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दुखी भारत/विषय प्रवेश

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दुखी भारत  (1928) 
द्वारा लाला लाजपत राय
[  ]

विषय-प्रवेश

[ १ ]

विदेशी शासन की पराधीनता राष्ट्रों के पतन का एक महान कारण है।

—प्रो॰ ई॰ ए॰ रॉस

राष्ट्रीय दृष्टि-कोण से कहा जाय तो एक जाति के ऊपर दूसरी जाति की ग़ुलामी से बढ़कर और कोई शाप नहीं हो सकता। लूट-मार करने और देश जीतने के इरादे से जो राजा अपना दल लेकर निकल पड़ता है उसका प्रभाव जिस देश को रौंदते हुए वह जाता है उसके लिए नाशकारी होता है। पर यदि उसकी तुलना किसी देश की स्वाधीनता की उस क्षति से की जाय जो उसकी जातियों को पूर्णरूप से पराधीन करके उस पर विदेशी सेना की सङ्गीनों का भय दिखाकर शासन करने से क्रमशः होती है, तो वह कुछ भी न ठहरेगा। आक्रमणकारी तूफ़ान की तरह आता है, लूट-मार करता है, उखाड़-पछाड़ करता है और बात की बात में सारे देश को तहस-नहस कर देता है। किन्तु या तो वह अपने लूट के माल के साथ चला जाता है या उसी देश में बस जाता है और उसके प्राचीन निवासियों में मिल जाता है। पहले प्रकार के मनुष्यों में सिकन्दर, महमूद गज़नी, तैमूर, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे आक्रमणकारी थे। दूसरे प्रकार के मनुष्यों में वे लोग थे जो सिथियनों और हूणों को भारतवर्ष में ले आये, यहीं बस गये और भारतीय राष्ट्र के एक अङ्ग बन गये या गोरी और बाबर जैसे शासक थे जिन्होंने यहाँ की भूमि पर अपने राज्यवंशों की गहरी नींव डाली। [  ]यह सच है कि दोनों दशाओं में देश के लोगों को अत्यन्त लज्जा अधःपतन और आर्थिक-हानि का कष्ट सहना पड़ता है। पर अन्त में विजित और विजेता आपस में मिल जाते हैं। दोनों एक दूसरे में अपना रक्त मिला देते हैं, दोनों एक दूसरे की सभ्यता और रहन-सहन के तरीकों को ग्रहण कर लेते हैं और दोनों अपनी सुदृढ़ विशेषताओं से एक नई सभ्यता और नई जाति की सृष्टि करने का प्रयत्न करते हैं। इन दोनों हालतों में विदेशी शासन का शाप ऐसा तीक्ष्ण, पीड़ाजनक, विनाशक और अपमानकारक नहीं होता जैसा कि तब होता है जब एक जाति दूसरी पर अपना शासन लाद देती है और उसे अपने सम्पूर्ण राजनैतिक, आर्थिक और सैनिक-बल के द्वारा बनाये रखती है। एक अकेले बादशाह या शासक से दया, उदारता और न्याय-भाव की प्रार्थना करने पर किसी अंश में सफलता हो भी सकती है पर एक जाति या प्रजातंत्र से प्रार्थना करने पर कभी नहीं हो सकती। ग़ैर जाति पर किसी प्रकार का शासन-विधान ऐसा कठोर और निर्दयतापूर्ण नहीं होता जैसा कि प्रजातन्त्र का। प्रजातान्त्रिक शासन घरेलू कामों के लिए अच्छा हो सकता है परन्तु दूसरी जातियों के हक में उसका परिणाम भयङ्कर होता है और अनन्त बुराइयों की आशङ्काओं से भरा रहता है।

राजनैतिक ग़ुलामी सामाजिक बुराइयों और राष्ट्रीयअपराधों के दण्डस्वरूप प्राप्त होती है। पर एक बार लद जाने से यह उन बुराइयों को बढ़ने और घनीभूत होने में और भी मदद देती है। यह राष्ट्र को फिर से ज़िन्दा होने या उठने से बुरी तरह रोकती है। यह सामाजिक कुरीतियों और कमजोरियों को सबसे आगे ला धरती है। यह मानसिक, नैतिक और शारीरिक सब प्रकार की भयानक ग़रीबी की ओर ले जाती है। यदि जाग्रति के कभी कोई लक्षण प्रकट होते हैं तो वे देर से उपस्थित होने पाते हैं या क़ानून, कूटनीति, मक्कारी और धोखेबाज़ी की पूरी शक्ति से रोके और कुचल दिये जाते हैं। पराधीन जातियों को हीन से हीन दशा में दिखलाना और लेखों तथा व्याख्यानों द्वारा उनको निर्लज्जता के साथ झूठ मूठ बदनाम करना साम्राज्यवाद का एक अङ्ग है। इसका उद्देश्य है पराधीन जातियों में दासता का भाव उत्पन्न करना और उसे दृढ़ रखना तथा उनके अधिकार, सम्पत्ति और [  ]स्वतन्त्रता को अपने कब्ज़े में रखने के लिए शेष संसार की नैतिक-स्वीकृति प्राप्त करना। गोरी जातियों के प्रभुता की यही आदि बाइबिल है। यही मनोभाव है जो साम्राज्यवादियों को उत्तेजित करता है। यही सामग्री है जिससे पराधीन जातियों को हाथ में रखने के लिए और स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए महत्वाकांक्षा और उद्योग करके, 'जो वे अपने आप अपनी हानि कर रहे हैं' उस से उन्हें बचाने के लिए 'लोहे के पिंजड़े' तैयार किये जाते हैं। इसी उपाय से ब्रिटेन ने भारतवर्ष में अपना राज्य स्थापित किया। इसी उपाय से अमरीका के संयुक्त राज्य ने फ़िलीपाइन द्वीपों पर अधिकार कर लिया और अब हटने से इनकार करता है।

यह सच है कि कभी कभी साम्राज्य स्थापित करने का काम आत्म-विस्मृति की दशा में आत्मरक्षा या व्यापार की सामयिक आवश्यकताओं को लेकर आरम्भ होता है किन्तु शीघ्र, बहुत शीघ्र वह दुराग्रह और अधर्मपूर्वक साम्राज्यस्थापन का रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार जो साम्राज्य कायम होते हैं और बनाये जाते हैं उनको और बढ़ाया जाता है, उन पर अधिकार रखा जाता है और उनका प्रबन्ध किया जाता है। तो भी कभी कभी जो साम्राज्य धूर्तता से स्थापित किये जाते हैं और बल से वश में रखे जाते हैं उनके सामने एक विकट समस्या यह खड़ी हो जाती है कि उनके अधीन जातियों में राजनैतिक चेतनता जाग्रत हो उठती है। राजनैतिक प्रधानता आर्थिक लूट-खसोट की ओर ले जाती है। आर्थिक लूट-खसोट से नाना प्रकार के रोग और व्याधियों की उत्पत्ति होती है। यहाँ तक कि पृथ्वी पर की सबसे सीधी जातियाँ भी हिंसात्मक या अहिंसात्मक विद्रोह करने के लिए विवश हो उठती हैं और उनमें स्वतन्त्रता की इच्छा उत्पन्न हो जाती है। शासक इसे बुरा मानते हैं। पहले वे स्वतन्त्र होने के इस जोश को हँसी उड़ाकर, घृणा दिखाकर या बिल्कुल उपेक्षा करके समूल नष्ट करना चाहते हैं। उसके बाद हुकूमत का दर्जा आता है। दबाव की नीति बर्ती जाती है या मीठी बातों से उन्हें अपने वश में रखने का उद्योग किया जाता है इन बातों में केवल मक्कारी, धोखेबाज़ी और ज़बानी जमाख़र्च रहता है। इसी तरह झगड़ा जारी रहता है। साम्राज्य-विस्तार के पण्डित लोग [  ]दो दलों में विभक्त हो जाते हैं। (१) वह जो केवल अपनी शक्ति से शासन करना चाहते हैं और बेवकूफियों में नहीं पड़ना चाहते। (२) लिबरल लोग जो संरक्षता की दलील उपस्थित करते हैं। वे अपनी जातियों को और संसार को यह विश्वास दिलाते हैं कि उनके अधीन जो जातियाँ हैं वे अपने आप शासन करने में असमर्थ हैं और स्वयं उन शासितों की भलाई के लिए यह आवश्यक है कि उन पर उनकी संरक्षता बराबर जारी रहे, उसका कभी अन्त न हो। कुछ ऐसी शर्तें बना दी जाती हैं जिनके पूरी होने पर इस संरक्षता के समय की समाप्ति हो सकती है। इन शर्तों के पूरी होने में रुकावट डालने के लिए वास्तविक उपाय काम में लाये जाते हैं। इस प्रकार झूठे तर्कों का एक वृत्त रच दिया जाता है जिससे पराधीन जातियाँ और संसार दोनों को धोखा होता है। निरक्षरता, सामाजिक पवित्रता और गम्भीरता का अभाव अछूतों और दलितों की उपस्थिति, निजी और सार्वजनिक धर्माचरण का छोटा स्वरूप, हथियार बनाने, सेना संचालन करने और वैज्ञानिक रीति से रक्षा का संगठन न कर सकने की अयोग्यता आदि बातें स्वतन्त्रता न देने के पक्ष में कही जाती हैं। उधर इन सब त्रुटियों को दृढ़ बनाये रहने के लिए प्रत्येक उद्योग भी किया जाता है। पराधीन जातियों के लिए यह घोषणा कर दी जाती है कि उनमें सदाचार की कमी है जिसके बिना कोई भी जाति स्व-शासन के योग्य नहीं हो सकती या एक जाति दूसरी के साथ अच्छी तरह पेश नहीं आ सकती। शासक लोग अपने या दूसरी जातियों के घरेलू इतिहास पर बिल्कुल ध्यान नहीं देते और उठते हुए राष्ट्र की इस नाम-मात्र की गिरी दशा को तिल का ताड़ बना देते हैं। और डंके की चोट पर कहते हैं कि ये जातियाँ दासता-प्रिय हो गई हैं, अपनी बेड़ियों को अलग नहीं करना चाहती, मूर्खता को ही अच्छा समझती हैं, गरीबी की पूजा करती हैं, गन्दगी तथा रोग-व्याधियों में बड़ी भक्ति रखती हैं, स्वतंत्रता से डरती हैं और जो लोग खूब अच्छी तरह जमे हुए तथा लूट-खसोट का बाना पहने हुए एकच्छत्र विदेशी शासन के विरोध का झण्डा उठाते हैं—और स्वतंत्रता की पुकार मचाते हैं, उनसे घृणा करती हैं। राजनैतिक गुलामी और आर्थिक [  ]परवशता का कुछ ऐसा शाप होता है कि स्वयं ग़ुलाम जातियाँ भी यह नहीं समझतीं कि स्वराज के योग्य चरित्र गढ़ने तथा स्वतंत्र मनोवृत्ति पैदा करने का एक मात्र उपाय यही है कि इन बेड़ियों को तोड़ डाला जाय और इस शासन के जुएँ को उतार कर फेंक दिया जाय। साम्राज्यवादियों की इस सम्मोहन-विद्या और दास-जातियों के विरुद्ध इस प्रकार सुसंगठित गन्दे प्रचार का ऐसा असर पड़ता है कि वे अपना जकड़ी हुई दशा से बेचैन होने पर भी स्वतन्त्रता से डरती हैं। इस प्रकार झूठे तर्क के वृत्त में यह युद्ध होता रहता है अन्त में बदला लेने की आग चारों तरफ भड़क उठती है और इतिहास में एक नया अध्याय प्रारम्भ होता है।

प्रत्येक विद्यार्थी यह जानता है कि योरोप शताब्दियों तक असभ्यता, मूर्खता और ग़ुलामी का शिकार रहा है। योरोप से हमारा मतलब संसार की सब गोरी जातियों से है। अर्थात् योरोप और अमरीका दोनों। अमरीका तो अभी योरोप का बच्चा ही है। इन गोरी जातियों ने एशिया से अपना धर्म पाया, मिस्र की कला और उद्योग का अनुकरण किया, भारतवर्ष और फ़िलस्तीन से सदाचार-सम्बन्धी आदर्श उधार लिये। संसार की आधुनिक उन्नत-जातियों में इस समय जो कुछ भी वास्तविक ख़ूबी और अच्छाई है वह अधिकांश में उन्हें पूर्व से मिली है। और कुछ लोगों के मत के अनुसार उनका रक्त भी एशिया के ही रक्त से बना है। जिन्होंने थोड़ा बहुत भी इतिहास पढ़ा है वे जानते हैं कि अभी तीन ही सौ वर्ष पहले वर्तमान योरोप के आधे भाग पर एशिया का अधिकार और शासन था। एशिया में ईसाइयों के आगमन से पहले केवल सिकन्दर की ही सेनाएँ ऐसी थीं जिन्हें विजय प्राप्त हुई थी। पर उनका प्रभाव एशिया के एक बहुत छोटे भाग पर पड़ा था। और वह भी थोड़े ही समय तक के लिए। सिकन्दर की चढ़ाई का बदला हूणों, चंगेज़ खाँ, तैमूर और उनके बाद मूर और तुर्कों के हमलों तथा जीतों से खूब अच्छी तरह ले लिया गया। शताब्दियों तक रूस, तुर्की, सिसली, स्पेन और बालकान पर अधिकार करके एशियावालों ने राज्य किया। एशिया पर योरोप का शासन तो अभी दो ही शताब्दियों से है। यह भारत की जीत के साथ आरम्भ हुआ है और ईश्वर ने चाहा तो भारत के स्वाधीन [  ]होते ही उसका अन्त भी हो जायगा। पृथ्वी पर की सब गोरी जातियों ने भारत की राजनैतिक स्वाधीनता के विरुद्ध जो अपवित्र एका किया है उसके पीछे यही भय काम कर रहा है। भारत ही काले गोरे आदि वर्णों की समस्या को जटिल बनाये हुए है। भारत की स्वतंत्रता से संसार की वे सब जातियाँ स्वतंत्र हो जायँगी जो सफेद नहीं हैं। इससे कुमारी कैथरिन मेयो की पुस्तक 'मदर इण्डिया' के तमाम योरोप में ख्याति और सफलता प्राप्त करने का कारण स्पष्ट हो जाता है।

मिस मेयो का मनोभाव एशिया की काली, भूरी और पीली सभी जातियों के विरुद्ध योरोप की गोरी जातियों का ही मनोभाव है। पूरब को दबाने-वालों के मुँह की वह पिपहरी मात्र है। पूर्व की जाग्रति ने योरोप और अमरीका दोनों को भयभीत कर दिया है। इसी से इतनी प्राचीन और इतनी सभ्य जाति के विरुद्ध इस पागलपने का प्रदर्शन हो रहा है और ख़ूब अध्ययन के साथ तथा जानबूझ कर यह झूठा आन्दोलन खड़ा किया गया है।

[ २ ]

मिस कैथरिन मेयो, जैसा कि उसके लेखों से जान पड़ता है, अमरीका की जिङ्गो जाति का एक औज़ार है। वह पत्रकार है। ग्रन्थकार होने का उसका दावा केवल इतना ही है कि उसकी लेखन-शैली मनोरञ्जक है, सनसनी पैदा करनेवाले उड़ते हुए शब्दों का प्रयोग करना उसे आता है और सन्देहपूर्ण कथाओं को बड़ी मनोरञ्जक भाषा में लिखने का उसे अभ्यास है। एक मामूली पाठक भी इतिहास, मनःशास्त्र और राज-नीति-विज्ञान में उसकी अज्ञानता को दिखला सकता है। फिर भी वह विविध विषयों की अच्छी लेखिका है। ग्रन्थकारों में पहले पहल उसकी गणना एक पुस्तक के से हुई जिसमें उसने अपनी वादा की हुई स्वतन्त्रता के लिए अमरीका का लगातार दरवाज़ा खटखटानेवाले फ़िलीफाइन-निवासियों के सम्बन्ध में अपनी 'खोजों' का वर्णन किया था। पुस्तक का नाम रखा गया 'भय के [  ]द्वीप'। कलकत्ता के 'स्टेट्समैन' के भूतपूर्व सम्पादक और एक प्रसिद्ध अँगरेज़ पत्रकार श्रीयुत एस॰ के॰ रैटक्लिफ़ जो आज-कल अमरीका में अपने व्याख्यानों और लेखों से ख़ूब प्रसिद्ध हो रहे हैं, न्यूयार्क के 'न्यूरिपब्लिक' नामक अख़बार में 'मदर इंडिया' की समालोचना लिखते हुए एक स्थान पर कहते हैं :––

"दो साल पहले जब मैंने कैथरिन मेयो की फ़िलीपाइन के सम्बन्ध में आन्दोलनकारी पुस्तक पढ़ी थी तभी मुझे यह निश्चय हो गया था कि इसके पश्चात् वह भारतवर्ष में जायगी और दूसरी पुस्तक तैयार करेगी जो ठीक उन्हीं नतीजों को दिखानेवाली होगी जिनको उसने 'भय के द्वीप' में बार बार दोहराया है। यहाँ स्मरण रखना चाहिए कि उस जबरदस्त घोषणा-पुस्तक का विषय यह है कि अमरीका के संयुक्त राज्यों को अपना शासनकारी हाथ इन द्वीप-समूहों पर सदा रखे रहना चाहिए। क्योंकि यदि ऐसा न किया जायगा तो बेचारे फ़िलीपाइनों को उन्हीं के ज़मींदार, वकील और अन्य भक्षक लोग बुरी तरह सताएँगे और उनकी ज़िन्दा खाल खिँचवा लेंगे।"

