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दुखी भारत/'मदर इंडिया' पर कुछ सम्मतियाँ

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दुखी भारत  (1928) 
द्वारा लाला लाजपत राय
[ ४५९ ]

परिशिष्ट
'मदर इंडिया' पर कुछ सम्मतियाँ

डाक्टर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने बाली से साप्ताहिक 'मैंचेस्टर गार्जियन' को एक पत्र लिखा था जो उस समाचार-पत्र की १४ अक्टूबर १९२७ की संख्या में प्रकाशित हुआ था। नीचे उसकी पूरी नक़ल दी जाती है:––

क्या आप न्यायभाव से प्रेरित होकर मेरी इस चिट्ठी को अपने पत्र में स्थान दे सकते हैं? मैं भारत के एक प्रतिनिधि की हैसियत से एक अत्यन्त अन्यायपूर्ण आक्रमण के विरुद्ध अपनी सम्मान-रक्षा के लिए यह चिट्ठी लिखने को विवश हुआ हूँ।

इस बाली द्वीप में यात्रा करते समय संयोगवश १६ वीं जुलाई के न्यू स्टेट्समैन का एक अङ्क मेरे हाथ लग गया। इसमें भारतवर्ष के सम्बन्ध में अमरीका के एक महिला-यात्री की लिखी हुई एक पुस्तक की समालोचना प्रकाशित हुई है। लेखिका ने हमारी जाति के ऊपर निन्दा का जो पहाड़ लादा है उसका नमक मिर्च लगाकर समर्थन करते हुए और हिन्दुओं में, बड़े बड़ों में भी, सामान्य रूप से पाये जानेवाले अबगुण––असत्य भाषण––की और बार बार ध्यान आकर्षित करते हुए, इस समालोचक ने एक द्वेषपूर्ण मिथ्या-रचना को सार्वजनिक रूप दिया है। इसे उसने इस पुस्तक में या किसी दूसरी पुस्तक में पूर्णरूप से प्रदर्शित की गई गन्दी बातों के एक नमूने के समान नहीं बल्कि सत्य के सम्बन्ध में एक ऐसी व्यर्थ बात के समान उपस्थित किया है जिसमें लेखिका ने अप्रत्यक्ष रूप से अपनी निजी सम्मति भी मिला दी है। वह इस प्रकार है:––"कवि सर रवीन्द्रनाथ ठाकुर छपे हुए शब्दों में अपना यह विचार प्रकट करते हैं कि स्त्रियों को कामोत्तेजना से बचाने के लिए रजोदर्शन से पूर्व ही ब्याह की सम्पूर्ण विधियाँ पूरी कर देनी चाहिएँ।

पश्चिम में शत्रु-देशों के विरुद्ध भयानक और मिथ्या बातों का जो प्रचार किया जाता है उससे हम पीड़ा के साथ परिचित हो गये हैं। परन्तु [ ४६० ]उन व्यक्तियों के विरुद्ध भी जिनके देशवासियों ने अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाओं द्वारा लेखिका का स्पष्ट रूप से अपमान किया हो, इसी प्रकार के आन्दोलन ने मुझे चकित कर दिया है। यदि अमरीका के निवासियों ने कभी इँगलैंड के प्रति राजनैतिक द्वेष प्रकट किया हो तो यह समझ में आ सकता है कि इसी श्रेणी का एक अँगरेज़ लेखक अमरीका के समाचार-पत्रों की सहायता से बड़े चाव से यह सिद्ध करने का प्रयत्न करेगा कि अमरीकावासियों की वृत्ति पापमयी है और अपने कथन के समर्थन में वह उनकी उन अश्लील दुर्भावनाओं को उद्धृत करेगा जिन्हें वे आनन्द के साथ सिनेमा के गन्दे चित्रों को देखकर प्रकट करते हैं। परन्तु क्या वह कभी अपने पागलपने में भूतपूर्व प्रेसीडेंट विलसन के विरुद्ध यह भयानक अपराध लगाने का साहस करेगा कि विलसन ने अपना पवित्र मत यह दिया था कि उच्च कोटि की सभ्यता में ईसाई-धर्म के सद्गुणों का विकास करने के लिए हबशियों का अन्यायपूर्वक वध करना आवश्यक है? अथवा क्या वह प्रोफेसर डेवी के नाम के साथ यह सिद्धान्त जोड़ने का साहस करेगा कि शताब्दियों तक जादूगरनियों को जलाते रहने के कारण पश्चिमीय जातियों में वह तीव्र और प्रबुद्ध नैतिक भावना विकसित होगई है जिससे वे उन लोगों के सम्बन्ध में अपनी सम्मति बनाते हैं और उनकी निन्दा करते हैं जिन्हें वे भली भांति नहीं जानते या जिनकी बातें वे नहीं समझते या जिनको वे नहीं पसन्द करते और जिनके अपराधी होने में उन्हें कोई सन्देह नहीं होता। परन्तु क्या मेरे सम्बन्ध में इस लेखिका और इसके समर्थक सम्पादक की दृष्टि में इस प्रकार जान बूझकर असत्य और उत्तरदायित्व से शून्य बातें लिखना केवल इसलिए सरल हो गया कि मैं ब्रिटिश प्रजा की अपेक्षा और कुछ नहीं हूँ तथा जन्म के संयोग से हिन्दू हो गया हूँ और उन मुसलमानों से मेरा सम्बन्ध नहीं है जो लेखिका के अनुसार उसकी जाति के लोगों के और हमारी सरकार के विशेष कृपापात्र हैं। क्या मैं इस सम्बन्ध में कह सकता हूँ कि चुने हुए काग़ज़ों का आधार लेकर सम्पूर्ण जनसंख्या पर आधात पहुँचानेवाला जो अनुचित परिणाम निकाला गया है, वह समुद्रपार के इस महिला यात्री के हाथों में अत्यन्त भयानक असत्य का एक ऐसा विषमिश्रित बाण हो सकता है जिसका स्वयं ब्रिटिश जाति बड़ी सरलता-पूर्वक विस्तृत लक्ष्य बन सकती है? लेखिका का यह कहना कि हिन्दू लोग गाय का गोबर खाते हैं, एक जाति के विरुद्ध उसका मिथ्या कपट-मात्र है। यह कथन उतना ही द्वेषपूर्ण है जितना उन लोगों से, जो अँगरेज़ों को कम जानते हैं, उनका इस प्रकार परिचय देना कि अँगरेज़ लोग कोकीन खाने के आदी हैं क्योंकि उनकी दन्तचिकित्सा में कोकीन का प्रायः प्रयोग होता है। हिन्दू भारत में कदाचित् किसी विशेष परिस्थिति में किसी सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करने पर प्रायश्चित्त करने के लिए अत्यन्त अल्प [ ४६१ ]मात्रा में गोबर खाना पड़ता है परन्तु वह उनके भोजन का कोई अङ्ग नहीं होता। यदि योरपियनों के विरुद्ध बुरे भावों के फैलाने में किसी को कोई विशेष स्वार्थ न सिद्ध करना हो या कोई विशेष आनन्द न आता हो तो वह घोंघा, सीप और पनीर का उदाहरण होते हुए भी यह कहने में संकोच करेगा कि योरपियन लोग जिन्दा जानवर और सड़ी गली चीज़ें खाते हैं, यद्यपि अन्य बातों की अपेक्षा इसके कहने में प्रकट-रूप से अधिक अन्याय न होगा। अपवाद को सर्वसान्य नियम का रूप देना और जिन बातों का कोई महत्व नहीं है उन्हें बहुत बढ़ा चढ़ा कर उपस्थित करना धूर्तता का अत्यन्त कपटपूर्ण ढङ्ग है।

अपरिचित वायुमण्डल में नैतिक पतन के जो उदाहरण मिलते हैं वे स्वभावतः बहुत भयङ्कररूप में दिखाई पड़ते हैं क्योंकि आन्तरिक पवित्रता रखनेवाली शक्ति और पाप के विरुद्ध कार्य करनेवाली सामाजिक शक्ति नवागन्तुक को दिखाई नहीं पड़ती और विशेष कर ऐसे व्यक्ति को जो उद्दाम और घृणित बासना खोज करने में व्यग्र हो। जब कोई ऐसा समालोचक पूर्वीय देशों में आता है––सत्य की खोज में नहीं बल्कि दूसरों की दिल्लगी उड़ाकर आनन्द लूटने के लिए––और कुछ सामाजिक भूलों पर प्रसन्न होकर अपनी लाल पेंसल से गहरा चिह्न अङ्कित करता है तथा उन्हें उनके प्रासङ्गिक प्रकरण से पृथक करके दिखलाता है तब वह हमारे नवयुवक समालोचकों को भी वही अपवित्र खेल खेलने के लिए छेड़ता है। बस, ये भी ऐसी ही अनेक पथ-प्रदर्शक पुस्तकों की सहायता से, जो मनुष्य की भलाई के लिए किसी प्रामाणिक संस्था से प्रकाशित की जाती हैं, पाश्चात्य समाज की अन्धकारमय गुफाओं, घृणोत्पादक चरित्रों के जन्मस्थानों और नैतिक गन्दगी को, जिनमें कुछ बाहरी सम्मान का भयानक आवरण धारण किये रहते हैं, खोज निकालते हैं। ये भी अपने विदेशी आदर्शों की भाँति उसी पवित्र उत्साह के साथ अपनी पसन्द के गन्दगी के नमूने चुनते हैं और सम्पूर्ण राष्ट्र के नाम पर उसी प्रकार कालिमा पोत देते हैं। इस प्रकार जिन खाइयों से कीचड़ उछाला जाता है, उनके अस्तित्व में तो सन्देह नहीं रहता पर उनमें पूर्ण सत्य नहीं होता।

