ जेहि होइ निबाहू ॥
'तुम सँवारि कै जानहु बाता । मकु सुनि माया करै बिधाता ॥
मिनती करहु मोर हुँत सीस नाइ, कर जोरि' ।
हा हा करै 'मुहम्मद' 'उमत दुखी है मोरि' ॥ ३४ ॥
तखरी = तकड़ी, तराजू (पंजाबी) । (३२) गाढ़े = संकट में । धरी = धरिहि, धरेगी (अवध) । खाँगै = घटता है । जठेर = बड़ा जेठा, बुजुर्ग । उदघाट = छुटकारा. उद्धार । (३३) बाउर = बावला । मैल ओढ़ावा = कलंक लगा दिया । भए = होने पर । तेहिहुत = उसी से, उसी कारण । (३४) उपकरु = उपकार कर । ठटै = बनाए । बात जेहि होई = जिससे काम हो जाय । कै जानहु बाता = बात
करना जानते हो । मकु = कदाचित्, शायद । मोर हुत = मेरी ओर से । आखिरी कलाम
३०५
'सुनहु रसूल बात का कहौं । हौं अपने दुख बाउर रहौं ॥
'कै कै देखेउ बहुत ढिठाई । मुँह गरुवाना खात मिठाई ॥
'पहिले मो कहँ आयसु दीन्हा । फरऊँ से मैं झगरा कीन्हा ॥
'रोधि नील कै डारेसि भूरा । फुर भा झूठ, झूठ भा फुरा ॥
'पुनि देखे बैकुंठ पठाएउँ । एकौ दिसि कर पंथ न पाएउँ ॥
'पुनि जो मो कह दरसन भएऊ । कोह तूर रावट होइ गएऊ ॥
'भाँति अनेक मै फिर फिर जापा । हर दावँन कै लीन्हेसि झाँपा ॥
'निरखि नैन मैं देखौं, कतहुँ परै नहि सूझि ।
'रहौं लजाइ, मुहम्मद ! बात कहौं का बूझि' ? ॥ ३५ ॥
दौरि दौरि सबहीं पहँ जैहैं । उतर देइ सब फिरि बहरैहैं ॥
ईसा कहिन कि कस ना कहत्यों । जौ किछु कहै क उत्तर पवत्यों ॥
मैं मुए मानुस बहुत जियावा । औ बहुतै जिउ दान दियावा ॥
इब्राहिम कह, कस ना कहत्यों । बात कहे बिन मैं ना रहत्यों ॥
मोसों खेल बंधु जो खेला । सर रचि बाँधि अगिन महँ मेला ॥
तहाँ अगिन हुँत भइ फुलवारी । अपडर डरौं, न परहि सँभारी ॥
नूह कहिन, जब परलै आवा । सब जग बूड़, रहेउँ चढ़ि नावा ॥
काह कहै काहू से, सबै ओड़ाउब भार ।
जस पै बनै 'मुहम्मद', करु आपन निस्तार ॥ ३६ ॥
सबै भार अस ठेलि ओड़ाउब । फिरि फिरि कहब, उतर ना पाउब ॥
पुनि रसूल जैहैं दरबारा । पैंग मारि भुइँ करब पुकारा ॥
तूँ सब जानसि एक गोसाईं । कोइ न आब उमत के ताईं ॥
जेहि सों कहौं सो चुप होइ रहै । उमत लाइ केहु बात न कहै ॥
मोर चाँड़ केहु नहिं चाँड़ा । देखा दुख, सबही मोहि छाँड़ा ॥
मोहि अस तहीं लाग करतारा । तोहिं होइ भल साँइ निस्तारा ॥
जो दुख चहसि उमत कहँ दीन्हा । सो सब मैं अपने सिर लीन्हा ॥
(३५) मुँह गरुवाना...मिठाई = कृपा की भिक्षा माँगते माँगते मुँह भारी हो गया है, अब और मुँह नहीं खुलता । फरऊँ = मिस्र का बादशाह जिसने इसराईल की संतानों को बहुत सताया था और वे मूसा के नायकत्व में मिस्र से भागे थे (जब मिस्र की सेना ने उनका पीछा किया था तब खुदा ने उनके लिये तो नील नद या समुद्र का पानी हटा दिया था, पर मिस्री सेना के सामने उसे और बढ़ा दिया था) । रोधि = रोककर । फुर = सच, सत्य । कोह तूर = वह पहाड़ जिसपर मूसा को ईश्वर की ज्योति दिखाई पड़ी थी । रावट महल, जगमगाता स्थान । जापा, पुकारा । हर दाँवन = हर अवसर पर । झाँपा = परदा, ओट । (३६) बहरैहैं = बहलाएगा । सर = चिता । (३७) मारि ठेलि ओड़ाउब = भार मुहम्मद पर ही डालेंगे । पैंग मारि = आसन मारकर । केहु = कोई (अवधी) चाँड़ = चाह, कामना । तहीं = तू ही । गँजन = पीड़ा, साँसत ।