हमें यह मानने का कारण है कि मिस मेयो की भारत-यात्रा स्वेच्छा से नहीं हुई। और यह कि उसे उन स्वार्थी ब्रिटिश-वादियों ने दबाव डालकर भेजा जो यह सोचते हैं कि भारतवर्ष में स्वराज्य होने से उनको और उनकी जेबों को ख़तरा है। प्रकट रूप से इस बात का हमारे पास कोई ठीक प्रमाण नहीं है। पर प्रबल और ब्यौरेवार गवाहियों का प्रभाव भी नहीं है। श्रीयुत लायनेल कर्टिज़ उन सुधार-वादियों में हैं जो ब्रिटिश साम्राज्य की अखण्डता और बढ़ती से दिलचस्पी रखते हैं। ग्रेट ब्रिटेन के 'गोल-मेज-दल' के के सदस्य हैं। साम्राज्य की समस्याओं में यह दल जी-जान से दिलचस्पी लेता है और इसके सदस्य अपना समय और शक्ति साम्राज्य के भिन्न भिन्न भागों को एक में मिलाने और उन्हें एक दूसरे को अधिक अच्छा समझाने में लगाते हैं। लेकिन जिस साम्राज्य के वे पक्षपाती हैं वह 'कामन वेल्थ आफ़ नेशन्स'––राष्ट्रों का प्रजातन्त्र है। उसमें गोरे अर्थात् ब्रिटिश और उपनिवेशी दोनों मिलकर असली बाशिन्दों को चूसेंगे। कर्टिज़ महाशय १९१६-१७ में उस समय भारतवर्ष में आये थे [  ]जब अगस्त १९१७ में मिस्टर मान्टेग्यू ने वह प्रसिद्ध घोषणा की थी जिसमें ग्रेट ब्रिटेन ने भारत को शासन-सुधारों द्वारा दर्जा बदर्जा स्वराज्य देने का वादा किया था। मिस्टर मान्टेग्यू भारत में इसलिए आये थे कि वेवहाँ की स्थिति की जाँच करें और पार्लियामेंट को बतलावें कि उस वादे को कार्य्य-रूप में कहाँ तक परिणत किया जा सकता है। कर्टिज़ महाशय भी कुछ कुछ ऐसे ही काम के लिए यहाँ आये थे। जब 'सेक्रेट्री आफ़ स्टेट' ने कुछ देने की कोशिश की तो 'गोल-मेज-दल' के इस बहादुर सवार का यह देखना काम हो गया कि न तो कुछ दिया जाय और न उस वादे की कुछ पाबन्दी हो। वह दो प्रभावशाली अँगरेजों से, जो भारतीय सिविल सर्विस में थे, उसके गोल-मेज-दल के सदस्य भी थे और एक प्रान्त में ऊँचे पदों पर थे, मिलकर षड्यन्त्र रचने लगा। इस षड्यन्त्र का उद्देश यह था कि भारत का भविष्य निश्चय करने में ग्रेट ब्रिटेन के गोरे उपनिवेशों को भी कुछ हिस्सा और कहने का अधिकार मिले। और जिन जंज़ीरों से भारत ब्रिटिश साम्राज्य का गौरव बढ़ाने के लिए बाँधा गया है उनको और भी मजबूत बनाया जाय। अकस्मात एक काग़ज़ जिसमें इस षड्यन्त्र की नीचतापूर्ण बातें थीं महात्मा गान्धी के हाथ लग गया और उन्होंने उसको सार्वजनिक रूप दे दिया। कर्टिज़ महाशय जहाँ के तहाँ पकड़ लिये गये और उन्होंने उस 'गोल-मेज-दल' की विज्ञप्ति को इष्ट-मित्रों के नाम 'निजी चिट्ठी' बता कर अपना पिण्ड छुड़ाया। वे और भारतीय सिविल सर्विस के उनके दोनों षड्यन्त्रकारी मित्र मान्टेग्यूचेल्मस् फोर्ड रिपोर्ट की उन बातों के रचयिता होने की प्रसिद्धि पा चुके हैं जो १९१९ के सुधारों—क़ानूनों,—को कलङ्कित करनेवाली थीं।

अगस्त १९२५ में कर्टिज़ महाशय 'मैसा चुसेट्स' (अमरीका) पहुँचे। वे कैथरिन मेयो से मिले और उसकी 'भय के द्वीप' नामक रचना पर ऐसे मुग्ध हो गये कि उस पुस्तक के अँगरेज़ी-संस्करण की भूमिका लिख दी। भूमिका की भाषा से यह अत्यन्त सम्भव प्रतीत होता है कि कर्टिज़ महाशय मिस मेयो की ख़र्चीली भारत-यात्रा के लिए यद्यपि धन नहीं जुटा सके पर उनका यह आशय अवश्य था कि फ़िलीपाइन्स पर लिखी गई [  ]पुस्तक के पश्चात् मिस मेयो उन्हीं उद्देश्यों से भारत की यात्रा करे। मिस्टर कर्टिज़ ने अपनी भूमिका में लिखा था*[१] :––

"ब्रिटिश सरकार पर जितने आश्रित देशों का उत्तरदायित्व है उतना दूसरे सब राष्ट्रों पर मिलाकर भी नहीं है। हमारा यह अनुभव शताब्दियों से है (क्या हम पूछ सकते हैं कि कितनी शताब्दियों का क्योंकि एशिया में ब्रिटिश साम्राज्य का प्रारम्भ हुए अभी पूरी दो शताब्दियाँ भी नहीं हुई?)... दूसरों के अनुभवों की उपेक्षा करने की हमारे पास बहुत गुजाइश नहीं है, ख़ासकर पश्चिम के चञ्चल-हृदय नवयुवक स्वामियों के अनुभवों की।...... हिन्दुस्तान और उपनिवेशों की समस्याओं के सम्बन्ध में बहस करते समय एक मन्त्री से यह पूरी आशा रक्खी जाती है कि वह पार्लियामेंट को बतलावे कि अमरीका या हालेंडवाले वैसी ही समस्याओं से फ़िलीपाइन या जावा में कैसे पेश आते हैं। १९१७ ई॰ में अमरीका ने फ़िलीपाइन द्वीपों में जिस नीति का अनुसरण किया वह बिल्कुल वैसी ही थी जैसे हिन्दुस्तान में आम तौर पर राष्ट्रीय आन्दोलन किया जारहा है। उसके दूसरे वर्ष बाद भारत सरकार से पेंशन लेकर सर डब्ल्यू॰ मेयर ने फ़िलीपाइन की यात्रा की। अमरीका किस ढङ्ग से शासन करता है इस बात की रिपोर्ट उन्होंने दी होगी पर 'इंडिया आफ़िस' ने उसका भेद कभी नहीं खोला।"

दूसरे पैराग्राफ़ में कर्टिज़ महाशय इस बात को ख़ुलासा कर देते हैं कि फ़िलीपाइन द्वीप-समूहों पर लिखी गई मिस मेयो की पुस्तक भारत के अँगरेज़ शासकों के कितने काम की है :––

"अमरीका की कांग्रेस ने १९१६ ई॰ में 'जोन्स-ला' नामक क़ानून पास किया। उसके अनुसार व्यवस्थापिका सभा का शासन और उसके चलाने का काम फ़िलीपाइन निवासियों के दे दिया गया पर कार्यकारिणी की शक्ति अमरीका के प्रेसिडेंट की मातहती में एक गवर्नर के ही हाथों में बनी रही। भारत को १९२० ई॰ में जो राजनैतिक अधिकार मिले हैं और भारतीय विधान के अनुसार जिनके सिवाय और नहीं मिल सकते थे वे इस 'जोन्सला' से बहुत कुछ मिलते जुलते हैं। [ १० ]इसलिए जो लोग भारतीय दशाओं के अध्ययन में लगे हैं उन्हें फ़िलीपाहन में जोन्सला की कारगुज़ारियों को ख़ूब समझ लेने की आवश्यकता है। ऐसी जाँच-पड़ताल को उत्तेजना मिलने की आशा से मैं अँगरेज़ पाठकों को यह पुस्तक पढ़ने की सलाह देता हूँ।"

कर्टिज़ महाशय यह जानते हैं कि "अमरीका ने फ़िलीपाइन द्वीपों को स्वराज्य देने में जो जल्दी की और मिस मेयो के वर्णन के अनुसार उसका जो दुष्परिणाम हुआ सम्भवतः वही बातें १९१७ ई॰ में भारत को स्वराज्य देने की जो घोषणा हुई थी उसको बुरा कहने के लिए तर्करूप में पेश की जायँगी।"

मिस मेयो का बयान है कि मदर इंडिया को उसने केवल अपने देशवासियों के लाभ के लिए लिखा पर अभी तक उसने हमें यह नहीं बताया कि भारतवर्ष का इस प्रकार अपमान करने से अमरीका के लोगों को क्या लाभ होगा? कोई वैसा ही लाभ तो नहीं जैसा कर्टिज़ महाशय 'भय के द्वीप' को पढ़ने की सलाह देकर अँगरेज़ शासकों को पहुँचाना चाहते हैं।

किसी तरह से हो हमारा इस परिणाम पर पहुँचना अनुचित नहीं है कि १९२५ ई॰ में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के योद्धा मिस्टर कर्टिज़ और 'भय के द्वीप' की रचयित्री मिस मेयो में कुछ इस प्रकार की बातें और कोई पारस्परिक समझौता अवश्य हुआ जिसके फल-स्वरूप अक्टूबर १९२५ के आरम्भ में मिस मेयो का 'इंडिया आफ़िस' होते हुए भारत में आगमन हुआ। इंडिया आफ़िस के अधिकारियों के सामने उसे किसने उपस्थित किया? अधिकारियों को उसे भारत में काम में लाने के लिए परिचय-पत्र देने को किसने फुसलाया? ये प्रश्न हैं जिनका जवाब कर्टिज़ महाशय चाहें तो कौतुक-प्रेमियों के लाभ के लिए दे सकते हैं। ख़ैर जो हो, शुरू अक्तूबर १९२५ में मिस मेयो ने 'इंडिया आफ़िस' के दरवाजे पर आवाज़ लगाई। 'इंडिया आफ़िस' के भले मानुषों ने उससे पूछा––"आप हम लोगों से क्या सहायता चाहती हैं?" उसने जवाब दिया :––

"मैं जो कहूँ उसका आप विश्वास करें। इसके सिवाय मैं और कुछ नहीं चाहती। एक विदेशी अजनबी जो प्राचीन शिल्प-विद्या के अध्ययन के लिए न निकला हो, दार्शनिकों और कवियों की खोज में न हो, किसी [ ११ ]चमत्कार की खोज में भी न हो, केवल भारतवर्ष की भीतरी बातों की जाँच करना चाहता हो पर किसी के द्वारा और कहीं नियुक्त न किया गया हो, तो वह उस देश में अजीब शक्ल का प्राणी जान पड़ेगा और विशेष कर जब उस अजनबी की प्रश्न करने की तीक्ष्ण-प्रवृत्ति हो उठे। मैं इस बात का विश्वास दिलाना चाहती हूँ कि मैं न तो दूसरों के मामलों में व्यर्थ पड़ने-वाली काहिल स्त्री हूँ, और न राजनैतिक दलाल हूँ। मैं केवल अमरीका की एक साधारण प्रजा हूँ जिसका काम सच्ची बातों को खोजकर अपने भाई-बहनों के सम्मुख उपस्थित करना है।"

वह इस बात को स्वीकार करती है कि इंडिया आफ़िस ने उसे परिचय-पत्र देने में ज़रा भी सुस्ती नहीं की। यहाँ ज़रा सन्देह होता है। लेकिन कुछ और भी बातें हैं जो मुझे पूछने पर मालूम हुई हैं। १९२६ ई॰ के शीतकाल में जब मिस मेयो दिल्ली में थी वह भारत सरकार के एक सदस्य और उसकी पत्नी की अतिथि बन कर रहीं। भारत में कम से कम एक सरकारी गृह में तो उसकी मेहमानी अवश्य की गई। बड़ी व्यवस्थापिका सभा में भारत-सरकार के 'होम-मेम्बर' ने यह स्वीकार किया है कि भारत के सरकारी अफसरों ने उसकी ख़ातिर और सहायता की। यद्यपि वे ज़ोरदार शब्दों में कहते हैं कि जो सहायता की गई या जो सद्‌भाव प्रदर्शित किया गया वह उससे भिन्न नहीं था जो अन्य प्रकाशन-कर्ता या यात्री के साथ किया जाता है। केवल अपने चेहरे की क़ीमत पर यह बयान नहीं माना जा सकता जब कि हम मिस मेयो को यह स्वीकार करते हुए देखते हैं कि वह कभी एक ज़िला कमिश्नर के साथ उसके अनेक कार्य्य के दौड़ों पर जाती थी, कभी वह किसानों की ग्राम-पञ्चायत में बैठती थी या कभी वह म्युनिस्पल बोर्ड की मीटिङ्ग में सम्मिलित होती थी। एक अमेरिकन स्त्री जो इस देश से बिलकुल अनभिज्ञ है, जो इसकी देशी भाषाओं को बिलकुल नहीं जानती! किसानों की ग्राम-पञ्चायत में कैसे सम्मिलित हो सकती है जब तक कि इन (सम्भवतः पहले से प्रबन्ध करके बुलाई गई) पञ्चायतों में अँगरेज़ी जाननेवाला कोई भारतीय अफ़सर अपने किसी बड़े अफ़सर की आज्ञा से उसे ले न जाय? [ १२ ]अक्टूबर १९२५ में मिस मेयो लन्दन के इंडिया आफ़िस में थी। अपनी पुस्तक की भूमिका में उसने तारीख़ और साल नहीं दिया। इससे यह पता नहीं चलता कि उसने पुस्तक लिखकर कब समाप्त की। अमरीकन संस्करण के मुख-पृष्ठ के भीतर 'मई १९२७' दिया हुआ है। इसी महीने में पुस्ततक पहले पहल छपी। अक्टूबर १९२५ से मई १९२७ तक इन दोनों महीनों को छोड़ देने से १८ महीने से अधिक नहीं होते। हिन्दुस्तान के लिए रवाना होने की तारीख़ से पुस्तक छपने की तारीख़ तक का यही १८ महीने का समय मिस मेयो ने इस पुस्तक में लगाया। और हमको यह भी समझ लेना चाहिए कि इसी समय में उसने उत्तरी पश्चिमी सीमा प्रान्त से मद्रास तक दोड़ा किया, बहुत से शहरों और गांवों को देखा, भिन्न भिन्न जातियों के इतिहास और उनके सामाजिक औद्योगिक और राजनैतिक जीवन का अध्ययन किया। उसने घरों और अस्पतालों का निरीक्षण किया और जीवन के दार्शनिक तथा तात्विक विचारों पर खूब बातें की। अपने इस भारी काम में उसने ९ प्रान्तीय कौंसिलों की छपी हुई कार्रवाइयों, भारतीय व्यवस्थापन की दोनों सभाओं, 'नीली किताबों' और सब प्रान्तों के अनेकों सरकारी महकमों की जिनकी संख्या २० से भी अधिक होगी, रिपोर्टों को भी शामिल करने का प्रबन्ध किया। इसी सत्रह महीने के समय में उसका अमरीका वापस जाना, किताब लिखना और छपाना भी शामिल है। क्या किसी लेखक ने कभी अकेले हाथ इतने थोड़े समय में ऐसा चमत्कार दिखाया है?