इस प्रकार पारस्परिक तू-तू मैं-मैं के अनन्त पाप-वृत्त की सृष्टि होती है और भ्रम का भाण्डार भरता जाता है। इन बातों से विश्व की शान्ति भयग्रस्त हो उठती है। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे पूर्व के नवयुवक समालोचक घाटे में रहते हैं। क्योंकि पाश्चात्य लोगों के पास आवाज़ को अत्यन्त बृहत् रूप देनेवाला यंत्र होता है जो बहुत गहराई तक जाता है और बहुत दूर तक असर करता है; चाहे वे दूसरों की निन्दा करें चाहे दूसरों [ ४६२ ]की निन्दा से अपनी रक्षा करें। इसके विरुद्ध हमारे दबे हुए समालोचकों को केवल अपने असहाय फेफड़ों का ही भरोसा रहता है; वे कान में फुसफुसा सकते हैं, आह भर सकते हैं पर चिल्ला नहीं सकते। परन्तु क्या यह विदित नहीं है कि हमारे अस्पष्ट भाव जब हमारे मन की अँधेरी और मौन गुफाओं में घनीभूत होते हैं तब बड़े वेग से प्रज्वलित हो उठते हैं? सम्पूर्ण पूर्वी महाद्वीप दिन पर दिन पाश्चात्य समालोचकों-द्वारा ऐसी ही भड़क उठनेवाली वस्तुओं का एक आगार बनाया जा रहा है। ये समालोचक आनन्दमय कर्तव्य पालन के भाव से अपनी द्वेषपूर्ण धारणाओं को प्रतिक्षण प्रकट करने के लिए तैयार रहते हैं परन्तु यह नहीं सोचते कि उनके पाश्चात्य समाज में भी ऐसी ही नैतिक पतन की बातें विद्यमान हैं, हाँ उनकी बुराइयों की पोशाक भिन्न है जो उनकी 'फ़ैशनेबुल' संस्थानों या गलियों में तैयार हुई है। अस्तु, मैं अपने अँगरेज़ और दूसरे पाश्चात्य पाठकों को विश्वास दिलाता हूँ कि लेखिका ने उक्त पुस्तक में जिस उद्दाम विषय-भोग की शिक्षा को साधारण रिवाज बतलाया है और हमारी हँसी उड़ाते हुए उद्धरण उपस्थित किया है उसकी छाया तक न तो मुझे और न मेरे क्रुद्ध भारतीय मित्रों को, जो इस समय मेरे साथ हैं, कहीं दिखाई पड़ी है। मैं आशा करता हूँ कि पाश्चात्य पाठक जब स्वयं अपने योरप और अमरीका के समाज में, जो विशेष सभ्य समझा जाता है, कभी कभी ऐसी रोमाञ्चकारी घटनाओं के घटित हो जाने का स्मरण करेंगे, जो सन्देहविहीन जनता को एकाएक अनियमित विषय-भोग के सङ्गठित षड्य्न्त्रों की एक झलक दिखाकर चकित कर देती हैं, तब वे कतिपय आक्षेपों को पूर्ण रूप से अस्वीकार करने की मेरी कठिनाई को समझ लेंगे।

'न्यू स्टेट्समैन' के लेखक ने संसार के कल्याण के लिए यह सम्मति दी है कि भारतवर्ष के जिन लोगों की, उनके पापाचारों के लिए, इस महिला यात्री ने निन्दा की है उनकी उदार ब्रिटिश सिपाहियों द्वारा रक्षा नहीं होनी चाहिए और न उन्हें जीवित रहने के लिए सहायता मिलनी चाहिए। यह लेखक स्पष्ट रूप से इस बात की उपेक्षा करता है कि इन जातियों ने स्वयं उसकी जाति की अपेक्षा बिना ब्रिटिश सिपाहियों की सहायता के शताब्दियों के लम्बे समय तक अपने जीवन और संस्कृति की रक्षा की है। खैर, कुछ हो, ऐसे ही साधनों का प्रयोग मैं नहीं करना चाहता और इसी भाँति ऐसे लेखकों का अभाव कर देने की सम्मति देता हूँ जो जातीय घृणा की द्वेषपूर्ण छूत चारों ओर फैलाते हैं; क्योंकि चिढ़ाये जाने पर भी हमें धैर्य के साथ इस बात में विश्वास रखना चाहिए कि मनुष्य-स्वभाव में सुधार करने के लिए अनन्त शक्ति होती है। और हमें यह आशा करनी चाहिए कि मनुष्य में जो पशु-स्वभाव की हठधर्मी बनी हुई है वह [ ४६३ ]शरीर-नाश के द्वारा हानिकारक बातों के मिटाने से नहीं बल्कि मस्तिष्क की शिक्षा और वास्तविक संस्कृति के संयम से दूर हो जायगी।

मोइंडॉक, बाली, श्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर
६ सितम्बर, १९२७
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"डिचर"—स्वर्गीय मिस्टर पैट लेवेट—ने, जिन्हें भारतीय सम्पादनकला का ४० वर्षों का अनुभव था और जो कलकत्ते के 'कैपिटल' नामक ऐंग्लो इंडियन समाज के प्रमुख व्यापारी साप्ताहिक के सम्पादक थे, अपने ८ सितम्बर १९२७ ईसवी के पत्र में लिखा था—

गत सप्ताह के अन्त में मुझे उस पुस्तक की एक प्रति उधार पढ़ने को मिली। मैंने उस पुस्तक को अपना कर्तव्य समझ कर पढ़ा; पर ज्यों ज्यों पढ़ता गया मेरी उद्विग्नता बढ़ती गई। पहले तो मुझे एक सर्वोच्च निबन्धलेखक की यह सम्मति स्वीकार करनी पड़ी कि आज-कल की पुस्तके खूब बिकती हैं उनमें दस में नौ अच्छी पुस्तकें नहीं होती; दूसरे मुझे अमरीका की इस गन्दी लेखिका की बौद्धिक बेईमानी बहुत भयङ्कर प्रतीत हुई; और अन्त में उसकी सम्पूर्ण राष्ट्र के कंलकित करने के लिए अस्पतालों में जाकर अमानुषिक क्रूरताओं की खोज करने की पैशाचिक प्रवृत्ति अत्यन्त बीभत्स जान पड़ी। यह पुस्तक साहित्यिक गुणों से वञ्चित है। यह नारकीय कुरुचि-उत्पादक सम्पादन-कला का अत्यन्त भद्दा रूप है। गरम रोटियों की भांति यह कुछ तो इसलिए बहुत बिकी कि यह सन-सनी उत्पन्न करने वाली बातों से परिपूर्ण है पर अधिकांश में इसलिए कि यह भारतवर्ष की स्वराज्य की माँग के विरुद्ध एक नीच आन्दोलन की पुस्तक है और उपयुक्त अवसर पर प्रकाशित हुई हैं।

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भारत में अमरीका के एक ईसाई-धर्म-प्रचारक श्रीयुत ए॰ एच॰ क्लार्क ने, बम्बई के 'इंडियन सोशल रिफ़ार्मर' में मदर इंडिया के सम्बन्ध में ईसाई-धर्म-प्रचारकों के निम्नलिखित विचार प्रकाशित करवाये हैं—

मैं आशा करता हूँ कि आप मुझे २६ नवम्बर के 'रिफ़ार्मर' में प्रकाशित श्रीयुत एस॰ वीरभद्र के एक लेख का उत्तर देने के लिए थोड़ा सा स्थान देंगे। उस लेख में श्रीयुत वीरभद्र ने, यह स्वीकार करते हुए कि भारतवर्ष [ ४६४ ]में कुछ अमरीकन ईसाई-धर्म-प्रचारकों ने मिस मेयो के पुस्तक की निन्दा की है, लिखा था कि कुछ उसके दृष्टिकोण से सहमत भी हैं। व्यक्तिगत रूप से मुझे इसमें सन्देह है कि भारतवर्ष में कोई ऐसा भी अमरीका का ईसाई-धर्म-प्रचारक है जो वास्तव में मिस मेयो के ही समान विचार रखता हो या घृणोत्पादक आक्षेपों का समर्थन करता हो। सम्भवतः हम अमरीकावासियों से यह भूल हुई है कि भारत की जनता के सामने इस पुस्तक के सम्बन्ध में हमने अपने विचार उपस्थित नहीं किये और अपनी शक्ति को अमरीका में इसके कुप्रभावों को रोकने तक ही परिमित रक्खा है।

