पृष्ठ:आलम-केलि.djvu/७

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यदि हिन्दी प्रेमियों ने इसे अपनाकर मेरा उत्साह बढ़ाया तो मनिराम, सेनापति, ठाकुर, पजनेश, अग्रदास, सूरदास, केशवदास और अन्य अनेक हिन्दी कवियों के अलभ्य ग्रंथों को सुन्दर सटिप्पन रूप से निकालने का साहस करूंगा।

हर्ष की बात है कि लब्धप्रतिष्ठ काठयानुरागी मेरे श्रद्धास्पद काव्यगुरु ला० भगवानदीन जी (दोन कवि) ने टिप्पनियाँ लिखने तथा संशोधन और संपादन का कार्य स्वीकार कर लिया है, अब मुझे बहुत कुछ आशा है कि इस माला के पुष्प अत्यन्त मनोहर होगे। मेरी प्रार्थना है कि कुछ काव्य प्रेमी सज्जन इस माला के स्थायी ग्राहक हो जाये, तो मेरो चिन्ता दूर हो जाय । स्थायी ग्राहकों का प्रवेश शुल्क केवल ) मात्र है। स्थायी ग्राहकों को सब पस्तके पौने दामपर मिल सकेंंगी। सज्जनों से यह भी निवेदन है कि यदि उनके पास कोई प्राचीन काव्य ग्रन्थ ऐसा हो जो अबतक प्रकाशित नहीं हुआ और जिसका प्रकाशित होना ये साहित्यदृष्टि से उत्तम समझते हैं, तो मुझे उसकी प्रतिलिपि देने की कृपा करें, मैं उसे प्रकाशित करने का उद्योग करूगा।

भवदीय
उमाशंकर मेहता