परीक्षा गुरु २०

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परीक्षा गुरु
द्वारा लाला श्रीनिवासदास
[ १४२ ]

प्रकरण २०


कृतज्ञता.

तृणहु उतारे जनगनत कोटि मुहर उपकार
प्राण दियेहू दुष्टजन करत बैर व्यवहार॥ +[१]

भोजप्रबंधसार.

लाला ब्रजकिशोर मदनमोहन के पास सै उठकर घर को जानें लगे उस्समय उन्का मन मदनमोहन की दशा देखकर दुःख सै बिबस हुआ जाता था वह बारम्बार सोचते थे कि मदनमोहन नें केवल अपना ही नुक्सान नहीं किया. अपने बाल बच्चों का हक़ भी डबो दिया मदनमोहन नें केवल अपनी पूंजी ही नहीं खोई अपनें ऊपर क़र्ज़ भी कर लिया.

भला! लाला मदनमोहनको क़र्ज़ करनें की क्या ज़रूरत थी? जो यह पहलै ही सै प्रबंध करनें की रीति जान्कर तत्काल अपनें आमद ख़र्च का बंदोबस्त कर लेते को इन्को क्या? इन्के बेटे पोतों को भी तंगी उठाने की कुछ ज़रूरत न थी. मैं आप तकलीफ़ सै रहनें को, निर्लज्जता सै रहनें को, बदइन्तज़ामी सै रहनें को, अथवा किसी हक़दार के हक़ मैं कमी करनें को पसंद नहीं करता, परंतु इन्को तो इन बातों के लिये उद्योग करनें की भी कुछ ज़रूरत न थी यह तो अपनी आमदनी का बंदोबस्त [ १४३ ]करके असल पूंजी के हाथ लगाए बिना अमीरी ठाठ सै उमरभर चैन कर सक्ते थे. विदुरजी नें कहा है "फल अपक्व जो बृक्ष ते तोर लेत नर कोय॥ फल को रस पावै नहीं नास बीजको होय॥ नासबीज को होय यहै निज चित्त विचारै॥ पके, पके फललेइ समय परिपाक निहारै॥ पके, पके फललेइ स्वाद रस लहै बुद्धिबल॥ फलते पावै बीज, बीजते होइ बहुरिफल॥ †[२]" यह उपदेश सब नीतिका सार है परन्तु जहां मालिक को अनुभव न हो, निकटवर्ती स्वार्थपर हों वहां यह बात कैसे हो सक्ती है? "जैसे माली बाग को राखत हितचित चाहि॥ तैसै जौ कोला करत कहा दरद है ताहि?॥"

लाला मदनमोहन अबतक क़र्ज़दारी की दुर्दशा का वृत्तान्त नहीं जान्ते.

जिस्समय क़र्ज़दार वादे पर रुपया नहीं दे सक्ता उसी समय सै लेनदार को अपनें क़र्ज़ के अनुसार क़र्ज़दार की जायदाद और स्वतन्त्रता पर अधिकार हो जाता है. वह क़र्ज़दार को कठोर से कठोर वाक्य "बेईमान" कह सक्ता है, रस्ता चल्ते मैं उस्का हाथ पकड़ सक्ता है. यह कैसी लज्जा की बात है कि एक मनुष्य को देखते ही डर के मारे छाती धड़कनें लगे और शर्म के मारे आंखें नीची हो जायँ, सब लोग लाला मदनमोहन की तरह फ़िजूल ख़र्ची और झूंठी ठसक दिखानें मैं बरबाद नहीं होते सौ [ १४४ ]मैं दो, एक समझवार भी किसी का काम बिगड़ जानें सै, या किसी की जामनी कर देनें से या किसी और उचित कारण सै इस आफ़त मैं फंस जाते हैं परंतु बहुधा लोग अमीरों कीसी ठसक दिखाने मैं और अपनें बूते सै बढ़कर चलनें मैं क़र्जदार होते हैं.

क़र्ज़दारी मैं सबसे बड़ा दोष यह है कि जो मनुष्य धर्मात्मा होता है वह भी क़र्ज़ मैं फंसकर लाचारी सै अधर्म्म की राह चलनें लगता है. जब सै कर्ज़ लेने की इच्छा होती है तब ही सै कर्ज़ लेनेंवाले को ललचानें, और अपनी साहूकारी दिखाने के लिये तरह, तरह की बनावट की जाती है. एकबार क़र्ज़ लिये पीछै क़र्ज़ लेने का चस्का पड़ जाता है और समय पर कर्ज़ नहीं चुका सक्ता तब लेनदार को धीर्य देनें और उस्की दृष्टि मैं साहूकार दीखने के लिये ज्यादाः ज्यादाः क़र्ज़ मैं जकड़ता जाता है और लेनदार का कड़ा तकाज़ा हुआ तो उस्का क़र्ज़ चुकानें के लिये अधर्म्म करने की भी रुचि हो जाती है क़र्ज़दार झूंट बोलनें सै नहीं डरता और झूंट बोले पीछै उस्की साख नहीं रहती वह अपनें बाल बच्चों के हक़ मैं दुश्मन सै अधिक बुराई करता है. मित्रों को तरह, तरह की जोखों मैं फंसाता है अपनी घड़ी भर की मौज के लिये आप जन्मभर के बंधन मैं पड़ता है और अपनी अनुचित इच्छा को सजीवन करनें के लिये आप मर मिटता है.

