पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१०९

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Tश्रालग-कोर , भावतो रिदेस जिये भामिनि फवनि भाँति. ' भवन न भावे भ्रम भीत न सँभारिये। 'आलम' लगत नहीं पलनि सो पल पल, प्रलय समान पिय चिनु · पल टारिये। उमड़त जल रही न्यारी है डगरी भारी, .. डोलते डगन कहुँ कहो कहाँ डारिय। " हाथाहिं के लीजै ले के दीजे ब्रजनाथ हाथ, ऊधौ दोऊ अँखियाँ ले साथ दो सिधारिये ॥२६॥ - उद्धवका लौटना . . : . खीजै छगि जुगति - अछूनी .छाप प्रानपति, _____सरसी है पलक , पुनीत मेरी जासु है। 'आलम' उन्हें न परतीति और पेम बिनु, · पंसी विनु और कहूँ ठौर न पिसासु है। पतिया पठाई तुम यतिया. न वृझो उन, . । गति और नारि व्रज और भयो बासु है। यासर उसाँसनि सो श्रीसरौ न पायै पलु.. निस अँमुनि सो न नेफ हू उकासु' है ॥ २२० १-कामु छुट्टो, फुरसत ।