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दुखी भारत/१ मिस मेयो के तर्क

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दुखी भारत  (1928)  द्वारा लाला लाजपत राय
१ मिस मेयो के तर्क
[ ४९ ]
दुखी भारत


पहला अध्याय

मिस मेयो के तर्क

मिस मेयो ने अपनी पुस्तक के प्रथम दो भागों में (पहले अध्याय से लेकर दसवें अध्याय तक में) हिन्दुओं के सामाजिक जीवन अर्थात् सामाजिक कुरीतियों का वर्णन किया है। इनमें अधिकांश कुरीति, जहाँ तक उनका अस्तित्व हो सकता है, वास्तव में भारत की सभी जातियों में समान रूप से पाई जाती हैं। पर उसने अपने द्वेषपूर्ण आक्षेपों के लिए केवल हिन्दुओं को ही चुना है। इन अध्यायों में भारत के पुरुषत्व और स्त्रीत्व के विरुद्ध अत्यन्त असावधानी और दुष्टता के साथ विचार किया गया है। कहीं-कहीं तो इन आक्षेपों में सत्य का केवल उतनाही सम्मिश्रण है जो सर्वथा असत्य से भी अधिक हानिकारक हो सकता है। कोई भारतीय, वर्तमान सामाजिक कुरीतियों का उसे कितना ही तीव्र ज्ञान क्यों न हो और उसके हृदय में मूल से सुधार करने की कितनी ही महान लगन क्यों न हो, किसी दशा में भी मिस मेयो द्वारा अङ्कित किये गये चित्र को अत्यन्त खींच-तान और असत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं स्वीकार कर सकता।

सच बात तो यह है कि मिस मेयो ने अपने हृदय में पहले ही से भारत के विरुद्ध असत्य धारणाएँ उत्पन्न कर ली थी। उन्हीं के आधार पर उसने अपना कार्य आरम्भ किया। विषय-प्रवेश में हम अपने यह [ ५० ] विश्वास करने का कारण बता चुके हैं कि यह 'असंरक्षित, अनियुक्त और असम्बद्ध' स्त्री-पत्रकार राजनैतिक आन्दोलन के उद्देश्य से अमरीका से आई थी। ब्रिटिश साम्राज्यवाद पर चूनाकारी करना उसका उद्देश्य था। और उसी उद्देश्य की पूर्ति में उसने एक लेखक के समस्त गुणों की अवहेलना कर दी। भारत की निरक्षरता, ग़रीबी और रुग्णावस्था के लिए वह सरकार को बिल्कुल दोषी नहीं ठहराती। उसकी समझ में इस समय भारतवर्ष में ऐब के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। और यह इसलिए कि हिन्दू या तो विषयी वन्यपशु हैं, या कुमार्ग-गामी, या दोनों।

आगे के अध्यायों में उसने भारत की सामाजिक दशा का जो चित्र खींचा है उसी का सविस्तर वर्णन है। मिस मेयो के जिस तर्क के अनुसार इस सम्बन्ध में भारत सरकार का कोई उत्तरदायित्व नहीं रह जाता, पहले हमें उसी पर विचार कर लेना चाहिए। क्योंकि वही उसके तर्क का मूल-मन्त्र है।

मदर इंडिया के २३ पृष्ठ पर उसने सर चिमनलाल सितलवाद और महात्मा गान्धी के वाक्य उद्धृत किये हैं। कहा जाता है कि नर्म दल के कट्टर नेता सर चिमनलाल ने कहा था कि 'इस देश के दुःख का कारण यही है कि यहाँ के निवासी स्वयं कोई नया मार्ग नहीं सीख सकते, पुरुषार्थी नहीं हैं और परिश्रम के कार्य्य नहीं सँभाल सकते।'

यह वाक्य महात्मा गान्धी के साप्ताहिक यंग इंडिया के एक वाक्य के पास रक्खा गया है। वह इस प्रकार है—'हम में जो असमर्थता, सोचने की कमी और मौलिकता का अभाव है उसके अपराधी हमारे अँगरेज़ शासक हैं। और हमारा ऐसा सोचना बिलकुल सही है।'

