पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/६

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प्रकाशक का निवेदन


पाठक वृन्द!

अनेक सुन्दर ग्रंथमालाओं के निकलते हुए भी मैंने यह 'प्राचीन कविमाला' निकालना आरंभ किया है, यह शायद मेरी अनभिज्ञता या धृष्टता ही कहलायेगी, पर क्या करूँ अपना २ शौक ही तो ठहरा। गुर्जरभाषाभाषी होने पर भी मुझे राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा का चाव लग गया है। ला॰ भगवानदीनजी की शुभ शिक्षा से प्राचीन कवियों का जितना कुछ महत्व समझ में आया है. उसीने मुझे इसकार्य की ओर प्रवृत्त किया है।

कई एक प्राचीन कवियों के वे ग्रंथ मैंने एकत्र कर लिये हैं जो प्रसिद्ध तो बहुत हैं, पर कहीं प्रकाशित नहीं हुए। उनका प्रकाशित होना मुझे आवश्यक जँचता है। मैंने बहुतों को यह कहते सुना है कि अमुक कवि की कविता है तो बहुत अच्छी पर खेद है कि प्रकाशित नहीं हुई। आलम की कविता भी उसी गणना में है। इसी कारण मैं इसी ग्रंथ से आरंभ करता हूं।