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अद्भुत आलाप


ही कि बलिदान के लिये एक पक्ष दूसरे पक्ष के जितने आदमी ज़बरदस्ती कैद कर सके कर ले जाय। नौबत हाथा-पाई तक ही न रहती, मार-काट अवश्य होने लगती। संध्या को लड़ाई बंद हो जाती। उस समय दोनो पक्षवाले एक दूसरे से मित्र की तरह मिलते, परंतु युद्ध के क़ैदियों की कुछ बात न होती। इन्हीं क़ैदियों का एक-एक करके बलिदान किया जाता। जब उनकी संख्या थोड़ी रह जाती, तब लोग राजा से फिर इसी प्रकार के युद्ध की आज्ञा माँगते।

मेक्सिकोवाले नर-मांस-भक्षी भी थे। बलिदान के बाद लाश उस आदमी को दे दी जाती थी, जो उसे युद्ध से पकड़ लाता था। वह उसे बड़ी प्रसन्नता से अपने घर उठा लाता और बड़े यत्न से पकाता। तब उसके बंधु-बांधव और मित्र एकत्र होते। सब लोग सब खुशी मनाते, और अंत में वे सब मिलकर उस नर-मांस को बड़ी प्रसन्नता से खाते।

कुछ वीर पुरुष अपने ही मन से अपने को बलिदान के लिये अर्पण कर देते थे। इन लोगों की खोपड़ियों की माला मेक्सिको का बादशाह बड़े प्रेम से पहनकर दरबार या त्योहार के दिन तख्त पर बैठता था।

जनवरी, १९१३