लेखि जोखि जो आवै, मरन गँजन दुख दाहू ।
सो सब सहै 'मुहम्मद', दुखी करहु जनि काहू ॥ ३७ ॥
पुन रिसाइ कै कहै गोसाईं । फातिम कह ढूँढ़हु दुनियाईं ॥
का मोसौं उन झगरा पसारा । हसन हुसैन कहौं को मारा ॥
ढूँढ़ै जगत कतहुँ ना पैहँ । फिरि कै जाइ मारि गोहरे हैं ॥
ढूँढ़ि जगत दुनिया सब आएउँ । फातिम खोज कतहु ना पाएउँ ॥
'आयसु होइ, अहँ पुनि कहाँ' । उठा नाद हैं धरती महाँ ॥
'मुँदै नैन सकल संसार । बीबी उठै, करै निस्तारा ॥
जो कोइ देखै नैन उधारी । तेहि कह छार करौं धरि जारी' !
आयसु होइहि दैउ कर, नैन रहैं सब भाँपि ।
एक ओर डरै 'मुहम्मद', उमत मरै डर काँपि ॥ ३८ ॥
उठिन बीबी तब रिस किन्हें । हसन हुसैन दुबी सँग लिन्हें ॥
'तैं करता हरता सब जानसि । झूठ फुरै नीक पहिचानसि ॥
हसन हुसैन दुबी मोर बारे । दुनहु यजीद कौन गुन मारे ? ॥
'पहिले मोर नियाव निवारू । तेहि पाछ छेतना संसारू ॥
समुझै जीउ आगि महँ दहौं । देहु दादि तौ चुप कै रहौं ॥
'नाहि त देत सराप रिसाई । मारौं आइ अर्श जरि आई ॥
'बहु संताप उठै निज, कैसहुँ समुझि न जाइ ।
बरजहु मोह 'मुहम्मद', अधिक उठै दुख दाइ ॥ ३९ ॥
पुनि रसूल कहँ आयसु होई । फातिम कहँ समुझाबहु सोई ॥
'मारें आइ अर्श जरि जाइ ! तेहि पाछ आपुहि पछिताई ॥
'जो नहिं बात क करै बिबादू । जानौ मोहिं दीन्ह परसादू ॥
'जो बीबी छाँड़हि यह दोख । तौ मैं करौं उमत कै मोख ॥
'नाहि त घालि नरक मह जागै । लोटि जिआइ मुए पर मारै ॥
'अग्नि खंभ देखहु जस आए । हिरकत हार होइ तेहि लागे ॥
'चहु दिसि फेरि सरग लै लाबौं । मुँगरन्ह मारौं, लोह जटावौं ॥
तेहि पाछै धरि मारौं, घालि नरक के काठ ।
बीबी कहँ समुझाबहु, जौ रे उमत कै चाँट ॥ ४० ॥
(३८) फातिम = बीबी फातिमा, मुहम्मद साहब की कन्या जिसके दो लड़के हसन और हुसैन करबला के मैदान में कष्ट से मारे गए और कोई खड़ा न हुआ । मारि = बहुत (अवध) । गोहरइहैं = पुकारेंगे । नाद = आकाश- वाणी । (३९) किहँ, = लिहैं = किए लिए (अवध) । बारे = बालक, लड़के । दादि देहु = इंसाफ करो । अर्श = आसमान (का सबसे ऊँचा तबक) । दुख- दाद = दुखदाह । (४०) जानौ मोहिं...परसाद = ता समझो कि मैं प्रसन्न हो गया या मैंने बख्श दिया । लौटि = फिर फिर । हिरकर = सटते ही । काठ =
किनारे, तट पर । जो रे...चाँट = यदि तुम्हें अपनी उम्मत की इतनी चाह है । आखिरी कलाम
पुनि रसूल तलफत तह जैहैं । बीबिकहि बार बार समुझैहैं ॥
'बोदी कहब, घाम कत सहहु ? । कस ना बैठि छाह महँ रहहु ? ॥
'सब पैगंबर बैठे छाहीं । तुम कस तपौ बजर अस माहाँ ? ॥
'कहब रसूल, छाँह का बैठौं ? । उमत लागि धूपह नहिं बैठी ॥