जिस दिन मुझे पहले-पहल मदर इंडिया पढ़ने का अवसर मिला उसी दिन मैंने इसकी एक संक्षिप्त समालोचना अमरीका के पत्रों में प्रकाशित होने के लिए भेज दी थी। यह समालोचना हाल ही में प्रकाशित भी होगई है। इसमें मैंने अन्य बातों के अतिरिक्त यह भी लिखा था कि मैं एक अमरीकन सहयोगी के ऐसी पुस्तक लिखने पर जिसमें भारतवर्ष का अत्यन्त व्यङ्गपूर्ण चित्र उपस्थित किया गया है, लज्जित हूँ। ईसाइयों की राष्ट्रीय सभा की कार्यकारिणी समिति के हम समस्त अमरीकन सदस्यों ने इस सभा के मन्त्रियों द्वारा प्रकाशित की गई मदर इंडिया की निन्दा का समर्थन किया था। केवल बिशप राबिनसन सहमत नहीं थे। परन्तु मैं समझता हूँ उनका एतराज़ अधिकांश में पारिभाषिक था। इस वक्तव्य की ४०० प्रतियाँ स्वयं मैं अमरीका के एक विस्तृत निर्वाचन क्षेत्र में भेज रहा हूँ। भारतवर्ष के एक समस्त भागों से अमरीकन ईसाई-धर्म-प्रचारकों का एक दल मदर इंडिया के विरोध में अपने वक्तव्य प्रकाशित कर रहा है और वह वक्तव्य अमरीका के समाचार-पत्रों में प्रकाशित होने के लिए भेजा जा रहा है। मिस मेयो के अधिकांश निकृष्ट और अनुचित वक्तव्यों के विरुद्ध अकाट्य प्रमाणों का स्वयं मैंने एक संग्रह तैयार किया है और एक पत्र के रूप में उन्हें मिस मेयो के पास भेज दिया है। उसमें मैंने मिस मेयों से प्रार्थना की है कि वह सत्य और शुभेच्छा के नाम पर अपनी पुस्तक वापस ले ले। श्रीयुत के॰ टी॰ पाल ने मेरी इस चिट्ठी की एक नकल देखी थी और अपने 'यंग मेन आफ़ इंडिया' नामक पत्र में प्रकाशित करने के लिए सानुरोध साँगा था। मैंने इसे पहले ही एक अमरीकन पत्र-प्रतिनिधि को सौंप दिया था ताकि वह मिस मेयो के प्रतिकूल जवाब देने पर उसे अमरीका के पत्रों में प्रकाशित करवा दे। व्यक्तिगत रूप से जहाँ तक मैं जानता हूँ भारत के अमरीकन ईसाई-प्रचारकों की ओर से अमरीका में मिस मेयो की पुस्तक का प्रभाव उखाड़ने के लिए लेखों और चिट्टियों की वर्षा कर दी गई है।

मेरे लिए यह विश्वास करना कठिन है कि मिस मेयो द्वारा उपस्थित किया गया भारत का भयङ्कर और गन्दा चित्र संसार में अधिक समय तक उसका [ ४६५ ]अमङ्गल करने के लिए टिक सकेगा, इसका उलटा परिणाम होना अनिवार्य्य है। उस समय संसार की सभ्यता के लिए भारत के कार्य्यों की पुनः प्रशंसा होगी। मैं महात्मा गान्धी के इस विचार से सहमत हूँ कि भारत विशाल-हृदय होकर मिस मेयो की इस पुस्तक को अपने सुधार-सम्बन्धी उद्योगों के लिए एक उत्तेजना समझे। असत्य की अपेक्षा सत्य में बहुत अधिक शक्ति होती है। कुभावना की अपेक्षा शुभेच्छा अधिक बलवती होती है। कोई अकेली पुस्तक कितनी ही असत्य और घृणोत्पादन क्यों न हो संसार की जातियों के पारस्परिक भ्रम-निवारण और विशेष पारस्परिक सम्मान-प्रदानान्दोलन के मार्ग में अधिक काल तक टिक नहीं सकती।

मुझे विश्वास है कि आप इस विचार से सहमत होंगे।

अहमदनगर आपका
ए॰ एच॰ क्लार्क
५ दिसम्बर १९२७
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लार्ड सिनहा—जो ब्रिटिश-ताज के अधीन सर्वोच्च पदों पर कार्य्य कर चुके थे और जो एक-मात्र ऐसे भारतीय थे जिन्हें एक प्रान्त का गवर्नर बनाया गया था तथा जो अपनी मृत्यु समय, जो हाल ही में हुई है, प्रिवी कौंसिल की न्यायकारिणी समिति के सदस्य थे—जब ३० दिसम्बर १९२७ को जहाज़ से उतरे तब इंडियन डेलीमेल के एक प्रतिनिधि ने उनसे भेंट की। नीचे हम उनकी बात-चीत का वह अंश उद्धृत करते हैं जिसका इस विषय से सम्बन्ध है—

मैं महात्मा गान्धी की इस बात से पूर्ण रूप से सहमत हूँ कि मिस मेयो ने भारतवर्ष के समस्त गन्दे नाबदानों को खूब अच्छी तरह से सूँघा है और उसका चित्र सर्वथा अनौचित्यपूर्ण है। और मुझे दुःख के साथ यह कहना पड़ता है कि इस पुस्तक में जान बूझ कर नपा तुला असत्य उपस्थित किया गया है।

हमारे प्रतिनिधि ने पूछा—"क्या सब का सब?"

लार्ड सिनहा ने उच्च स्वर से जवाब दिया—'हाँ, सबका सब। सम्पूर्ण पुस्तक जो चित्र उपस्थित करती है, वह सर्वथा मिथ्या है।

"परन्तु मैं समझता हूँ कि भारतवर्ष में उसकी वंचकता को अनुचित महत्त्व दिया गया। इससे उसे अपनी पुस्तक बेचने में और अपना आन्दोलन करने में सहायता मिली है। जहाँ मैं यह सब कह रहा हूँ वहाँ इतना [ ४६६ ]और जोड़ देना चाहता हूँ कि यह कहना कि इस पुस्तक के प्रकाशन में भारत-सरकार का या लंदन के इंडिया आफिस का हाथ है, मूर्खता होगी। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक ने ब्रिटिश सरकार को चक्कर में डाल दिया है। आप इस पुस्तक को अनुचित महत्त्व दे रहे हैं। उसने करीब करीब भारत के प्रत्येक बड़े आदमी को निन्दास्पद बनाया।

"जहाज़ पर मेरे साथ कई एक अमरीकावासी थे। उन सबने यही कहा कि पुस्तक जिस चित्र को अंकित करती है वह सत्य नहीं हो सकता। मैं यह भी जानता हूँ कि प्रत्येक एंग्लो इंडियन अफसर, जो भारतवर्ष में रह चुका है, इस पुस्तक को केवल झूठी ही नहीं बल्कि शैतानी से भरी हुई भी समझता है।"

यह पूछे जाने पर कि क्या आप पुस्तक से कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जो सर्वथा मिथ्या हो, लार्ड सिनहा ने उत्तर दिया कि मुझे मिस मेयो का एक वक्तव्य स्मरण है जो सर्वथा मिथ्या है। वह यह है कि भारतीय माताएँ अपने बच्चों को अप्राकृतिक विषय-भोग की शिक्षा देती हैं। "इससे अधिक भयङ्कर असत्य की मैं कल्पना नहीं कर सकता। मैंने भारतीय मेडिकल सर्विस के आधे दर्जन अँगरेजों से, जिनमें से प्रत्येक भारतवर्ष में २५ वर्ष से अधिक रह चुका था, पूछा कि क्या आप लोगों ने कभी कोई ऐसी बात सुनी है? उन सबों ने यही उत्तर दिया कि इस बात को जैसे मैंने नहीं सुना वैसे ही उन्होंने भी नहीं सुना। उनका यह दृढ़ निश्चय है कि यह वक्तव्य मिथ्या है।"

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आयर्लेंड के कवि और लेखक डाक्टर जेम्स एच॰ कज़िन्स, जो भारतीय सभ्यता के उत्कृष्ट विद्यार्थी हैं और जो इस देश को अधिक काल के निवास और अपने शिक्षा सम्बन्धी अनुभवों से जानते हैं, अपने 'शान्ति का मार्ग' नामक निबन्ध की भूमिका में लिखते हैं[१]––

'मदर इंडिया' नाम के भीतर असत्य का जो महान् प्रासाद खड़ा किया गया है बह जातीय विद्वेष की नींव पर खड़ा है और उसकी आधार-शिला वह मानसिक वञ्चना है जो अस्फुट रूप में होने के कारण और भी हानिकारक और भयानक है। यद्यपि इस पुस्तक के अन्त में भारत के प्रति सहृदयता-सूचक शब्द पाये जाते हैं परन्तु उनसे उस क्षति की तो तनिक भी पूर्ति नहीं हो सकती जो एक जाति को इस दृष्टि से कलङ्कित करने से हुई है कि [ ४६७ ]वह जाति सदा राजनैतिक पराधीनता में जकड़ी रहे। पुस्तक का विषय यही है; यद्यपि यह हो सकता है कि आरम्भ में लेखिका का यह भाव न रहा हो। प्राचीन घटनाओं के मनमाने और छल के साथ उपस्थित करने से भी इसी बात की पुष्टि होती है। कतिपय रवाजों को, जो जाति के केवल एक आधे वर्ग में प्रचलित हैं, यह लेखिका समस्त भारत में प्रचलित बताती है। वह भारत को 'संसार का संकट' कहती है परन्तु यह नहीं बतलाती कि संसार का संकट इन्फ्लुएब्ज़ा; जिसने १९१८ ईसवी में ६० लाख भारतवासियों के प्राण लिये थे, भारतवर्ष से बाहर ही उत्पन्न होकर इस देश में पहुँचा मद्रास में अच्छा पानी न मिलने की वह शिकायत करती है परन्तु इस बात पर ध्यान नहीं देती कि अभी गत वर्ष इस बात का भण्डाफोड़ हुआ था कि न्यूयार्क में दूध में अस्तबल के 'होस' का गन्दा पानी मिला कर बेचने से टाईफाइड ज्वर का प्रकोप हुआ था। वह काली के मन्दिर में बकरों की बलि की निन्दा करती है परन्तु मांसाहार का समर्थन करती है जिसके कारण योरप और अमरीका के लोगों की क्षुधा निवारण के लिए असंख्य पशुओं का निर्दयता के साथ वध किया जाता है ।.........