कुछ लोगों को तो ये बातें पूरा विश्वास दिला देंगी कि मिस मेयो उन अधगोरे भारतीयों के, और सरकारी या ग़ैर सरकारी अफ़सरों की प्रेरणा से भारतवर्ष में आई जो उससे वैसी ही पुस्तक लिखाना चाहते थे जैसी उसने १९२४ में फिलीफाइन के सम्बन्ध में लिखी थी। पर जिन पाठकों को अब भी सन्देह हो उनके लिए यहाँ हम इतना और कहेंगे कि :—

१—ब्रिटिश द्वीपों में मिस मेयो के पुस्तक की पहले पहल 'टोरी दल' के प्रमुखों ने धूम मचाई। और यह वह दल है जो भारतवर्ष के अग्रगामी राजनैतिक दलों की स्वराज्य की मांग के विरुद्ध पहले से ही आन्दोलन करता रहा है। [ चित्र ]
दुखी भारत
 
दुखी भारत.pdf

सर तेजबहादुर सप्रू

[ १३ ]२—इस दल के मुख्य समाचारपत्र 'टाइम्स' ने एक आवश्यक विरोध-पत्र*[२] को, जो उस समय लन्दन में जितने प्रभावशाली सरकारी और गैर सरकारी भारतीय थे सबके हस्ताक्षर के साथ भेजा गया था, छापने से साफ़ इन्कार कर दिया। पत्र का विषय यह था :—

"हमारा ध्यान मदर इंडिया नामक पुस्तक की ओर आकर्षित किया गया है। यह पुस्तक हाल ही में छपी है और इसे अमरीका की देश-घूमने वाली मिस कैथरिन मेयो नाम की एक महिला ने, जो १९२५-२६ के शीतकाल में भारत गई थी, लिखा है। भारतीय सभ्यता और चरित्र को इस प्रकार झूठ मूठ कलङ्कित करने वाली विवेकशून्य पुस्तक पढ़ने का हमें इसके पहले कभी दुर्भाग्य नहीं हुआ।

"हम यह मानते हैं कि शीतकाल के अन्य यात्रियों की भांति मिस मेयों का भी अपनी सम्मति बनाने और प्रकट करने का अधिकार था। परन्तु जब एक विदेशी यात्री जो हमारे देश में कुछ महीनों से अधिक नहीं लगाता, अस्पताल में पहुँची घटनाओं से इकट्ठा कर, फ़ौजदारी के मुकदम्मों की रिपोर्टो से चुनकर और स्वयं अपने निरीक्षण की एकान्त घटनाओं से लेकर सामग्री जुटाता है, और प्रासङ्गिक प्रकरणों से उद्धरण देकर अपनी रक्षा का प्रयत्न करता है तथा ऐसी निर्बल नींव पर प्राचीन संस्कृति से युक्त भारत जैसे विशाल देश की सभ्यता और आचरण के विरुद्ध एक व्यापक कलङ्क तैयार करना चाहता है तो हमारा विरोध करना आवश्यक हो जाता है।


[ १४ ]"बत्तीस करोड़ नर-नारियों के सम्पूर्ण राष्ट्र को वह अपाहिज, अनाचारी और बेहया तथा कूठा बतलाती है। यदि एक भारतीय, योरोप या अमरीका के किसी देश में कुछ ही महीने रहने के बाद वहां के किसी राष्ट्र के सम्बन्ध में ऐसी ही सम्मति देने का दुस्साहस करता और सनसनीदार मुकदमों और हत्याओं तथा शारीरिक और मानसिक गिरावट की रिपोर्टों के बल पर, जो कि अदालतों की कार्रवाइयों, अस्पतालों और व्यक्तिगत अनुभवों, अफ़सरों के बयानों, अख़बारों के आन्दोलनों तथा दूसरे खास दृष्टान्तों से सच साबित होती हैं, सम्पूर्ण योरोप के लोगों, उनकी सभ्यता और आचरण को कलङ्कित करता तो वह निस्सन्देह गम्भीर विचार के अयोग्य ठहराया जाता.........।

"हम इस प्रकार की पुस्तक पर सार्वजनिक रूप से विचार करने की आवश्यकता नहीं समझते थे। पर जब हम देखते हैं कि इस डामाडोल परिस्थिति में भारत को खुल्लम-खुल्ला हानि पहुँचाने के लिए इस पुस्तक का प्रकाशन विलायती समाचारपत्रों का खूब ध्यान आकर्षित कर रहा है तो हम अपना यह कर्त्तव्य समझते हैं कि जो हमें दुष्टता से भरी एक ही पुस्तक प्रतीत होती है उसके विरुद्ध ब्रिदिश-जनता को सावधान कर दें।"

३—यह पुस्तक ग्रेट ब्रिटेन अमरीका, दोनों जगह मुफ्त बाटी गई। पार्लियामेंट के सदस्य माननीय महाशय कर्नेल वेजउड को तीन प्रतियाँ मिलीं। तीनों मुफ़्त। केवल सार्वजनिक आन्दोलन की पुस्तकें ही ऐसी हैं जो मुफ़्त में और इतनी उदारता से दी जाती हैं।

[ ३ ]

पिछले खण्ड में मैंने अगस्त १९२७ में, जब कि विलायत के सुकृती समाचारपत्र मिस मेयो की पुस्तक का खूब आन्दोलन कर रहे थे, कुछ उत्तरदायी भारतवासियों द्वारा लन्दन के 'टाइम्स' को भेजी गई एक चिट्ठी उद्धृत की थी। हस्ताक्षर करनेवालों में तीन सज्जन (दो हिन्दू और एक मुसलमान) 'ह्वाइट हाल' की भारत-कौंसिल के सदस्य थे। इस पद पर पहुँचने से [ १५ ] पहले हिन्दुस्तान में वे बड़े ओहदों पर रह चुके थे। एक सज्जन शाही अधिकारपत्र द्वारा स्थापित किये हुए एक हाई कोर्ट के जज और दूसरे बम्बई सरकार के शिक्षा मन्त्री रह चुके थे। दूसरे भारतीयों में से दो भारत सरकार की कार्यकारिणी सभा के और एक बम्बई सरकार की कार्यकारिणी सभा के सदस्य रह चुके थे। उनमें से एक सज्जन इस समय लन्दन में भारत के प्रधान कमिश्नर के उच्च पद पर हैं। इसी तरह और भी। मदर इंडिया पर उनकी सम्मति का कम मूल्य नहीं है। साधारण उत्तेजकों या बिना किसी पद के मनुष्यों की भांति उन पर झाडू नहीं चलाया जा सकता। यह कहकर कि उनकी सम्मति असत्य और मानने योग्य नहीं है भारत सरकार की विशेष चापलूसी नहीं की जा सकती।

अब मैं एक ऐसे व्यक्ति की राय देना चाहता हूँ जिसकी तुलना अमरीका के एक बड़े ईसाई नेता ने ईसामसीह के साथ की है और जिसे पश्चिम के कितने ही विद्वानों ने इस युग का सबसे महान् पुरुष माना है। मेरा तात्पर्य महात्मा गान्धी से है। अपने साप्ताहिक पत्र "यंग इंडिया" में 'मोरी निरीक्षक का विवरण' शीर्षक देकर महात्मा गान्धी ने अपने हस्ताक्षर के साथ एक लेख प्रकाशित किया था। उसमें उन्होंने इस पुस्तक के सम्बन्ध में निम्न-लिखित राय दी थी :—

पुस्तक बड़ी चतुरता और ज़ोर के साथ लिखी गई है। सावधानी के साथ चुने हुए उद्धरणों से जान पड़ता है कि यह सच्ची किताब होगी। परन्तु मेरे चित्त में इसने जो भाव पैदा किया वह यह है कि यह एक ऐसे मोरी निरीक्षक का विवरण है जो केवल देश के नाबदानों को खोलने और उनकी जाँच करके विवरण तयार करने या खुले नाबदानों से जो दुर्गन्धि निकलती है उसका ललित भाषा में वर्णन करने के उद्देश्य से ही भेजा गया हो। यदि मिस मेयो यह स्वीकार कर लेती कि वह भारतवर्ष के केवल नाबदानों को खोलने और उनकी जाँच करने आई थी तो कदाचित् उसकी इस रचना की निन्दा न की जाती।

मैं जानता हूँ कि कोई भी, जिसे भारतवर्ष के बारे में कुछ जानकारी है, इस दुखी देश के निवासियों के जीवन और विचार के विरुद्ध ऐसे भयानक अपराधों को स्वीकार नहीं कर सकता। पुस्तक बिना सन्देह झूठी है। [ १६ ] इसमें वर्णन की गई बातें सचही क्यों न हों। यदि मैं लन्दन के नाबदानों में जो दुर्गन्धि भरी है उसको खोलू और सावधानी के साथ उसका ठीक ठीक वर्णन करके कहूँ—'देखिए यह लन्दन है', तो मेरी बातों के विरोध करने का किसी को दावा नहीं हो सकता। पर मेरा निर्णय सत्य का उपहास करनेवाला समझा जायगा और ग़लत ठहराया जायगा। यही होना भी चाहिए। मिस मेयो की पुस्तक इससे ज्यादा अच्छी चीज़ नहीं है। इससे भिन्न भी नहीं। लेखिका का कहना है कि हिन्दुस्तान के बारे में उसने जो साहित्य पढ़ा उससे उसे सन्तोष नहीं हुआ। इसलिए वह हिन्दुस्तान में 'वह बातें देखने के लिए आई जो बिना किसी के द्वारा नियुक्त किया हुआ, बिना किसी आर्थिक सहायता के एक असंबद्ध स्वयं सेवक मानव जीवन की दैनिक क्रियाओं में देख सकता है।'

पुस्तक को ख़ूब ग़ौर से पढ़ने के बाद मुझे दुःख के साथ कहना पड़ता है कि मैं लेखिका के इस दावे को नहीं मान सकता। सम्भव है कि उसे कोई आर्थिक सहायता प्राप्त न हुई हो। पर ऐसा कोई पृष्ठ नहीं जिसमें वह अपने अनियुक्त और असम्बद्ध होने का प्रमाण दे सके। हम भारतवर्ष में सरकार की, संरक्षता-प्राप्त ('संरक्षता-प्राप्त' आर्थिक सहायता प्राप्त' का अच्छा पर्याय-वाची माना जाता है) प्रकाशनों के आदी हो गये हैं। हमें अँगरेज़ों के शासन-काल के पहले ही से यह समझने का अभ्यास हो गया है कि शासनकला (जिसका पूर्ण विकास ब्रिटिश लोगों ने किया) में सामयिक सरकार पर किये गये संदेहों को छिपाने और उसका गुणानुवाद फैलाने के लिए प्रसिद्ध, सम्माननीय और विद्वान् पुरुषों से गुप्त सेवाएँ लेना भी सम्मिलित है। ये सेवाएँ लेख आदि के रूप में इस तरह ली जाती हैं कि जान पड़ता है मानों सरकार को यह प्रमाणपत्र ऐसी जगह से मिला है जिसका उसके साथ कोई सम्बन्ध न हो। मुझे आशा है कि मिस मेयो बुरा न मानेंगी यदि उन पर भी ऐसे सन्देह की छाया पड़ती हो।.........

मदर इंडिया पुस्तक झूठी ही नहीं, दोहरी झूठी है। प्रथम तो इस कारण कि वह सम्पूर्ण राष्ट्र को, या उसी के शब्दों में 'भारत की सब जातियों' को (वह हमें एक राष्ट्र नहीं समझ सकती) बिना किसी अपवाद के स्वास्थ्य, आचरण और धर्म में गिरा हुआ बतलाती है। दूसरे इस कारण कि वह ब्रिटिश सरकार में ऐसी खूबियों के होने का दावा करती है जो सिद्ध नहीं की जा सकतीं और जिनके कारण सरकार को सम्मानित होते देख कर कितने ही ईमानदार ब्रिटिश अफ़सर बिना लज्जा के सिर नीचा किये न रहेंगे।......

मिस मेयो एक प्रतिज्ञा-बद्ध भारत की विरोधिनी और ब्रिटिश की पक्षपातिनी है। भारतवासियों में वह कुछ भी अच्छाई और ब्रिटिश तथा उनके शासन में कुछ भी बुराई देखने से इनकार करती है।...... [ १७ ]लेखिका ने अपने सब उद्धरणों को या एकान्त के अनुभवों को सचाई के साथ नहीं वर्णन किया। मैं उनको दिखलाऊँगा जिनकी मुके निजी तौर-पर जानकारी है। पुस्तक अनेक ऐसे प्रासङ्गिक प्रकरणों से उधेड़े हुए वाक्यों और उद्धरणों से भरी है जिनका सप्रमाण विरोध किया जा चुका है।

लेखिका ने कवीन्द्र का नाम बाल-विवाह के साथ जोड़ कर औचित्य के सब भावों को बुरी तरह घायल किया है। कवीन्द्र ने निस्सन्देह आरम्भ-काल के विवाह के लिए लिखा है कि वह बुरा नहीं है। परन्तु वाल-विवाह और आरम्भ काल के विवाह में ज़मीन आसमान का अन्तर है। यदि वह शान्ति-निकेतन की स्वाधीन और स्वतन्त्रता-प्रिय बालिकाओं तथा स्त्रियों से परिचय प्राप्त करने का कष्ट करती तो कवीन्द्र के आरम्भ-काल के विवाह का अर्थ समझ जाती।

अपने तकों के पक्ष में स्थान स्थान पर मुझे उपस्थित कर उसने मेरा बड़ा सम्मान किया है। पर कोई व्यक्ति जब एक सुधारक के रोज़नामचे से वाक्यसमूह इकट्ठा करता है और उन्हें उनके प्रासङ्गिक प्रकरणों से उधेड़ कर उन्हीं के बल पर उस जाति को, जिसके बीच में कि उस सुधारक ने काम किया है, अपराध लगाने का प्रयत्न करता है, तो वह पक्षपातरहित और बुद्धिमान पाठकों या श्रोताओं पर अपना कुछ प्रभाव नहीं डाल सकता।

परन्तु हर एक चीज़ को जो भारतीय हो बुरे भाव से देखने की जल्दी में उसने मेरे लेखों के साथ स्वतन्त्रता ही नहीं की बरन् उन बातों का, जिनका सम्बन्ध उसने या दूसरे लेखको ने मेरे साथ जोड़ा है, मुझसे पूछ कर निर्णय कर लेने की आवश्यकता भी नहीं समझी।.........

उसकी पुस्तक का उन्नीसवाँ अध्याय भारत सरकार की सफलताओं की प्रशंसा में प्रमाणों का संग्रह है। उनमें से लगभग सबों की सत्यता सिद्ध करने के लिए निष्पक्ष और सच्चे अँगरेज़ तथा भारतीय लेखकों ने बार बार उसे चैलेंज किया है। सत्रहवां अध्याय यह दिखलाने के लिए लिखा गया है कि हम 'संसार में सबसे पतित' हैं। यदि मिस मेयो के उद्योगों के परिणामस्वरूप राष्ट्रसंघ यह घोषणा करने के लिए प्रभावित हो जाय कि भारतवर्ष बहिष्कृत देश है और हम लोगों की लूट खसोट के योग्य बिलकुल नहीं है तो मैं बिना सन्देह कह सकता हूँ कि इससे पूर्व और पश्चिम दोनों लाभ में रहेंगे। उस दशा में हम भले ही आपस में लड़ मरें। हिन्दुओं को मिस मेयो के धमकाने के अनुसार उत्तर पश्चिम और मध्य एशिया की लुटेरी जातियों भले ही निगल जाएँ। पर हमारी वह दशा इस बढ़ते हुए अपौरुष से लाख दर्जे अच्छी होगी। जैसे बिजली से प्राणहरण करने का ढङ्ग जीवित उबालने के पीडाजनक ढङ्ग से अधिक दयापूर्ण है वैसे ही मिस मेयो के कथना[ १८ ] नुसार, 'निरुद्योगी, गंदे, अन्ध-विश्वासी और कामुकता में फंसे' हम हिन्दुओं पर मध्य एशिया से एकाएक घोर आँधी आ जाय तो हमें इस समय जो अपमान-पूर्ण जीवित मृत्यु का कष्ट सहना पड़ रहा है उससे बड़ा सदय छुटकारा मिल जाय। अभाग्य से मिस मेयो का यह उद्देश्य नहीं है। उसका काम है भारत को स्वराज्य के लिए अयोग्य सिद्ध करके इस देश में गोरी प्रभुता को और भी मज़बूत करना।

यह चतुर लेखिका अपने भिन्न भिन्न पात्रों के मुँह से जो मनोरञ्जक बातें कहलाती है उनमें एक ऐसे सनसनीदार उपन्यास के पृष्ठों के पढ़ने कासा मज़ा आता है जिसमें सचाई का बिलकुल ध्यान नहीं रखा जाता। उसकी बहुत सी बातें मुझे विश्वास के सर्वथा अयोग्य प्रतीत होती हैं और जिन नर-नारियों के साथ उनका सम्बन्ध जोड़ा गया है, उन्हें वे अनुकूल प्रकाश में नहीं दिखलाती। उदाहरण के लिए एक राजा के मुंह से कहलाये गये नीचे लिखे वक्तव्य पर विचार कीजिए :—

"उनमें से एक ने मुझसे बड़ी शान्ति के साथ कहा—हमारा लगाव विलायत के राजमुकुट के साथ है। हिन्दुस्तान के राजाओं ने किसी सरकार के साथ ऐसा समझौता नहीं किया जिसमें बङ्गाली बाबू भी शामिल हों। हम इन दफर के लौंडों के साथ कभी पेश नहीं आ सकते। जब तक ब्रिटेन का शासन है वही हमारे पास अपने अँगरेज़ प्रतिनिधि भेजेगा। और सब बातें ऐसी ही होंगी जैसी कि मित्रों में होनी चाहिएँ। यदि ब्रिटेन यहाँ से अपना शासन उठा लेगा तो हम सच्चे राजाओं की भांति भारत को सीधे रास्ते पर लाना जानते हैं।"*[३]

भारतीय नरेश कितने ही गिरे क्यों न हों, बिना प्रत्यक्ष प्रमाण के मैं इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता कि भारतवर्ष में कोई ऐसा नीच राजा भी है जो इस प्रकार का वक्तव्य दे। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि लेखिका ने उस राजा का नाम नहीं प्रकट किया।

३१४ पृष्ठ पर एक इससे भी अधिक अपमानजनक वक्तव्य देखने में आता है। वह इस प्रकार है :—

"दीवान ने कहा—'राजा साहब इस बात को नहीं मानते कि अँगरेज़ हिन्दुस्तान को छोड़ने जा रहे हैं। पर तब भी इंग्लैंड के इस नये शासन के कारण उन्हें ग़लत सलाह दी जा सकती है। इसलिए राजा साहब अपनी सेना संभाल रहे हैं, हथियार इकट्ठा कर रहे हैं और चांदी के सिक्के ढाल


[ १९ ]

रहे हैं। और यदि अँगरेज़ चले जायँगे तो उसके तीन ही महीने बाद समस्त बँगाल में ढूँढने से न एक रुपया मिलेगा न कोई कुमारी कन्या।"

बेचारे पाठक को न तो राजा साहब का नाम बताया गया है न उनके चतुर दीवान का।

यह सोचकर मुझे वास्तव में बड़ा दुःख होता है कि बहुत से अँगरेज़ पुरुष और स्त्री ऐसे हैं जो अपने भारतीय मित्रों से एक बात कहते हैं और पश्चिम के विश्वास-पात्रों से दूसरी। जिन अँगरेज़ पुरुषों और स्त्रियों को मिस मेयो के परिश्रम के साथ बटोरे गये इस कूड़े को देखने का अवसर मिला होगा वे मेरा आशय अवश्य समझ जायँगे।

एक गिरे हुए भारतवर्ष की तलाश करने में मिस मेयो ने जिन्हें अपनी बातें सिद्ध करने का यंत्र बनाया भूल से उन्हीं को गिरा दिया है। और मज़ा यह कि ऊपर से डींग हाँकती है कि उसकी बातों को कोई न हिला सकता है, न गलत कह सकता है। मैं आशा करता हूँ कि मैंने इस लेख में यह दिखलाने के लिए उसकी बहुत सी बातें, निर्जनता से ली गई भी, ग़लत हैं, यथेष्ट प्रमाण दे दिये हैं। और एक साथ मिलकर तो उसकी सब बातें बिलकुल ही झूठा दृश्य खड़ा करती हैं......।

