परीक्षा गुरु ३३

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परीक्षा गुरु
द्वारा लाला श्रीनिवासदास
[ २३८ ]

प्रकरण ३३.


मित्रपरीक्षा।

धन न भयेहू मित्रकी सज्जन करत सहाय॥
मित्र भाव जाचे बिना कैसे जान्यो जाय॥‡[१]

बिदुरप्रजागरे.

आज तो लाला ब्रजकिशोर की बातोंमैं लाला मदनमोहन की बात ही भूल गए थे!

लाला मदनमोहन के मकानपर वैसी ही सुस्ती छा रही है केवल मास्टर शिंभूदयाल और मुन्शी चुन्नीलाल आदि तीन, चार आदमी दिखाई देते हैं परन्तु उन्का भी होना न होना एकसा है वह भी अपनें निकासका रस्ता ढूंढ रहे हैं हम अबतक लाला मदनमोहनके बाकी मुसाहबोंकी पहचान करानें के लिये अबकाश देख रहे थे इतनेमैं उन्नें मदनमोहन का साथ छोड़कर अपनी पहिचान आप बतादी. हरगोबिन्द और पुरुषोत्तमदासनें भी कलसै सूरत नही दिखाई थी. बाबू बैजनाथ को बुलाने के लिये आदमी गया था परन्तु उन्हैं आनें का अवकाश न मिला लाला हरदयाल साहबके नाम कुछ दिन के लिये थोड़े रुपे हाथ उधार देनें को लिखा गया था परन्तु उन्का भी जवाब नहीं आया लाला मदनमोहन का ध्यान सबसै अधिक डाककी तरफ़ लग रहा था उन्को [ २३९ ]विश्वास था कि मित्रों की तरफ़सै अवश्य अवश्य सहायता मिलेगी बल्कि कोई, कोई तो तारकी मारफत रुपे भिजवायंगे.

"क्या करें? बुद्धि काम नहीं करती" मास्टर शिंभूदयालनें समय देखकर अपनें मतलब की बात छेड़ी "इन्हीं दिनोंमैं यहां काम है और इन्हीं दिनों मदरसे मैं लड़कोंका इमतहान है कल मुझको वहां पहुंचनें मैं पाव घण्टे की देर हो गई थी इस्पर हेड-मास्टर सिर होगए. वहां न जायं तो रोज़गार जाता है यहां न रहैं तो मन नहीं मान्ता (मदनमोहनसै) आप आज्ञा दें जैसा किया जाय?"

"ख़ैर? यहांका तो होना होगा सो हो रहैगा तुम अपना रोज़गार न खोओ" लाला मदनमोहननें रुखाई सै जवाब दिया.

क्या करूं? लाचार हूं" मास्टर शिंभूदयाल बोले "यहां आए बिना तो मन नहीं मानेंगा परन्तु हां कुछ कम आना होगा आठ पहर की हाजरी न सध सकेगी मेरी देह मदरसे मैं रहेगी परन्तु मेरा मन यहां लगा रहेगा"

"बल आपकी इतनी ही महरबानी बहुत है" लाला मदनमोहननें जोर देकर कहा.

निदान मास्टर शिंभूदयाल मदरसे जानें का समय बताकर रुख़सत हुए.

"आज निहालचन्दका मुकद्दमा है देखैं ब्रजकिशोर कैसी पैरवी करते हैं" मुन्शी चुन्नीलालनें कहा" कल आपके पाकटचेन देनेंसै उन्का मन बहुत बढ़गया परन्तु वह उसै अपनें महन्तानें मैं न समझैं मेरे निकट अब उन्का महन्ताना तत्काल भेज देना चाहिये जिस्सै उन्को यह संदेह न रहै और मन लगाकर अपनें [ २४० ]मुकद्दमों मैं अच्छी जवाब दिही करैं. मैं इन्के पास रहकर देख चुका हूं कि यह अपनें मुख सै तो कुछ नहीं कहते परन्तु इन्के साथ जो जितना उपकार करता है यह उस्सै बढ़कर उस्का काम कर देते हैं"

"अच्छा! तो आज शाम को कोई क़ीमती चीज़ इन्के महन्तानें मैं दे देंगे और काम अच्छा किया तो शुक्राना जुदा देंगे" लाला मदनमोहनने कहा.