यदि मैं अपनी अमरीकन समाचार पत्रों की कतरनों की फाइलों में से (जो घूसखोरी, व्यभिचार, अशिष्टता, अपवित्रता, डाकेज़नी, धोका आदि बातों से भरी पड़ी हैं) एक उदाहरण उपस्थित करके हाल ही में एक जज ने जो घोषणा की थी कि अमरीका संसार में सबसे पापी देश है, उसका समर्थन करूँ और इससे यह निष्कर्ष निकालूँ कि अमरीका को पुनः उसी स्थिति में पहुँचा देना चाहिए जिसमें वह स्वाधीन होने से पहले था, तो निस्सन्देह मेरे लिए यह कार्य जितना सरल हेगा उतना ही व्यर्थ और 'नीचता-पूर्ण भी होगा। मैं इसके उत्तर से पहले ही से सहमत हूँ कि ये बातें वास्तविक अमरीका का बोध नहीं करातीं। भारतवर्ष के सम्बन्ध में भी मैं ऐसा ही तर्क चाहूँगा......।

इस बात के लिए कि भारतवर्ष में बड़ी बुराइयाँ हैं यह आवश्यक नहीं है कि 'अमरीका का एक साधारण नागरिक' उनका ढोल पीटता फिरे। भारतीय उनको दूर करने के लिए पीढ़ियों से उसी लगन से काम कर रहे हैं जिससे अमरीका के सुधारक उस देश में होनेवाली ६ हज़ार वार्षिक हत्याओं को रोकने के लिए और इँगलैंड के सुधारक लोग इन्द्रिय-रोगों को दूर करने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। भारतवर्ष में मनुष्यता से गिरी हुई जो बात बतलाई जाती हैं उन्हें मैं भली भाँति जानता हूँ क्योंकि मैंने उस देश की परोपकारिणी संस्थाओं में १२ वर्ष तक कार्य किया है। मुझे उनकी संख्या और सचाई दोनों बातों का ज्ञान है। परन्तु मैं यह निष्कर्ष निकालने के लिए अपनी बुद्धि को वेश्या नहीं बना सकता कि भारतवर्ष में पाप होते हैं इसलिए [ ४६८ ]वहाँ के निवासियों को राजनैतिक दासता में जकड़े रहना चाहिए। मैं राजनैतिक दृष्टि से राजनीतिज्ञ नहीं हूँ। मैं मनुष्यता के विकास का विद्यार्थी हूँ और मनुष्य की पूर्णता के लिए एक उपर्युक्त मार्ग की खोज में हूँ। मैं यह निश्चय के साथ कहता हूँ कि भारतवर्ष के लिए जिन बातों की आवश्यकता है वे मदर इंडिया में बतलाई गई बाते के सर्वथा प्रतिकूल है। अनुभव ने हमेशा यह बतलाया है और आधुनिक मनोविज्ञान इसका समर्थन करता है कि उत्तरदायित्व योग्यता को जन्म देता है, उससे स्वयं जन्म नहीं ग्रहण करता।

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भारतवर्ष, बरमा और लङ्का की राष्ट्रीय ईसाई-सभा की कार्य-कारिणी समिति की ओर से मिस मेयो की पुस्तक मदर इंडिया के सम्बन्ध में एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ है। इस पर समिति के मंत्रियों––रेबरेंड डाक्टर एन॰ माओकोल और श्रीयुत पी॰ ओ॰ फिलिप––के तथा कुमारी ए॰ बी॰ वान डोर्न, अवैतनिक कार्यकर्ती, के हस्ताक्षर हैं। विपक्ष में केवल बिशप जे॰ डब्ल्यू॰ राबिन्सन हैं। परन्तु उनका मतभेद भी केवल पारिभाषिक है। भारतवर्ष के लाट पादरी और कलकत्ते के लार्ड बिशप इस सभा के सभापति हैं। डाक्टर एस॰ के दत्त उपसभापति हैं और कार्य- कारिणी समिति के सदस्यों में हैं––डोरंकल के बिशप रेवरेंड चितम्बर; रेवरेंड जे॰ एफ॰ एडवर्ड; मदरास के बिशप डाक्टर सी॰ आर॰ ग्रीन फील्ड; रेवरेंड जे॰ मैकेंज़ी, रायबहादुर ए॰ सी॰ मुखर्जी, श्रीयुत के॰ टी॰ पाल॰, बी॰ एल॰ रल्लाराम और रेवरेंड एच॰ सी॰ सी॰ वेल्ट। नीचे हम उस वक्तव्य का कुछ अंश उद्धत करते हैं:––

भारतीयों ने या विदेशी ईसाई-धर्म-प्रचारकों ने कभी इस बात को अस्वीकार नहीं किया कि भारतवर्ष में बड़ी सामाजिक कुरीतियाँ हैं। यह सबको विदित है कि भारतीय समाज-सुधारकों-द्वारा इन बुराइयों को दूर करने के लिए सङ्गठित रूप में बड़ा उद्योग हो रहा है। तो भी हम सब, जिनमें स्त्री और पुरुष दोनों सम्मिलित हैं और जिन्हें भारतवासियों के नैतिक जीवन का पूर्ण परिचय है, यह बात बिना किसी सङ्कोच के कह सकते हैं कि मिस मेयो की पुस्तक भारतवर्ष का जो चित्र अङ्कित करती है वह असत्य और अन्याययुक्त है। लेखिका ने जिन बातों को [ ४६९ ]देखा है या जो उसे बताई गई हैं उनके आधार पर जो भयानक परिणाम निकाले गये हैं वे, पूरे भारतवर्ष के सम्बन्ध में विचार किया जाय, तो मिथ्या सिद्ध होंगे। पुस्तक के अन्त में मिस मेयो यह स्वीकार करती है कि उसने भारतीय जीवन के अन्य अङ्गों को अछूता छोड़ दिया है। इसी कारण से हम और भी दृढ़ता के साथ कहते हैं कि भारतीय जीवन दोष का ही जीवन नहीं है जैसा कि इस पुस्तक में दिखाया गया है। और इस पुस्तक में जिन कुरूप और घृणोत्पादक बातों पर जोर दिया गया है उनकी भारतीय समाज में प्रधानता नहीं है।

सौंदर्य और संस्कृति, दयालुता और आकर्षण, धर्म और भक्ति आदि गुण छोटे बड़े सबमें समानरूप से पाये जाते हैं। मिस मेयों ने अपनी पुस्तक में इन बातों को कोई स्थान नहीं दिया।

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स्त्री-संघ की मंत्री श्रीमती मारगैरेट ई॰ कज़िन्स ने मिस कैथरिन मेयो की मदर इंडिया के सम्बन्ध में अपना निम्नलिखित वक्तव्य प्रकाशित कराया है––

यद्यपि लेखिका ने अपने आक्षेपों के अधिकांश भाग का विषय भारतवर्ष में स्त्रियों पर किये गये अत्याचारों को ही बनाया है तथापि उसने श्रीमती नायडू जैसी प्रतिनिधि स्त्रियों से भेंट नहीं की। यदि वह भेंट कर लेती तो अधिक बुद्धि से काम ले सकती थी। भारतीय स्त्रियाँ सोचती हैं कि उनकी शक्ति इसलिए क्षीण की जा रही है कि जिससे उनके देश को स्वराज्य मिलने में विलम्ब लगे। श्रीमती कज़िन्स इस आक्षेप का खण्डन करती हैं कि भारतीय स्त्रियाँ रजोदर्शन के पश्चात् ९ मास के भीतर ही माता बनने की इच्छा करने लगती हैं, और कहती हैं कि लाखों की अधिक संख्या में लोग स्त्रियों को १६ वर्ष से पूर्व माता बनने का अवसर नहीं देते। यदि ऐसी बात न होती तो भारत शताब्दियों पहले ही नष्ट हो गया होता। अन्त में वे कहती हैं––उधर हम उसकी पुस्तक का खण्डन करें और इधर अपनी शक्ति का प्रत्येक औंस उन सामाजिक बुराइयों को उखाड़ने में लगावें जो वास्तव में हमारे बीच में विद्यमान हैं।

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श्रीयुत स्टेनली जोन्स, जो ईसाई-धर्म-प्रचारक हैं और जिन्हें भारतीय जीवन का अच्छा अनुभव है, इलाहाबाद के लीडर में अपनी एक प्रकाशित चिट्ठी में एक स्थान पर लिखते हैं:––

मदर इंडिया के सम्बन्ध में मेरे विचार संक्षेप में इस प्रकार हैं––

(१) यदि उसने जो आक्षेप किये हैं उन पर पृथक पृथक विचार किया जाय तो उन्हें अस्वीकार करना सरल न होगा। यत्र तत्र कुछ भूलें और [ ४७० ] अतिशयोक्तियाँ मिलेंगी परन्तु वे पूर्ण रूप से सत्य ही सिद्ध होंगे। यह मैं केवल उन प्रारूपों के सम्बन्ध में लिख रहा हूँ जो उसने किये हैं। यहाँ उसने इन आक्षेपों के आधार पर जो परिणाम निकाले हैं उनसे मेरा तात्पर्य्य नहीं है। वे असत्य हो सकते हैं।

(२) इतना स्वीकार करते हुए भी, इस पुस्तक के सम्बन्ध में बहुत उदारता के साथ कहना पड़े तो भी मैं यही कहूँगा कि यह मुझे बहुत अनुचित प्रतीत हुई है। पुस्तक को पढ़ने के पश्चात् जो चित्र सामने उपस्थित होता है वह न सत्य है न न्याययुक्त। जिन पाश्चात्य पाठकों को वास्तविक बातें नहीं ज्ञात हैं, उनके हृदय में इस पुस्तक के पढ़ने पर जो विचार उठते हैं वे एक पाश्चात्य समालोचक के आगे लिखे शब्दों से भली भाँति जाने जा सकते हैं-'भारतवर्ष पतित देश है, सोडोया गोमोर्रा से भी गया बीता है; इत्यादि।' यह सम्पूर्ण भारतीय जाति पर कलङ्क है। यदि पश्चिम की बुराइयों को पुलिस की अदालतों के विवरणों के साथ संसार के सम्मुख उपस्थित किया जाय और कहा जाय कि यही पाश्चात्य जीवन का सच्चा चित्र है तो कोई भी पश्चिमी व्यक्ति बिना क्रोध और घृणा प्रकट किये न रहेगा। यही इस पुस्तक में अनौचित्य है। एक दूसरा भारत भी है। वह इस पुस्तक में नहीं दिखाया गया। यदि वह भी दिखाया जाता तो हम इसकी शिकायत नहीं कर सकते थे। परन्तु जिस भारत को मैं जानता हूँ वह इस पुस्तक में नहीं है। उस भारत के प्रति मेरे हृदय में स्नेह है, श्रद्धा है और सम्मान है।

