दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग/ बारहवां परिच्छेद

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दुर्गेशनन्दिनी द्वितीय भाग  (1918) 
द्वारा बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, अनुवाद गदाधर सिंह

[ ४८ ]गार में रहने की प्रार्थना तुम से की थी।

उ॰। राजकुमार! कतलूखां यदि आपको कारागारही में रखकर तृप्त हो तो बड़ी बात।

युवराज ने भौं टेढ़ी करके कहा 'वीरेन्द्रसिंह की दशा मेरी भी होगी, और क्रोध के मारे आँखैं लाल हो गयीं।

उसमान ने कहा 'मैं जाता हूँ। अपना काम म कर चुका कतलूखां की आज्ञा आपको दूसरे दूत द्वारा ज्ञात होगी।

थोड़ी देर के अनन्तर वह दूत आया। उसका वेष सैनिक पुरुष की भांति था, पर साधारण सिपाहियों से कछ बढ़कर बोध होता था। उसके सङ्ग और चार सिपाही थे। राजपुत्र ने पूछा! 'तुम क्यों आये?'

सैनिक ने कहा 'आप को दूसरी कोठरी में चलना होगा' 'मैं प्रस्तुत हूँ चलो' कहकर राजपुत्र दूतों के पीछे हो लिये।

 

बारहवां परिच्छेद।
अलौकिक आभरण।

महा उत्सव उपस्थित। आज कतलूखां का जन्मदिन है। दिन में सब लोग राग, रङ्ग, नृत्यगान भोजन पान, इत्यादि में नियुक्त थे और रात को इससे भी अधिक दुर्ग में दीपावली दान होने लगी, सैनिक, सिपाही, उमरा, नोकर, चाकर, धनी, रंक, मतवाले, नट, नर्तक, नायक, नायिका, बजनिया, मानमती, माली, गन्धी, तमोली, हलवायी, ठठेरे, कसरे इत्यादि से दुर्ग परिपूर्ण हो गया। जिधर देखो उधर दीपमाला, गाना बजाना इतर, पान, पुष्प, बाजी, वेश्या देख पड़ते थे। महल में इससे [ ४९ ]भी धूमधाम था। नवाब के बिहार गृह की अपेक्षा तो स्थिर था परंतु उससे विशेष प्रमोदजनक था। कोठरी में सुगंधित तैल संयुक्त दीप जल रहे थे और दीवार में, झरोखों में स्तम्भों पर, साया पर, आसन पर, युवतियों के शरीर पर जहाँ देखो तहाँ पुष्प और दीप दृष्टि गोचर होता था। सुगंध के मारे चतुर्दिक मह मह हो रहा था। दासीगण स्वेच्छानुसार हेममय नील, लोहित, श्याम रङ्ग के पट वस्त्र धारण किये हुए निर्भय भवन में झमकती गिरती थीं, जो जहाँ जिस काम पर नियुक्त थी अपनी स्वामिनी की सेवा में उन्मत्त फिरती थी। आज नवाब साहेब बिहार गृह में आकर सब के सङ्ग क्रीड़ा करेंगे और जिसको जो अभिष्ट होगा उसको वैसा पुरस्कार देंगे। कोई अपने भ्राता को सेवा में नियत कराने की लालसा से केश विन्यास कर रही है। कोई अपनी दासी की संख्या बढ़ाने की आशा करके केश को कुच पर्यन्त छिटका रही है। कोई नव प्रसूत पुत्र जन्म सम्पत्ति प्राप्त हेतु शरीर को मल मल कर पाका कर रही है। कोई किसी सुन्दरी के समान नव भूषण पाने की कामना कर आँखों में सुरमा लगा रही है। एक ललना ने अपनी दासी को 'पेशवाज' पहिनाने में असावधानता देख उसको एक थप्पड़ मारा। कोई मदन मद मतवाली गर्व पूर्वक बैठी कंघी करवा रही थी कि दो चार बाल टूट पड़े देखतेही कोप करके नागिनि की भांति फुफकारने और दासी को अपवाद कहने लगी।