इतनें मैं डाक आई उस्मैं एक रजिस्ट्री चिट्ठी मेरठसै एक मित्रकी आई थी जिस्मैं दस हज़ार की दर्शनी हुंडी निकली और यह लिखा था कि "जितनें रुपे चाहिये और मंगा लेना. आपका घर है" लाला मदनमोहन यह चिट्ठी देखते ही उछल पडे और अपनें मित्रों की बड़ाई करनें लगे. हुंडी तत्काल सकरानें को भेज दी परन्तु जिस्के नाम हुंडी थी उस्नें यह कहकर हुंडी सिकारनें से इन्कार किया कि जिस साहूकार के हां सै लाला मदनमोहनके पास हुंडी आई है उसीनें तार देकर मुझको हुंडी सिकारनें की मनाई की है इस्सै सब भेद खुल गया. असल बात यह थी कि जिस्समय मदनमोहन की चिट्ठी उस्के पास पहुंची उस्को मदनमोहनके बिगडने का जरा भी संदेह न था इसलिये मदनमोहन की चिट्ठी पहुंचते ही उस्नें सञ्ची प्रीति दिखानें के लिये दस हज़ार की हुंडी खामदी परन्तु पीछेसै और लोगोंकी जबानी मदनमोहन के बिगड़ने का हाल सुन्कर घबराया और तत्काल तार देकर हुडी खड़ी रखवादी.

लाला मदनमोहन इस तरह अपने एक मित्रके छलसै निराश होकर तीसरे पहर अपनें शहरके मित्रोंसै सहायता मांगनें के [ २४१ ] लिये आप सवार हुए, पहलै रस्ते मैं जो लोग झुक, झुक कर सलाम करते थे वही आज इन्हैं देखकर मुख फेरनें लगे बल्कि कोई, कोई तो आवाज़ कसनें लगे. मदनमाह को सबसै अधिक विश्वास लाला हरदयाल का था इसलिये वह पहलै उसीके मकानपुर पहुँचे.

हरदयाल को मदनमोहनके काम बिगडनें का हाल पहले मालूम हो चुका था और इसी वास्तै उस्नें मदनमोहन की चिट्ठी का जबाब नहीं भेजा था. अब मदनमोहनके आनें का हाल सुन्ते ही वह जरासी देरमैं मदनमोहन के पास पहुँँचा और बड़े सत्कारसै मदनमोहनको लिवा लेजा कर अपनी बैठकमैं बिठाया.

लाला मदनमोहननें कल सहायता मांगने के लिये चिट्ठी भेजी थी उस्को पहलै उस्नें हंसीकी बात ठैराई और जवाब न भेजनें का भी यही कारण बतायां परन्तु जब मदनमोहननें वह बात सच्ची बताई और उस्के पीछे का सब वृत्तान्त कहा तो लाला हरदयाल अत्यन्त दुखित हुए और बड़ी उमंगसैं अपनी सब दौलत लाला मदनमोहन पर न्योछावर करनें लगे. लाला हर- दयाल की यह बातें केवल कहनें के लिये न थी वह दौड़कर अपनें गहनें का कलमदान उठा लाए और उसमें से एक, एक रकम निकाल कर लाला मदनमोहल को देनें लगे इतने मैं एका-एक दरवाजा खुला हरदयालका पिता भीतर पहुँँचा और वह हरदयाल को जवाहरातकी रकमें मदनमोहनके हाथमें देते देख कर क्रोध से लाल हो गया.

“अभागे हटधमीं! मैंने तुझक इतनी बार बरजा परन्तु तू अपना हट नहीं छोड़ता आजकल के कपूत लड़के इतनी बातको [ २४२ ]सच्ची स्वतंत्रता समझते हैं कि जहां तक हो सके बडों का निरादर और अपमान किया जाय, उन्को मूर्ख और अनसमझ बताया जाय, परन्तु मैं इन बातों को कभी नहीं सहूंगा मेरे बैठे तुझको घर बरबाद करनें का क्या अधिकार है? निकल यहांसै काला मुंहकर तेरी इच्छा होय जहां चला जा मेरा तेरा कुछ सम्बन्ध नहीं रहा" यह कह कर एक तमाचा जड़ दिया और गहना सम्हाल, सम्हालकर संदूक मैं रखने लगा. थोड़ी देर पीछे लाला मदनमोहन की तरफ देखके कहा. "संसारके सब काम रुपै सै चल्ते हैं फिर जो लोग अपनी दौलत खोकर बैरागी बन बैठें और औरों की दौलत उड़ाकर उन्को भी अपनी तरह बैरागी बनाना चाहें वह मेरे निकट सर्वथा दया करनें के योग्य नहीं हैं और जो लोग ऐसे अज्ञानियों की सहायता करते हैं वह मेरे निकट ईश्वर का नियम तोडते हैं और संसारी मनुष्यों के लिये बडी हानिका काम करते हैं मेरे निकट ऐसे आदमियों को उन्की मूर्खताका दण्ड अवश्य होना चाहिये जिस्सै और लोगों की आंखें खुलैं. क्या मित्रता का यही अर्थ है कि आप तो डूबें सो डूबें अपने साथ औरों को भी ले डूबें! नहीं, नहीं आप ऐसे बिचार छोड दीजिये और चुपचुपाते अपनें घर की राह लीजिये यह समय अपनें मित्रोंको देनें का है अथवा उल्टा उन्सै लेने का है?"

