पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/१२१

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उन्नीसवा परिच्छेद।

इक दिन वहीं रह कर तब फिर महेशपुर आऊंगा। किन्तु मैं हाथ जोड़ कर तुम से यही भीख मांगता हूं कि, “तुम चाहे इंदिरा हो, या कुमुदिनी हो, अथवा विद्याधरी हो, पर मुझे मत त्याग करना।

मैं―कभी नहीं। मैं अपने शाप से छुटकारा पाने पर भी भगवती की कृपा से फिर आप को पा सकूंगी। क्योंकि आप मेरे प्राण से भी बढ़ कर प्रिय हैं।

“यह बात तो डाकिनियों की सी नहीं है।” यह कह कर वे बाहर चले गये। वहां एक आदमी आये थे; आदमी और कोई न थे, खुद रमण बाबू थे। वे मेरे पति के साथ ज़वानख़ाने में आकर मुझे सील मुहर किया हुआ पुलिन्दा दे गये। और उन्हों ने उस पुलिन्दे के बारे में जो उपदेश मेरे पति को दिया था, मुझे भी वही उपदेश दिया। और अन्त में कहा―“सुभाषिणी से क्या कहूंगा?”

मैंने कहा―“कहियेगा कि कल मैं महेशपुर जाऊंगी और जाते ही शाप से छुटकारा पा जाऊंगी।”

मेरे पति ने कहा―“क्या आप लोग इन सारे रहस्यों को जानते हैं।”

इस पर चतुह रमण बाबू ने कहा―“मैं तो सब रहस्य नहीं जानता, किन्तु मेरी स्त्री सुभाषिणी सब जानती है।”

फिर बाहर जाकर मेरे प्राणनाथ ने रमण बाबू से पूछा―

“क्या आप डाकिनी, योगिनी, विद्याधरी आदि का होना मानते हैं?”

रमण बाबू कुछ रहस्यभेद जान गये थे, सोई बोले―