इसके पश्चात् एक और वक्तव्य उद्धृत किया गया है और उसका सम्बन्ध 'भारत के अन्य नेताओं से बताया गया है। वह वक्तव्य नीचे उद्धृत किया जाता है:—

"हमारे उत्साह इस प्रकार विफल क्यों हो जाते हैं? हमने अपनी पारस्परिक प्रतिज्ञाओं, त्यागपूर्ण भ्रातृभावनाओं और स्वतंत्रता के व्रत को इतनी शीघ्र क्यों व्यय कर दिया और क्यों विस्मरण कर दिया? स्वयं हमारा पुंसत्वही इतना कम टिकाऊ क्यों है? हमारे इतने शीघ्र थक जाने और और इतनी कम आयु में मर जाने का क्या कारण है?' फिर अपने ही आप [ ५१ ] इसके उत्तर में वे चिल्लाते हैं कि—'हमारा आध्यात्मिक अङ्ग घायल हो गया है और उसमें से रक्तस्राव हो रहा है। अभिमानी विदेशी की छाया ने हमारे सूर्य को ढक लिया है इससे हमारी आत्मा दूषित हो गई है। इसके अतिरिक्त कि राजनीति के मञ्च पर खड़े होकर हम अपने कठोर शासक की इतनी निन्दा करें कि वह भग जाय और कुछ नहीं किया जा सकता। कहीं कुछ नहीं। जब ब्रिटिश लोग यहाँ से चले जायँ, तब—उससे पहले नहीं—हम स्वाधीन पुरुष, स्वतन्त्रता की हवा में सांस लेते हुए अपनी प्यारी भारत-माता की साधारण आवश्यकताओं पर ध्यान दे सकते हैं।"

अब मिस मेयो का व्यङ्गपूर्ण उत्तर देखिए:—

भारत में ब्रिटिश शासन का चाहे वह भला हो, चाहे बुरा, चाहे उदासीन, ऊपर लिखी गई अवस्थाओ से कोई सम्बन्ध नहीं है। शिथिलता, असमर्थता, स्वयं कुछ न सोचने की कमी, मौलिकता, स्थिर शक्ति, और स्थायी राजभक्ति का अभाव, उत्साह-हीनता और स्वयं जीवन-बल का ह्रास आदि अवगुण भारतवासियों में नये नहीं हैं। इनका सम्बन्ध अत्यन्त प्राचीन काल के इतिहास से चला आ रहा है। ये सब भारतवासियों की इस दशा को इसी प्रकार बनाये रहेंगे और दिनों दिन बढ़ते जायँगे जब तक कि भारतवासी इनके कारणों को स्वीकार न कर लेंगे और स्वयं अपने हाथों से इन्हें निर्मूल न कर देंगे। इसमें सन्देह नहीं कि भारतवासियों की आत्मा और शरीर दोनों को दासता की ज़ञ्जीर ने जकड़ रक्खा है। पर वे स्वयं अपनी ज़ञ्जीरों को चिपटाये हुए हैं। जो उन्हे तोड़ने का प्रयत्न करे उसे मारने दौड़ते हैं। उन्हें कोई स्वतन्त्र नहीं कर सकता। उन्हीं के हृदय में कोई नवीन उत्साह पैदा हो तभी वे स्वतन्त्र हो सकते हैं। अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के लिए बाहरी लोगों को दोषी ठहराकर वे अपने आपको धोखा दे रहे हैं और अपनी मुक्ति के दिन को दूर ठेल रहे हैं।

