पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१६१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
१६१
अद्भुत इंद्रजाल


मदारी अपनी मौहर को बजा रहा था। पर जान पड़ता था कि वह हम लोगों से कुछ दूर पर बजा रहा है। था वह पास ही; पर सुर में अंतर हो गया था।

"कुछ देर में वाद्य बंद हुआ। परंतु वह सर्पिणी नारी अपने कृष्ण-मणिमय रत्नों के प्रकाश में नाचती ही रही। इतने में उसने अपना रूप बदल डाला। वह दिव्य-रूप हो गई। उसके मुख- मंडल पर अप्रतिम प्रभा छा गई। उसने अपने विशाल नेत्रों से हम लोगों की तरफ निनिमेष-भाव से देखना शुरू किया। हम लोग उसके अद्भुत रूप को देखकर दंग हो गए। वैसा रूप हमने कभी पहले नहीं देखा था। और न अब आगे कभी देखने की संभावना ही है। उसके निरुपम रूप, उसके त्रिभुवन-जयी नेत्र और उसके मोहक लावण्य ने हम लोगों को बेहोश-सा कर दिया। हमारी चित्तवृत्ति उसी के मुख-मंडल में जाकर प्रविष्ट हो गई; शरीर-मात्र से हम लोग अपनी-अपनी जगह पर बैठे रह गए। गोरिंग की दशा भयंकर हो गई; क्योंकि उस दिव्य नारी की नज़र सबसे अधिक उसी की तरफ़ थी।

"हम सब बँगले के बरामदे में थे। खेल कुछ दूर नोचे हो रहा था। वह स्त्री नाचते-नाचते क्रमशः आगे बढ़ी, और थोड़ी देर में बरामदे की सीढ़ियों के पास आ गई। जब वह इतना पास आ गई, तब गोरिंग की अजीब हालत हो गई। वह बेतरह भयभीत हुआ-सा जान पड़ने लगा। मालूम होता था कि उसे आनंद भी हो रहा है और भय भी हो रहा है। कुछ मिनट बाद