मिस मेयो ने मेरे एक सन्देश के बारे में लिखा। मुझे याद नहीं पड़ता कि मैंने वह सन्देश कभी दिया हो। उस समय जो व्यक्ति उपस्थित था उसे भी मेरे के साथ जोड़े गये इस सन्देश का स्मरण नहीं है। पर मैं जानता हूँ कि प्रत्येक अमरीका निवासी को जो मुझसे मिलने आता है, मैं क्या सन्देश देता हूँ :—

"समाचार-पत्रों का और अमरीका में आपको जो उड़ती खबरें मिलती हैं उनका विश्वास न कीजिए। यदि आप भारतवर्ष के सम्बन्ध में कुछ जानना चाहते हैं तो विद्यार्थी की भांति वहाँ जाइए और स्वयं उसका अध्ययन कीजिए। यदि आप नहीं जा सकते तो हिन्दुस्तान के पक्ष में और उसके विपक्ष में जो लिखा गया है उसका सबका अध्ययन कीजिए और तब अपनी राय निश्चित कीजिए। साधारण साहित्य जो आपको मिलता है उसमें या तो निन्दा का एक हाथ ककड़ी नौ हाथ बीज बनाया रहता है या स्तुति का।" मैं अमरीका और इंग्लैंड के निवासियों को मिस मेयो का अनुकरण न करने के लिए सावधान कर देना चाहता हूँ। वह अपने दावे के अनुसार यहाँ खुले-दिल नहीं बल्कि पहले ही से बने विचारों और विरोधी-भावों को लेकर आई थी। उन्हीं भावों को वह अपने प्रत्येक पृष्ठ पर प्रकट करती है। भूमिका का प्रकरण भी, जिसमें कि उसने अपने इस दावे को लिखा है, इन बातों से खाली नहीं है। [ २० ]ये बड़े बड़े अवतरण मैंने महात्मा गान्धी के लेखों से दिये हैं। क्योंकि सबकी राय से वर्तमान भारतवासियों में वेही सबसे बड़े पुरुष, सबसे बड़े महात्मा और सबसे बड़े सत्यवादी समझे जाते हैं। यह दूसरी बात है कि मिस मेयो उन्हें साधुता में सिविल सर्विस के कर्मचारियों और इस देश के ईसाई धर्म-प्रचारकों की बराबरी करने योग्य भी न समझे। जैसा कि उसने एक पत्र-संवाद-दाता से बात करते हुए दबे स्वर में कहा भी था। पर महात्मा गाँधी को भी उसने अपनी पुस्तक में लिखे अनुसार भारत और पश्चिम के लोगों की पारस्परिक गणना की कसौटी में ही रक्खा है। महात्मा गाँधी के बाद दो भारतीय और हैं जिन्हें ऐसी सार्वदेशिक प्रसिद्धि जो एशियाई और पराधीन देश के बेटों के लिए अपार गौरव की बात है, प्राप्त है? एक हैं कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ ठाकुर जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने बहादुरी की और उसके विश्वविद्यालयों ने डाक्टर की उपाधि दी है और जिन्होंने 'नोबुल प्राइज़' जीता । दूसरे हैं श्रेष्ठ विज्ञान-वेत्ता डाक्टर सर जे० सी० बोस, एफ० आ० ए० एस०।

कबीन्द्र दो अवसरों पर इस पुस्तक के सम्बन्ध में अपना मत प्रकट कर चुके हैं। (१) “मैंनचेस्टर गर्जियन को स्व-लिखित एक पत्र में (२) निउयोर्क के 'नेशन' को स्वलिखित दूसरे पत्र में। अन्यन्त्र हम दोनों के कुछ अंश प्रकाशित करेंगे।

डाक्टर बोस इसे ध्यान देने के अयोग्य और गन्दी किताब कहते हैं।

पुस्तक के अखीर में हम मदर इंडिया के बारे में कुछ ऐसे प्रभावशाली पुरुषों की राय एक साथ दे रहे हैं जो भारतवर्ष को मिस मेयो से अधिक जानते हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर उसे इस बात का दोषी ठहराते हैं कि उनके लेखों का उसने बिना किसी उत्तरदायित्व के और जान बूझ कर धूर्तता के साथ उपयोग किया है। स्वर्गीय लार्ड सिनहा, जिनके अतिरिक्त कोई भारतीय कभी किसी सूबे का गवर्नर नहीं हुआ, महात्मा गान्धी से इस बात में पूर्णरूप से सहमत हैं कि 'मिस मेयो ने भारतवर्ष के समस्त नाबदानों को खूब अच्छी तरह सूंघा है।' वे उसकी पुस्तक को 'एक असत्य और मिथ्या-चित्र' बतलाते हैं। भारतीय ईसाई सभा की कार्यकारिणी [ २१ ] समिति, जिसके सभापति कलकत्ता के 'लार्ड विशप' हैं और सारे भारत के लाट-पादरी हैं यह स्वीकार करती है कि 'मिस मेयो की पुस्तक के अनुसार भारतवर्ष का जो चित्र खिंचता है वह झूठा है और भारत की जातियों के लिए अन्याय-पूर्ण है। प्रसिद्ध विदेशी विद्वानों ने जो भारत को भीतर-बाहर से ख़ूब अच्छी तरह जानते हैं, इस पुस्तक का बड़ी ज़ोरदार भाषा में खंडन किया है। प्रसिद्ध उपन्यास और नाटक-लेखक श्रीयुत एडवर्ड थामसन, जिनकी लिखी पुस्तक 'एन इंडियन डे' बहुत प्रसिद्ध है, मदर इंडिया को 'महान कष्ट पहुँचानेवाली रचना' बताते हैं और अपनी सम्मति देते हैं कि मिस मेयो ने, पुस्तक में यह कटु अपराध जोढ़ कर कि 'नीच बंशों पर गोरों का शासन इतना अधिक अच्छा है कि वे केवल दुष्टतावश असन्तुष्ट हैं, अपना पक्ष खो दिया।' सरकारी कार्यकारिणी समिति के भूतपूर्व मेंबर सर जान मेनर्ड मिस मेयो की पुस्तक के सम्बन्ध्य में संयम के साथ लिखने में बड़ी कठिनाई देखते हैं। पार्लियामेंट मेम्बर कर्नेल वेजउड १९२७ के 'वार्षिक हिन्दू' में मिस मेयो लिखित भारतीयों की काम-वासना-सम्बन्धी बातों पर विचार करते हुए लिखते हैं :—

"सभ्य जातियों की यह हमेशा आदत रही है कि वे अपने जिन पड़ोसियों से डरती हैं और घृणा करती हैं उनमें ऐसे दुर्गुणों की कल्पना करती हैं जिन्हें कोई पसन्द नहीं करता। इस उपाय से भय का स्थान भी घृणा ले लेती है। फ़्रांसीसियों के बारे में जर्मन लोगों ने कहा था कि वे विषय-भोग की अधिकता के कारण शक्तिहीन हो गये । हाँ, उन्होंने इस बात को केवल संक्षेप में कहा। क्रुसेड्स के समय में 'झूठे मेहोन्ड' के सब अनुयायी अप्राकृतिक विषय-वासना में लिप्त थे। इसी तरह 'बलगेरियन और अलबीजिन' लोग थे जब कि उनके विरुद्ध ईसाई-मत का प्रचार किया जा रहा था। मध्यकालीन फ़्रांस पर जब अँगरेज़ो के हमले होने लगे तो उस समय के फ़्रांसीसियों ने घृणा से हमें 'दुमदार बन्दर' कहना शुरू कर दिया था, यद्यपि वह एक ऐसा अवगुण है जिससे हम लोग बिलकुल बचे हैं।"

मदर इंडिया पर और दूसरे लोगों की सम्मतियाँ पाठकों के अवलोकनार्थ इस पुस्तक के अन्त में दी गई हैं। [ २२ ]

[ ४ ]

मिस मेयो के प्रमाणों का प्रयोग

हिन्दुओं के जीवन, रीति-रिवाज, और आचरण तथा हिन्दु-धर्म और हिन्दू-दर्शन पर लिखते समय मिस्त मेयो ने मुख्यतः 'एबे डुबोइस' के प्रमाणों का सहारा लिया है। और इन विषयों पर उसी की पुस्तक से ख़ूब अवतरण दिये हैं। इसलिए यहां पहले एबे के ही प्रमाणों पर विचार कर लेना और यह बता देना कि उसकी लम्मातियों और आलोचनाओं का क्या मूल्य हो सकता है, उचित होगा।

'डुबोइस' महाशय ईसाई मिशनरी थे। फ़्रांस की राज्य-क्रान्ति के भय से भाग कर वे भारतवर्ष में आये और यहीं बस गये। हमें यह विश्वास करने का कारण है कि वे जब तक हिन्दुओं में रहे, ब्राह्मण बन कर रहे। यह भी विश्वास करने का कारण है कि उन्होंने संस्कृत*[४] की अपेक्षा तामिल का कहीं अधिक अध्ययन किया था। इस प्रकार कहना यह कहने का एक विनम्न ढङ्ग है कि वे संस्कृत बहुत नहीं जानते थे। हिन्दू-धर्म और हिन्दू-सभ्यता के विषय में उनकी सम्मतियाँ बहुत मूल्यवान नहीं हैं। डुबोइस के समय में हिन्दू-साहित्य और हिन्दू-धर्म का योरुपवालों को बहुत संकुचित ज्ञान था। तब की अपेक्षा अब बहुत सी ऐसी बातें खोज निकाली गई हैं और लोगों को बताई गई हैं जिनका वैज्ञानिक महत्त्व बहुत अधिक है। और पश्चिम के अनेक विद्वानों ने हिन्दू-धर्म, हिन्दू-दर्शन-शास्त्र, और हिन्दू क़ानून के बारे में बहुत कुछ लिखा है। पश्चिमीय विद्वानों की खोजों में जो न्यूनता रह गई थी उसे अब भारतीय पंडित पूरी कर रहे हैं। योरप के लोगों में मैक्समूलर, ह्यूसन, बेल्किन्स, रपसन, कोलब्रुक, सर विलियम जोन्स, सिलवियन लेवी और सैकड़ों दूसरे तथा भारतीयों में जायसवाल, बी० एन० सील, आर० जी० भाण्डारकर, सरकार, आर० एल० मित्र और सैकड़ों दूसरे हैं। इन विषयों पर इन विद्वानों के प्रमाण एबे


[ २३ ]

डुबोइस से कहीं बढ़े चढ़े हैं। मिस मेयो इनमें से किसी को नहीं जानती। वह इनके लेखों और सम्मतियों का ज़िक्र भी नहीं करती। वह एक-मात्र डुबोइस महाशय का विश्वास करती है जिन्होंने कि संस्कृत ग्रन्थों के उस समय प्राप्त योरपीय भाषा में अनुवाद से अपना ज्ञान अर्जित किया था। उनके व्यक्ति-गत अनुभवों के सम्बन्ध में भी यह स्मरण रखना चाहिए कि भारतवर्ष में वे जब तक रहे उनका समस्त समय दक्षिण भारत में, कृष्णा नदी के दक्षिण, व्यतीत हुआ। उनके ग्रन्थों के आक्सफोर्ड संस्करण के सम्पादक लिखते हैं*[५]

"वह [ डुबोइस ] अपने ग्रन्थ का सम्पूर्ण भारत के सम्बन्ध में लागू होने का दावा नहीं करता। अधिक कहा जाय तो उसके अनुभव भारत के केवल उसी भाग तक जाते हैं जो विन्ध्याचल पहाड़ के दक्खिन में है। और बह बड़ी सावधानी के साथ लिखता है कि उन सीमाओं के भीतर भी स्थानीय भेदभाव इतने अधिक और इतने प्रकट हैं कि हिन्दुओं की कोई जाति, वर्ग या सम्प्रदाय ऐसा नहीं जिसमें हिन्दू-धर्म के साधारण नियमों के अतिरिक्त औरों से भिन्न कोई विशेष रिवाज न हो।' इसलिए उसी के कथनानुसार उसकी बातों से सम्बन्ध रखनेवाले किसी विषय से पूर्ण सचाई के साथ कोई उत्तम परिणाम नहीं निकाला जा सकता।"

इंडियन सोशल रिफ़ार्मर (भारतीय समाज-सुधारक) के सम्पादक श्रीयुत के० नाटराजन, जो स्वयं भी एक बड़े समाज-सुधारक हैं, अपने पत्र में मिस मेयो की पुस्तक पर सिलसिलेवार कई लेख लिखते हुए लिखते हैं :—

"एबे शुरू से अख़ीर तक पाखण्डी था। वह लिखता है—-'हिन्दुस्तान में आते ही मुझे यहीं के बाशिन्दों का विश्वासपात्र बनने की अत्यन्त आवश्यकता प्रतीत हुई। अतः मैंने उन्हीं की तरह जीवन व्यतीत करने का निश्चय किया। मैंने उनकी सी पोशाक धारण की और उनकी तरह ठीक ठीक मालूम होने के लिए मैंने उनके रस्म-रवाजों का अध्ययन किया। इतना ही नहीं, मैंने उनके बेढङ्गे विरोधी भावों पर क्रोध करना भी बन्द कर दिया। इस होशियारी से रहने के कारण सब जाति और स्थिति के लोग


[ २४ ]दिल खोल कर मेरा स्वागत करने लगे। और कभी कभी बिना मेरे पूछे भी अपने सम्बन्ध की विचित्र और मनोरञ्जक बातें बताने लगे।'*[६] इन सब आडम्बरों के होते हुए भी, एक ईसाई मिशनरी की हैसियत से, एबे को अपने काम में जैसा कि वह स्वयं स्वीकार भी करता है अत्यन्त लज्जाजनक असफलता हुई। वह लिखता है—'अपने आपको इस देश के रस्म-रिवाजों के अनुकूल बनाने, बहुत सी दशाओं में यहाँ के बाशिन्दों के विरोधी भावों को आलिङ्गन करने, उन्हीं की तरह रहने, और एक वास्तविक हिन्दू छोड़ कर और सब कुछ बनने के प्रयत्न में मुझे अत्यन्त संयम और परवशता से काम लेना पड़ा है। संक्षेप में इतना ही कह देना यथेष्ट होगा कि कुछ आदमियों को ठीक रास्ते पर लाने के लिए मुझे अनेक आदमियों के लिए अनेक रूप धारण करने पड़े हैं। सब बाते मुझे किसी हिन्दू को ईसाई बनाने में ज़रा भी सहायक सिद्ध न हुईं। ईसाई मिशनरी की हैसियत से भारतवर्ष में मेरा जो लम्बा समय बीता उसमें मैं कुल दो सौ से लेकर तीन सौ के भीतर स्त्री-पुरुषों को ईसाई बना सका, वह भी एक तद्देशीय ईसाई धर्मप्रचारक की सहायता से। इस संख्या में भी दो तिहाई जाति-च्युत या भिखारी और शेष कई एक शूद्र जातियों से बहिष्कृत मारे मारे फिरनेवाले लोग थे। ये लोग बे-सहारा होने के कारण विवाह करने या ऐसे ही और किसी

दिल-पसन्द उद्देश्य से ईसाई†[७] हुए थे। "एबे ने अपने प्रचार कार्य में असफलता देखकर दूसरे तरीके से ईसाई धर्म्म की सेवा करने का निश्चय किया था। वह लिखता है :‡[८]

"जिस उद्देश ने मेरे (इस पुस्तक के लिखने के) निश्चय को सबसे अधिक प्रभावित किया वह यह है। मेरे दिल में यह बात पैदा हुई कि मैं मूर्तिपूजा और बहु-देवोपासना की बुराइयों का सञ्चा चित्र खींचूँ तो वह अपनी कुरूपता से ईसाई धर्म की सुन्दरता और पूर्णता का प्रभाव पड़ने में सहायक होगा। लैसी डामोनिया के लोग अपने बच्चों को मदिरा-पान की बुराई से भयभीत करने के लिए उनके सामने जो शराब के नशे में चूर गुलामों को उपस्थित करते थे वह यही ढङ्ग तो था।"


[ २५ ]कोई भी पाठक इन स्वीकारोक्तियों को, जो डुबोइस की पुस्तक और

उसके नये रूप 'मदर इंडिया' को सर्वथा असत्य ठहरानेवाली हैं, कभी भुला नहीं सकता।

ईसाई मिशनरियों का हिन्दुस्तान में धर्मप्रचार का ढङ्ग इस बात से जाना जा सकता है कि डुबोइस के पहले (सत्रहवीं सदी में) राबर्ट डे नोबिली नामक एक बड़ा ईसाई मिशनरी जो ब्राह्मण का सा जीवन व्यतीत करके, जनेऊ धारण करके दक्षिण प्रान्त में डुबोइस की ही भांति प्रचार कर रहा था, यहाँ तक बढ़ा कि उसने अपनी धूर्तता से एक पाँचवाँ वेद रचा और उसमें ईसाई धर्म की बातें भर दी*[९]

मिस्टर नाटराजन एबे के बारे में कुछ और भी बातें लिखते हैं :—

"जिस समय एबे भारतवर्ष में था उसी समय अँगरेज़ों और फ़्रांसी- सियों में बड़ी प्रतिद्वन्द्विता चल रही थी। एबे ने 'भारत की जो सेवाए की थीं, उनके बदले में भारत छोड़ते समय उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने पेन्शन दी। इससे ईस्ट इंडिया कम्पनी की निःस्वार्थ दयालुता का या स्वयं एबे की सुन्दर देश-भक्ति का परिचय मिलता है।"