'तिन्ह सब बाँधि घाम मह, मेले । का भा मोरे छाह अकेले ॥
'तुम्हरे कोह सबहि जो मरे । समुझहु जीउ, तवहि निस्तरे ॥
'जो मोहिं वही निवारहु कोहू । तब बिधि करे उमत पर छोहू' ॥
वह दुख देखि पिता कर, बीबी समुझा जीउ ।
जाइ मुहम्मद विनवा, ठाढ़ पाग के गोउ ॥ ४१ ॥
तव रसूल के कहँ भइ माया । जिन चिंता मानहु, भइ दाया ॥
जी बीबी अबहूँ रिसिआई । सबहि उमत सिर आड बिसाई ॥
अब फातिम कह बेगि बोलावह । देइ दाद तौ उमत छोड़ावह ॥
फातिम आइ कै पार लगावा । धरि यजीद दोजख मह गवा ॥
अंत कहा, धरि ज्ञान से मारै । जीउ देइ देइ पुनि लोटि पछारै ॥
तस मारब जेहि भुइँ गड़ि जाई । खन खन मारै लोटि जियाई ॥
बजर अगिन जारब के छारा । लोटि दहै जस दहै लोहारा ॥
मारि मारि घिसियावैं, धरि दोजख मह देव ।
जेतनी सिस्टि 'मुहम्मद', सबहि पुकारै लेब ॥ ४२ ॥
पुनि सब उमत लेब बुलाई । हरु गुरु लागब बहिराई ॥
निरखि रहैती काढ़ब छानी । करब निनार दूध औ पानी ॥
बाप क पूत, न पूत क बापू । पाइहि तहाँ न पुत्रि न पापू ॥
आपहि आप आइ कै परी । कोउ न कोउ क धरहरि करी ॥
कागज काढ़ि लेब सब लेखा । दुख सुख जो पिरथथी महँ देखा ॥
पुनि पियाला लेखा माँगब । उतर देत उन पानी खाँगब ॥
नैन क देखा स्रवन क सुना । कहब, करब, औगुन औ गुना ॥
हाथ, पाँव, मुख, काया, स्रवन, सीस औ आँखि ।
पाप न छुपै 'मुहम्मद', आइ भरै सब साखि ॥ ४३ ॥
देह क रोवाँ बैरी होइहैं । बजर बिया एहि जीउ क रोइहैं ॥
पाप पुन्नि निरमल कै धोउब । राखब पुन्नि, पाप सब खोउब ॥
(४१) बजर धूप । समुझहु जीउ अपने जी में ढ़ाढ़स बाँधो । पाग के गोउ = गले में पगड़ी डालकर, बड़ी अधीनता से । (४२) यजीद = जिसने हसन हुसैन को मारा था । गवा = गया । घिसियावैं = घसीटते हैं । पुकारै लेब = पुकार लेंगे । (४३) हरु = हलका, ओछा । गुरु = भारी, गंभीर । बहिराइ लागब = निकलने लगेंगे । रहैती = रहन सहन, आचरण । निनार =
न्यारा, अलग । धरहरि = धर पकड़, सहायता । करो = करिहि, करेगा । पुनि कौसर पठउब अन्हवाव । जहाँ कया निरमल सब पाव ॥
बुड़की देब देह सुख लागी । पलुहब उठि, सोवत अस जागी ॥
खोरि न्हाइ धोइ सब दुंदू । होइ निबरहिं पुनिउ के चंदू ॥
सब क सरीर गुवास बसाई । चंदन के अस घानी आई ॥
झूठे सबहि, आप पुनि साँचे । सबहि नबी के पीछे वाँचे ॥
नविहि छाँड़ि होइहि सबहि, बारह बरस क राह ।
सब अस जान 'मुहम्मद', होइ बरस के राइ ॥ ४४ ॥
पुनि रसूल नेवतब जेवनारा । बहुत भाँति होइहि परकारा ॥
ना अस देखा, ना अस सुना । जौ सरहीं तौ है दस गुना ॥
पुनि अनेक बिस्तर तहँ डासब । बास सुबास कपूर ते बासब ॥
है आयसु जौ बेगि बोलाव । औ सब उमत साथ लेइ आउब ॥
जिबरईल आगे होइ जइहैं । पग डारै कहँ आयसु देइहैं ॥
चलब रसूल उमत लेइ साथा । परग परग पर नावत माथा ॥
'आबहु भीतर' बेगि बोलाव । बिस्तर जहाँ तहँ बैठाउब ॥
भारि उमत सब बैठी, जोरि के एकै पाँति !