पुष्प वाटिका में स्थल कमलनी की भांति एक कामिनी केश विन्यास समापन करके इतस्ततः भ्रमण कर रही थी। आज किसी को कहीं जाने का निषेध नहीं था। जहाँ की जो सुन्दरता थी विधना ने सब एकत्र किया था और जहाँ का जो अलंकार था कतलू ने सस साज दिया था जिसपर भी इस [ ५० ]स्त्री मुख पर सौन्दर्य वा अलंकार के गर्व का कोई चिन्ह नहीं दरसता था। हंसी कुछ भी नहीं थी। आनन की कांति भी गम्भीर और स्थिर थी और आँखों से कठोरपन बरसता था।

इसी प्रकार भ्रमण करते २ बिमला परम शोमामय भवन में घुसी और पीछे से द्वार बंद कर दिया। इस महोत्सव के दिन भी उसमें केवल एक सलिन ज्योति दीपक जलता था। एक कोने में एक पलंग पर बिछौने के कोने से मुँह ढांपे एक स्त्री पड़ी थी। बिमला पट्टी के समीप खड़ी होकर मीठे स्वर से बोली 'मैं आई हूँ।'

सोने वाली ने चिहुंक कर मुँह खोला, बिमला को‌‌ चीन्ह कर उठ बैंठी किन्तु कुछ बोली नहीं।

बिमला ने फिर कहा तिलोत्तमा। 'मैं आई हूँ।'

इसपर भी तिलोत्तमा ने कुछ उत्तर नहीं दिया वरन बिमला के मुँह की ओर घूरती रही।

अब वह रूप तिलोत्तमा का नहीं रहा। शरीर दुबला हो गया, मुँह सूख गया, एक मैली लंगोटी लगाये पड़ी थी‌। उङ्गाली में एक छल्ला भी नहीं था केवल प्राचीन अलंकार के चिन्ह जहाँ तहाँ दिखाई देते थे।

बिमला ने फिर कहा 'मैं अपने कहने के अनुसार आई हूँ तु बोलती क्यों नहीं?'

तिलोत्तमा ने कहा 'जो कहना था सो सब कह चुकी अब क्या कहूं?'

बिमला ने तिलोत्तमा की बोली से जाना कि वह रोती है। मस्तक पकड़ कर उठाया और आँसू पोंछने लगी। आँचल सब भींग रहा था और विछौना भी गीला होगया था।

बिमला नें कहा 'इस प्रकार दिन रात रोती रहेगी तो कब तक जीयेगी?' [ ५१ ]

तिलोत्तमा ने कहा 'इतने दिन जी कर क्या किया और अब जी कर क्या करूँगी।'

बिमला भी रोने लगी और थोड़ी देर में ठंढी सांस लेकर बोली 'अब क्या उपाय करना चाहिये?'

तिलोत्तमा ने बिमला के अलंकार की ओर देखकर कहा 'उपाय करके क्या होगा?'

बिमला ने कहा 'बेटी! लड़कपन नहीं करते। अभी क्या तुने कतलूखां को नहीं जाना अपने अनावकाश के कारण वा हमारे शोक निवारण के कारण उस दुष्ट ने अभी तक क्षमा किया था। आज तक उसकी अवधि थी। यदि आज हमलोगों को नृत्यशाला में न देखेगा तो न जाने क्या करेगा। तिलोत्तमा ने कहा 'अब और क्या करेगा?'

बिमला ने कुछ स्थिर होकर कहा 'तिलोत्तमा! आशा क्यों छोड़ती है? जबतक शरीर में प्राण है तबतक धर्म्म प्रतिपालन करूँगी।'

तिलोत्तमा ने कहा 'तो माता? यह अलंकार उतार के फेंक दे। इनको देखकर मुझे शूल होता है।'

बिमला ने मुसकिरा कर कहा 'बेटी! जब तक मेरा सब आभरण न देखले तब तक मेरी निंदा न करना।' और वस्त्र के नीचे से एक खरतर छूरी निकाली। दीप की ज्योति पड़ने से उसकी प्रभा बिजलीसी चमकी और तिलोत्तमा डर गई। उसने पूछा 'यह तूने कहाँ पाया बिमला ने कहा' कल महल में एक नई दासी आई है तूने उसको देखा है?'