एने अपने ही कथनानुसार अपराधी ठहरता है। श्रीयुत नाटराजन क्या ख़ूब शंका करते हैं :— “मान लीजिए कि इसी उद्देश्य से कोई हिन्दू कुछ वर्ष के लिए अमरीका जाकर रहे और 'मैमन-पूजा' की बुराइयों का झूठा चिन्न चित्रित करे ताकि उसकी कुरूपता से वेदान्त की ख़ूबियों और पूर्णताओं का प्रभाव पड़े तो क्या अमरीका की सभ्यता और संस्कृति का कोई गम्भीर विद्यार्थी उसे इस विषय पर प्रमाणस्वरूप मानेगा? इस सत्य और डंके की चोट पर कही गई बात को पढ़ लेने के बाद किसी विदेशी को हिन्दुओं के प्राचरण और रस्म-रिवाजों के सच्चे वर्णन खोजने के लिए एबे की पुस्तक को सबसे अन्त में सहारा लेने की वस्तु समझना चाहिए।


[ २६ ]इन बातों का सम्बन्ध एबे के व्यक्तिगत जीवन की कथा से ही नहीं

बरन उसकी पुस्तक की कथा से भी वैसा ही है। मैं श्रीयुत नाटराजन के शब्दों में ही उसे पाठकों के सम्मुख उपस्थित करता हूँ :—

"एबे डुबाइस के समान द्वेष-दर्शक ने भी यह नम्रता के साथ स्वीकार किया है कि कम से कम जन-समूह में हिन्दू स्त्रियों के साथ बड़ा ही सस्कार- पूर्ण बर्ताव किया जाता था। उसके ग्रन्थ के प्रथम अनुवाद में जिसे १८१७ ई० में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने प्रकाशित किया था, निम्न लिखित वर्णन मिलता है :—

'इसमें सन्देह नहीं कि घर के भीतर हिन्दू स्त्रियाँ बहुत सताई जाती हैं तथापि यह मानना पड़ेगा कि जन-समूह में उनका अत्यन्त आदर होता है। निस्सन्देह उनका आदर छेड़छाड़ और मजाक-पूर्ण नहीं होता जैसा कि हम लोगों में होता है और जो हमारे स्त्री-पुरुषों के लिए लज्जा की बात है। इसके अतिरिक्त उन्हें जन-समूह में किसी प्रकार के अपमान का भय नहीं रहता। कोई स्त्री जहाँ चाहे जा सकती है। वह आम जगहों में घूम सकती है (क्या वहाँ भी जहाँ गोरों की बस्ती अधिक है और देश में लुच्चों की संख्या अधिक होते हुए भी उसे उनसे डरने का कोई कारण नहीं रहता। जो आदमी रास्ते में या कहीं किसी स्त्री पर निगाह डालता है उसे सब एक-स्वर से गुंडा और अत्यन्त नीच कुल से उत्पन्न हुआ कहते हैं*[१०]

"संशोधित संस्करण में जिससे स्वर्गीय मिस्टर ब्यूकैंप ने १८९७ ई० में मौजूदा अनुवाद तैयार किया है और तीसरे संस्करण में जिससे मिस मेयो अपने प्रमाण देती हैं तत्सामयिक योरपीय आचरण पर किये गये कटाक्ष बड़ी सावधानी के साथ पाने से रोक दिये गये हैं। और उस अंश को नीचे लिखे-प्रकार फिर से ढाला गया है :—

'पर यदि घर के भीतर स्त्रियों का बहुत कम सत्कार होता है तो किसी हद तक उसकी पूर्ति उन्हें जन-समूह में मिले आदर से हो जाती है। यह सच है कि उन्हें वह शुष्क आदरभाव नहीं मिलता जिसे हम नम्रता-पूर्ण सत्कार कहते हैं पर तब भी, दूसरी ओर वे अपमान के खतरे से बची रहती हैं। हिन्दू-स्त्री कहीं भी अकेली जा सकती है। अत्यन्त भीड़ भाड़ के स्थानों में भी । और उसे काहिल गुण्डों की दिल्लगी और बेहूदा कटाक्षों से डरने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं रहती। यह मुझे एक ऐसे देश के लिए जिसके


[ २७ ]

बाशिन्दों का इतना घोर नैतिक पतन होगया है वास्तव में बड़े प्रशंसा की बात मालूम होती है। जिल मकान में केवल स्त्रियाँ ही रहती हों वह देवस्थान के तुल्य माना जाता है । अत्यन्त निर्लज्ज गुण्डे तक उसके विरुद्ध आचरण करने का कभी स्वप्न में भी खयाल नहीं कर सकते।"*[११]

मिस मेयो डुबोइस की किताब ले कूड़ा एकत्रित करने में लगी थी। इसलिए उसकी इस राय को उसने जान बूझ कर छोड़ दिया। और कहा कि संतानोत्पत्ति की आयु प्राप्त हो जाने पर कोई हिन्दू स्त्री हिन्दुस्तान के लोगों की निगाह से गुजरने का साहस नहीं कर सकती। यहां उसने अपने डुबोइस से सलाह लेने की आवश्यकता नहीं समझी।

दुबोइस की नीचता-पूर्ण प्रचार-पुस्तक में मिस मेयों ने अपनी चतुराई का सम्मिश्रण करके उससे प्रमाण उद्धृत किये हैं। डुबोइस के प्रमाणों को मौके-बेमौके वह किस प्रकार उद्धृत करती है इसका जिक्र करते मिस्टर नाटराजन बहुत ठीक लिखते हैं :—

“मिस मेयो ने यह मूर्खता जान बूझ कर की है। प्रमाण यह है कि एबे दुबोइस की पुस्तक का उसने कई स्थान पर हवाला दिया है पर अपने पाठकों को वह कहीं भी नहीं बतलाती कि उस पुस्तक की हस्तलिपि १८०७ ई० में ईस्ट इंडिया कम्पनी को दी गई थी और उसमें जो वर्णन है वह हमारे समय से सवा सौ वर्ष पहले का है। एक स्थान पर वह कहती भी है तो यह कि वह वर्णन हम लोगों के समय से बहुत पुराना नहीं है। यहाँ हम उसके उस वर्णन का जिक्र कर रहे हैं जिसमें वह कहती है कि, एबे ने मालूम किया कि यह प्राचीन नियम [पति के प्रति पत्नी के कर्तव्य-सम्बन्धी] उन्नीसवीं सदी के हिन्दुओं का भी उसी प्रकार धर्म बना है†[१२]। यद्यपि एबे के भारतीय जीवन का अधिकांश भाग १८ वीं सदी से सम्बन्ध रखता है। संसार की आँखों के सामने हिन्दुओं को मुंह पर कालिख पोत कर उपस्थित करने के उद्देश्य से मिस मेयो के लिए एक सदी आगे कूद जाना कोई बड़ी बात नहीं। पर उनसे भी कोई यह प्रश्न कर सकता है कि अब से सौ वर्ष पहले आम तौर पर योरप में या स्वयं मिस मेयो के देश में स्त्रियों की क्या स्थिति थी


[ २८ ]

और क्या सामाजिक दशा थी। पर तुलनात्मक कार्य विरोध बढ़ानेवाले होते हैं।"

मिस मेयो अपने सहयोगी और हिन्दुओं के शत्रु डुबोइस के अनुभवों का भी सावधानी के साथ प्रयोग करती है। इसका दूसरा उदाहरण देखना चाहें तो पाठक डुबोइस की किताब से लिये गये उसके हिन्दुओं की शिक्षा-व्यवस्था-सम्बन्धी उद्धरण को असली से मिला कर पढ़ें। डुबोइस को वह इस प्रकार कहते हुए उपस्थित करती है:—

"डुबोइस कहता है—'ब्राह्मण लोग इस बात को खूब समझते थे कि ज्ञान उन्हें दूसरी जातियों पर नैतिक प्रभुता जमाने में कितना सहायक होता है। इसलिए उन्होंने दूसरी जातियों को, उसके पास तक फटकने देने से भी, यथाशक्ति पूरी सावधानी के साथ रोक कर उसे एक रहस्य की वस्तु बना दिया।"

जिस अंश से यह अवतरण उद्धृत किया गया है उसके प्रथम दो वाक्य छोड़ दिये गये हैं; क्योंकि उनमें हिन्दुओं की इस बात की बड़ी प्रशंसा की गई थी कि वे बहुत प्राचीन समय से विद्या प्राप्त करते चले आ रहे हैं और ब्राह्मण तो 'सदैव से इसके भण्डार ही रहे हैं।'[१३]

मिस मेयो प्रकट रूप से इस प्रकार के 'हानिकारक' वक्तव्य को अपनी पुस्तक में नहीं आने देना चाहती थी। ऊपर उद्धृत किये गये वर्णन के बाद एक दूसरी उक्ति उसी पुस्तक से दी गई है। मिस मेयो ने उसे इस प्रकार रक्खा है:—

"मैं इस बात को नहीं मानता कि वर्तमान समय के ब्राह्मण 'लिकर्गस' और 'पिथागोरेस' के समय के अपने पूर्वजों से किसी अंश में अधिक शिक्षित हैं। इस लम्बे समय में अनेकों असभ्य जातियाँ अज्ञानता के अन्ध[ २९ ] कार से सभ्यता के शिखर पर पहुँच गई हैं और उन्होंने अपनी बुद्धि के कार्य्यों को बहुत विस्तृत किया है.......परन्तु इस सम्पूर्ण समय में हिन्दू लोग जहाँ के तहाँ गड़े रहे। उनमें हमें मानसिक या नैतिक उन्नति का कुछ पता नहीं चलता। कला और विज्ञान में भी उनकी कोई उन्नति दृष्टिगोचर नहीं होती। प्रत्येक निष्पक्ष निरीक्षक निःसन्देह यह स्वीकार करेगा कि अब वे उन जातियों से बहुत पीछे हैं जिन्होंने उनके बहुत बाद अपना नाम सभ्यता की सूची में अङ्कित किया था।"

कदाचित् बिन्दुओं के स्थान पर कुछ शब्द छोड़ दिये गये हैं। वह इसलिए कि यदि वे रहते तो उनसे इस बात का पता चलता कि डुबोइस में अतिशयोक्ति दोष था। मूल में वह वाक्य इस प्रकार है—'अपनी बुद्धि के कार्यों को बहुत विस्तृत किया है और लगभग मानव बुद्धि की सर्वोच्च सीमा तक पहुंचा दिया है।'

मिस मेयो ने उक्ति-चिह्नों को किस धूर्तता के साथ प्रयोग किया और भारत में जिन लोगों से वह मिली उनके वक्तव्य उपस्थित करने में कैसी विवेक-शून्यता से काम लिया? इन बातों के कुछ और उदाहरण मैं इसी क्रम में दे देना चाहता हूँ। नामों को छोड़ देना उसकी स्वाभाविक शैली है। 'वह व्यक्ति जिसकी सत्यता पर कोई सन्देह नहीं कर सकता,' 'एक मुसलमान ज़मींदार,' 'एक वकील,' 'एक भारतीय नरेश' बिना अपने नाम और पते के उपस्थित किये जाते हैं। पर जिन दो चार उदाहरणों में उसने नामों का उल्लेख किया है वे उसकी शुद्धता और सत्य-प्रियता के साधारण आदर्श की जाँच करने के लिए पर्याप्त हैं।

दूसरे लोगों को उसने किस प्रकार उपस्थित किया है इसकी जाँच मैंने परिश्रम के साथ की है और ऊपर मैंने मिस मेयो के विरुद्ध जो अभियोग लगाये हैं, इस जाँच-पड़ताल से उनकी और भी पुष्टि होती है।

मदर इंडिया में जिन लोगों का वर्णन उनके नामों के साथ किया गया है, दुर्भाग्य से उनमें पनगल के राजा भी हैं[१४] उनके नाम के साथ मिस मेयो [ ३० ] ने जो वक्तव्य प्रकाशित किया है उसके सम्बन्ध में वे मुझे निम्नलिखित पत्र लिखते हैं:—

"आपका १३ ता॰ का पत्र मिला। मिस मेयो ने मेरे जवाबों को ठीक उद्धृत नहीं किया। बात-चीत में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है वह मैं समझता हूँ स्वयं उसी की रचना है। मैंने उससे जो कुछ कहा था वह अपनी स्मरण-शक्ति के अनुसार आपको अपने पिछले पत्र में लिख चुका हूँ।

पनगल-नरेश का पिछला पत्र नीचे दिया जाता है:—

"मिस मेयो जब मदरास के 'गवर्ननेंट-हाउस' में थी तो मुझे उससे मिलने का अवसर प्राप्त हुआ था। मुझे स्मरण है कि उस अवसर पर उसके प्रश्नों के उत्तर में मैंने कहा था कि इस प्रान्त की वर्तमान खेदपूर्ण निरक्षरता कुछ तो इसलिए है कि सर्व-साधारण में अंध धार्मिक विश्वास फैले हैं और कुछ इसलिए कि वर्णाश्रम धर्म के अनुसार नीच जातियाँ जिनसे कि जन-संख्या का मुख्य भाग बना है, पढ़ने लिखने का काम कर ही नहीं सकती। मैंने उससे यह भी कहा कि आज दिन भी हिन्दू पाठशालाओं में बहुतेरी जातियाँ नहीं भर्ती होने पाती, खासकर उन पाठशालाओं में जहाँ संस्कृत और शास्त्रों की शिक्षा दी जाती है। स्मृतियों में अब्राह्मणों के लिए यह आज्ञा है कि ये वेद का पाठ भी न सुनें। यह आज्ञा न मानने का दण्ड दूसरे लोक में उन्हें—यह मिलता कि उनके कान में शीशा गला कर छोड़ दिया जाता है। फिर मैंने यह कहा कि अँगरेज़ों का शासन होने के बाद से और देश में उच्च शिक्षा का प्रचार बढ़ने से वर्णाश्रम धर्म के सम्बन्ध में शनैः शनैः अज्ञानतापूर्ण विचार मिटते जा रहे हैं और परिणाम यह हो रहा है कि अब अब्राह्मण जातियाँ वर्तमान स्कूलों और कालिजों से लाभ उठाने में बिलकुल सङ्कोच नहीं करतीं।"

दूसरी कथा जिसके सम्बन्ध में मैंने कुछ जाँच की मदर इंडिया के ३१९ पृष्ठ पर है। मिस मेयो लिखती है:—

"तब मुझे दिल्ली में मिले एक प्रीति-भोज का स्मरण आता है। यह प्रीति-भोज मेरे एक भारतीय मित्र ने इसलिए संयोजित किया था कि मैं गुप्त रीति से कुछ स्वराज्यवादी राजनीतिज्ञों की सम्मति सुन सकूँ। मेरे [ ३१ ] मित्र की तरह अधिकांश अतिथि भी पाश्चात्य-शिक्षा-द्वारा-जीविका चलानेवाले बङ्गाली हिन्दू थे। वे भारत से ब्रिटेन के भावी प्रथक्करण और देश पर स्वयं शासन करने के सम्बन्ध में बड़ी देर तक बोलते रहे। मैंने पूछा—'और देशी-नरेशों के विषय में आप लोगों का क्या विचार है?' एक ने आत्मविश्वास के साथ कहा—'हम उन्हें निर्मूल कर देंगे।' और शेष सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दी।"

उपरोक्त वक्तव्य की जांच करने के लिए नामों के अभाव में इस घटना का पता लगाना कठिन था। पर जितने लोग ऐसी दावत दे सकते थे या इसमें सम्मिलित हो सकते थे उन सबसे पूछने पर ज्ञात हुआ कि असोसिएटेट प्रेस के मिस्टर के॰ सी॰ राय ने एक प्रीति-भोज दिया था जिसमें बहुत से भारतीय निमन्त्रित किये गये थे। मिस्टर के॰ सी॰ राय के सहकारी मिस्टर सेन केवल दूसरे बङ्गाली सज्जन थे जो वहाँ उपस्थित थे। मिस्टर के॰ सी॰ राय ने मुझे इस बात का विश्वास दिलाया है कि उस सम्मिलन में जो बातें हुईं उनके सम्बन्ध में मिस मेयो का कथन (यदि वह उसी सम्मिलन का वर्णन करती है) बिलकुल असत्य है। श्रीमती के॰ सी॰ राय मुझे अपने एक पत्र में लिखती हैं:—

"मिस मेयो जब दिल्ली में थीं तो हमने उन्हें स्थानीय मेडन्स होटल में एक सहभोज दिया था। वे हमारे पास बड़े महत्त्वपूर्ण परिचय पत्रों के साथ आई थीं। दावत में केवल दो बङ्गाली थे। मेरे पति और मिस्टर सेन। शेष एक भी बङ्गाली नहीं था। हमारे अतिथियों में इंडिपेंडेंट दल के नेता मिस्टर एम॰ ए॰ जिन्ना और मिस्टर एस॰ चेटी मुख्य थे। जैसा मुझे स्मरण है भारतीय विधानात्मक उन्नति, स्वराज्य, हिन्दू मुसलिम समस्या, शिशु-रक्षा, और दिल्ली की कला और संस्कृति पर वादविवाद हो रहा था। मुझे यह याद नहीं है कि भारतीय नरेशों के सम्बन्ध में भी विचार हुआ था। जो भी हो, इतना तो मुझे मालूम है कि 'नरेशों को निर्मूल करने की कोई बात नहीं हुई।"

महात्मा गान्धी और कवीन्द्र रवीन्द्र की वैद्यों और डाक्टरों से सम्बन्ध रखनेवाली जिन सम्मतियों का वह उल्लेख करती है उन्हें वे सर्वथा अस्वी[ ३२ ] कार करते हैं। इसमें आश्चर्य्य नहीं कि महात्मा गान्धी भी उसकी शैली की आलोचना करते समय उत्तेजित हो उठे और लिखा कि:—

