पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/१६०

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R [ ३५५ ] गुन पाये हैं झै त्रिभंगी हरि के किधी मैन यसन्तहि जोर परी सुरचाप गड़ी तड़ तेग तये कवि 'पालम' उत्तर दच्छिन में प्रगट्यो परिवार विपुन उते इत पछिम है विधु अर्ध धरी दिसि वारि चितै चित चक्रित द्वै जनु जुद्धत जोधनि खंगफरी [ ३५५ ] ते न सुन्यो जनकादि के द्वार पिनाक पस्यो जु सबै विरचे फयि 'पालम' थान थपे उथपे को रहै पलु के नर चैन रचें सार के साल उसालि धरे बुझि रावन देखि यह पर, चिंगुटी गुन चाहि टकोरत ही कर ले रघुयोर फरी किरचें [ ३५६ ] . कोसिला सासुसखी रघुवंसिनि केतक दूरि सबै सँग.पैयाँ ही अंध हारी ही हारी को मुनि के हरि नैन हिये जल लेयो 'यातम' नीर के गोय रही किये जानकी भूमि की ओर फवैवो घुघर से बन चे बर: रून तहाँ हु ते और कहाँ लगि जैवो [ ३५७. ] .टेक को मेरु अनेगनि दारिही दानय द्वार को दारुन हाथी पालम' कृल के मूल कुदारि हो मेटि कुमंत सुमंत को गाथी रायवराइ को दूत घली जिहि दुखन संडि के तारिका नाधी • अंगद नाम अभंग भुजायल बालि को घोलकु रामको साथी