बुरे वक्तमैं एक मित्रका जी दुखाना, और दयाके समय क्रूरता करनी, किसी की दुखती चोटपर हँसना, एक गरीब को उस्की गरीबीके कारण तुच्छ समझना, अथवा उस्की गरीबी की याद दिवाकर उसै सताना, दूसरेका बदला भुगताती बार अपनें मतलब का खयाल करना, कैसा ओछापन और घोर पाप है [ २४३ ]जहां सज्जन धनवानों की खुशामद सै दूर रहकर गरीबों का साथ देनें और सहायता करनें मैं सच्ची सज्जनता समझते हैं कठोर बचन दो तरह सै कहा जाता है जो लोग अपनायत की रीति सै कहते हैं उन्को कहनसै तो अपनें चित्तमैं वफादारी और आधीनता बढती है पर जो अभिमान की राहसै दूसरे को तुच्छ बनाते हैं उन्की कहनसै चित्तमैं क्रोध और धिःकार बढ़ता जाता है. हर तरह का घाव ओषधिसै अच्छा होसक्ता है परन्तु मर्म बेधी बात का नासूर किसी तरह नहीं सूझता. बिदुरजी नें सच कहा है "नावक सर धनु तीर काढे कढत शरीरते॥ कुवचन तीर गभीर कढत न क्यों हूं उर गढे॥ १"

निदान लाला मदनमोहन को यह कहना अत्यन्त असह्य हुई. वह तत्काल उठकर वहां सै चल दिये परंतु बैठक सै बाहर जाते, जाते उन्हें पीछेसै हरदयाल का यह वचन सुन्कर बडा आश्चर्य हुआ कि "चलो यह स्वांग (अभिनय) हो चुका अब अपना काम करो"

लाला मदनमोहन वहां से चलकर एक दूसरे मित्रके मकान पर पहुंचे और उस्सै अपनें आनेंकी ख़बर कराई वह उस्समय कमरे मैं मोजूद था परंतु उस्नें लाला मदनमोहन को थोडी देर अपनें दरवाजे पर बाट दिखानें मैं और अपनें कमरे को ज़रा मेज़ कुरसी, किताब, अखबार आदि सै सजाकर मिलनें में अधिक शोभा समझी इस लिये कहला भेजा कि "आप ठैरें लाला साहब भोजन करनें गए हैं अभी आकर आप से मिलेंगे" देखिये आजकलके सुधरे विचारोंका नमूना यह है! थोड़ी देर पीछे वह लाला मदनमोहनको लिवानें आया और बड़े शिष्टाचार सै लिवा [ २४४ ] ले जाकर उन्हैं तकियेके सहारे बिठाया. लाला मदनमोहनको थोडी देर उस्की बाट देखनी पड़ी थी इस्की क्षमा चाही और इधर उधरकी दो चार बातें करके मानों कुछ चिट्ठियां अत्यन्त आवश्यकीय लिखनी बाकी़ रह गई हों इस्तरह चिट्ठी लिखनें लगा परंतु दो चार पल पीछे फिर कलम रोककर बोला “हां यह तो कहिये आपनें इस्समय किस्तरह परिश्रम किया?”

“क्यों भाई! आनें जानें का कुछ डर है? क्या मैं पहले कभी तुम्हारे यहां नहीं आया? या तुम मेरे यहां नहीं गए?” लाला मदनमोहननें कहा.

“आपने यह तो बड़ी कृपा की परन्तु मेरे पूछनें का मतलब यह था कि कुछ ताबेदारी बताकर मुझे अधिक अनुग्रहीत कीजिये” उस मनुष्यनें अजानपों मैं कहा.

“हां कुछ काम भी है मुझको इस्समय रुपे की कुछ ज़रूरत है मेरे पास बहुत कुछ माल अस्वाब मौजूद है परन्तु लोगोंनें बृथा तकाजा करके मुझको घबरा लिया” लाला मदनमोहन भोले भाव सै बोले.

