पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/६३

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परलोक से प्राप्त हुए पत्र

मेरी दृष्टि अब बहुत विस्तृत हो गई है। मैं अपने सामने अनंत ज्ञान-राशि देखकर घबरा रहा हूँ। जो चीजें मुझे अनंत, आश्चर्य-पूर्ण और अंधकारमय मालूम होती थीं, वे मुझे अब वैसी नहीं मालूम होतीन। उनको अब मैं बख़ूबी देख सकता हूँ, और उन्हें समझ भी सकता हूँ।

पृथ्वी पर ७० वर्ष की उम्र पाकर आदमी इन सब बातों को नहीं जान सकता।

आध्यात्मिक विषयों में अनेक बातें गुप्त हैं। मनुष्य उन सबको नहीं जान सकता। आत्मा ईश्वर का अश है। वह मनुष्य-शरीर से भिन्न है। वह अपना अस्तित्व अलग ही रखती है। वह अनादि है। वह हमेशा आगे की ओर बढ़ती है, पीछे की ओर नहीं। वह धीरे-धीरे अपनी उन्नति करती जाती है, और अपनी शांति और अनुभव को बढ़ाती रहती है। मनुष्य का मन और आत्मा तभी उन्नत होते है, जब जीवन के अनेक झंझटों को वे धैर्य के साथ सह लेते हैं, और उनको पार करके आगे निकल जाते हैं।

परमात्मा की असीमता का अंदाज़ा बहुत कम आदमियों को है। उसकी सीमा नहीं। वह सब तरफ़ है। कोई जगह उससे खाली नहीं। इस विश्व का कोई अंश ऐसा नहीं, जो उसके अंतर्गत न हो। जो सुख या दुख हमको मिलता है, वह इसलिये कि उससे हम कुछ-न-कुछ शिक्षा ले सकें।

यह मनुष्य-शरीर अनेक जन्म-मरणों का फल है। लोग