पृष्ठ:आनन्द मठ.djvu/२६

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सातवां परिच्छेद


हवाले कर दो। यहां जीवानन्द ही रहें, तो यहांका सारा काम चला जा सकता है।"

भवानन्दने स्वीकार कर लिया। ब्रह्मचारी दूसरी तरफ चले गये।





सातवां परिच्छेद

चट्टीमें बैठे बैठे केवल सोच विचार करते रहनेसे कोई नतीजा न निकलेगा, यही सोचकर महेन्द्र वहांसे उठे। शहरमें जाकर सरकारी अमलोंकी सहायताले स्त्री कन्याका पता लगा लूंगा, यही सोचकर वे उधर ही चल पड़े। कुछ दूर चलकर उन्होंने देखा, कि बहुतसे सिपाही अनेक बैलगाड़ियोंको घेरे हुए चले जा रहे हैं।

१९७६ सालमें बंगाल प्रान्त अंगरेजोंके शासनाधिकारमें नहीं आया था। उस समयतक अंगरेजोंके हाथमें यहांकी दीवानी ही थी। ये लोग मालगुजारी वसूल करते थे सही; पर उस समयतक बंगालियोंके जानोमालके रक्षक नहीं बने थे। दिनों लगान वसूल करना तो अंगरेजोंके हाथमें था और प्रजाके प्राण और सम्पत्तिकी रक्षाका भार था पापी, नराधम, विश्वास घातकी और मनुष्य-कुल-कलंक मीरजाफरके हाथमें। पर मीरजाफर तो अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता था, सारे बंगालकी रक्षा वह क्या करता? मीरजाफ़र अफीम खाकर पिनक लिया करता और अँगरेज लोग रुपया वसूलकर विलायतको खरीतेलिख लिखकर भेजा करते। बंगाली मरे, चाहे आठ आठ आंसू रोया करें, इसको किसे चिन्ता थी!

अतएव बंगालकी मालगुजारी अँगरेजोंको ही देनी पड़ती थी; किन्तु शासनका भारं नवावपर था। जहां जहां अंगरेज