पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/१६०

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अद्भुत आलाप


"मेजर साहब की आज्ञा मिलते ही खेल शुरू हुआ। मदारी मियाँ बंगाली थे। उम्र उसकी कोई ६० वर्ष के करीब होगी। उसने अपनी पिटारी में हाथ डाला और उसके भीतर से एक काला नाग बाहर निकाला। निकलते ही उसने अपना फन उठाया और फुफकार मारते हुए उसे इधर-उधर हिलाना शुरू किया। दूसरा आदमी उसके सामने मोहर (तूँबी) बजाने लगा। तब वह सर्प अपना फन और भी अधिक लहराने लगा। जैसे-जैसे मदारी महाशय के मनोहर वाद्य का सुर चढ़ने लगा, वैसे-ही-वैसे सर्प की फणा भी ऊँची होने लगी। यहाँ तक कि कुछ देर में यह मालूम होने लगा कि वह हवा में निराधार हिल रही है। उसका रंग अत्यंत काला था। फणा बहुत ही तेजस्क थी। जान पड़ता था कि फन पर देदीप्यमान रत्न जड़े हुए हैं। जब खेल इस अवस्था को पहुँचा, तब जर्मिन ने उस दृश्य का एक फ़ोटो लिया। केमरा के बटन की आवाज आई, और प्लेट ने छाया ग्रहण कर ली। यद्यपि मैं तमाशे में तन्मनस्क था, तथापि मैंने प्लेट का गिरना सुन लिया।

"अब एक विलक्षण---महा विलक्षण---बात हुई। तमाशे में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ। परंतु कब हुआ, यह हम लोगों ने नहीं देख पाया। स्वच्छ आकाश सहसा काला हो गया। प्रकाशवती दिशाओं ने श्यामलता धारण की। सब तरफ़ बादल-से घिर आए। इतने में उस सर्फ की फणा ने स्त्री का रूप धारण किया, और उस रूप में वह पूर्ववत् आकाश में नृत्य करने लगी।