इपोह (मलाया स्टेट्स) ई॰ स्टेनली जोन्स
५ अक्टूबर १९२७
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अँगरेज़ी के विख्यात नाटक और उपन्यास-लेखक श्रीयुत एडवर्ड टामसन जो भारतवर्ष में शिक्षा-विभाग में बहुत समय तक कार्य कर चुके हैं और इस समय आक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में बङ्गाली-साहित्य के प्रोफेसर हैं। लन्दन के 'नेशन और अदेनीम' नामक समाचार-पत्र के ३० जुलाई १९२७ के अङ्क में लिखते हैं—

दोषारोपण इतना सार्वभौमिक है और प्रत्येक अवस्था में इतना अनुदार है कि सम्पूर्ण पुस्तक एक 'दीर्घ पीड़ा' के समान प्रतीत होती है। यदि आप भारतीयों को यह विश्वास दिला सकें कि आप कभी कभी उनके दृष्टिकोण से भी विचार करते हैं, उनके साथ सहानुभूति रखते हैं और उनके देश तथा [ ४७१ ]उनकी सभ्यता में जो अच्छी बातें हैं उनसे स्नेह रखते हैं तो आप उनकी कड़ी से कड़ी आलोचना कर सकते हैं और उस दशा में वे आपकी बातें सुनेगे भी। सरकारी कर्मचारी, भारतीय कालिजों के प्रोफ़ेसर और ईसाई-धर्म-प्रचारक सब इस बात को जानते हैं। परन्तु यदि आप द्वेष के साथ उनकी आलोचना करेंगे तो आपकी बात कोई नहीं सुनेगा। स्त्रियों के प्रति व्यवहार के सम्बन्ध में मिस मेयो ने जो बातें लिखी हैं उनके अतिरिक्त उसकी मौलिकता और कहीं नहीं प्रतीत होती। उस भारतीय नरेश का यह कहना कि यदि अँगरेज़ भारत को छोड़ कर चले जायेंगे तो उसके तीन ही मास के भीतर बङ्गाल में 'न तो एक रुपया शेष रह जायगा न कोई कुमारी बचेगी' सम्भवतः सच हो सकता है। परन्तु जिस ढङ्ग से यह बात अँगरेज़ पाठकों के सम्मुख रक्खी गई है उसको देखते हुए मैं यह कह सकता हूँ कि इसका उलटा प्रभाव हुए बिना नहीं रह सकता। वह लिखती है––'यहाँ एक ऐसे व्यक्ति के मुँह से निकली बात उपस्थित की जा रही है जिसकी सत्यता पर मेरी समझ में किसी को सन्देह नहीं हो सकता।' अच्छा, अब मैं इस पर सन्देह करता हूँ; यद्यपि मुझे यह ज्ञात कि उनके 'भारत के सम्बन्ध में विशेष अनुभव रखनेवाले अमरीकन संवाददाता' ने इसे एक बड़े आकर्षक, सुशिक्षित और शक्तिमान् मरहठा-नरेश से भेंट करने पर सुना था। यह कथा गत बीस वर्षों से प्रत्येक जहाज़ पर, जो इँगलैंड से भारत को और भारत से इँगलैंड को यात्री ले जाता है, कही जाती है। अठारह महीने हुए मुझसे पार्लियामेंट के एक सदस्य ने बतलाया था कि यह बात एक राजपूत––सर प्रतापसिंह––ने कही थी। मिस मेयो महात्मा गान्धी के प्रभाव और निर्भयता के विरुद्ध कुछ नहीं कहती। वह बाल-विवाह, अस्पृश्यता तथा अन्य कुरीतियों के सम्बन्ध में उनकी कड़ी आलोचनाओं के खूब उद्धरण देती है, तो भी उनका मज़ाक उड़ाती है क्योंकि वे रेलों और कल-कारख़ानों को बुरा समझते भी उनका उपयोग करते हैं। इसके पश्चात्, क्या केवल भारतवर्ष ही ऐसा देश है जहाँ के विद्यार्थी विश्वविद्यालय की शिक्षा का व्यापारिक मूल्य लगाते हैं? क्या हरवर्ड, वेल और आक्सफोर्ड के विश्वविद्यालय में ऐसे विद्यार्थी नहीं हैं जो अपनी शिक्षा के पुरस्कारस्वरूप अच्छी नौकरी पा जाने के लिए चिन्तित नहीं रहते? मिस मेयो में दूसरी जातियों की भावना का अनुभव करने की इतनी भी शक्ति नहीं है, और उनके साथ वह इतनी भी सहानुभूति नहीं दिखा सकती कि वह समझे कि कदाचित् कुछ भारतीयों ने कहीं आत्मसम्मान के भाव से ही प्रेरित होकर प्रिंस आफ़ वेल्स की यात्रा पर उत्साह न प्रकट किया हो––क्योंकि चाहे जो हो, प्रिंस आफ़ वेल्स का सम्बन्ध तो उनके विजेताओं के ही रक्त से है। वह उस यात्रा का वर्णन ऐसी उन्माद-मयी भाषा में करती है कि किसी अँगरेज़ी जनता [ ४७२ ]को, जिसकी बाइबिल सचित्र सामाजिक पत्रिकाएँ न हों, उस पर हँसी आये बिना नहीं रह सकती। बङ्गाली जाति पर उसने सबसे अधिक घृणा की वर्षा की है और कहती है कि समस्त देशी नरेश बङ्गालियों से इसी प्रकार घृणा करते हैं। परन्तु भारतीय राज्यों में बङ्गाली मन्त्रियों की कमी नहीं है––उदयपुर में भी। इस बात पर वह सन्देह नहीं प्रकट करती कि सम्भवतः बङ्गाल ने या भारतवर्ष में स्वयं अँगरेजी शिक्षा ने 'बाबुओं' या बी॰ ए॰ फेल या बी॰ ए॰ पास लोगों के अतिरिक्त भी कभी कुछ उत्पन्न किया है। वह लिखती है––'फिलीफाइन्स और भारतवर्ष, दोनों जगह किसी प्रकार का सामयिक साहित्य नहीं है या कोई ऐसा साहित्य नहीं है जिसमें सर्वसाधारण की रुचि हो। और इन दोनों देशों में बहुतसी भाषाएँ ऐसी हैं जिनमें कोई भी साहित्य नहीं है।' कोई भी महत्वपूर्ण भारतीय भाषा ऐसी नहीं है जिसमें यथेष्ट साहित्य न हो। तामिल में मणिकेश्वर और दूसरे शैव भक्तों की सुन्दर कविताएँ हैं, हिन्दी में तुलसीदास की रामायण है जो एक उत्कृष्ट काव्य-ग्रन्थ है और जिसके आधार पर संयुक्त-प्रान्त के गाँवों में प्रतिवर्ष शरद ऋतु की उजली निशा में १५ दिन रामलीला होती है। बँगला में रामायण और महाभारत के ग्रन्थों में, जिनकी लाखों प्रतियाँ प्रतिवर्ष बिकती हैं और रामप्रसाद के भजनों में जिन्हें आप किसी भारतीय सड़क पर सुन सकते हैं, सुन्दर साहित्य भरा पड़ा है। इन सब भाषाओं में ऐसा साहित्य मौजूद है जिसमें सर्वसाधारणों को बड़ा आनन्द आता है।

मिस मेयो ने २५८ वें पृष्ठ पर भारतवर्ष में अँगरेज़ी शासन का संक्षिप्त इतिहास दिया है। यह इतिहास उसने सम्भवतः भोजन के समय की बातचीत से सुनकर लिखा है। वह गम्भीरता के साथ १७८४ ईसवी की घोषणा को उद्धृत करती है कि––'कोई स्थानिक निवासी जाति, वर्ण, धर्म या कुल-भेद के कारण कम्पनी की किसी नौकरी के लिए अयोग्य न माना जायगा।' इस पर वह अपनी सम्मति देती है कि––'यह घोषणा जात-पात में जकड़े, गृह-युद्ध में फँसे, और अत्याचारों से पीड़ित भारत पर बम्ब के समान प्रतीत हुई।' निःसन्देह, यदि यह दूसरी शताब्दी या और समय तक के लिए सचाई के साथ किया गया होता तो भारतीय शासकों पर बम का गोला ही फेंकना होता। यही घोषणा १८३३ और १८५८ ईसवी में फिर की गई। १८२२ और १८२४ ईसवी में मदरास के गवर्नर सर टामस मुनरो ने अत्यन्त दुःख के साथ लिखा था कि अत्यन्त निम्न पदों के ऊपर प्रत्येक विभाग में भारतीयों को कदापि नहीं पहुँचने दिया जाता। और २ मई १८५७ ईसवी को (सिपाही-विद्रोह से ८ दिन पूर्व) इसी परिस्थिति के सम्बन्ध में हेनरी लारेन्स ने क्रोध के साथ लिखा था। मिस मेयो स्वतन्त्र पश्चिमी विचारों के विरुद्ध सिक्खों के विद्रोह को १८४५ ईसवी की [ ४७३ ]घटना बतलाती है। सिक्खों ने किसके साथ विरुद्ध विद्रोह किया? तब तो उनकी जाति स्वतन्त्र थी।