बहुत सै अविचारी लोग क़र्ज़ चुकानें की अपेक्षा उदारता को अधिक समझते हैं इस्का कारण यह है कि उदारता सै यश मिल्ता है, लोग जगह, जगह उदार मनुष्य की बड़ाई करते फिरते [ १४५ ]हैं परंतु क़र्ज़ चुकाना केवल इन्साफ है इसलिये उस्की तारीफ़ कोई नहीं करता इन्साफ़ को लोग साधारण नेकी समझते हैं इस कारण उस्की निस्वत उदारता की ज्यादः क़दर करते हैं जो बहुधा स्वभाव की तेज़ी और अभिमान सै प्रगट होती है परंतु बुद्धिमानी सै कुछ संबंध नहीं रखती किसी उदार मनुष्य सै उस्का नौकर जाकर कहै कि फ़लाना लेनदार अपनें रुपेका तकाज़ा करने आया है और आप के फ़लानें ग़रीब मित्र अपनें निर्वाह के लिये आप की सहायता चाहते हैं तो वह उदार मनुष्य तत्काल कह देगा कि लेनदार को टाल दो और उस ग़रीब को रुपे देदो क्योंकि लेनदार का क्या? वह तो अपनें लेनें लेता इस्के देनें सै वाह वाह होगी.

परंतु इन्साफ़ का अर्थ लोग अच्छी तरह नहीं समझते क्योंकि जिस्के लिये जो करना चाहिये वह करना इन्साफ़ है इसलिये इन्साफ़ मैं सब नेकियें आगईं इन्साफ़ का काम वह है जिस्मैं ईश्वर की तरफ़ का कर्तव्य, संसार की तरफ़ का कर्तव्य, और अपनी आत्मा की तरफ़ का कर्तव्य अच्छी तरह सम्पन्न होता हो. इन्साफ़ सब नेकियों की जड़ है और सब नेकियां उस्की शाखा प्रशाखा हैं इन्साफ़ की सहायता बिना कोई बात मध्यम भाव सै न होगी तो सरलता अविबेक, बहादरी दुराग्रह, परोपकार अन्समझी और उदारता फिजूलखर्ची हो जायँगीं.

कोई स्वार्थ रहित काम इन्साफ़ के साथ न किया जाय तो उस्की सूरत ही बदल जाती हैं और उस्का परिणाम बहुधा भयंकर होता है. सिवाय की रकम मैं सै अच्छे कामों मैं लगाए [ १४६ ]पीछै कुछ रुपया बचै और वो निर्दोष दिल्लगी की बातों मैं ख़र्च कियाजाय तो उस्को कोई अनुचित नहीं बता सक्ता परन्तु कर्तव्य कामों को अटका कर दिल्लगी की बातों मैं रुपया या समय ख़र्च करना कभी अच्छा नहीं हो सक्ता. अपनें बूते मूजब उचित रीति सै औरों की सहायता करनी मनुष्य का फ़र्ज़ है परन्तु इस्का यह अर्थ नहीं है कि अपनें मन की अनुचित इच्छाओं को पूरी करनें का उपाय करै अथवा ऐसी उदारता पर कमर बांधे कि आगै को अपना कर्तव्य संपादन करनें के लिये और किसी अच्छे काम मैं ख़र्च करनें के लिये अपनें पास फूटी कौड़ी न बचे बल्कि सिवाय मैं क़र्ज़ होजाय.

अफ़सोस! लाला मदनमोहन की इस्समय ऐसी ही दशा हो रही है. इन्पर चारों तरफ़ सै आफत के बादल उमड़े चले आते हैं परन्तु इन्हें कुछ ख़बर नहीं है बिदुरजी नें सच कहा हैं:—"बुद्धिभ्रंशते लहत बिनासहि॥ ताहि अनीति नीतिसी भासहि॥+[३]"

इस तरह सै अनेक प्रकार के सोच बिचार मैं डूबे हुए लाला ब्रजकिशोर अपनें मकान पर पहुंचे परन्तु उन्के चित्त को किसी बात सै ज़रा भी धैर्य न हुआ.