"बारह वर्ष की एक बालिका को लीजिए। हाड़ और रक्त में एक दयनीय शरीर का वह नमूना मात्र है। वह निरक्षर है। मूर्ख है। स्वास्थ्यपूर्ण जीवन बनाने के लिए उसे किसी प्रकार की शिक्षा भी नहीं मिली। जितनी जल्दी हो सके उस पर मातृत्व का भार लाद दीजिए। उसके दुर्बल शिशु को अत्यन्त विषयवासना के बीच में पालिए जिससे उसकी नन्हीं शक्ति दिनों दिन घटती जाय। उसे खेल-कूद से दूर रखिए। उसका स्वभाव ऐसा बना दीजिए कि वह ३० वर्ष की अवस्था तक पहुँचते पहुँचते बिलकुल निकम्मा वृद्ध बन जाय। और तब क्या आप पूछेंगे कि उसके पुरुषत्व को किसने खोखला कर दिया? [ ५२ ]"एक बड़ी जन-संख्या को लीजिए जो मुख्यतः देहात में बसी हो, निरक्षर हो और अपनी निरक्षरता को पसन्द करती हो। इस समाज की किसी स्त्री को बिना अध्यापिका नियुक्त किये इसे आरम्भिक शिक्षा देने का प्रयत्न कीजिए। क्योंकि यदि आप किसी स्त्री को अध्यापिका नियुक्त करेंगे तो सर्व-साधारण की आंखों के सामने उपस्थित कर उसके सर्वनाश का बीज बोएँगे। तब क्या आप पूछेंगे कि उस जाति में इतना धीरे धीरे शिक्षा का प्रचार क्यों हो रहा है?

"इस प्रकार के वायुमण्डल में जिन शरीरों और मस्तिष्कों की रचना हुई और पालन-पोषण हुआ उनको लीजिए। तब क्या आप यह प्रश्न कर सकते हैं कि मृत्यु-संख्या इतनी अधिक क्यों है और लोग इतने ग़रीब क्यों हैं?

"भारत के राजसिंहासन पर चाहे ब्रिटिश बैठें, चाहे रूसी, चाहे जापानी। चाहे देशी नरेश सारे देश को आपस में बाँट लें और प्राचीन राजसत्ता को पुनर्जीवित करें। या चाहे जो शासन-प्रणाली वर्तमान है उससे अधिक पूर्ण शासन स्थापित किया जाय पर यदि कोई शक्ति भारतवासियों को स्वाधीनता की ओर जिस गति से वे जा रहे हैं उससे अधिक तेज़ी से लेजा सकती है तो वह उन्हीं की शक्ति हो सकती है। और वह शक्ति उन्हें तब प्राप्त हो सकती है जब वे जो उनके दोष दिखावें उनके दोष ढूँढ़ने में और अपना अपराध दूसरों के सिर मढ़ने में समय नष्ट न करें बल्कि स्वयं अपने शरीर और आत्मा के सुधार करने में पूर्ण निश्चय के साथ लग जायँ।"

मिस मेयो के साथ कोई अन्याय न हो इस विचार से हमने उसके लेखों को ऊपर सविस्तर उद्धृत कर दिया है।

अच्छा, अब इस प्रकार का तर्क करना तो बिल्कुल ठीक प्रतीत होता है कि हम भारतवासियों ने आपस की फूट और मूर्खता से विदेशी शासन को निमंत्रित किया है। इसलिए यदि उस शासन ने हमारी शारीरिक बाढ़ रोक दी है, हमें पुरुषत्वहीन बना दिया है, हमें स्वतन्त्र विचार करने के अयोग्य नहीं रखा, हमारी उन्नति और राष्ट्रीय पूर्णता का मार्ग बन्द कर दिया है तो हमें अपने ही आपको इसके लिए अपराधी ठहराना चाहिए। यदि मिस मेयो का तर्क इस प्रकार का होता तो हम इसके वेग को स्वीकार कर लेते। वास्तव में यह तर्क इतना प्रबल है कि इसी कारण हम इस [ ५३ ] विदेशी शासन के जुए को उतार फेंकना चाहते हैं और स्वतन्त्र होकर एक राष्ट्र की भांति अपना पूर्ण विकास करना चाहते हैं।

परन्तु मिस मेयो के तर्क बिलकुल दूसरे प्रकार के प्रतीत होते हैं। उसकी सम्मति में राजनैतिक परिस्थिति का जातीय अयोग्यता और असमर्थता से कोई सम्बन्ध नहीं। क्या किसी राष्ट्र में स्वतन्त्र विचार और पुरुषार्थ के कार्य्य राजनैतिक परिस्थिति की कोई परवाह नहीं करते? क्या साक्षरता, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय पूर्णता पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता जो व्यवस्थापन और शासन का यन्त्र चलाते हैं। क्या ये बातें एक-मात्र सामाजिक रीतियों पर ही निर्भर हैं जैसा कि मिस मेयो हम लोगों को विश्वास दिलाना चाहती है। इसके विपरीत क्या देश में प्रचलित राजनैतिक अवस्थाओं और लोगों की साक्षरता-द्वारा सामाजिक रीतियाँ भी अधिकांश रूप में निश्चित नहीं की जाती?