अन्त में इतना और कह देना चाहता हूँ कि हिन्दुओं के बाल-विवाहों और पशुओं पर अत्याचारों––परन्तु हम लोग भी शिकार खेलते हैं––की जितनी निन्दा की जाय थोड़ी है। परन्तु मिस मेयो ने एक तरफ से निन्दा करके अपने इस महान् उद्दश्य को गिरा दिया। उसे यह भुला देने का अधिकार नहीं था कि भारतीय राजनीतिज्ञों के समस्त अनौचित्यों के विरुद्ध कुछ ने स्वार्थरहित और निर्भयतापूर्ण देशप्रेम के साथ साथ अपने विरोधियों के प्रति भी उच्च कोटि की उदारता का परिचय दिया है। कड़वी बात लिखकर, कि गोरे मनुष्यों का शासन विन्न कुलोत्पन्नों के लिए इतना अधिक अच्छा है कि वे केवल दुष्टतावश उससे असन्तोष प्रकट करते अपना पक्ष गिरा दिया।

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मदरास के युवक-ईसाई-संघ के अमरीकन मन्त्री श्रीयुत डी॰ एफ॰ मैक्लीलैंड ने सदरास की एक सार्वजनिक सभा में भाषण देते हुए मदर इंडिया का निम्नलिखित शब्दों में उल्लेख किया था[२]––

मिस कैथरिन मेयो की हाल में प्रकाशित हुई पुस्तक के सम्बन्ध में अपने वक्ता सर टी॰ सदाशिव ऐयर के विचार सुनने के पश्चात्, एक अमरीकन की हैसियत से मैं अपना यह कर्तव्य समझता हूँ कि उस पुस्तक के सम्बन्ध में यह अत्यन्त लज्जा की बात है कि मेरे देश की एक महिला भारतवर्ष में बहुत थोड़े समय तक रहने के पश्चात् यहाँ के जीवन पर ऐसा अनुचित और अन्यायपूर्ण आक्षेप करे। मैंने उस पुस्तक का केवल एक अंश पढ़ा है। क्योंकि जो पुस्तक मैंने पढ़ने के लिए उधार ली थी वह मुझसे श्रीयुत एंडज ने ले ली और उसे अपने साथ लेते चले गये। परन्तु यह तो स्पष्ट है कि मिस मेयो ने भारत का केवल एक अङ्ग देखा है और उसे भी ठीक ठीक नहीं देखा। उसने बहुत सी ऐसी बातों की खोज की है जिन्हें वह सिद्ध नहीं कर सकती और उसके अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन भारतवर्ष का प्रत्येक पहलू से वास्तविक चित्र नहीं उपस्थित करते। मैं १९१५ ईसवी से भारतवर्ष में हूँ और इस समय में मुझे सब श्रेणियों के मनुष्यों से मिलने-जुलने का अवसर मिला है। मुझे उसकी पुस्तक का घोर विरोध करने में जरा भी सङ्कोच नहीं है। बाहर के पाठक उसके जिन निष्कर्षों को सत्य मान सकते हैं वे अधिकांश में उसकी पक्षपातपूर्ण निजी राय पर [ ४७४ ]निर्भर हैं। अमरीकन राष्ट्र या किसी भी पश्चिमी राष्ट्र के सम्बन्ध में भी अत्यन्त आक्षेपपूर्ण पुस्तक लिखी जा सकती है। तब हम पश्चिम के लोग ऐसी पुस्तक का विरोध करेंगे, और हमारा विरोध करना उचित ही होगा। मानवीय पाप और सामाजिक बुराइयाँ संसार में सर्वत्र पाई जाती हैं। जो लेखक उससे निष्कर्ष निकालें उन्हें इस बात को सदा ध्यान में रखना चाहिए।......मैं इस सभा के सम्मुख इस बात के लिए अपना हार्दिक दुःख प्रकट करता हूँ कि एक अमरीकन नागरिक पाश्चात्य संसार के सामने भारतवर्ष को ऐसे पक्षपात और अन्याय के साथ उपस्थित करे।

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माननीय सर सी॰ पी॰ रामस्वामी ऐयर ने––जो जेनेवा के राष्ट्रसंघ के अधिवेशन में भारत-सरकार के प्रतिनिधि होकर सम्मिलित होने गये थे––साम्राज्य के भिन्न भिन्न भागों से आये हुए विद्यार्थियों की एक सभा में भाषण देते हुए कहा था––

बाहर के लोगों को मिस मेयो की मदर इंडिया का वास्तविक चित्र दिखलाने के लिए एक उपमा का प्रयोग करना अधिक अच्छा होगा। मान लीजिए, मेरे घर में एक मेहमान आया। उसे बैठक और रहने के कमरे दिखाये गये। इसके अतिरिक्त उसने बाग और अन्य साज-सामान भी देखे। यह भी मान लीजिए कि बिदा होते समय उसकी दृष्टि किसी कोने में एक खुले नाबदान पर जा पड़ी। अब यह मान लीजिए कि मेरा यह मेहमान मेरे घर में देखी गई तमाम बातों के सम्बन्ध में एक पुस्तक लिखने बैठता है पर उस नावदान के अतिरिक्त साज-सामान, बाग़ आदि सबको भुला देता है; केवल उसी एक नाबदान पर अपनी समस्त मानसिक शक्तियों को केन्द्रित करता है। ऐसी दशा में मेरे उस मेहमान का कार्य ठीक वैसा ही होगा जैसा मिस मेयो ने किया है। ऐसा न समझिए कि यह कहते समय उन सामाजिक कुरीतियों और त्रुटियों को एक क्षण के लिए भी भुला रहा हूँ, जिनसे भारतवर्ष पीड़ित है। इनमें से कुछ बुराइयाँ इतनी प्राचीन हैं जितनी कि स्वयं मनुष्यता, और इन बुराइयों के रूप योरप और अमरीका में भी उतने ही प्रबल हैं जितने कि भारतवर्ष में! परन्तु प्रत्येक उचित भारतीय देशभक्त इन कुरीतियों को सुधारने के लिए चिन्तित है और इनका अन्त करने के लिए उद्योग कर रहा है। ऐसे उद्योग में दूसरी जातियों के पुरुषों और स्त्रियों ने भी भारतवासियों की सहायता की है। परन्तु ऐसे सहायकों में मिस मेयो जैसे दूषित मस्तिष्कवालों की गणना नहीं है। ये लोग [ ४७५ ]संभवतः ऐसी दुवृत्ति के वशीभूत हैं जो मनुष्य को आगे नहीं बढ़ने देती और जो बुराई, गन्दगी और अधःपतन के अतिरिक्त और कुछ नहीं देखती।

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श्रीमती जे॰ सी॰ वेजउड ने, 'पीपुल' (लाहौर) की ५ जनवरी ११२८ की संख्या में एक लेख लिखते हुए एक स्थान पर लिखा था––

अमरीकन महिला कैथरिन मेयो ने अपनी पुस्तक मदर इंडिया में भारतवासियों की जिस ढङ्ग से निन्दा की है उससे बहुत-सी अँगरेज़ महिलाएँ अत्यन्त उद्विग्न हो उठी हैं। हम आपको यह बतलाना चाहती हैं कि भारतीय जीवन और विचार का उसने जो गन्दा और झूठा चित्र उपस्थित किया है, उससे हमें अत्यन्त दुःख पहुँचा है। जिन बुराइयों का उसने वर्णन किया है यदि वे सब सच भी हों तो भी अच्छाइयों को छोड़ देने से वह अपने पाठकों के सामने गलत बातें उपस्थित करती है और उनके हृदयों में भारतवासियों––हिन्दू-मुसलमान––दोनों के प्रति घृणा उत्पन्न करती है और उनकी दृष्टि में उन्हें निर्बल, मूर्ख और धर्मान्ध ठहराती है। स्त्री-पुरुष दोनों को उसने अन्धविश्वासी, विषयी और दासता के भाव से जकड़ा हुआ बताया है। और यह भी कहा है कि उनके हृदयों में उन्नति की इच्छा ही नही है............

उदाहरण के लिए, उसकी पुस्तक का कोई भी पाठक इस परिणाम पर पहुँच सकता है कि भारतवर्ष में कोई वैवाहिक सम्बन्ध सुखमय नहीं होता। अत्याचारी और निर्दयी बुड्डा पति होता है जो अपनी भयभीता बाल-पत्नी को सताता है। मिस मेयो उस सुन्दर सम्बन्ध की उपेक्षा करती है जो भारतीय पति और पत्नी में प्रायः पाया जाता है। पति प्रेम के साथ पत्नी की रक्षा करता है और पत्नी उसके प्रति श्रद्धा और भक्ति प्रदर्शित करती है। निःसन्देह भारतीय दम्पती का स्नेह अमर, अतृप्त और औपन्यासिक है; और संसार की सब जातियाँ इसे स्वीकार करती हैं। अब अनेक सुन्दर कथाओं और गीतों का प्राण है। मिस मेयों ने इसे कदाचित् जानबूझ कर भुला दिया है क्योंकि इसकी तुलना में अमरीकन विवाहों के विश्वासघात और सम्बन्धविच्छेद के उदाहरण अत्यन्त निकृष्ट प्रतीत होते। इन 'आधुनिक' महिलाओं को अपने पति की सेवा करने का भाव हास्यास्पद प्रतीत होगा। ये तो उलटा पति को अपना गुलाम बनाती हैं और जब उससे पूरा लाभ उठा चुकती हैं तब उसे छोड़ देती हैं और नया शिकार करती हैं।......... [ ४७६ ]दूसरी बुराई वर्ण-व्यवस्था की है जिस पर मिस मेयो ने बड़े अतिशयोक्ति-पूर्ण आक्षेप किये हैं। परन्तु इसी बात के लिए अमरीका पर भी ऐसे ही आक्षेप जा सकते हैं। गोरे-अमरीकन हबशी-अमरीकनों से घृणा करते हैं और उनसे कोई सम्पर्क नहीं रखना चाहते। उस देश में वे अछूत तुल्य है। परन्तु मिस मेयो भारतीयों के अवगुण खोजने में इस प्रकार तन्मय है कि उसे अपने गृह में झांकने का अवकाश नहीं है। अस्पृश्यता के पक्ष में वह अनेक भारतीयों के मत उद्धृत करती है पर उसकी निन्दा में केवल महात्मा गान्धी को उपस्थित करती है।.........