"परन्तु हर एक वस्तु को जो भारतीय हो दुर्भाव से देखने की शीघ्रता में उसने मेरे लेखों के साथ स्वतन्त्रता ही नहीं ली बरन उन बातों का, जिनका सम्बन्ध उसने या दूसरे लेखकों ने मेरे साथ जोड़ा है, मुझसे पूछ कर निर्णय कर लेने की भी आवश्यकता नहीं समझी। हम लोगों को भारतवर्ष में जज और मजिस्ट्रेट से जो बेाध होता है वास्तव में उसने वही रूप धारण किया है। वह दोनों है। वादी भी और जज भी।"

महात्मा गान्धी जब जेल में थे और उनका फोड़ा चीरा गया था उस समय का मिस मेयो ने जो वर्णन किया है ज़रा उसको भी देख लीजिए। इन वर्टेड कामाओं पर भी ध्यान देते जाइएगा।

"उस समय वे जेलख़ाने में थे। इसलिए एक अँगरेज़ सिविल सर्जन सीधा उनके पास पहुँचा और जैसा कि उस घटना की रिपोर्ट से मालूम होता है, बोला—'मिस्टर गान्धी मुझे दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आपके पेट के भीतर फोड़ा हो गया है। यदि आप मेरी चिकित्सा में होते तो मैं तुरन्त इसे चीर देता। पर कदाचित् आप अपने आयुर्वेदिक वैद्य को बुलाना अधिक पसन्द करेंगे।'

"मिस्टर गान्धी का विचार कुछ और ही प्रकार का मालूम हुआ।"

"डाक्टर ने फिर कहा—'मैं इस फोड़े को चीरना पसन्द न करूँगा क्योंकि यदि इसका विपरीत परिणाम हुआ तो आप के सब मित्र हम लोगों को, जिनका कि कर्तव्य आपकी संभाल करना है, द्वेष की भावना से यह काम करने का अपराधी ठहरावेंगे।"

"मिस्टर गान्धी ने आग्रह किया—'मैं अभी अपने मित्रों को बुला कर कहूंगा कि आप मेरे निवेदन करने पर ऐसा कर रहे हैं।'

"इस प्रकार मिस्टर गान्धी स्वेच्छापूर्वक 'पाप बढ़ानेवाली संस्था' में गये। और 'सबसे बुरों' में से एक ने—भारतीय मेडिकल सर्विस के एक अफसर ने—उनका फोड़ा चीरा और जब तक अच्छे नहीं हो गये एक अंगरेज़ बहिन ने बड़ी सावधानी से उनकी सेवा की। सुना जाता है उसे उन्होंने अन्त में 'एक काम का व्यक्ति' कहकर स्मरण किया था।" [ चित्र ]

दुखी भारत

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महात्मा गांधी

[ ३३ ]इस पर महात्माजी लिखते हैं:—

"यह सत्य का उपहास है। पर मैं केवल उसी को ठीक करने का प्रयत्न करूँगा जिसमें मेरी मान-हानि है; दूसरी गलतियों को नहीं। अवसर पर किसी आयुर्वेदिक वैद्य को बुलाने का प्रश्न नहीं था। कर्नेल मैडक को, जिन्होंने मेरा फोड़ा चीरा, यह अधिकार था कि बिना मुझसे बताये और बिना मेरा कुछ खयाल किये वे वैसा कर सकते थे। पर उन्होंने और 'सर्जन-जेनरल' हूटन ने मेरे प्रति कोमल सद्भाव का प्रदर्शन किया और मुझसे पूछा कि क्या मैं अपने खास डाक्टरों की, जिनको वे जानते थे और जो पाश्चात्य चिकित्सा-प्रणाली और चीर-फाड़-विज्ञान में भी निपुण थे, प्रतीक्षा करूंगा। उनकी इस नम्रता और सद्भाव का उत्तर देने में मैं पीछे नहीं हटा। तुरन्त मैंने कहा कि वे बिना मेरे डाक्टरों की प्रतीक्षा किये, जिन्हें उन्होंने तार देकर बुलाया था, चीर फाड़ कर सकते हैं। मैंने यह भी कहा कि चीर फाड़ में बुरा परिणाम होने पर उनके बचाव के लिए मैं उन्हें अपनी लिखित अनुमति दे दूंगा। मैंने यह दिखलाने का प्रयत्न किया कि मैं उनकी योग्यता और सत्यता पर अविश्वास नहीं करता। अपनी निजी इच्छा को प्रकट करने के लिए मुझे यह बड़े सुख का अवसर प्रतीत हुआ।"

लाहौर के विक्टोरिया स्कूल की मुख्य अध्यापिका कुमारी बोस ने भी मिस मेयो के साथ हुई अपनी बातों का मदर इंडिया में झूठा उद्धरण देने के लिए इसी प्रकार उसका विरोध किया है। मिस मेयो ने कुमारी बोस की जिन बातों का वर्णन किया था उनके सम्बन्ध में पूछ ताछ करने के लिए रेवरेंड ए॰ एच॰ पोपले उनले (कुमारी बोस से) मिले थे। रेवरेंड पोपले ने लखनऊ से निकलनेवाले ईसाइयों के मेथाडिस्ट नामक सम्प्रदाय के साप्ताहिक पत्र 'इंडियन विटनेस' में जो लिखा था वह नीचे दिया जाता है:—

"१३२ और १३३ पृष्ठों पर वह लाहौर के विक्टोरिया स्कूल का वर्णन करती है और उक्ति-चिह्नों में मुख्य अध्यापिका कुमारी बोस के वक्तव्यों को उद्धृत करती है। मैंने कुमारी बोस से इसके सम्बन्ध में बातचीत की और मुझे मालूम हुआ कि उक्ति-चिह्नों में छपी बहुत सी बातें बिलकुल नहीं [ ३४ ] हुई। आगे कुमारी बोस भारतीय ईसाई कुल की तीसरी पीढ़ी में से नहीं हैं। उसी पृष्ठ के तीसरे पैराग्राफ़ में नीची जातियों के लड़कों के सम्बन्ध में जो वक्तव्य है वह असत्य है और कभी कहा नहीं गया। ऊपरी भाग में वह कहती है कि पुरुष पंडितों को पर्दे की आड़ से पढ़ाना पड़ता है। कुमारी बोस मुझे सूचित करती हैं कि 'हिन्दू बालिकाएँ पुरुष पंडितों से संस्कृत पढ़ती हैं पर पर्दा नहीं किया जाता, और वृद्ध पंडित के सम्बन्ध में जो कहा गया है वह प्रबन्ध अब से ४० वर्ष पहले हुआ करता था।' १३८ पृष्ठ पर स्कूल के उद्देश्य के सम्बन्ध में जो पैराग्राफ है वह सर्वथा असत्य है। मिस मेयो के इस कथन के सम्बन्ध में कि 'भारतवर्ष की अधिकांश स्त्रियाँ सीना-पिरोना जानती ही नहीं' कुमारी बोस कहती हैं कि भारत की स्त्रियों को यह कला शताब्दियों से मालूम है। १३४ पृष्ठ पर उक्ति चिह्नों से अङ्कित यह वक्तव्य कि 'बड़ी होने पर अपने हाथ से वे कदापि भोजन नहीं पकातीं और यह काम बिलकुल गन्दे नौकरों के ऊपर छोड़ देती हैं इसी से रोगों और मृत्यु की अधिकता रहती है' बिलकुल काल्पनिक है। इसके उत्तर में कुमारी बोस कहती हैं कि 'प्रत्येक जाति की स्त्रियाँ नौकरों के होने पर भी अपना भोजन पकाती हैं। किसी भी अच्छे घर के नौकर गन्दे नहीं होते और विशेषकर हिन्दू घरों के तो हो ही नहीं सकते।'

"मैंने इसे अधिक विस्तार के साथ लिखना इसलिए आवश्यक समझा कि यही एक ऐसा विषय है जिसकी परीक्षा मैं कर सका हूँ। और यहाँ हम देखते हैं कि हम मिस मेयो की सचाई की प्रशंसा करने में सर्वथा असमर्थ हैं। यह बहुत सम्भव है कि बिना नाम के अगणित उद्धरणों में भी ऐसी ही झुठाई मौजूद हो।"

विक्टोरिया स्कूल की आर्थिक दशा के सम्बन्ध में भी मिस मेयो ने अपनी सम्मति प्रकट की है इस सम्मति से वह यह दिखलाना चाहती है कि शिक्षित भारतीय अपनी कन्याओं की शिक्षा पर कुछ व्यय करना नहीं चाहते। इस सम्बन्ध में मिस मेयो ने जो बातें लिखी हैं उनकी सत्यता सिद्ध करने के लिए दीवान बहादुर कुंजबिहारी थापर, ओ॰ बी॰ ई॰ ने, जो विक्टोरिया स्कूल के प्रबन्ध से सम्बन्ध रखते हैं, उसे चेलेंज किया है। हम अन्यत्र मिस्टर थापर का पत्र उद्धृत कर रहे हैं।

महात्मा गान्धी और टैगोर ने मदर इंडिया के सम्बन्ध में जो लिखा था वह हम पहले ही उद्धृत कर चुके हैं। दोनों महानुभावों ने उसे झूठे [ ३५ ] उद्धरण देने का अपराधी ठहराया है। किसी विषय में टैगोर का उसने बड़ी धूर्तता के साथ उल्लेख दिया है, और ऐसी सम्मतियों को उनकी बताया है जिनका उन्हें कभी स्वप्न में भी ध्यान नहीं था। यहाँ हम न्यूयार्क के 'नेशन' के ४ थी जनवरी के अङ्क में प्रकाशित टैगोर के पत्र के कुछ अंश उद्घृत करते हैं:—

संयोगवश मैं उन लोगों में हूँ जिन्हें लेखिका ने अपनी स्मृति से विशेष आदर प्रदान किया है और अर्द्धनिशा में निशाना लगाने का लक्ष्य बनाया है। यद्यपि दूर तक फैली हुई इस शैतानी से अपनी रक्षा करना मेरे लिए बिलकुल कठिन है तथापि मैं आपके पत्र-द्वारा कम से कम अपने कुछ मित्रों के कानों तक, जो अटलांटिक के दूसरे छोर पर रहते हैं, और जो मुझे विश्वास है, एक आकस्मिक यात्रीद्वारा सम्पूर्ण राष्ट्र के विरुद्ध ऐसे दिल-दहलानेवाले वर्णनों की सचाई पर साधारणतः विश्वास करने से पहले अपने निर्णय को स्थगित रखने का वीर-भाव रखते हैं, यह आवाज़ पहुँचाना चाहता हूँ।

अपने बचाव के लिए मैं इस देश की सामाजिक बुराइयों के अत्यन्त निर्भय समालोचकों में से एक मिस्टर नाटराजन के लेख का आगे लिखा अंश काम में लाऊँगा।

मिस मेयो ने केसरलिङ्ग की 'बुक आफ मैरिज' में दिये गये मेरे लेख के कुछ वाक्यों को जानबूझ कर जो तोड़ा मरोड़ा है और धूर्तता से उनके वास्तविक अतलब को छिपाकर और अपना बुरा उद्देश्य सिद्ध करने के लिए उन्हें पूर्णतः असत्य सम्मति के रूप में ढाल कर मुझे जो अपराध लगाया है, संयोग से मिस्टर नाटराजन ने उसी को अपने लेख का विषय बनाया है। वे लिखते हैं:—

"टैगोर अपने लेख के अन्त में, पूरे पाँच पृष्ठों में विवाह का अपना खास आदर्श उपस्थित करते हैं (केसर्लिङ्ग पृष्ठ १५७ और आगे)। वे कहते हैं—'एक अकेले भारतीय की हैसियत से इस लेख के अन्त में मैं विवाह के आम प्रश्न पर अपनी निजी राय भी दे देना चाहता हूँ।' उनकी यह धारणा है कि विवाह भारत में ही नहीं, सारे संसार में आरम्भ काल से लेकर आज तक स्त्री पुरुष के वास्तविक मेल में बाधक बना है। यह बाधा तभी दूर हो सकती है 'जब समाज घर के रचनात्मक कार्य्य को बिना कम किये स्त्रियों के विशेष मानसिक गुणों के प्रस्फुटन का एक बड़ा क्षेत्र तैयार करने के योग्य हो जाय। [ ३६ ]यदि मिस कैथरिन मेयो अपने आन्दोलन में क्षीण-दृष्टि से काम न लेकर ईमानदारी के साथ जाँच-पड़ताल करती तो टैगोर के निबन्धों के पढ़ने का धैर्य्य न रखने पर भी वह कलकत्ते में किसी से पूछ सकती थी कि स्वयं टैगोर के कुटुम्ब में लड़कियों का विवाह किस आयु में किया जाता है। यह स्पष्ट है कि वह कवि को बदनाम करने पर उतारू थी।"

आपके पाठकों से मेरा यह निवेदन है कि वे केसरलिङ्ग की पुस्तक में हिन्दू विवाह पर लिखे गये मेरे लेख को पढ़ें और मेरे साथ न्याय करने के लिए मिस मेयो को यह सिद्ध करने का चैलेंज दें कि उसके कथनानुसार यह सम्मति मेरी ही है कि—"बालविवाह महान आकांक्षाओं का पुष्प है। जाति की संस्कृति को ऊँचा उठाने के लिए विषय-वासना और देहवाद पर बुद्धिमानों की विजय है?" इसका अर्थ यह स्वीकार करना हुआ कि—"यदि स्त्रियों को अपने वश में रखना है तो उन्हें वयस्क होने से पहले ही अत्यन्त दृढ़ता के साथ बाँध कर दूसरों को सौंप देना चाहिए।"

अन्त में मैं आपके पाठकों का ध्यान एक दूसरे आश्चर्य्यजनक झूठे वक्तव्य की ओर आकर्षित करना चाहता हूँ। उसमें वह मुझे एक घृणित मज़ाक के साथ पश्चिमीय चिकित्सा विज्ञान के विरुद्ध आयुर्वेदिक चिकित्सा-प्रणाली के पोषक के रूप में उपस्थित करती है। यदि उसमें शक्ति हो तो इस बात को सिद्ध करके दिखलावे।

मेरे अतिरिक्त दूसरे भी कितने ही व्यक्ति हैं जो यदि पश्चिम के पाठकों तक पहुँच सके तो मेरी ही भांति अपनी शिकायतें उनके सामने उपस्थित करेंगे और उन्हें बतलायेंगे कि उनके विचारों को किस तरह गलत बनाया गया है, शब्दों को कैसे काटा छाँटा गया है और वास्तविकता को किस तरह घायल करके कुरूप बनाया गया है कि वह असत्य से भी बुरी जान पड़ती है।

शान्तिनिकेतन, श्रीरवीन्द्रनाथ टैगोर
९ नवम्बर, १९२७

कलकत्ते के एँगलो-इंडियन दैनिक पत्र 'दी इँगलिश-मैन' के ७ मार्च के अङ्क में कलकत्ता हाईकोर्ट के बैरिस्टरों के नेता मिस्टर एन॰ सी॰ सरकार ने स्वर्गीय लार्ड सिनहा की प्रशंसा में एक लेख छपाया है। हमें यह पता चला है कि लार्ड सिनहा से मिस्टर सरकार की बड़ी घनिष्ठता थी और लार्ड सिनहा के कामों तथा विचारों से वे भली भांति परिचित थे। मिस्टर [ ३७ ] सरकार के पत्र से मिस मेयो की एक और झूठ का भंडाफोड़ हुआ है। हम आवश्यक अंश नीचे उद्धृत करते हैं:—

"लार्ड सिनहा अपने सम्बन्ध की कोई भी बात प्रकट नहीं होने देना चाहते थे। इससे उन्हें आन्तरिक घृणा थी। मिस मेयो की मदर इंडिया में एक महान वकील' शीर्षक का एक अध्याय (सोलहवाँ अध्याय) है। इस अध्याय में मिस मेयो एक उच्च घराने के हिन्दू के साथ, जो एक प्रभावशाली वकील भी है, अपनी बातचीत का वर्णन करती है। पर मिस मेयो ने नाम प्रकट नहीं किया क्योंकि 'ऐसा करना उक्त सज्जन का निरादर-मात्र होता।'

"यह हिन्दू वकील लार्ड सिनहा के अतिरिक्त और कोई नहीं है। इस बात को उन्होंने स्वयं स्वीकार किया था। उनके कुछ मित्रों को मालूम भी है कि यह मिलाप उनके ही घर पर १७, इलिज़िय रो में हुआ था।

"इस मिलाप में लार्ड सिनहा ने शिकायत की थी कि बङ्गाल के गाँवों की दशा बहुत शोचनीय है पर सरकार उस ओर उचित ध्यान नहीं देती। हमें मालूम हुआ है कि लार्ड सिनहा के शब्द ये थे—'इसमें सन्देह नहीं कि सरकार बहुत कुछ और बहुत शीघ्र कर सकती थी पर वह हमारे ग्रामीण भाइयों को भूखों मार रही है।' मिस मेयो लाई सिनहा का मज़ाक उड़ाती हुई इस वक्तव्य के ढकने के लिए कहती है कि 'न्यूयार्क के एक बड़े वकील की जैसी आय होने पर भी' इस धनी मनुष्य ने अपने गाँव (रायपुर) के लिए कुछ नहीं किया। 'यद्यपि वह उसके निवास स्थान से इतनी दूरी पर है कि घोड़े पर चढ़कर तीसरे पहर की सैर को भी कोई निकले तो घूमकर आराम के साथ वापस आ सकता है।'

