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अहङ्कार


पर सो जाते थे। अपने पूर्व पुरुष के पापों का प्रायश्चित करने के लिए वह अपनी देह को भोग-विलास ही से दूर नहीं रखते थे, वरन उसकी इतनी रक्षा भी न करते थे जो वर्तमान काल में अनिवार्य्य समझी जाती है। उनका विश्वास था कि देह को जितना ही कष्ट दिया जाय, वह जितनी रुग्णावस्था में हो, उतनी ही आत्मा पवित्र होती है। उनके लिए कोढ़ और फोड़ों से उत्तम शृंगार की कोई वस्तु न थी।

इस तपोभूमि में कुछ लोग तो ध्यान और तप में जीवन को सफल करते थे, पर कुछ ऐसे लोग भी थे जो ताड़ की जटाओं को बट कर किसानों के लिए रस्सियां बनाते, या फ़स्ल के दिनों में कृषकों की सहायता करते थे। शहर के रहने वाले समझते थे कि यह चोरों और डाकुओं का गरोह है, यह सब अरब के लुटेरों से मिल कर क़ाफिलों को लूट लेते हैं। किन्तु यह भ्रम था। तपस्वी धन को तुच्छ समझते थे, आत्मोद्धार ही उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था। उनके तेज की ज्योति आकाश को भी आलोकित कर देती थी।

स्वर्ग के दूत युवकों या यात्रियों का वेष रख कर इन मठों में आते थे। इसी प्रकार राक्षस और दैत्य हवशियों या पशुओं का रूप धर कर इस धर्माश्रम में तपस्वियों को बहकाने के लिए विचरा करते थे। जब ये भक्तगण अपने अपने घड़े लेकर प्रातःकाल सागर की ओर पानी भरने जाते थे तो उन्हें राक्षसों और दैत्यों के पदचिन्ह दिखाई देते थे। यह धर्माश्रम वास्तव में एक समरक्षेत्र या जहाँ नित्य और विशेषतः रात को स्वर्ग और नरक, धर्म और अधर्म में भीषण संग्राम होता रहता था। तपस्वी लोग स्थर्गदूतों तथा ईश्वर की सहायता से व्रत, ध्यान और तप से-इन पिशाच-सेनाओं के आघातों का निवारण करते थे। कभी