तिलिस्माती मुँदरी

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तिलिस्माती मुँदरी  (1927) 
द्वारा श्रीधर पाठक

[  ]श्रीपद्मकोट-प्रबन्धमालासंख्या १७


तिलिस्माती मुँदरी

या

कश्मीर के राजा की लड़की

[ अंग्रेज़ी से ]

लेखक

पं. श्रीधर पाठक


प्रकाशक

पं. गिरिधर पाठक एम. ए.

लूकरगंज, इलाहाबाद

१९२७

(सर्वाधिकार रक्षित)

चतुर्थ बार पांच आने
१०००
[  ]
Note.

THIS story was taken many years ago, with some adaptations, from an old English periodical bearing 1861 as the apparent date of publication; the author or-editor being unknown.

2. The earlier part was published in portions in Nagri as well as Persian characters in the Kashi Patrilsa, the well-known educational weekly of these Provinces which then flourished, and which. for all its purposes, employed a style of the vernacular which could be commonly understood by all sections of the people able to read and write.

3. The first portion of the story is almost a reprint from the above-named journal and the style adopted in that portion has been adhered to throughout the rest of the work,

4. It is hoped. that the story,, from its-innor cent yet intensely. pleasing and instructive plot and easy style, will prove a not unwelcome cons tribution to our present day Vernacular jevenile literature.

ALLAHABAD

March,6,1916

[  ]
नोट

इस कहानी का बहुत सा प्रारंभिक भाग बनारस की प्रसिद्ध मासिक पत्रिका 'काशीपत्रिका' में सन् १८८७ और १८८८ में ऐसी भाषा में प्रकाशित किया गया था जो नागरी और फ़ारसी दोनों अक्षरों में लिखी जा सके और सुगमता से सब को समझ में आ सके। वह पत्रिका अपने कलेवर में ऐसी ही भाषा का व्यवहार करती थी और दोनों वर्णो को काम में लाती थी। यदि वह कुछ समय बाद बन्द न हो गई होती तो कहानी का शेष भाग भी उसमें छप जाता।

२. मुझे यह कहानी इतनी प्रिय थी और पत्रिका के पढ़नेवालों को भी इतनी पसन्द आई थी कि मैंने पक्का संकल्प कर लिया था कि कभी न कभी इसे समाप्त कर हिन्दी रसिको के सामने पुस्तक रूप में अवश्य उपस्थित करूँगा। इसी से आज इसे सब की सेवा में समर्पित करने का साहसी होता हूं।

३. जिस प्रकार की भाषा में इसका प्रारंभिक भाग उक्त पत्रिका में प्रकाशित हुआ था उसी भांति की भाषा में शेष भाग भी लिखा गया है। इसमें फ़ारसी अरबी के अनेक शब्द आये हैं, परन्तु मैं आशा करता हूं कि उनके कारण हिन्दी के प्रेमी पाठक मुझ पर दुब्ध न होंगे, क्योंकि करीब २ वह सारे शब्द लाखों हिन्दी बोलने वालों की रोज़ की बोल चाल में आते हैं, इस कारण वह हिन्दी के कुनबे में संमिलित है और उनका हिन्दी पुस्तकों में विशेष कर कहानी की पुस्तकों में—व्यवहार करना मैं कोई अपराध की बात नहीं समझता।

श्रीपद्मकोट,प्रयाग

७ मार्च, १९१६


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