लाला ब्रजकिशोर कठिन सै कठिन समय मैं अपनें मन को स्थिर रख सक्ते थे परंतु इस्समय उन्का चित्त ठिकानें न था उन्नें यह काम अच्छा किया कि बुरा किया? इस बात का निश्चय वह आप नहीं कर सक्ते थे वह कहते थे कि इस दशा मैं मदनमोहन का काम बहुत दिन नहीं चलेगा और उस्समय ये सब [ १४७ ]रुपे के मित्र मदनमोहन को छोड़कर अपनें, अपनें रस्ते लगेंगे परंतु मैं क्या करूं? मुझको कोई रस्ता नहीं दिखाई देता और इस्समय मुझ सै मदनमोहन की कुछ सहायता न हो सकी तो मैंने संसार में जन्म लेकर क्या किया?

फ्रान्स के चौथे हेन्री नें डी ला रोमाइल को देशनिकाला दिया था और काउन्ट डी आविग्नी उस्सै मेल रखता था इस्पर एक दिन चौथे हेन्री ने डी आविग्नी से कहा कि "तुम अबतक डी ला रोमाइल की मित्रता कैसे नहीं छोड़ते"? डी आविग्नी ने जवाब दिया कि "मैं ऐसी हालत मैं उस्की मित्रता नहीं छोड़ सक्ता क्योंकि मेरी मित्रता के उपयोग करनें का काम तो उस्को अभी पड़ा है."

पृथ्वीराज महोबेकी लड़ाई मैं बहुत घायल होकर मुर्दों के शामिल पडे थे और संजमराय भी उन्के बराबर उसी दशा मैं पडा था. उस्समय एक गिद्ध आके पृथ्वीराज की आंख निकालने लगा पृथ्वीराजको उसके रोकनेंकी सामर्थ्य न थी इसपर संजमराय पृथ्वीराजको बचानेके लिये अपने शरीर का मांस काट, काट कर गिद्धके आगे फैंकने लगा जिस्सै पृथ्वीराजकी आंखें बच गई और थोड़ी देर मैं चन्द वगैरे आ पहुंचे.

हेन्‌री रिचमन्ड पीटरके भयसै ब्रीटनी छोड कर फ्रान्सको भागनें लगा उस्समय उस्के सेवक सीमारनें उस्के वस्त्र पहन कर उस्की जोखों अपनें सिर ली और उस्को साफ निकाल दिया.

क्या इस्तरहसै मैं मदनमोहन की कुछ सहायता इस्समय नहीं कर सक्ता! यदि इस काममैं मेरी जान भी जाती रहै तो [ १४८ ]कुछ चिन्ता नहीं जब मैं उन्को अनसमझ जान कर उन्के कहनें सै उन्हें छोड आया तो मैंनें कौन्सी बुद्धिमानी की? पर मैं रह कर क्या करता? हां मैं हां मिला कर रहना रोगी को कुपथ्य देनें सै कम न था और ऐसे अवसर पर उन्का नुक्सान देख कर चुप हो रहना भी स्वार्थ परता सै क्या कम था? मेरा बिचार सदैव सै यह रहता है कि काम करना तो बिधी पूर्वक करना. न होसके तो चुप हो रहना, बेगार तक को बेगार न समझना परन्तु वहां तो मेरे वाजबी कहनें से उल्टा असर होता था और दिनपर दिन जिद बढ़ती जाती थी मैंने बहुत धैर्य सै उन्को राह पर लानें के अनेक उपाय किये पर उन्नें किसी हालत मैं अपनी हद्द सै आगै बढ़ना मंजूर न किया.

असल तो ये है कि अब मदनमोहन बच्चे नहीं रहे उन्की उम्र पक गई, किसीका दबाब उन्पर नहीं रहा लोगोंनें हां मैं हां मिला कर उन्की भूलों को और दृढ कर दिया रुपे के कारण उन्को अपनी भूलों का फल न मिला और संसारके दुःख सुखका अनुभव भी न होनें पाया बस रंग पक्का होगया विदुरजी कहते हैं कि "सन्त असन्त तपस्वी चोर। पापी सुकृती हृदय कठोर॥ तैसो होय बसे जिहि संग। जैसो होत बसन मिल रंग॥"*[४]

यदि वह सावधान हों तो अंगद हनुमान की तरह उन्की आज्ञा पालन करनें मैं सब कर्तव्य संपादन हो जाते हैं परन्तु जहां ऐसा नहीं होता वहां बड़ी कठिनाई पड़ती है. सकड़ी गली मैं हाथी नहीं चल्ता तब महावत कूढ़ बाजता है वृन्द कहता है [ १४९ ]कि "ताकों त्यों समझाइये जो समझे जिहिं बानि॥ बेन कहत मग अन्धकों अरु बहरेको पानि॥" जिस तरह सुग्रीव भोग बिलास में फंस गया तब रघुनाथजी केवल उस्को धमकी देकर राह पर ले आए थे इस तरह लाला मदनमोहन के लिये क्या कोई उपाय नहीं होसक्ता? हे जगदीश! इस कठिन काम मैं तूं मेरी सहायता कर.