सब के माझ 'मुहम्मद', जानौ दुलह बराति ॥ ४५ ॥
पुनि जेवन कह आवै लागी । सबके आगे धरत न खाँगी ॥
भाँति भाँति कर देखब धारा । जानब ना दहू कौन प्रकारा ॥
पुनि फरमाउब आप गोसाईं । बहुतै दुख देखेउ दुनियाईं ॥
हाथन्ह से जेवन मुख डारत । जीभ प्रसारत दाँत उघारत ॥
कूँचत खात बहुत दुख पाए । तहँ ऐसे जेवनार जेवैं ॥
अब जिन लँटि कस्ट जिउ करहू । सुख सवाद औ इंद्री भरहू ॥
पाँच भूत आतमा सेराई । बैठि अघाउ, उदर ना भाई ॥
ऐस करब पहुनाई, तब होइहि संतोख ।
दुखी न होहु 'मुहम्मद', पोखि लेहु फुर पोख ॥ ४६ ॥
हाथन्ह से केहु और न लेई । जो चाह मुख पैठे सोई ॥
दाँत, जीभ, मुख किछु न डोलाव । जस जस रचि है तस तस खाउब ॥
जेस अन्न बिन कूँचे रँचै । तैस सिठाइ जी कोऊ कूँचै ॥
(४४) कौसर = स्वर्ग की एक नदी या चश्मा । बुड़की = गोता । पलु- हेर । (४५) जौ सरहीं...दस गुना = यदि सराहता हूँ तो उसका दसगुना ठहरता है । (४६) तहँ संसार में । लँटि = स्वर्ग में लौट आकर । सेराई = शीतल तुष्टि । उदर ना भाई = यहाँ पेट नहीं है जिसे भरना पड़े । (४७) तैस सिठाइ...
कूँचै = कूँचने पर वह वैसा ही सीठी सा नीरस लगता है । आखिरी कलाम
एक एक परकार जो आए । सत्तर सत्तर स्वाद सो पाए ॥
जहँ जहँ जाइ के परै जुड़ाई । इच्छा पूजै ,खाइ अघाई ॥
अनचाखे राते फर चाखा । सब अस लेइ अपरस रस चाखा ॥
जलम जलम कै भूख बुझाई । भोजन केरे साथै जाई ॥
जेवन अचवन होइ पुनि, पुनि होइहि खिलवान ।
अमृत भरा कटार, पियहु 'मुहम्मद' पान ॥ ४३ ॥
एक तौ अमृत, वास कपूरा । तेहि कह रहा शराव तहुरा ॥
लागब भरि भरि देइ कटोरा । पुरुष ज्ञान अस भरै महोरा ॥
ओहि के मिठाइ भाँति एक दऊँ । जलम न मानब होइ अब काहूँ ॥
सचु मतवार रहब होइ सदा । रहसै कूदै सदा सरबदा ॥
कबहु न खोवै जलम खुमारी । जनौ बिहान उठै भरि बारी ॥
ततखन बासि बासि जनु धाला । घरी घरी जस लेब पियाला ॥
सबहि क भा मन सो मद पिया । नव अवतार भवा औ जिया ॥
फिरें तंबोल, मया से, कहब 'अपन लेइ खाहु ।
भा परसाद, 'मुहम्मद', उठि बिहिस्त महँ जाहु' ॥ ४४ ॥
कहब रसूल, 'बिहिस्त न जाऊँ । जौ लगि दरस तुम्हार न पाऊँ ॥
उघर न नैन तुम्हि बिनु देखे । सबहि अबिरथा मोरे लेखे ॥
तौ लै केहु बैकुंठ न जाई । जौ लै तुम्हारा दरस न पाई ॥
करु दीदार, देखौं मैं तोही । तौ है जीउ जाइ सुख मोहीं ॥
देखें दरस नैन भरि लेऊँ । सीस नाइ पै झुड़ कह देऊँ ॥
जलम मोर लागा सब थारा । पलै जीउ जो गोउ उभाग ॥
होइ दयाल करु दिसिट फिगवा । तोहि छाँड़ि मोहिं और न भावा ॥
सीस पाय भुइ लावीं, जौ देखौं तोहि आँखि ।
दरसन देखि 'मुहम्मद', हिवे भरीं तोरि साखि ॥ ४५ ॥
सुनहु रसूल ! होत फरमानु । बोल तुम्हार कीन्ह परमानु ॥
तहाँ हुतेंउ जह हुतेंउ न ठाऊँ । पहिले रचेउ मुहम्मद नाऊँ ॥