आप लोगों में से किसी के भी लिए जिसके पास समय और सुअवसर हो 'मदर अमरीका' लिखना अत्यन्त सरल होगा। उसमें आप अमरीका के गन्दे जीवन को––उसकी सांसारिकता और अतुलनीय पाप-वृत्ति को, उसकी अन्यायपूर्ण हबशियों की हत्याओं और तलाकों को, उसकी वेश्या-वृत्तियों और अनाचारमय गलियों को––दिखाकर अमरीका के सम्बन्ध में सत्य का वैसा ही उपहास करते सकते हैं जैसा मेयो ने भारत के सम्बन्ध में किया है। परनतु उसकी सतह तक अपने आपको गिरा लेना अच्छा न होगा। मैं आप लोगों को यह सलाह दूँगी कि आप उसमें उदार दृष्टि के अभाव के लिए खुले आम खेद प्रकट करके उसे लजित करें और सत्य को उपस्थित करके उसकी आँखें खोल दें।......तब लोग आश्चर्य करेंगे कि मिस मेयो उन समस्त पुष्पों और फलों की ओर से आँखें मूँद कर, जो भारतवर्ष में भरे पड़े हैं, केवल गन्दगी की खोज में भटकतही; तब लोग उससे घृणा भी करेंगे।

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पार्लियामेंट के लिए मज़दूर-दल के एक उम्मेदवार मेजर डी॰ ग्रैहम पोल १९ अगस्त १९२७ के 'न्यू लीडर' (लन्दन ) में लिखते हैं––

मदर इंडिया पढ़ने के पश्चात्......कोई व्यक्ति इस निर्णय पर पहुँच सकता है कि पागलों के अतिरिक्त और कोई भारतवर्ष के लिए स्वराज्य की बात नहीं सोच सकता। यह बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि कुछ वर्ष पूर्व इस पुस्तक की लेखिका मिस केथरिन मेयो ने फिलीपाइन्स की यात्रा की थी और उसके सम्बन्ध में भी एक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक का नाम था 'भय के द्वीप' और इसका उद्देश्य था अमरीकन साम्राज्य-वाद का समर्थन करना। अब भारत की यात्रा करने के पश्चात् मिस मेयो ने मदर इंडिया द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की उसी प्रकार सेवा की है। [ ४७७ ]इसमें सन्देह नहीं कि भारत की स्वतंत्रता के विरोधीगण इस पुस्तक को ईश्वर की भेजी हुई वस्तु समझते हैं। वे लोग भारतवर्ष पर हमारा आधिपत्य बनाये रहना चाहते हैं। पिछले बहानों को उन्होंने त्याग दिया है और अब स्पष्ट रूप से हमसे कह रहे हैं कि 'मुख्य बात यह है कि सामाजिक दृष्टिकोण से भारतवर्ष स्वराज्य के लायक नहीं है।' जब तक भारतवर्ष अपनी दशा न सुधारे तब तक इँगलैंड को चाहिए कि उसे कोई राजनैतिक अधिकार न दे। इस पुस्तक की समालोचना करते अपरिवर्तनवादी दल का एक समाचार पत्र कहता है कि 'राजनैतिक अधिकार देने के बहाने हमें भारतवर्ष को कुमार्ग पर न खड़ा कर देना चाहिए'।

सर जान मेनर्ड के॰ सी॰ एस॰ आई॰, जो पहले भारतीय सिविल सर्विस में थे, जिनके जीवन का अधिकांश भाग भारतवर्ष में व्यतीत हुआ था और जो पञ्जाब के गवर्नर की कार्यकारिणी समिति से पेंशन लेकर पृथक होने से पूर्व प्रत्येक विभाग में कार्य कर चुके थे, लिखते हैं कि इस पुस्तक के सम्बन्ध में संयम के साथ विचार करना मेरे लिए कठिन है। इससे सहमत हूँ। मैंने भारतवर्ष की उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक गत १६ वर्षों में ६ बार से कम यात्रा नहीं की। और भारतीय गृहस्थों के साथ रह चुका हूँ; ब्रिटिश इंडिया में भी और देशी रियासतों में भी। यदि मैं पक्षपातरहित होकर भारतवर्ष के सम्बन्ध में एक पुस्तक लिखूँ तो वह मिस मेयो की पुस्तक से उतनी ही भिन्न हो सकती है जितनी कि कोई कल्पना कर सकता है। मैं जिन मकानों में ठहरा हूँ केवल उन्हीं तक अपने विचारों को परिमित रक्खूँ सब भी यह भारतवर्ष को उससे सच्चा चित्र होगा जो मिस मेयो अपने निरीक्षण से तैयार कर सकी है।

वह भारतीय समाज में केवल वहीं आनन्द आती है जहाँ वह अस्वस्थ होता है। उसने प्रथम अध्याय में एक घृणित धार्मिक कृत्य का चित्रण करके अपना वायुमण्डल तैयार किया है; यद्यपि यह धार्मिक कृत्य वास्तविक भारतीय जीवन का अङ्ग नहीं है और केवल अत्यन्त निम्नकोटि के मूर्ख लोगों में ही प्रचलित है। जिस प्रकार उसने धर्म का वर्णन किया है वैसे ही सामाजिक रवाजों का भी। भारतीय विवाह के सम्बन्ध में कुछ बातें बताने के लिए उसने अस्पतालों और अधिकारी डाक्टरों का सहारा लिया परन्तु इन स्थानों में जो बातें देखी जाती हैं वे सामान्य नियम की अपवाद-मात्र होती हैं।

मिस मेयो की पुस्तक पढ़ कर आप यह सोच सकते हैं कि भारतवर्ष में कदाचित् एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं मिलेगा जो इन्द्रिय रोगों से पीड़ित न हो। परन्तु सरजन मेनर्ड लिखते हैं कि कोई भी डाक्टर जो भारतवर्ष [ ४७८ ]में काम कर चुका है इस बात का खण्डन कर सकता है। हाल के ही एक भूतपूर्व भारतीय गवर्नर सर रिजीनैल्ड कैडक भी 'मार्निंग पोस्ट' में लिखते हुए इसी बात पर जोर देते हैं कि मिस मेयो ने जो चित्र उपस्थित किया है––वह अत्यन्त गन्दा है और केवल बुराइयों को ही दर्शाता है। 'टाइम्स' का समालोचक भी यह स्वीकार करता है कि इसमें अतिशयोक्ति दोष है। उसका यह लिखना कि सन्तानोत्पत्ति करनेवाली आयु की स्त्रियाँ बिना विशेष रक्षा के भारतीय पुरुषों की पहुँच में जाने का साहस नहीं कर सकतीं, मेरी समझ में भयङ्कर और निराधार आक्षेप है। यदि मिस मेयो ब्रिटेन में आवे और यहाँ के अस्पतालों को देखे तो वह ब्रिटिश जीवन का भी वैसा ही गन्दा चित्र उपस्थित कर सकती है। यदि वह पुलिस की अदालत में कुछ दिन व्यतीत करे तो उसके ब्रिटिश गार्हस्थ्य जीवन के वर्णन में नाम मात्र को भी सुन्दरता न मिलेगी। स्वयं उसके देश पर विचार कीजिए। अमरीका की फिल्मों के आधार पर हम उसकी सभ्यता की क्या कल्पना नहीं कर सकते। यह एक अत्यन्त व्यङ्ग-पूर्ण बात जान पड़ती है कि एक ओर तो मिस मेयो की पुस्तक हमें भारतीय सभ्यता का बड़ा बीभत्स दृश्य दिखा रही है और दूसरी ओर भारत-सरकार अमरीकन फिल्मों की उस देश में खरीद रोकने के लिए कानून बनाना आवश्यक समझ रही है क्योंकि अश्लील होती हैं और उनका भारतीयों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

राजनैतिक बातों को भी मिस मेयो ने इसी प्रकार गंभीरता के साथ उपस्थित नहीं किया। उसने भारतीय व्यवस्थापिका सभाओं को भी देखा है और कहती है कि केन्द्रीय और प्रान्तीय सभी व्यवस्थापिका सभा की बैठकें बाहरी को ऐसी प्रतीत होती हैं मानों कमरे में छोटे और शैतान लड़के भरे हो और उन्हें खेलने के लिए अचानक एक बहुत बड़ी घड़ी मिल गई हो। "वे घड़ी में अपनी अँगुलियां छोड़ने के लिए लड़ते हैं और चीखते हैं, एक या दो पहिए निकाल लेने के लिए, मुख्य स्प्रिंग के साथ खेलने के लिए यत्न करते हैं, कीलों को उखाढ़ लेने की चेष्टा करते हैं।" मैंने भारतीय व्यवस्थापिका सभाओं को कार्य करते हुए देखा है और यह कहने के लिए विवश हूँ कि उनकी तुलना हमारी स्थानिक कौंसिलों से या स्वयं इम्पीरियल पार्लियामेंट से बड़े मजे में की जा सकती है। भारतीय बड़ी व्यवस्थापिका सभा के सभापति माननीय मिस्टर वी॰ जी॰ पटेल ने इस देश की यात्रा अभी अभी समाप्त की है। उनका अधिकांश समय हाउस आफ़ कामन्स में ही व्यतीत हुख था और व्यवस्थापिका सभा के मुकाबले में, जिसका कार्य वे बड़ी योग्यता के साथ सन्चालन करते हैं, हाउस आफ़ कामन्स की गड़बड़ी देख कर उन्होंने बड़ा आश्चर्य प्रकट किया था। जब मिस मेयो हमें यह बतलाती है कि भारतीय बड़ी व्यवस्थापिका सभा में स्वराज्यदल के लोग घंटों और दिनों [ ४७९ ]व्यर्थ के अडङ्गों में अपनी सारी शक्ति लगाते रहते हैं और अधिकांश समय तक अन्य सदस्यों को चुपचाप बैठे रहना पड़ता है तब हमें आश्चर्य होता है कि क्या मिस मेयो इस बात को नहीं जानती कि हाउस आफ़ कामन्स में राज्यकोष की बैंचों पर जो बैठते हैं वे अडङ्गा नीति के प्राचीन आचार्य हैं। और यदि वह उदासीनता के भारी भार का अनुभव करना चाहे तो हाउस आफ़ कामन्स में भारतीय प्रश्नों पर विवाद की बैठकें देखे। उस समय यदि उसके भाग्य अच्छे हुए तो ४१५ अपरिवर्तनवादी सदस्यों में उसे अधिक से अधिक २० दिखाई पड़ जायेंगे और वे भी या तो जँभाई लेते होंगे या अर्द्धनिन्द्रित होंगे।