ये प्रश्न इस विषय की जड़ तक पहुँचते हैं। क्योंकि हमारी समझ में भारतीय समस्या राजनैतिक एवं आर्थिक समस्या पहले है और सामाजिक समस्या बाद को।

अपने कार्य्य में सहायक होने के लिए मिस मेयो ने पहले तो कुछ ऐसी बातों का होना सोच लिया है जो बिलकुल हैं ही नहीं। दूसरे वह अपनी कल्पना से उन्हें 'अति प्राचीन इतिहास' में भी देखती है जिससे कि वह सर्वथा अनभिज्ञ है। तीसरे वह किसी जाति के सम्पूर्ण जीवन पर, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन पर भी आर्थिक और राजनैतिक दासता के प्रभावों को बिलकुल नहीं देखती।

मिस सेयो के तर्क ऊपर ही ऊपर काम करते हैं। और राजनैतिक समस्या को वह इस प्रकार छोड़ देती है। मिस मेयो की ही भांति स्त्रियों का लक्ष्य करके कदाचित् प्रसिद्ध मनोविज्ञान-वेत्ता प्रोफ़ेसर मस्टरवर्ग ने अमरीका के सहानुभूतियुक्त पर निष्पक्ष अध्ययन में वहाँ की स्त्रियों के सम्बन्ध में लिखा है[१] कि—'अमरीका की स्त्रियां जिन्होंने कदाचित् ही कुछ [ ५४ ] शिक्षा प्राप्त की हो किसी भी विषय पर, बिना अपने किसी निश्चित मत के व्यर्थ विचार करने बैठ जाती हैं। स्त्रियों में इस ज्ञानाभाव की अहंमन्यता से उनकी आत्मा का बहुत गहराई तक परिचय मिलता है। और इससे उस भयङ्करता का भी परिचय मिल जाता है जो बौद्धिक जीवन में स्त्रियों की प्रधानता से उपस्थित हो सकती है।

मिस मेयो जानना चाहती है कि एक बारह वर्षीय कन्या 'हाड़ और रक्त में एक दयनीय शरीर का नमूना' क्यों है? इसके कारण हो सकते हैं:—(क) पैतृक संस्कार (ख) अपर्याप्त भोजन (ग) जीवन की अस्वास्थकर स्थिति (घ) निरक्षरता और अज्ञान। केवल (क) को छोड़कर क्या कोई कह सकता है कि (ख) (ग) और (घ) पर राजनैतिक परिस्थिति का प्रभाव नहीं पड़ता। यह एक मानी हुई बात है कि निर्बल माता पिताओं से उत्पन्न बच्चे भी यदि बाद में सावधानी से पाले जायँ तो अपनी पैतृक दुर्बलता की कमी बहुत कुछ पूरी कर सकते हैं। यदि पैतृक दुर्बलता पर राजनैतिक दासता और आर्थिक सङ्कट से उत्पन्न होनेवाली असमर्थता की भी मार हो तो ऐसे बच्चों की ईश्वर ही रक्षा करे। राष्ट्र का यह देखना कर्तव्य है कि प्रत्येक नवजात शिशु की भली भांति देख-रेख की जाती है और यदि माता-पिता इतने निर्धन हों कि स्वस्थ वायुमण्डल में उसका पालन-पोषण न कर सकें और उसको नागरिक के कर्तव्यों के योग्य न बना सकें तो पूरा उत्तरदायित्व राष्ट्र का हो जाता है। इसी सिद्धान्त को लेकर असमर्थ माता पिताओं से उत्पन्न बच्चों के लिए इस युग में राष्ट्रीय धाई-गृहों की स्थापना हुई है। और सब बच्चों को उनके माता पिताओं के सम्बन्ध में बिना कुछ विचार किये निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए राष्ट्र की ओर से सार्वजनिक स्कूल खोले गये हैं। स्वतन्त्र और उन्नतिशील देशों में देखने में आता है कि बच्चों को मज़दूरी नहीं करने दिया जाता, सब नागरिकों को अनिवार्य्य रूप से स्वास्थ्य-सम्बन्धी शिक्षा दी जाती है। जिन बालकों को घर पर अपर्याप्त भोजन मिलता है उन्हें सरकार या नगर-समितियों की ओर से उचित भोजन दिया जाता है, समय समय अनिवार्य्य रूप से स्वास्थ्य-परीक्षा होती है और बेकारी तक दूर करने के [ ५५ ] लिए प्रबन्ध किया जाता है। स्वतन्त्र रियासतें नशेबाज़ी दूर करने, जननेन्द्रिय के रोगों की चिकित्सा करने, विवाह का नियन्त्रण करने और जनसंख्या-वृद्धि रोकने के लिए इतना कष्ट क्यों उठा रही हैं, संसार के भिन्न भिन्न राष्ट्रों ने स्वास्थ्य-विभाग की स्थापना क्यों की है? ब्रिटेन में सरकार ने सबको दूध पहुँचाने का काम अपने हाथ में क्यों ले लिया है? सर्व-साधारण के लिए उसने अच्छे और स्वच्छ मकान बनाने का काम अपनी ही देख-रेख में क्यों रखा है? यदि मिस मेयो की धारणाएँ ठीक हैं तो यह सब क्यों किया गया है?