सिठाइ = सीठी सा फीका लगता है । अपरस = अछूता । जलम = जन्म (अवध) । खिलवान = खिलारी (धनिया, खरबूज आदि के तले बीज जो भोजन के पोछ दिए जाते हैं) । (४४) शराव तहुरा = शरावतहुरा, स्वर्ग की शराव । महोरा = महुअरा, मधु, मद्य । सचु मतवार = आनंद से मतवाला । बिहान बारी = मानो नित्य सुह तक भरा प्याला मिल जाता है । परसाद = प्रसन्नता, कृपा । (४५) अबिरथा = वृथा, व्यर्थ । जाई = जाइहि, जायगा । पाई = पाइहि, पाएगा । जाइ = उत्पन्न हो । जलम = जन्म । थारा = थाला (जिसमें पौधा लगाया जाता है) । गीउ उभाय = गर्दन ऊपर की, ऊपर दृष्टि की । (५०) हुतेंउ = मैं था । हुतेंउ न ठाऊँ = जहाँ कोई स्थान न था, लामकान ।
तुम बिनु अबहूँ न परगट कीन्ह । सहस अठारह कहँ जिउ दीन्ह ॥
चौदह खंड ऊपर तर राखे । नाद बनाइ भेद बहु भाखे ॥
चार फिरिस्तन बड़ अवतारे । सात खंड बैकुंठ सँवारे ॥
सवा लाख पैगंबर सिरजे । कर करतुति ओहहि थे बेधे ॥
औरन्ह कर आगे कत लेखा । जेतना सिरजा सो ओह देखा ॥
तुम तहँ एसा सिरजा, आप के अंतरहेत ।
देखहु दरस 'मुहम्मद' ! आपनि उमत समेत ॥ ५० ॥
सुनि फरमान हरण जिउ बाढ़े । एक पाँव से भए उठि ठाढ़े ॥
भारि उमत लागी तब तारी । जेतना सिरजा पुरुष औ नारी ॥
लाग सबन्ह सहूँ दरसन होई । ओह बिनु देखे रहा न कोई ॥
एक चनकार होइ उजियारा । छपै बीजु तेहि के चमकारा ॥
चाँद सुरुज ठपिहैं बहूँ जोती । रतन पदारथ मानिक मोती ॥
सो मनि दिगँ जो कीन्हि थिराई । छपा सो रंग गात पर आई ॥
ओह रूप निरमल होइ जाई । और रूप ओह रूप समाई ॥
ना अस कबहुँ देखा, ना केहु ओह भाँति ।
दरसन देखि 'मुहम्मद' मोहि परे बहु भाँति ॥ ५१ ॥
दुइ दिन लहि बोड़ मुधि न सँभारे । धिनु सुधि रहे, न नैन उधारे ॥
तिसरे दिन जिबरैल जी आए । सब पदमाने आनि जगाए ॥
जे हिय भेदि सुदरसन राते । परे परे लौटि जस माते ॥
सब अस्तुति कै करै बिमेखा । ऐस रूप हम कतहूँ न देखा ॥
अब सब गए जलम दुख धोरे । जो चाहिय हुति पाबा सोई ॥
अरु निहचिंत जीउ बिधि कीन्हा । जी पिय आपन दरसन दीन्हा ॥
मन कै जेति आस सब पूजी । रही न कोई आस गति दूजी ॥
मरन, गँजन औ परिहस, दुख, दलिट्र सब भाग ।
सब सुख देखि 'मुहम्मद', रहस कूद जिउ लाग ॥ ५२ ॥
जिबरैल कह आयसु होइहि । अठरिन्ह आइ आगे पय जोइहि ॥
उमत रसूल केर बहिराउब । के असवार बिहिस्त पहुँचाउब ॥
सात बिहिस्त बिधिन अवतारा । औ आठई शदाद सवारा ॥
सो सब देव उमत कह बाँटी । एक बराबर सब कहँ आँटी ॥
अबहूँ = अब तक । नाद = कलाम । कहि करनुति = कर्तव्य बतलाकर । अंतरहेत = अंतर्हित, ओट में, अदृश्य । (५१) भारि = सारी, कुल । तारी लागी = टकटकी लग गई, पलकों का गिरना बंद हो गया । सहुँ = संमुख, साक्षात् । चमकार = चमत्कार, ज्योति । कीन्हि थिराई = स्थिर रह सके । छपा सो रंग आई = उनके शरीर पर उस ज्योति की छाप लग गई । (५२) लहि = तक । परिहरा = ईर्ष्या, डाह, कुढ़न (अवध) ।
रहम = आनंद । (५३) अठरी = अप्सरा । बहिराउब = निकालेंगे, चलाएंगे । ३११
आखिरी कलाम