“मुझको बड़ा खेद है कि मैंने अपना रुपया अभी एक और काम मैं लगा दिया यदि मुझको पहलै सै कुछ सूचना होती तो मैं सर्वथा वह काम न करता” उस मनुष्यनें जबाब दिया.

“अच्छा! कुछ चिन्ता नहीं आप मेरे लेनदारोंकी जमाख़ातर ज़रा अपनी तरफ़ सै कर दें“

“इस्सै हमारी स्वरूपहानि है हम जामनी करें तो हमको रुपया उसी समय देना चाहिये” उस पुरुषनें जवाब दिया और लाला मदनमोहन वहां सै भी निराश होकर रवाने हुए. [ २४५ ]

रस्ते मैं एक और मित्र मिले वह दूर ही सै अजानकी तरह दृष्टि बचाकर गलीमैं जानें लगे परन्तु लाला मदनमोहननें आवाज़ देकर उन्हें ठैराया और अपनी बग्गी खडी की इस्सै लाचार होकर उन्हें ठैरना पडा परन्तु उनके मनमैं पहली सी उमंग नाम को न थी.

"आप प्रसन्न हैं? मुझको इस्समय एक बड़ा ज़रूरी काम था इस्सै मैं लपका चला जाता था मुझको आपकी बग्गी दृष्टि न आई, माफ करें मैं किसी समय आपके पास हाज़िर होऊंगा" यह कहकर वह मनुष्य जानें लगा परन्तु मदनमोहननें उसै फिर रोका और कहा "हां भाई? अब तुमको अपनें जरूरी कामोंके आगे मुझसैं मिलने का अवकाश क्यों मिलनें लगा था? अच्छा? जाओ हमारा भी परमेश्वर रक्षक है"

इस तानें सै लाचार होकर उसै ठैरना पड़ा और उसके ठैरनें पर लाला मदनमोहन ने अपना वृत्तान्त कहा.

"यह हाल सुन्कर मुझको अत्यन्त खेद हुआ परमेश्वर आप पर कृपा करे वह सर्वशक्तिमान दीनदयाल सर्व का दुःख दूर करता है उस्पर विश्वास रखनें सै आप के सब दुःख दूर हो जायंगे आप धैर्य रक्खें. मुझको इस्समय सचमुच बहुत ज़रूरी काम है इस लिये मैं अधिक नहीं ठैर सक्ता परन्तु मैं आजकल मैं आपके पास हाजिर होऊंगा और सलाह करके जो बात मुनासिब मालूम होगी उस्के अनुसार बरताव किया जायगा" यह कह कर वह मनुष्य तत्काल वहां सै चल दिया.

लाला मदनमोहन और एक मित्रके मकानपर पहुंचे. बाहर खबर मिली कि "वह मकान के भीतर हैं" भीतर सै जवाब आया [ २४६ ]कि "बाहर गए" लाचार मदनमोहन को वहां सै भी खाली हाथ फिरना पड़ा. और अब और मित्रोंके यहां जानें का समय नहीं रहा इस लिये निराश होकर सीधे अपनें मकान को चले गए.


प्रकरण ३४.


हीनप्रभा (बदरोबी).

नीचन के मन नीति न आवै। प्रीति प्रयोजन हेतु लखावै॥
कारज सिद्ध भयो जब जानें। रंचकहू उर प्रीति न माने॥
प्रीति गए फलहू बिनसावै। प्रीति विषै सुख नैक न पावै॥
जादिन हाथ कछू नहीं आवै। भाखि कुबात कलंक लगावै॥
सोइ उपाय हिये अवधारै। जासु बुरो कछु होत निहारै॥
रंचक भूल कहूं लख पावै। भांति अनेक बिरोध बढावै॥ +[२]

बिदुरप्रजागरे.

लाला मदनमोहन मकान पर पहुंचे उस्समय ब्रजकिशोर वहां मौजूद थे.

लाला ब्रजकिशोर नें अदालत का सब बृत्तान्त कहा उस्मैं मदनमोहन मोदी के मुकद्दमें का हाल सुन्कर बहुत प्रसन्न हुए उस्समय चुन्नीलाल ने संकेत मैं ब्रजकिशोर के महन्तानें की याद


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  1. ‡ अर्चयेदैव मित्राणि सनिवासतिवा धर्ने
    नानर्थ यन् प्रजानाति मित्राणां सारफलगुतां॥

  2. + निवर्तनाने सौहार्दे प्रोति र्नीचे प्रणश्यति।
    याचैव फलनिर्तत्तिः सौहृदे चैव यन्सुखम्॥
    यतते अपवादाय यत्न मारभते क्षये।
    अल्पे प्यपकृते मोहन् न शान्ति मधिगच्छति॥