यदि इन उत्तरदायित्व-पूर्ण कार्य्यों को अपने ज़िम्मे लेना संसार के राष्ट्रों का कर्तव्य था तो भारत-सरकार ने इनसे मुँह क्यों मोढ़ा? इसका उत्तर स्पष्ट है। भारत-सरकार विदेशी सरकार है। भारतवर्ष में उसका मुख्य उद्देश्य यह है कि वह इस देश से अधिक से अधिक लाभ उठावे और साम्राज्य के हित के लिए इसकी सब प्रकार की शक्तियों को अपने काम में लावे। भूतपूर्व भारतमन्त्री सर आस्टन चम्बर लेन ने 'सेवाय होटल में २६ मार्च, १९१७ ई॰ को व्याख्यान देते हुए जब कहा था कि भारतवर्ष शेष साम्राज्य का लकड़ी चीरनेवाला और पानी भरनेवाला बनकर रहना पसन्द न करेगा और उसे करना भी न चाहिए तब यह बात स्पष्ट हो गई थी कि उस समय तक भारतवर्ष साम्राज्य के लिए एक लकड़ी चीरनेवाले और पानी भरनेवाले से बढ़ कर नहीं था। उसी दशा में वह आज भी है। भारतवर्ष में ब्रिटिश शासन का सम्पूर्ण आर्थिक इतिहास इस बात का साक्षी है।[२]

इस बात के प्रकट हो जाने पर कि गत २०० वर्षों से अपने साम्राज्य के हित के लिए ब्रिटिश भारत को चूस रहा है, भारत की सामाजिक अधोगति, उसके [ ५६ ] बेटों-बेटियों में रोग-वृद्धि, उत्साह की कमी और स्वतन्त्र विचार-शक्ति के अभाव का कारण बड़ी सरलतापूर्वक समझाया जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति यह बात जानता है, कदाचित् मिस मेयो भी, कि सामाजिक राज-नियमों ने ग्रेट ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, अमरीका और जापान में गत ७५ वर्षों में ही क्या परिवर्तन उपस्थित कर दिया? बालपन या युवापन आदि के जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं जो कानून और राजकीय आज्ञाओं के आक्रमण से बचा हो। केवल राष्ट्रीय शासन ही ऐसा है जो राष्ट्र के साथ मिलकर चलता है। दोनों के स्वार्थ एक दूसरे पर इतने निर्भर रहते हैं कि वे एक रूप हो जाते हैं। प्राचीन भारत में भी राज्य को सामाजिक जीवन और जन-साधारण के स्वास्थ्य से बड़ा सम्बन्ध रखना पड़ता था। ऋषियों ने हिन्दू धर्मशास्त्रों और स्मृतियों में सार्वजनिक शिक्षा, विद्यार्थी-जीवन, सार्वजनिक और व्यक्तिगत स्वास्थ्य-सुधार और विवाह आदि की खूब विवेचना की है।