लाला ब्रजकिशोर इन्बातों के विचार मैं ऐसे डूबे हुए थे कि उन्को अपना देहानुसन्धान न था. एक बार वह सहसा कलम उठा कर कुछ लिखनें लगे ओर किसी जगह को पूरा महसूल देकर एक ज़रूरी तार तत्काल भेज दिया. परन्तु फिर उन्हीं बातों के सोच विचार मैं मग्न होगए. इस्समय उन्के मुखसै अनायास कोई, कोई शब्द बेजोड़ निकल जाते थे जिन्का अर्थ कुछ समझ मैं नहीं आता था. एक बार उन्नें कहा "तुलसीदासजी सच कहते हैं "षट्‌रस बहु प्रकार ब्यंजन कोउ दिन अरु रैन बखानें॥ बिन बोले सन्तोष जनित सुख खाय सोई पै जानें॥" थोड़ी देर पीछे कहा "मुझको इस्समय इस वचन पर बरताव रखना पड़ेगा (वृन्द) झूंटहु ऐसो बोलिये सांच बराबर होय॥ जो अंगुरी सों भीत पर चन्द्र दिखावे कोए॥" परन्तु पानी जैसा दूध सै मिल जाता है तेल से नहीं मिलता. विक्रमोर्वशी नाटक मैं उर्वशी के मुख सै सञ्ची प्रीति के कारण पुरुषोत्तम की जगह पुरूरवा का नाम निकल गया था इसी तरह मेरे मुख से कुछका कुछ निकल गया तो क्या होगा? थोड़ी देर पीछे कहा "लोक निन्दा सै डरना तो वृथा है जब वह लोग जगत जननी जनक नन्दिनी की झूंटी निन्दा किये बिना नहीं रहे! श्रीकृष्णचन्द्र कोजाति वालों के अपवाद [ १५० ]का उपाय नारदजी से पूछना पड़ा! तो हम जैसे तुच्छ मनुष्यों की क्या गिन्ती है? सादीनें लिखा है "एक बिद्वान से पूछा गया था कि कोई मनुष्य ऐसा होगा जो किसी रूपवान सुन्दरी के साथ एकांत मैं बैठा हो दरवाज़ा बन्द हो, पहरे वाला सोता हो मन ललचा रहा हो काम प्रबल हो + + और वह अपनें शम दम के बल सै निर्दोष बच सकै?" उसनें कहा कि "हां वह रूपवान सुन्दरी से बच सक्ता है परन्तु निन्दकों की निन्दासै नहीं बच सक्ता" फिर लोक निन्दा के भय सै अपना कर्तव्य न करना बड़ी भूल है धर्म्म औरों के लिये नहीं अपनें लिये और अपनें लिये भी फल की इच्छा से नहीं, अपना कर्तव्य पूरा करनें के लिये करना चाहिये परन्तु धर्म्म अधर्म्म होजाय, नेकी करते बुराई पल्ले पड़े, औरों को निकालती बार आप गोता खाने लगें तो कैसा हो? रुपेका लालच बड़ा प्रवल है और निर्धनोंको तो उन्के काम निकालनें की चाबी होने के कारण बहुत ही ललचाता है" थोड़ी देर पीछे कहा "हलधरदास नें कहा है "बिन काले मुख नहिं पलाश को अरुणाई है॥ बिन बूड़े न समुद्र काहु मुक्ता पाई है। इसी तरह गोल्ड स्मिथ कहता है कि "साहस किये विना अलभ्य वस्तु हाथ नहीं लग सक्ती" इसलिये ऐसे साहसी कामों मैं अपनी नीयत अच्छी रखनी चाहिये यदि अपनी नीयत अच्छी होगी तो ईश्वर अवश्य सहायता करैगा और डूब भी जाँयगे तो अपनी स्वरूप हानि न होगी."



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  1. + सन्त स्तृ णोत्तारणमृतमांगात् सुवर्णकोट्यर्पणभां मनन्ति॥
    प्राणव्ययेनापि कृतोपकाराः खलाः परम्बैरमिवोदहन्ति॥

  2. † बनस्पतेरपक्वानि फलानिप्रचिनोति यः॥
    सनाप्रीति रसं तेभ्यो बीजं चास्व विनश्यति
    यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं बलं॥
    फलाद्रसं सलभते बीज च्चै व फलं पुनः॥

  3. + बुद्धौ कलुषभूतावां बिनाशे प्रत्युपस्थिते॥
    अनयो नयसंकाशी हृदयान्नापसर्पति॥

    • यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विन यदि वा स्तनमेव॥

    बासो यथा रंगवशं प्रयाति तथा सतेषां वशमभ्युपैति॥