एक एक कह दीन्ह निवासू । जगत लोक विरसें क बिलासू ॥
चालिस चालिस हूरें सोई । ओ सँग लागि बियाही जोई ॥
औ सेवा कहँ अछरिन्ह केरी । एक एक जनि कहँ सौ सौ चेरी ॥
ऐसे जतन बियाहें, जस साजै वरियात ।
दूलह जतन 'मुहम्मद', बिहिस्त चले बिहँसात ॥ ५३ ॥
जिबराइल इतात कह धाए । चोल आनि उम्मत पहिराए ॥
पिरहहु दगल सुरंग रँग राते । करहु सोहाग जनहुँ मद माते ॥
ताज कुलह सिर मुहम्मद सोहे । चंद बदन औ कोकब मोहे ॥
न्हाइ खोरि अस बनी बराता । नबी तंबोल खात मुख राता ॥
तुम्हरे रुचे उमत सब आनब । ओ सँवारि बहु भाँति बखानब ॥
खड़े गिरत मदमाते ऐहैं । चढ़ि कै घोड़न कहँ कुदरैहैं ॥
जिन भरि जलम बहुत हिय जारा । बैठि पाँव देइ जम ते पारा ॥
जैसे नबी सवारे, तैसे बने पुनि साज ।
दूलह जतन 'मुहम्मद', बिहिस्त करै सुख राज ॥ ५४ ॥
तानब छत्र मुहम्मद माथे । ओ पहिरै फूलन्ह बिनु गाँथे ॥
दूलह जतन होब असवारा । लिए बरात जैहैं संसारा ॥
रचि रचि अछरिन्ह कीन्ह सिंगारा । बास सुबास उठै महकारा ॥
आज रसूल बियाहन ऐहैं । सब दुलहिन दूलह सह नेहैं ॥
आरति करि सब आगे ऐहैं । नंद सरोदन सब मिलि गैहैं ॥
मंदिरन्ह होइहि सेज बिछावन । आजु सबहि कहँ मिलिहैं रावन ॥
बाजन बाजै बिहिस्त दुवारा । भीतर गीत उठै झनकारा ॥
बनि बनि बैठो अछरी, बैठि जोहैं कबिलास ।
बेगिहि आउ 'मुहम्मद', पूजै मन कै आस ॥ ५५ ॥
जिबराइल पहिले से जैहैं । जाइ रसूल बिहिस्त नियरैहैं ॥
खुलिहैं आठौ पँवरि दुवारा । ओ पैठे लागे असवारा ॥
सकल लोग जब भीतर जैहैं । पाछे होइ रसूल सिधैहैं ॥
मिलि हूरें नेवछावर करिहैं । सबके मुखन्ह फूल अस झरिहैं ॥
रहसि रहसि तिन करब किरीड़ा । अगर कुंकुमा भरा सरीरा ॥
बहुत भाँति कर नंद सरोदू । बास सुबास उठै परमोदू ॥
अगर, कपूर, बेना, कस्तूरी । मंदिर सुबास रहब भरपूरी ॥
विरसें = विलास करते हैं । हूर = बिहिश्त की अप्सरा । जोई = जोय, स्त्री । ऐसे जतन = ऐसे ढंग से, इस प्रकार । (५४) इतात = आज्ञापालन । चोल = वस्त्र, पहनावा । दगल = लंबा अगरखा । कुलह = टोप । बहुत हिय जारा
ईश्वर के विरह में लीन रहे । जतन = प्रकार, समान । (५५) नंद
[सम्पादित करें]आनंद । सरोद = स्वर । (फारसी) । रावन = रमण करनेवाला, प्रियतम । (५६) पँवरि = ड्योढ़ी ।
सोवन आजु जो चाहै, साजन मरदन होइ ।
देहि सोहाग 'मुहम्मद', सुख विरसै सब कोड़ ॥ ५७ ॥
बैठि बिहिस्त जौ नौनिधि पैहँ । अपने अपने मैंदिर सिधैहैं ॥
एक एक मंदिर सात दुवारा । अगर नँदन के लाग केवारा ॥
हरे हरे बहु खंड सँवारे । बहुत भाँति दइ आपु सँवारे ॥
सोने रूपै घालि उचावा । निरमल कहँ कहँ लाग गिलावा ॥
हीरा रतन पदारथ जरै । तेहि क जोति दीपक जस बरै ॥
नदी दूध अतरन क बहहीं । मानिक मोति परे भुड़ रहहीं ॥
ऊपर गा अव छाह सोहाई । एक एक खंड चहा दुनियाई ॥
तात न जुड़ न कुनकुन, दिवस रात नहिं दुख ।
नींद न भूख 'मुहम्मद', सब विरसै अति सुख ॥ ५७!