"लार्ड सिनहा को अपना विज्ञापन पसन्द नहीं था। इसलिए उन्होंने मिस मेयो को यह बतलाने की परवाह नहीं की कि रायपुर में स्कूल की पक्की इमारत उन्हीं ने बनवाई, स्कूल और गाँव के अस्पताल का खर्च भी वही उठाते हैं। और इसके लिए उन्होंने स्थायी कोष भी बना दिया है। उन्होंने यह भी नहीं बताया कि अपने जिले के कृषि-विद्यालय को उन्होंने १०,०००) का दान दिया है और न यह कि अपने गाँवों और ग्रामीणों की सहायता और दान के उनके इतने काम हुए हैं कि सबका उल्लेख नहीं हो सकता।

"लन्दन में जब मिस मेयो की पुस्तक प्रकाशित हुई तब मैं वहीं था। लार्ड सिनहा के साथ उसने जो घोर अन्याय किया था उसकी और उनका [ ३८ ] ध्यान आकर्षित किया गया। और उनकी ओर से समाचारपत्रों में इसका प्रतिवाद छपाने के लिए एक निबन्ध भी तैयार किया गया पर लार्ड सिनहा ने उसे कहीं भेजने की आज्ञा नहीं दी।"

इससे लार्ड सिनहा के विरुद्ध उसके एक और झूठ का खण्डन हो जाता है।

[५]

इस पुस्तक में योरप के स्त्री पुरुषों के नैतिक सम्बन्ध पर विचार करना उचित होगा या नहीं यह सोचने में मुझे कई रात बेचैन रहना पड़ा मैं मिस मेयो की स्त्री-जाति के प्रति बिना किसी वर्ण या जातिभेद के उसकी अपेक्षा कहीं अधिक आदर रखता हूँ। मेरा यह विश्वास है कि स्त्री के समान सुन्दर और पवित्र वस्तु और कोई नहीं है। इस संसार में मातृत्व उसे सर्वोच्च स्थान पर पहुँचा देता है। यही कारण है कि भारतवर्ष में मातृपद को इतना महान् आदर दिया गया है। प्राचीन काल के हिन्दू अनेक प्रकार से स्त्री की पूजा करते थे। शक्ति, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा ये सब पूज्य देवियाँ हैं। माता, वधू, भगिनी, पुत्री प्रत्येक की पूजा का एक अलग त्योहार है। यह स्वीकार करने में मुझे ज़रा भी सङ्कोच नहीं कि हिन्दू समाज अपने आदर्शों से गिर गया है। मेरे विचार में यह एक-मात्र राजनैतिक पराधीनता का दुष्परिणाम है। और जब तक भारत को राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त नहीं हो जाती तब तक समुचित सुधार होना सम्भव नहीं है।

हिन्दूसमाज का फिर से सुधार करने में हम १८३० में ब्रह्मसमाज स्थापित होने के समय से लगे हैं। १८७७ से इस सम्बन्ध में आर्य्यसमाज बड़ा काम कर रहा है। दूसरी सामाजिक सुधारक संस्थाएँ भी इस ओर बड़े परिश्रम से जुटी हैं। सहस्रों सभा-मन्चों से हमने बाल-विवाह के विरुद्ध घोषणा की है। सरकार की धारा-सभाओं से कुछ सहायता न मिलने पर भी हम लोगों ने बालक-बालिकाओं की विवाह की आयु बढ़ाने में ठोस उन्नति की है। अब १२ वर्ष की आयु में विवाह सिर्फ कुछ ही जातियों में [ ३९ ] प्रचलित है। मेरी निजी राय यह है कि मैं सोलह वर्ष से कम आयु किसी कन्या का ब्याह होना सामाजिक पाप मानता हूँ, यद्यपि भारत की लड़कियां लगभग १२ वर्ष की आयु में ही विवाहयोग्य हो जाती हैं। विधवा-विवाह के मार्ग में जो रुकावटें हैं उनसे हम बराबर युद्ध करते चले आ रहे हैं। और निःसन्देह उन्नति के चिह्न प्रकट हो रहे हैं; यद्यपि अब भी बहुत कुछ करना शेष है। विधवा-विवाह की मनाही केवल कुछ ही जातियों में रह गई है, सबमें नहीं। प्रति वर्ष हजारों विधवा-विवाहों की सूचना प्रत्येक श्रेणी, प्रत्येक जाति और प्रत्येक वर्ग से मिलती है। मुसलमान और ईसाइयों में भी जातिभेद विद्यमान है। उनमें से कुछ अपनी विधवाओं को युनर्विवाह करने की आज्ञा नहीं देते। पर चौ-तरफा उन्नति हो रही है। ऐसी एक भी कट्टर जाति नहीं है जिसमें विधवा-विवाह न हुआ हो। गत दस वर्षो से कट्टर हिन्दुओं और समाज-सुधारकों में बड़ा घोर युद्ध चल रहा है, पर पहले दल के लोगों की इसमें काफी हार हुई है।

भारत में विवाह-स्वीकृत्ति की आयु १३ वर्ष है। बड़ी धारा-सभा में इसको १४ वर्ष कर देने का बिल उपस्थित है। पर सरकार की ओर से इसका विरोध किया जा रहा है। लड़कियों की विवाह की आयु १२ वर्ष नियत कर देने का एक दूसरा बिल भी उपस्थित किया गया है। दोनों व्यक्तिगत प्रस्ताव हैं और बड़ी व्यवस्थापिका सभा के हिन्दू सदस्यों द्वारा उपस्थित किये गये हैं।

इसी प्रकार अस्पृश्यता दूर करने के लिए भी शक्तिशाली और देशव्यापी उद्योग हो रहा है। अछूतोद्धार के लिए, दलित जातियों को शिक्षा-सम्बन्धी सुविधाएं देने के लिए, उनकी सामाजिक और आर्थिक दशा ऊँची उठाने के लिए हिन्दुओं की निजी संस्थाओं ने बड़ी बड़ी रक़में ख़र्च की हैं। यह वक्तव्य कि इस आन्दोलन के विरुद्ध 'असंख्य' आवाजें उठ रही हैं बिलकुल असत्य है और दुष्टता से भरा हुआ है; क्योंकि जो अत्यन्त कट्टर लोग हैं वे भी दलित जातियों के प्रति न्याय करने के लिए अब चिन्तित हैं। जातिभेद में मेरा खुद विश्वास नहीं है। मैं इसको एक-दम मिटा देने के पक्ष में हूँ। स्त्री-पुरुषो के वैवाहिक अधिकारों में भी मैं कोई भेद नहीं मानता। [ ४० ]इस पुस्तक में इन सब विषयों की सविस्तर विवेचना की गई है। और मिस मेयो को चैलेंज देकर उसके वक्तव्यों का खण्डन किया गया है। यदि मिस मेयो हिन्दू सामाजिक जीवन की विशुद्ध आलोचना करती तो भारतीय समाज-सुधारक उसका साथ देते और बदले में पश्चिम की सामाजिक कुरीतियों का भण्डाफोड़ करने का विचार भी न कर उसकी आलोचनाओं से लाभ उठाते। दूसरे राष्ट्रों पर कीचड़ उछालना हमारा काम नहीं है। प्रत्येक में बुराइयाँ हैं। सत्य हो या असत्य, हम भारतीयों का यह विश्वास है कि कुछ कुप्रथाओं के होते हुए भी भारत में स्त्री-पुरुष का पारस्परिक जीवन पश्चिम की अपेक्षा कहीं अधिक पवित्र, कहीं अधिक स्वस्थ और कहीं अधिक सदाचारयुक्त है। विषय-भोग की उत्तेजना योरप में जैसी भयङ्कर है वैसी भारत में नहीं है। विषय-भोग से उत्पन्न रोगों में तो पूर्व और पश्चिम की तुलना ही नहीं हो सकती। दोनों में महान् अन्तर है। हमारे चिकित्सकों का कहना है कि ब्रिटिश लोगों के आगमन से पूर्व कुछ पहाड़ी जातियों को छोड़कर भारत में इन रोगों का पता ही न था। गर्मी के रोग का दूसरा नाम फिरङ्ग रोग भी है। यह नाम पड़ने का कारण यही है कि भारत को यह रोग फिरङ्गियों (योरप-वासियों) से प्राप्त हुआ।

यदि मिस मेयो यह कहती कि हमारा सामाजिक जीवन खोखला हो गया है और उसके सुधार और पुनर्निर्माण की आवश्यकता है तो हमें इतना कष्ट न होता जितना उसने राजनैतिक और स्वजातीय आन्दोलन के लिए अपने अधूरे ज्ञान का नीच प्रयोग करके और दुष्ट परिणाम निकाल कर हमें पहुँचाया है। लंदन के इंडिया आफ़िस ने भी उसे ऐसे परिणाम न निकालने के लिए सावधान कर दिया था परन्तु उसने इस सम्मति की कुछ परवाह न की और ३१ करोड ५ लाख मानवों से बसे सम्पूर्ण राष्ट्र पर कारिख पोत दी। हमारे विरुद्ध उसने झूठे अपराधों की सृष्टि करके यह दिखलाने का प्रयत्न किया है कि हम राजनैतिक स्वतंत्रता के अयोग्य हैं और हमारे लिए ब्रिटिश सरकार से बढ़कर अच्छी और कोई वस्तु नहीं। अभी हाल में ही सन् १९२४, २६ और २७ में मैं योरप गया था। वहाँ मैंने देखा कि भारत के स्वराज्य के अधिकार और माँग के विरुद्ध महान् [ ४१ ] व्यक्तियों की सहायता के साथ एक व्यापक, सुसङ्गठित, सम्पन्न और बड़ा आन्दोलन ग्रेट ब्रिटेन में ही नहीं, बरन पश्चिम के दूसरे देशों में भी और विशेषतया अमरीका में हो रहा है। इस अपवित्र युद्ध में योरप की सब प्रकार की शक्तियाँ काम कर रही हैं । सरकार के एंगलो इंडियन कर्मचारी जो पेंशन पाते हैं या अभी नौकरी ही कर रहे हैं, ईसाई-धर्म-प्रचारक और व्यापारी रईस सभी इसमें सम्मिलित हैं। उपाय जो काम में लाये जा रहे हैं वे अत्यन्त धोखेबाज़ी से भरे और घातक हैं । राजनैतिक और आर्थिक कारणों को पीछे ठेल दिया जाता है और सामाजिक बुराइयों को खूब प्रचंड प्रकाश रखा जाता है। भारत के विरुद्ध चारों तरफ़ घृणा का भाव उत्पन्न करने के लिए मिथ्या दृश्यों का बहुत बढ़ाकर प्रदर्शन किया जाता है। समाचार-पत्र, व्याख्यान-मञ्च, प्रार्थना-भवन, नाटक, सिनेमा सभी का हमारे विरुद्ध प्रयोग हो रहा है। इसमें सन्देह नहीं कि मिस मेयो की मदर इंडिया उसी आन्दोलन का एक अङ्ग-मात्र है। अँगरेज़ी जुए को उतार फेंकने के लिए एशिया में जो उद्योग हो रहे हैं उनका विरोध करना, उनकी दिल्लगी उड़ाना और उनके प्रति घृणा का भाव उत्पन्न करना यही उसके जीवन का उद्देश जान पड़ता है।

मैं पहले कह चुका हूँ कि अगस्त १९२५ में मिस्टर लायनन कर्टिज़ और मिस मेयो की भेंट हुई। 'भय के द्वीप' के इँगलिश संस्करण की भूमिका में कटिज़ ने निम्न लिखित सम्मति प्रकट की थी।[१५]

"यहाँ (विलियम्स नगर में) और अमरीका के अन्य स्थानों में भी मुझे ऐसे मित्र मिले जो पुस्तकों में वर्णित बातों को पूरे ज्ञान और प्रमाण के साथ उपस्थित कर सकते हैं। दो विचारों में वे सब सहमत हैं। उनका कहना है कि मिस मेयो ने ऐसी कोई बात नहीं लिखी जो उनकी सम्मति में सच न हो।...आगे वे कहते हैं कि और भी बहुत सी ऐसी बातें हैं जिनके निरीक्षण की आशा, बिना कुछ वर्ष पहले गये, मिस मेयों से नहीं की जा सकती थी। मेरे ये सब मित्र भारत में रह चुके हैं और कई राष्ट्रीय नेताओं से मिल भी चुके हैं। मेरे इस प्रश्न पर कि फिलीपाइन और भारत के नेताओं में क्या अन्तर [ ४२ ] है? हर एक ने (भिन्न अवसरों पर) यही उत्तर दिया कि भारतीय नेता बिलकुल भिन्न और ऊँचे धरातल पर हैं।"

कर्टिज़ महाशय यह जानते थे और मिस मेयो को भी अवश्य मालूम हो गया होगा कि भारत को दिये गये सुधार-नियमों पर पुनः विचार होगा और उनकी जाँच के लिए शीघ्र ही एक 'शाही जाँच' कमीशन नियुक्त होनेवाला है। इस कमीशन की बनावट के सम्बन्ध में लन्दन के 'टाइम्स' और टोरी दल के अन्य समाचार-पत्र कुछ पहले से ही आन्दोलन कर रहे थे। इसमें वे किसी भारतीय को सम्मिलित करना नहीं चाहते थे। वे हिन्दुओं की सामाजिक स्थिति पर आक्रमण करके और अछूत जातियों की असमर्थता पर विशेष बल देकर ब्रिटिश जनता को भारत के विरुद्ध पहले ही से भड़का रहे थे। इन नाम-मात्र की बुराइयों को दिखलाने के लिए 'टाइम्स' अपने पृष्ठ पर पृष्ठ भर रहा था। सम्भवतः ब्रिटिश दल के समाचार-पत्र यह जानते थे कि एक इस प्रकार की पुस्तक रची जा रही है। इसलिए जैसे ही पुस्तक प्रकाशित हुई 'एक स्वार्थ-रहित' विदेशी का कार्य कहकर उन पत्रों ने उसकी धूम मचानी आरम्भ कर दी। उनका पक्ष प्रबल करने के लिए यह अत्यन्त मूल्यवान् वस्तु थी। पुस्तक की किसी प्रकार की समालोचना को उसके पाठकों से दूर रखने के लिए वे इतने चिन्तित थे कि उन्होंने सम्पूर्ण सम्पादकीय-शिष्टाचार को एक-दम भुला दिया और लन्दन में उस समय उपस्थित प्रभावशाली और विश्वसनीय भारतीयों के हस्ताक्षर से युक्त मदर इंडिया पर लिखे गये एक समालोचना-पत्र को प्रकाशित करना अस्वीकार कर दिया। पुस्तक सहस्रों की संख्या में बिना मूल्य बाँटी गई। इन सब बातों से एक भारतीय के हृदय में पुस्तक के राजनैतिक और गैर-जातीय होने में कोई सन्देह नहीं रह जाता।

ऐसी परिस्थिति में हम जो सर्वथा सत्य है उसका वर्णन करके समुचित उत्तर क्यों न दें? मिस मेयो ने हममें जिन अवगुणों का वर्णन किया है वे योरपीय समाज में भी पाये जाते हैं। कुछ तो भारतीय समाज से और गहरे रूप में। पर वहाँ वे राजनैतिक और राष्ट्रीय स्वाधीनता में बाधक नहीं समझ जाते। मैं कह चुका हूँ कि इस प्रश्न पर सोचने के लिए मुझे कई [ ४३ ] रात जगना पड़ा है। पर अन्त में मैं इस निर्णय पर पहुँचा कि जब मातृभूमि और सत्य के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करना है तो मुझे इस उत्तर को बिना पूरा किये नहीं छोड़ना चाहिए। और यद्यपि यह काम मेरे स्वभाव के अनुकूल नहीं है तो भी इसे करना ही उचित है।

जब मैं १९२० में अमरीका से लौटा था तो मेरे मित्रों ने मुझे पश्चिमीय जीवन के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करने के लिए बहुत बार कहा था। पर मैंने ऐसा करना अस्वीकार कर दिया था क्योंकि उससे मुझे पश्चिमीय स्त्री-पुरुषों के नैतिक सम्बन्ध में जो कालापन है उसे भी दिखाने का अप्रिय कार्य्य करना पड़ता। मैं प्रत्येक राष्ट्र में जो खूबियाँ हैं उन्हीं को देखना ठीक समझता हूँ। इसी उपाय से हम अन्तर्जातीय सम्बन्धों की उन्नति कर सकते हैं और अन्तर्जातीय शान्ति स्थापित कर सकते हैं। इसलिए यदि मैं अपने जीवन में प्रथम बार उस नियम को भङ्ग करने जा रहा हूँ तो इसका पूर्ण उत्तरदायित्व मिस मेयो पर है अथवा उसके एंगलो-इंडियन समर्थकों पर।

[६]

अपने प्रमाणों के प्रयोग, या यह कहना अधिक उचित होगा कि दुष्प्रयोग, में ही नहीं बरन अपने निज के लेखों में भी मिस मेयो का एक मात्र प्रयत्न यही रहा है कि हमारे जीवन का अत्यन्त घृणित और गन्दा चित्र तैयार हो। उसने शीघ्रता में जो सम्मतियाँ प्रकट की हैं उनमें लेश-मात्र भी सत्य नहीं है। हमारे 'अत्यन्त विषयीपने' से उसका मस्तिष्क दूषित होगया है और इसी विषय का जो वह समय असमय का ध्यान किये बिना बार बार वर्णन करती है उससे स्पष्ट है कि उसे किसी विचित्र लेखन-शैली का रोग हो गया है। पाठकों के अवलोकनार्थ हम उसकी इस ढङ्ग की कुछ बातें उद्धृत करते हैं:—

