पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१५७

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अद्भुत इंद्रजाल

"एक दिन इस ऐद्रजालिक ने खेल शुरू किया। इसके साथ एक लड़का था। उसे बुलाकर इसने पास बिठलाया। फिर इसने सुतली का एक बंडल निकाला। उसका एक सिरा इसने ज़मीन में भीतर गाड़ दिया। फिर उस बंडल को इसने आकाश की तरफ़ फेक दिया। सुतली सीधी आकाश में चली गई, और जाते-जाते लोप हो गई। तब इसने उस लड़के को हुक्म दिया कि वह सुतली पर चढ़कर आकाश की सैर कर आवे। लड़का उस पर चढ़ा। जैसे लोग ताड़ के पेड़ पर चढ़ते हैं, वैसे ही वह उस पर झट-झट चढ़ता गया। धीरे-धीरे उसका आकार छोटा मालूम होने लगा। यहाँ तक कि दूरी के कारण वह कुछ देर में अदृश्य हो गया। तब तक यह मदारी महाशय और खेल खेलने लगे। कोई आध घंटे बाद इसे उस लड़के की याद आई। गोया अभी तक उसकी याद ही न थी। इसने उसे आवाज देना शुरू किया। उसे आकाश से नीचे उतारने की इसने बहुत कोशिश की, पर सब व्यर्थ हुई। उस लड़के ने ऊपर ही से जवाब दिया कि अब मैं नीचे नहीं उतरता। यह सुनकर इसे बहुत क्रोध आया। इसने एक छुरा निकाला और उसे अपने दाँतों में दबाया। तब यह भी उस लड़के ही की तरह उस सुतली पर चढ़ने लगा। कुछ देर में छोटा होते-होते यह भी अदृश्य हो गया। दो-चार मिनट बाद आकाश से पड़ी ही करूणा-जनक चिल्लाहट सुनाई पड़ी। ऐसा मालूम होता था, जैसे कोई किसी को मारे डालता है, और वह अपनी जान बचाने की कोशिश