पृष्ठ:अद्भुत आलाप.djvu/६२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
६४
अद्भुत आलाप

मुझे अभी बहुत कुछ करना है। मेरा भविष्य आशा और आनंद से भरा हुआ है। भविष्य में मैं अपनी अनेक महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने की आशा रखता हूँ।

मनुष्य-जीवन को एक तरह का स्कूल समझना चाहिए, परंतु जिस अवस्था में मैं अब हूँ, उसकी बात बिलकुल ही भिन्न है। जो बातें पृथ्वी पर स्वप्न-सी मालूम होती थीं, वे यहाँ करतलामलकवत् हो रही हैं। जीवन क उद्देश्य, शिक्षण और फल का ज्ञान यहाँ अच्छी तरह होता है। जितने सत्कर्म और सदुद्देश्य हैं, वे यहाँ पूरे तौर पर सफल हो सकते हैं। परमात्मा की सृष्टि की रचना और उद्देश्य आदि यहाँ समझ में आने लगते हैं। पृथ्वी पर इन बातों का समझना कठिन था।

मुझे यह बात अब अच्छी तरह मालूम हो गई है कि आदमी की ज़िदगी सिर्फ़ उसी के फायदे के लिये नहीं। उसे समझना चाहिए कि जो कुछ संसार में है, वह सब उसी का है; ओर वह खुद भी संसार ही का एक अंश है। इन बातों को ध्यान में रखकर उसे सब काम करने चाहिए। स्वार्थ से कर्तव्य की हानि होती है। कर्तव्य-विधात हा का दूसरा नाम स्वार्थ है। संसार बहुत विस्तृत है। जो अपना कर्तव्य करना चाहते हैं, संसार में उनके लिये काम-ही-काम है। विश्व-रूप ईश्वर ही में सब कुछ है। जो कुछ है, उसे उसी के अंतर्गत समझना चाहिए। भिन्न भाव रखना अज्ञानता का चिह्न है। मैं और मेरा पिता (परमेश्वर) भिन्न-भिन्न नहीं, एक ही हैं। "सर्वं खल्विदं ब्रह्म।"