पृष्ठ २५—यदि आप उन्हें (अध्यापिकाओं को) आरम्भिक शिक्षा के लिए नियुक्त करते हैं तो मानों उन्हें सर्वसाधारण की आँखों के सम्मुख उपस्थित कर उनके सर्वनाश का बीज बोते हैं। [ ४४ ]पृष्ठ ३०—जो बच्चा जन्म समय के कष्ट को सह लेता है और बच भी जाता ह उसे प्रायः इन्द्रिय-सम्बन्धी रोग घेर लेते हैं।

पृष्ठ ३०—घर में बढ़ता हुआ बच्चा विषय-भोग की बातों को सुनते सुनते और कामों को देखते देखते बचपन में ही स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध की सारी बातें सीख जाता है।

पृष्ठ ३२-३३—देश के अधिकांश भाग में, उत्तर में भी और दक्षिण में भी, छोटे बालकों को जिनका शरीर आकर्षक होता है बड़े लोग अपने विषय-भोग के लिए बहका लेते हैं या एक वेश्या के समान ये बालक किसी मन्दिर में रख लिये जाते हैं। माता-पिता इसमें कोई हानि ही नहीं देखते बरन यह जानकर प्रसन्न होते हैं कि उनका पुत्र चित्ताकर्षक है।

यह किसी खास दर्जे के लोगों की बात नहीं है। विशेष अज्ञानता भी इसका कारण नहीं। हम लोग जैसे भले और बुरे का भेद जानते हैं वैसे वे (भारतीय) नहीं जानते। वास्तव में वे उससे बहुत दूर हैं। मां चाहे उच्च जाति की हो चाहे नीच जाति की अपने बच्चों को स्वयं विषय की शिक्षा देती है। पुत्री को 'स्त्री की भाँति शयन करना' सिखाती है और पुत्र को 'पुरुष का कार्य्य करने' की शिक्षा देती है। यह एक ऐसा दुष्प्रयोग है कि कम से कम बालक तो इसे अपने शेष जीवन में प्रतिदिन जारी रख सकता है।

यह अन्तिम बात ध्यान देने की है। सब जाति और वर्गों के उच्च से उच्च प्रामाणिक वैद्य यह कहते हैं कि इस अवगुण के चिह्न चाहे जिस कारण से हो ध्यान से देखने से प्रायः प्रत्येक बालक के शरीर में पाये जाते हैं।

पृष्ठ ३४—अचलित हिन्दू-शास्त्र में किसी बात के लिए भी संयम का उपदेश नहीं मिलता। विषय-भोग के लिए तो बिलकुल ही नहीं।

पृष्ठ ३४—ऊपर दी गई साधारण बातों के पश्चात् किसी को यह सुन कर आश्चर्य नहीं हो सकता कि देश के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक हिन्दू पुरुष, यदि उन्हें विषय-भोग के लिए सब साधन प्राप्त रहते हैं, औसतन ३० वर्ष की आयु में बुड्ढे हो जाते हैं। और ऐसे प्रत्येक १० मनुष्यों में जिनकी आयु पचीस और तीस वर्ष के भीतर होती है, लगभग सात या आठ नपुंसक होते हैं। ये अङ्क यों ही नहीं लिख दिये गये हैं, और इनका कारण, ऊपर जो लिखा गया है उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है।[१६] [ ४५ ]पृष्ठ ६१—(भारतीय स्त्रियाँ) साधारणतः दिन में दो या तीन बार पतिसङ्ग करती हैं।

पृष्ठ ६७—जब तक ब्रिटेन की शक्ति इतनी दूर तक (खैबर-मार्ग तक) नहीं पहुंची थी, कोई हिन्दू बिना स्त्री-वेष बनाये उसमें से जीवित नहीं निकल सकता था।

पृष्ठ ८४—अपने पति के घर में रहनेवाली स्त्री, उसकी मृत्यु के पश्चात् विधवा हो जाने पर यद्यपि अपनी रक्षा का हिन्दू नियम के अनुसार दावा नहीं कर सकती तथापि ऊपर वर्णन की गई बातों का पालन करने से वह घर में रख ली जा सकती है या निकाल दी जा सकती है। तब वह चाहे भिक्षावृत्ति करके अपना निर्वाह करे चाहे वेश्या-वृत्ति करके। अधिकतर वह वेश्यावृत्ति ही स्वीकार करती है। वह मैले कुचैले चिथड़े पहने, सिर मुंडाए, दुःखी जीवन से फँसा जाता हुआ चेहरा लिये मन्दिरों की भीड़ में या तीर्थ-स्थाने की गलियों में प्रायः दिखाई पड़ती है। वहाँ कंजूस पुण्यात्मा लोग कभी कभी उसे एक मुट्ठी चावल दे देते हैं।

पृष्ठ ८८—हिन्दू विधवा का पुनर्विवाह अब भी कल्पनातीत समझा जाता है।

पृष्ट ९१—भारतीय स्त्रियों के जीवन में जब अत्यन्त कोमल, भयप्रद और आवश्यक घड़ी उपस्थित होती है तो उनकी देख रेख का भार किसी निधन और गन्दे घर से बुलाई गई अन्धी, लँगड़ी, लकवा ले बेकाम और रोगग्रस्त बुढ़िया को सौंपा जाता है। (यह उसने दाइयों के सम्बन्ध में लिखा है)

पृष्ठ १५४—आज भी अस्पृश्यता के पक्ष में लाखों हैं। और यद्यपि मिस्टर गांधी अपने विश्वास पर दृढ़ रहते हैं तथापि उनके अनुयायियों में से बहुत कम ऐसे हैं जिन्होंने यहाँ तक उनका साथ देने का कभी विचार किया हो। पृष्ठ ३०८—"बिना अँगरेज़ों की सहायता के भारतवर्ष में उनके अतिरिक्त जो हमारे (पठानों के) गुलाम बन कर रहें और कोई हिन्दू नहीं रह सकता।"

पृष्ठ ३२५—"यदि हम अपने बच्चों की रक्षा करें तो देवता हम से अप्रसन्न हो जायेंगे और हमें शाप देंगे।"

यह बात एक बङ्गाली माता के मुँह से कहलाई गई है।

पृष्ठ ३३२—कोई कट्टर हिन्दू जूता पहनना स्वीकार न करेगा और स्त्री तो कदापि नहीं कर सकती। [ ४६ ]हमने केवल थोड़े से उदाहरण दिये हैं। पुस्तक के भीतर इन पर और इसी प्रकार की अन्य बहुत सी बातों पर विचार करेंगे। पर क्या किसी ऐसी लेखिका की बातों पर जो इतनी अधिक मात्रा में ऐसे बेहूदा परिणाम निकालने में आनन्द लेती है, गम्भीर लोग गम्भीरता के साथ विचार कर सकते हैं?

[अनुलेख]

जनवरी में मिस मेयो ने 'शिकागो ट्रिब्यून' के अधीन 'लिबर्टी' नामक साप्ताहिक पन्न की चौदहवां संख्या में एक लेख लिखा है। इसमें उसने मदर इंडिया की कुछ समालोचनाओं का जवाब देने का प्रयत्न किया है। महात्मा गान्धी ने उसके पुस्तक की जो समालोचना लिखी थी उसी की और उसका विशेष लक्ष्य है। पीछे हम वह समालोचना दे आये हैं। बातें बनाने में वह बड़ी चतुर है।

वास्तविक विषय पर वह यह उत्तर देकर पर्दा डालना चाहती है कि मैंने यह नहीं कहा था कि महात्मा गान्धी जो कुछ भी कहते हैं उसे लिख लेने के लिए अपने साथ सदा दो मंत्री रखते हैं। 'यदि महात्मा गान्धी मेरी पुस्तक के २२२ पृष्ठ (इंगलिश संस्करण, २०२ पृष्ठ) पर देखें तो उन्हें मालूम होगा कि उन्होंने उसमें 'सर्वदा' शब्द अपनी ओर से बढ़ा दिया है।' यह कथन असत्य है। महात्मा गान्धी ने उसके लेख में कुछ नहीं जोड़ा। वे केवल इतना ही कहते हैं कि बिना 'सर्वदा' शब्द का प्रयोग किये मिस मेयो की बात का यह अर्थ निकलता है कि वह केवल उनका आश्रम देखने के अवसर का ही वर्णन नहीं कर रही है।

परन्तु यह तो एक अत्यन्त साधारण बात है। सन्देशवाली घटना अधिक महत्त्व की है। पर उसका उत्तर देने में मिस मेयो सफल नहीं हुई। वह लिखती है:—

"....महात्मा गान्धी के साथ बातचीत का संशेधित और परिवर्द्धित विवरण उन्हीं के हस्ताक्षर के साथ मुझे ठीक समय पर वापस मिल गया।

"इस समय यह लेख मेरे सामने है। इस छपे हुए कई पृष्ठों के लेख का पहला वाक्य—'इस चर्खे का भन भन शब्द अमरीका के लिए मेरा सन्देश [ ४७ ] है'—मेरे इस प्रश्न का कि क्या अमरीका के लिए आप कोई सन्देश देंगे उत्तर है। यह ठीक वही है जो उन्होंने कहा था। यही मैंने छापा भी है।

"महात्मा गान्धी अब इस 'सन्देश' से भागना चाहते हैं और इसे शत्रु का आविष्कार बताते हैं। वे कहते हैं—'मुझे यह सन्देश देने की बात याद नहीं आती। उस समय केवल एक व्यक्ति ऐसा था जिसने कुछ बातें नोट की थीं। पर उसे भी इस 'सन्देश' का स्मरण नहीं है।'

परन्तु इस सन्देश के सम्बन्ध में वास्तविक बात क्या है? मदर इंडिया की समालोचना लिखते समय महात्मा गान्धी दौड़े पर थे। उस समय उनके पास मिस मेयो से उनकी जो बातें हुई थीं उनका लिखित विवरण नहीं था। पर मिस मेयो के 'लिबर्टी' में प्रकाशित लेख के उत्तर में उन्होंने २ फरवरी १९२८ के यंग इंडिया में जो लेख लिखा है उससे इस बात का खुलासा हो जाता है। महात्मा गान्धी लिखते हैं:—

"उसका अपने इस कथन पर दृढ़ रहना कि मैंने वह सन्देश दिया था यह सिद्ध करता है कि वह सत्य को पूर्ण रूप से दबाने की अपराधिनी है। सम्भवतः उसने सोचा होगा कि मेरे और उसके बीच में जो बातें हुई थी उसकी संशोधित प्रतिलिप मेरे पास न होगी। उसके अभाग्य से उसके लेखों की एक प्रतिलिपि मेरे अधिकार में सुरक्षित है। चर्खे के भन भन से सम्बन्ध रखनेवाला सम्पूर्ण अंश नीचे दिया जाता है:—

"इस चर्खे का भन भन शब्द-मात्र अमरीका के लिए मेरा सन्देश है। मुझे अमरीका की जो चिट्टियाँ और समाचारपत्रों की कतरनें मिलती हैं उनसे पता चलता है कि लोगों का एक दल तो अहिंसात्मक असहयोग के परिणामों का अत्यन्त अधिक मूल्य लगाता है और दूसरा उनका मूल्य ही नहीं गिराता बरन इस आन्दोलन से सम्बन्ध रखनेवालों के सिर सब प्रकार के दोष भी मढ़ रहा है। किसी भी प्रकार की अत्युक्ति न कीजिए। इच्छुक अमरीका-वासी पक्षपातरहित होकर धैर्य से इस श्रान्दोलन का अध्ययन करेंगे तभी यह सम्भव होगा कि रचयिता होने पर भी जिस आन्दोलन को मैं अद्वितीय समझता हूँ उसका कुछ ज्ञान अमरीका को हो जाय। कहने का तात्पर्य यह कि चर्खा हमारे आन्दोलन का संक्षिप्त रूप है। चर्खे में ही इसके सब प्रयोग केन्द्रीभूत हैं। मेरी समझ में गोला-बारूद का स्थान यही हो सकता है। क्योंकि यह करोड़ों भारतवासियों को आत्मावलम्बन और पाशा का सन्देश देता है। जब उनमें वास्तव में जाग्रति हो जायगी ते अपनी स्वतंत्रता [ ४८ ] को पुनः प्राप्त करने के लिए उन्हें छोटी सी उँगली उठाने की भी आवश्यकता न रहेगी। लूट-खसोट को सेवा के भाव में बदल देना ही वास्तव में चर्खे का सन्देश है। पश्चिम में इस समय उच्च स्वर से जो गीत गाया जा रहा है वह स्वार्थ का गीत है। मेरी यह इच्छा नहीं है कि मेरा देश भी इसी भाव या इसी गीत का अनुकरण करे।'

"मुझे हास्यास्पद बनाने के लिए मिस मेयो ने अपर के अंश का केवल प्रथम वाक्य दिया है और उसकी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्याख्या नहीं दी। आशा करता हूँ कि पूरे पैराग्राफ ने मेरे सन्देश के तात्पर्य को साफ और समझने योग्य बना दिया है......। अस्तु मेरा दावा है कि ऊपर पूरे पैराग्राफ में जो सन्देश उद्धृत किया गया है वह मेरे यंग इंडिया में लिखे उस लेख से, जिसे मिस मेयो ने उखाड़ने का प्रयत्न किया है, भिन्न नहीं है।"

इतना तो स्पष्ट हो गया कि मिस मेयो ने उस सन्देश को गढ़ा नहीं था। पर उसका अपराध जैसा पहले था वैसा ही अब भी बना है। क्योंकि उसने सन्देश को जो मिथ्या और हास्यास्पद रूप दिया वह उसके पूरे आविष्कार से किसी दशा में भी अधिक आदर के योग्य नहीं हो सकता। कोई समुचित उत्तर न होने से इस बार भी उसने बातें ही बनाई हैं। तिस पर भी वह इस कथा को 'व्यर्थ की बकवास' कह कर अपने 'लेख पर लिखी महात्मा गान्धी की समालोचना पर आगे विचार करने की आवश्यकता' से छुटकारा पा जाती है।

मदर इंडिया में वर्णित सेसून-अस्पताल की चीर-फाड़-सम्बन्धी कथा के विरोध में महात्मा गान्धी ने जो कहा था कि वह अत्यन्त असत्य मार्ग की ओर ले जानेवाली है, उस पर उसने ध्यान ही नहीं दिया। क्योंकि वह तो महात्मा गान्धी की समालोचना पर आगे विचार करने की आवश्यकता से छुटकारा पा गई थी।

और फिर केसर्लिंग की पुस्तक में टैगोर के लेख के साथ उसने जो मनमानी की उसका क्या उत्तर है? यदि मिस मेयो ने किसी प्रकार टैगोर के प्रति किये गये अपराध को सुधारने की चेष्टा की हो या अपनी उस मनमानी की रक्षा के लिए जो कि असम्भव है, कोई बात बनाई हो तो वह हमें उसके लेख में कहीं देखने को नहीं मिली।

  1. दी आइल्स आफ़ फियर (भय के द्वीप) की भूमिका। लन्दन संस्करण पृष्ठ ९––१०
  2. उस पत्र पर भारत के प्रधान कमिश्नर, सर ए० सी० चटर्जी, वायसराय की कार्यकारिणी सभा के भूतपूर्व सदस्य सर तेजबहादुर सप्रू, बम्बई गवर्नर की कार्यकारिणी सभा के भूतपूर्व सदस्य सर चिमनलाल सिटालवड, बिहार उड़ीसा के गवर्नर की कार्यकारिणी सभा के भूतपूर्व सदस्य श्रीयुत सच्चिदानन्द-सिंह, सर एम० एम० भोवानाग्री, श्रीयुत दुबे बैरिस्टर जो प्रिवी कौंसिल में मुक़दमें लड़ते थे, शाही कृषिकमीशन के सदस्य मिस्टर कमट, भारत-सचिव की कौंसिल के सब भारतीय सदस्य अर्थात् सर मुहम्मद रफ़ीक़, श्रीयुत एस० एन मलिक और डाक्टर परांजपे; इन सब महानुभावों के हस्ताक्षर थे। यह पत्र प्रसिद्ध व्यक्तियों का आवश्यक वक्तव्य था फिर भी टाइम्स ने इसे नहीं छापा। और रूटर की समाचार भेजने वाली प्रचारसमिति ने भी इसका बिलकुल प्रकाशन नहीं किया।
  3. मदर इंडिया पृष्ठ ३१६ (आमेर संस्करण)
  4. डुबोइस के किताब की (आक्सफोर्ड संस्करण) भूमिका पृष्ठ ६
  5. वही पुस्तकं पृष्ठ, १३
  6. * डुबोइस पृष्ठ, ८
  7. † डुबोइस की किताब के तीसरे (आक्सफोर्ड) संस्करण की सम्पादकीय भूमिका, पृष्ठ २६, २७
  8. ‡ वही पुस्तक, लेखक की भूमिका, पृष्ट, ९
  9. * विशप ह्वाइट हेड लिखित 'इंडियन प्राबलेम्स' (कान्सटेबुल) पृष्ठ, १७२
  10. * डुबोइस की पुस्तक, १८१७ ई० की छपी, पृष्ठ, २२०
  11. * तीसरा (आक्सफोर्ड) संस्करण, पृष्ठ, ३३९-३४०
  12. † मदर इंडिया पृष्ठ ७४
  13. डुबोइस, आक्सफोर्ड संस्करण पृष्ठ २७६
  14. मदर इंडिया पृष्ठ, १६५
  15. कर्टिज़। उसी पुस्तक से।
  16. मिस मेयो की पुस्तक के एक पक्षपाती ब्रिटिश समालोचक मिस्टर रश-ब्रुक विलियम्स को भी जो पहले भारत-सरकार के प्रकाशन-विभाग के एजेन्ट थे, ऐसे वक्तव्य के प्रत्यक्ष भद्देपन को स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा है। लन्दन के ऐसियाटिक रिव्यू में उनकी समालोचना छपी है।