आज दिन प्रत्येक राजनीतिज्ञ और नेता नागरिकों को सब प्रकार से योग्य बनाने के राजकीय उत्तरदायित्व को स्वीकार करते हैं। अब यह बात इतनी स्पष्ट हो गई है कि इस विषय पर अधिक लिखना और प्रमाण देना व्यर्थ है। पर मिस मेयो के तर्कों के लिए यह प्रश्न बड़े काम का है। इस बात को ध्यान में रखते हुए यहाँ कुछ आधुनिक लेखकों की सम्मतियाँ दे देना अनुचित न होगा।

अमरीका के समाज-शास्त्र के पंडित प्रोफ़ेसर स्काट नियरिंग अपनी एक सर्वोत्तम पुस्तक "सोशल एडजस्टमेंट" में लिखते हैं[३]:—

"एक बड़ी जाति की सामाजिक कुरीतियों के दूर करने का (एक-मात्र) उपाय यही है कि उनके विरुद्ध (कानून के रूप में) जनता के मत का प्रयोग किया जाय। बड़े समूहों में जन-मत का प्रभाव थोड़े ही समय तक पड़ सकता है पर स्थायी सुधार केवल कानून द्वारा ही सम्भव है। [कोष्ठक के शब्द हमारे हैं]

इँगलैंड के उदार दल के एक बड़े विचारशील सदस्य श्रीयुत एल॰ टी॰ हाब हाउस ने सामाजिक मामलों में राजकीय उत्तरदायित्व के वर्तमान [ ५७ ] विचारों की उत्पत्ति के कारण बतलाये हैं। अपनी एक पुस्तक में उन्होंने यह बतलाया है कि राज्य के अधिकार बढ़ने के साथ साथ किस प्रकार जन-साधारण के प्रति उसके उत्तरदायित्व भी बढ़ गये हैं; और उन सिद्धान्तों की विवेचना की है जिनको लेकर सर्व-साधारण को काम देने और वृद्धावस्था में पेन्शन आदि द्वारा उनके निर्वाह के प्रबन्ध करने का उत्तरदायित्व राज्य को अपने सिर पर लेना पड़ा है। उन्होंने गरीबों के लिए कानूनों की जांच-समिति के सामने अल्पसंख्यक दल की गवाही का उल्लेख किया है, जिसमें इस बात की शिफ़ारिस की गई थी कि 'श्रमसमितियां स्वयं राज्य का एक अंङ्ग बनकर लोगों को काम दिलाने की व्यवस्था करें और काम के अभाव में प्रत्येक स्वस्थ और कामकाजी पुरुष या स्त्री के निर्वाह का समुचित प्रबन्ध करें।' आधुनिक राज्य के कर्तव्यों के सम्बन्ध में प्रोफ़ेसर हाबहाउस लिखते हैं :—

"स्वेच्छापूर्वक आलस्य में लिप्स मनुष्य को समाज का भार बनकर रहने की आज्ञा न होनी चाहिए। उसका व्यर्थ के कामों के लिए इधर-उधर फिरना या भीख माँगना ठीक नहीं है। उसे अपने स्त्री-बच्चों को चिथड़े पहनाने, बुरे घरों में रखने और अपर्याप्त भोजन देने से रोकना ही चाहिए। बच्चों की देखभाल अवश्य होनी चाहिए। और माँ, यदि वह उनके प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर रही है तो वह एक स्त्री का काम कर रही है और बिना किसी प्रकार का बदला चुकाने की बात सोचे अपने निर्वाह का दावा कर सकती है। और वह मनुष्य नियंत्रणपूर्वक शिक्षा देने का पात्र है। उसे काम सीखने का कोई क्षेत्र मिलना चाहिए। वहाँ वह काम सीखे और जब तक औद्योगिक प्रतिद्वन्दिता का भार वहन करने की शारीरिक और मानसिक योग्यता प्राप्त न कर ले, वहां से निकलने न पावे।"