देखत अछरिन केरि निकाई । रूप तें मोहि रहत मुरछाई ॥
लाल करत मुख जोहब पासा । कीन्ह चहँ किछु भोग बिलासा ॥
ऐ सब आवै मोरे निवासा । तुम आगे लेउ अब कबिलासा ॥
जो अस रूप पाट परधानी । औ सबहिन्ह चेरन्ह क रानी ॥
बदन जोति मनि माथे भागु । औ बिधि आगर दीन्ह सोहागु ॥
साहस करै सिंगार सँवारी । रूप सुरुस पदमिनी नारी ॥
पाट बैठि नित जोहैं, बिरहन्ह जारै माँस ॥
दीन दयाल 'मुहम्मद', मानहु भोग बिलास ॥ ५८ ॥
सुनहिं सुरुस अवहि बहु भाँती । इनहि चाहि जो है रूपवँती ॥
सातों पँवरि नवत तिन्ह पेखब । सातूँ आए सो कौकुत देखब ॥
चले जाब आगे तेहि आसा । जाइ परब भीतर कबिलासा ॥
तखत बैठि सब देखब रानी । जे सब चाहि पाट परधानी ॥
दसन जोति उठै चमकारा । सकल बिहिस्त होइ उजियारा ॥
बारहबानी कर जो सोना । तेहि तें चाहि रूप अति लोना ॥
निरमल बदन चंद क जोती । सब क सरीर दिपै जस मोती ॥
बास सुबास छुवै जेहि बेधि भँवर कहँ जात ।
बर सो देखि 'मुहम्मद' हिरदै महँ न समात ॥ ५९ ॥
पैग पैग जस जस नियराउब । अधिक सवाद मिलै कर पाउब ॥
समाइ रहै चुप लागे । सब कहँ आइ लेहिं होइ आगे ॥
साजन = स्वजन, प्रियतम । मरदन = आलिंगन । विरसै = बिलसे (५७) आधा गरम । (५८) तात = गरम । कुनकुन = कुनकुना = रूपवती । कौकुत = कौतुक, चमत्कार । चाहि = बढ़कर । बास सुबास जात = जिस भौंरे को बढ़कर छूने के लिये सुगंध जाती है ।
बिसरहु दूलह जोबन बारी । पाएउ दुलहिन राजकुमारी ॥
एहि महँ सो कर गहि लेइ जैहैं । आध तखत पै लै बैठैहैं ॥
सब अछूत तुम कहँ भरि राखै । महै सवाद होइ जौ चाखै ॥
नित पिरीत, नित नव नव नेहु । नित उठि चौगुन होइ सनेहु ॥
[[नित्तिहि नित्त जो बारि बियाहै । बीसौ बीस अधिक ओहि चाहै ॥
तहाँ न मीचु, न नींद, दुख, रह न देह महँ रोग ।
सदा अनंद 'मुहम्मद', सब सुख मानै भोग ॥ ६० ॥
(६०) जोबन बारी (क) यौवन की वाटिका, (ख) युवती बालाएँ । महै = बहुत ही । बीसौ बीस = पहले से और बढ़कर ।