पृष्ठ:अन्तस्तल.djvu/१२३

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वह

वह सोने की न थी, इस्पात की थी। पर मैं उसे हीरों के बराबर तोल कर भी बिछो देने वाला न था। बहुत दिन से हृदय मन्दिर मे प्यार और कोमलता की एक ज्योतिर्मयी स्वर्णप्रतिमा को खोज मे भटक रहा था, स्वर्ण नहीं मिला, प्रतिमा भी नहीं मिली। यह मिली। उस समय वह एक खेड़ी का अनघड़ टुकड़ा था। मिट्टी और पत्थर से मिला हुआ, मैला और भदरंग। मैं उसे उठा लाया, सोचा क्या हर्ज है, स्वर्ण न सही-यही सही, इसी की प्रतिमा बना कर उस मन्दिर मे प्रतिष्ठित कर दूंगा। पर शीघ्र ही समझ गया---यह मूर्खता