इसी वेग में वे भिन्न भिन्न प्रकार के और भिन्न भिन्न अवस्था के लोगों के प्रति राज्य के कर्तव्यों की व्याख्या करते हैं। उनकी विवेचना का सारांश यह है कि 'अब राज्य ने, जीवन के बड़े बड़े विभागों का संयोजक बनकर, अपना काम बहुत बढ़ा लिया है। इनमें सबसे मुख्य काम सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था करना है । वे कहते हैं—'जो पुराने लोग अभी जीवित हैं उनके जीवन-काल में शिक्षा के सम्बन्ध में ग़रीबों के लिए कुछ हज़ार रुपये लगा देने से ही राज्य के कर्तव्यों का भलीभांति पालन हो जाता था। मेरे जीवन[ ५८ ] काल में अब तीन चौथाई लोगों की आरम्भिक शिक्षा का उत्तरदायित्व राज्य ने स्वीकार कर लिया है। आरम्भिक शिक्षा से यह माध्यमिक शिक्षा तक पहुँचा है। और विश्वविद्यालयों के ढङ्ग की शिक्षा में भी आर्थिक तथा अन्य प्रकार की सहायता देने लगा है। प्रोफसर हाबहाउस का यह कहना बिलकुल ठीक है कि आज-कल राज्य पर जो भार बढ़ गया है उसके अधिकांश भाग को प्राचीन पंडित 'पैतृक उत्तरदायित्व का आवश्यक कार्य्य' मानते हैं। आज 'वह कौटुम्बिक स्वतंत्रता अनिवार्य्य शिक्षा के रूप में बदल गई है।' '१८५० या १८६० के शिक्षा-मन्त्री के आय-व्यय-पत्र की तुलना वर्तमान शिक्षा-मन्त्री के आय-व्यय-पत्र के साथ की जाय तो राज्य के कर्तव्यों के विस्तार का इससे अच्छा उदाहरण और नहीं दिया जा सकता।'

ऐतिहासिक प्रमाण तो स्पष्ट ही है। यदि कोई १८७० के पूर्व की, या कुछ उससे भी पहले अर्थात् १८३० के सुधार कानूनों के बनने से पहले की इँगलैंड की धार्मिक, सामाजिक, स्वास्थ्य सम्बन्धी, बौद्धिक और औद्योगिक स्थिति का अध्ययन करे तो ज्ञात होगा कि उस समय वहाँ के निवासी वर्तमान भारतवासियों की अपेक्षा कहीं अधिक गिरी दशा में थे। निरक्षरता का साम्राज्य था। रोग और दरिद्रता का चारों तरफ़ दौरदौरा था। कारखानों में स्त्री-बच्चों की दशा वर्णनातीत थी और किसी प्रकार के धर्माचरण का नाम निशान नहीं था। १८७० के पूर्व सार्वजनिक शिक्षा की बड़ी शोचनीय अवस्था थी। १९ वीं सदी में इँगलेंड की सफलताओं का वर्णन करते हुए इतिहासवेत्ता श्रीयुत जी॰ एम॰ ट्रिवेलियन लिखते हैं[४]:—

"महारानी विक्टोरिया के शासन-काल के अन्त में नये राष्ट्रीय सङ्गठन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि एक ओर तो भलाई के सार्वजनिक उद्योगों का राजकीय शासन से बहुत गहरा सम्बन्ध हो गया और दूसरी ओर स्थानिक तथा केन्द्रिक शासन आपस में मिल गये। पार्लियामेंट और स्थानिक शासन ने जनता की आवश्यकताओं पर ध्यान देना आरम्भ किया और केन्द्रिक शासन [ ५९ ] ने शिक्षा, चिकित्सा, सफाई और ऐसे ही जीवन के सैकड़ों सार्वजनिक कामों में बुद्धिमानी के साथ अधिकाधिक योग देना आरम्भ किया। इस प्रकार स्थानिक संस्थाओं की आर्थिक सहायता, श्रम और जीवन के राजकीय निरीक्षण, औद्योगिक विश्वास-सत्र और आधुनिक शिक्षण पद्धति आदि के द्वारा राजकीय सहायता, बल-प्रयोग और नियन्त्रण के नियमों की सृष्टि हुई।