मिस मेयो का विश्वास है कि ब्रिटेन ने भारतवर्ष को राजनैतिक सुधार देने में जल्दी की है; पर भारतीय स्वयं इस जल्दी को बुरा मानते हैं। वह दोहरी शासन-व्यवस्था की असफलता उसकी आन्तरिक त्रुटियों के कारण नहीं स्वीकार करती बल्कि उसे महात्मा गांधी के बुरे राजनैतिक आन्दोलन के कारण बताती है; यद्यपि इन त्रुटियों को लार्ड कर्जन से लेकर संयुक्त-प्रान्त के गवर्नर तक, जिसने इसे 'दुःखदायक जटिल और अनिश्चित पद्धति' कहा था, सब स्वीकार करते हैं। मिस मेयो ने जेनरल डायर और अमृतसर का कहीं उल्लेख नहीं किया। परन्तु यदि मिस मेयो किसी भारतीय से इस सम्बन्ध में पूछती तो उसे मालूम होता कि सुधारों के विरोध होने का सबसे बड़ा कारण १९१९ ईसवी में अमृतसर का भयानक हत्याकाण्ड है।

लेखिका भारतीयों की इस शिकायत को नहीं सुनती कि उनके देश की आय का एक बड़ा भाग बाहर चला जाता है। उसकी समझ में सेना के अफसर वतन के अतिरिक्त अपनी निजी आय भी वहीं व्यय कर देते हैं। परन्तु दूसरे ही पृष्ठ पर वह स्वयं अपना खण्डन करती है और लिखती है कि सेना के अफसर और सिविल सर्विस के अफसर अपने बच्चों को इँगलैंड पढ़ने के लिए भेजते हैं––जहाँ उनके वेतन का एक विचारणीय भाग आवश्यकता में व्यय होता है। परन्तु गत वर्ष के २१ मार्च को ही लार्ड विंटरटन ने हाउस आफ़ कामन्स में कुछ अङ्क उपस्थित किये थे उनसे पता चलता है कि ४,००० से ५,००० तक फौजी अफसर ऐसे हैं जो भारतीय कर की आयु से २०,००,००० पौंड प्रतिवर्ष पेंशन पाते हैं और उसे इसी देश में (इँगलैंड में) व्यय करते हैं। अन्य विभागों से पेंशन पानेवाले अँगरेज़ों की संख्या ३,००० है। वे १५,००,००० पौंड प्रतिवर्ष भारत से पेंशन पाते हैं, इँगलैंड में रहते हैं और वहीं व्यय करते हैं। निःसन्देह भारत के धन का यह भीषण बहिगमन है; और ज्वाइंट स्टाक बैंकों, व्यापारिक गृहों और कारखाना आदि के लाभ के द्वारा भारत का जो धन इँगलैंड पहुँचता है, उसका तो कुछ कहना ही नहीं है। [ ४८० ]****

स्वर्गीय लार्ड लिटन ने, जब वे भारतवर्ष के वायसराय थे तो यहाँ इँगलैंड की सरकार को एक पत्र लिखा था। उसमें उन्होंने भारत सरकार की उच्च नौकरियों के लिए भारतीयों की मांगों का उल्लेख किया था और कहा था कि:––

"हम सब जानते हैं कि भारतीयों की ये आशाएँ कभी पूरी नहीं की जा सकती, न कभी की जायँगी। हमें दो बातों में से एक करना है––उन्हें रोक दें या धोखा दें। हम लोगों ने सबसे कम सचाई का मार्ग ग्रहण किया है।"

इसके आगे उन्होंने लिखा था कि:––

"इँगलैंड और भारत दोनों सरकारों ने यथाशक्ति प्रत्येक उपाय से उन वादों को हृदय में तोड़ दिया जिन्हें कानों को सुनाया था।"

मेरा विचार है कि हमने जो बार बार प्रतिज्ञा की है कि भारतवर्ष में भारतीय और योरपियन समान दृष्टि से देखे जायेंगे उसको भङ्ग करने के लिए एक और बहाना मिल जायगा।

अपरिवर्तनवादी सरकार जो कुछ भी हमारे पास है, सबको अपनी मुट्ठी में किये रहने का प्रयत्न करेगी। भारत के हित के लिए नहीं बल्कि अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए। यह देखना मज़दूरदल का कर्तव्य है कि हमारी प्रतिज्ञाएँ सम्मान के साथ पूर्ण की जाती हैं––भारतवासियों को अपना भार और उत्तरदायित्व स्वयं वहन करने का अवसर दिया जाता है और वे अपनी भलाई के स्वयं रक्षक बनते हैं

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श्रीयुत एच॰ एस॰ एल पोलक ने, जो एक अँगरेज़ वकील हैं जिन्होंने कई बार भारत की यात्रा की है और जिन्हें तीन महाद्वीपों में भारतीयों से काम पड़ा है, 'मैंचेस्टर गार्जियन' में एक पत्र प्रकाशित करवाया है। उसमें एक स्थान पर लिखते हैं:––

कुमारी लिलियन विन्सटेनली डाक्टर टैगोर के इस आक्षेप से सहमत नहीं हैं कि मिस मेयो ने 'जाति-द्वेष' और दूसरे द्वेषपूर्ण उद्देशों से प्रेरित [ ४८१ ]होकर मदर इंडिया की रचना की है। मिस मेयो का पक्ष समर्थन करने के लिए उन्होंने अमरीका के प्रसिद्ध लेखकों की ऐसी कड़ी टीकाएँ उद्धृत की हैं जो उन्होंने स्वयं अपने देशवासियों के सम्बन्ध में लिखी थीं। जो उदाहरण उद्धृत किये गये हैं वे समान नहीं हैं। उन समालोचकों ने जिनकी निन्दा की है वे बदला ले सकते हैं। इसके विरुद्ध मिस मेयों ने फिलीपाइन्स में और भारतवर्ष में जिनकी निन्दा की है वे बदला नहीं ले सकते। जिन भारतीयों ने इस पुस्तक को या इसमें से दिये गये उद्धरणों को पढ़ा है वे सब इस विश्वास में सहमत हैं कि मिस मेयो ने जिन उद्देश्यों से प्रेरित होकर इस पुस्तक को लिखा है उनमें यह भी एक है। उनका दृढ़ निश्चय है कि बिना किसी सन्तोषजनक कारण के एक स्वच्छता-सम्बन्धी विवरण उपस्थित करने की आड़ में उसने वैसी ही राजनैतिक पुस्तक लिखी है जैसी कुछ समय पूर्व फिलीपाइन्स के सम्बन्ध में लिख चुकी थी। यही उसका उद्देश्य भी था। मिस मेयो का उद्देश्य कुछ भी रहा हो महात्मा गान्धी के शब्दों में उसने 'असत्य से भरी पुस्तक' लिखी है, और वक्तव्यों को तथा घटनाओं को अपने अनुकूल बनाने के लिए बुरी तरह तोड़ा-मरोड़ा है।......

भारतीय इस बात को भली भांति जानते हैं कि योरप और अमरीका में मदर इंडिया के पक्ष में बड़ा धूर्ततापूर्ण आन्दोलन हो रहा है और उसके उत्तरों पर कदाचित् ही कुछ ध्यान दिया जायगा। मेरे भारतीय मित्र—जो सरकारी नौकरी में उच्च पदों पर हैं और अपने देशवासियों की दृष्टि में महान् आदरणीय हैं ऐसे प्रश्नकर्ताओं-द्वारा जिनका यह विश्वास है कि पुस्तक का विषय सत्य और अकाट्य है तथा लेखिका ने उत्तेजित होकर उन्हें उपस्थित किया है—बार बार यह प्रश्न किये जाने पर कि उनमें शक्ति हो तो पुस्तक में वर्णित बातों को असत्य सिद्ध करें, अत्यन्त क्रोध और घृणा से उद्विग्न हो कर मेरे पास आये हैं। यह विष कहां तक फैल गया है इसका अनुमान करना कठिन है; परन्तु इतना मैं निश्चय के साथ कह सकता हूं कि मिस मेयो का उद्देश्य चाहे जो रहा हो, पुस्तक के लिए जो घोर आन्दोलन किया गया है उसने भारतवर्ष में काले गोरे के जातिगत घृणा-भाव को इतना अधिक बढ़ा दिया है और घनीभूत कर दिया है कि इससे कोई असहमत नहीं हो सकता और इसके कुपरिणामों की गणना नहीं की जा सकती।.....

समाप्त

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