पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१०५

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सत्रहवा परिच्छेद।

मैं―तो कितने दिनों में लौटेंगे? यदि जल्दी फिरें तो, मुझे यहीं छोड़ जायं।

वे―ऐसा तो भरोसा नहीं है कि मैं जल्दी लौट सकूंगा, क्योंकि कलकत्ते हमलोग, कभी, ऐसाही संयोग हुआ तो.आते हैं।

मैं―अच्छा, आप जाइये, मैं आप का जाञ्जाल न हूंगी―(खुब रोते रोते यह बात मैंने कही) बस, मेरे कर्मों में जो बदा होगा सो होगा।

वे―किन्तु मैं तुम्हें देखे बिना पागल हो जाऊगा।

मैं―देखिये आप की विवाहिता स्त्री तो हूं नहीं?―(यह सुन प्राणप्यारे ज़रा कांप उठे)―सो आप के ऊपर मेरा ज़ोर क्या? इसलिये मुझे आप उस समय विदा―

किन्तु उन्होंने मुझे इस के आगे फिर न बोलने दिया और कहा, “आज अब इन बातों का कोई काम नहीं है। आज सोचें, फिर जो कुछ सोच साच कर ठीक करेंगे, उसका हाल कल कहेंगें।”

फिर उन्होंने तीसरे पहर आने के लिये रमण बाबू को एक चिट्ठी लिखी, उसने यही लिखा था कि कोई गुप्त बात है सो यहाँ आइये, बिना आयें नहीं कह सकते।

तीसरे पहर रमण बाबू आयें। उस समय मैं विवाह की आस खड़ी होकर सुनने लगी कि क्या क्या बातें होती हैं। मेरे प्राण पति ने कहा―“आप की वह रसोईदारिन―जो नौजवान थी―उस का नाम क्या है?”