पुनश्च:—

"मनुष्य-धर्म, प्रजातन्त्रवाद और शिक्षा में उन्नति होने से तथा औद्योगिक रीतियों में नये परिवर्तन के अनुसार दफ्तरों तथा कारखानों में अधिक संख्या में स्त्री-पुरुषों के साथ साथ काम करने से स्त्री-पुरुषों में बराबरी का भाव पैदा हुआ। स्त्री-शिक्षा (जिसकी ओर पहले बिलकुल ध्यान नहीं दिया जाता था) दोही पीढ़ियों के पश्चात् पुरुषों की शिक्षा के साथ तुलना करने योग्य हो गई। कानून की दृष्टि से कुटुम्ब में स्त्रियों का स्थान बदल गया तथा व्यवहार और जनता की सम्मति में उससे भी अधिक बदल गया। (कोष्टक के वाक्य हमारे हैं)[५]

योरप के कुछ देशों में तो ग्रेट ब्रिटेन से भी पहले ये कार्य्य आरम्भ हुए थे। जर्मनी ने १७१७ ई॰ में अनिवार्य्य शिक्षा का कानून पास किया था। चार्ल्स पियर्सन ने राष्ट्रीय जीवन और सदाचार[६] पर एक पुस्तक लिखी है। उसमें वे ब्रिटिश उपनिवेशों की, राज्य-शासन को अधिकाधिक सामाजिक कर्तव्य सौंपने की, प्रवृत्ति पर विचार करते लिखते हैं :—

"यह स्मरण रखना चाहिए कि प्रत्येक योरपीय राष्ट्र ने—जिसमें जर्मन जाति से उत्पन्न राष्ट्र भी शामिल हैं इन्हीं सिद्धान्तों पर सदियों से काम किया है। और खास इँगलैंड में भी लेज़िज़ फेयर पद्धति का पहले पहल बलपूर्वक प्रयोग किया गया था।"

प्रत्येक राज्य और प्रत्येक राजनीतिज्ञ आज इन सिद्धान्तों को स्वीकार करते हैं। व्यक्तिवादी, समाजवादी, शान्तिवादी और साम्यवादी सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि राज्य का यह देखना कर्त्तव्य है कि उसकी जनता निरक्षर न हो। समृद्धिशाली संयुक्त राज्य (अमरीका) भी इस सिद्धान्त को [ ६० ] उतना ही मानता है जितना उसका दरिद्र पड़ोसी मेक्सिको। और जापान में इसका उतना ही मान है जितना पश्चिमीय देशों में। इसमें सन्देह नहीं कि स्वतन्त्र भारत भी इस सिद्धान्त से विमुख न होगा। पश्चिमीय देशों की जनता को जैसे निरक्षरता और मूर्खता से प्रेम नहीं है वैसे ही भारत को भी नहीं है। पर यह स्वीकार करना पड़ेगा कि पश्चिम की भाँति बिना अनिवार्य्य शिक्षा हुए सम्पूर्ण भारत शिक्षित नहीं हो सकता।


  1. दी अमेरिकन्स, पृष्ठ ५८७
  2. आनेवाले अध्यायों में मुझे इसका उल्लेख करने की आवश्यकता पड़ेगी, पर विशेष जानकारी के लिए पाठक मेरी लिखी इँग्लेंड्स डेब्ट टू इंडिया (इँग्लैंड पर भारत का ऋण) नामक पुस्तक देखें। वह पुस्तक थी डब्लू॰ हूबक, न्यूयार्क ने १९१७ में प्रकाशित की थी।
  3. सोशन एडजस्टमेंट (मैकमिलन, १९११) पृष्ठ ३२३
  4. इँगलैंड का इतिहास, जी॰ एम॰ ट्रिवेलियन-कृत लांगमैन्स १९२६, पृष्ठ ६१७।
  5. वही पुस्तक, पृष्ठ ६१८
  6. नेशनल लाइफ़ एंड कैरेक्टर, (मैकमिलन कं॰ १९१३) पृष्ठ, १९