ति॰। देखा है। आसमानी आई है।

बि॰। उसी के द्वारा इसको अभिराम स्वामी के यहाँ से मंगाया है। [ ५२ ]

तिलोत्तमा चुप रही और उसका हृदय काँपने लगा। फिर बिमला ने पूछा 'तू आज यह अपना वेष न त्यागेगी!'

तिलोत्तमा ने कहा 'नहीं।'

बि॰। नाचने गाने न जायगी?

ति॰। नहीं।

बि॰। तो क्या तू बच जायगी?

तिलोत्तमा रोने लगी। बिमला ने कहा 'स्थिर होकर सुन, मैंने तेरे छूटने के निमित्त उपाय किया है।'

तिलोत्तमा आग्रह से बिमला के मुँह की ओर देखती रही कि उसने उसमान वाली अंगूठी निकाल कर उसके हाथ में दिया और बोली 'इस अंगूठी को अपने पास रख, नाच घर में न जाना, आधी रात के इधर तो यह उत्सव समाप्त नहीं होगा तब तक मैं पठान को वहलाये रहूँगी मैं तेरी माता हूँ यह जान कर वह तुझको मेरे सामने न बुलावेगा। आधी रात को महल के द्वार पर जाना वहाँ एक मनुष्य तुझको ऐसीही अंगूठी दिखावेगा। निशंक तू उसके सङ्ग चली जाना, जहाँ कहेगी वहाँ वह तुझको पहुँचाय देगा। तू उससे कहना कि मुझको अभिराम स्वामी के कुटी में ले चलो।

तिलोत्तमा को सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ और आनंद भी हुआ। थोड़ी देर कुछ कह न सकी फिर बोली 'यह तू क्या कहती है यह अंगूठी तुझको किसने दिया?'

बिमला ने कहा 'यह भारी कथा है फिर कभी अवकाश में तुझसे कहूँगी। अभी मैंने जैसा कहा है वैसाही करना।'

तिलोत्तमा ने कहा 'तेरी क्या दशा होगी तू कैसे बाहर आवेगी?'

बिमला ने कहा 'मेरी चिंता न कर मैं कल प्रात को आकर [ ५३ ]तुझसे मिलूंगी।'

इस प्रकार तोष जनक बातें कहकर बिमला ने तिलोत्तमा को समझाया किंतु उसने तिलोत्तमा के हेतु जो अपना जाना बंद रक्खा इसका भेद तिलोत्तमा को कुछ न मालूम हुआ बहुत दिन से तिलोत्तमा के मुख पर प्रसन्नता के चिन्ह नहीं देख पड़ते थे बिमला की बातें सुनकर आज उसका बदन कमला सा खिल उठा। बिमला को भी उसकी दशा देखकर आनंद हुआ। गदगद स्वर से बोली 'लो अब मैं जाती हूँ।'

तिलोत्तमा ने कुछ संकुच कर कहा 'मैं देखती हूँ कि तू दुर्ग की सम्पूर्ण बातों को जानती है बता तो हम लोगों के और साथी कहाँ है कौन किस दशा में है?'

बिमला ने देखा कि इस विपद में भी जगत सिंह तिलोत्तमा को नहीं भूलते। उसने उनका कठोर पत्र पाया था उस में तिलोत्तमा का नाम भी नहीं था, इस बात को सुनकर तिलोत्तमा को और भी दुःख होगा इसलिये उसका ज़िक्र न करके बोली—

'जगतसिंह भी इसी दुर्ग में हैं और कुशल से हैं।'

तिलोत्तमा चुप रह गई।

बिमला आँसू पोंछते २ वहाँ से चली गई।

 

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तेरहवां परिच्छेद।
अंगूठी दिखलाना।

बिमला के जाने के पीछे तिलोत्तमा के मन में चिन्ता उत्पन्न हुई। पहिले तो यह सोचकर मनको बड़ा आनंद हुआ कि अब शीघ्र दुष्ट के बंधन से छुटूंगी और फिर बिमला का उस पर स्नेह और तद्धारा उद्धार। फिर सोचने लगी कि छूट कर


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