पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/२१

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चौथा परिच्छेद।

किये गई, मेरा मर जाना ही अच्छा था, केवल ये ही बातें मन में उद होने लगी और नीन्द न आहे।

सबेरे ज़रा सी नीन्द आ गई। फिर मैंने एक स्वप्न देखा―कि सामने अन्धकारमय यमराज की मूर्ति विकट दांतों को निपोर कर हंस रही है। बस यह देख फिर मैं न सोई। दूसरे दिन सबेरे उठ कर देखा कि मेरे आँखों में अत्यन्त पीड़ा होती है, पांव फूल गये हैं और बेठने की शक्ति नहीं है।

जब तक मेरे शरीर का दर्द न छूटा तब तक मुझे लाचार हो ब्राह्मण के घर रहना पड़ा। ब्राह्मण और उन की स्त्री मे भो मुझे आदरपूर्वक रक्खा किन्तु मैं ने महेशपुर जाने का कोई उपाय न देखा। कोई भी स्त्री पथ नहीं आरती थी, जो जानती थी सो जाना ही स्वीकार न करती थी। पुरुषों में अनेक लोग जाने के लिये स्वीकृत हुए, किन्तु उन लोगों के साथ अकेली जाने में मैं भय करने लगी। ब्राह्मण ने भी मना किया और कहा कि, “उन लोगों का चरित्र अच्छा नहीं है, इस लिये उन के संग न जाओ। उस का क्या मतलब है सो जान नहीं पड़ता और मैं कुलीन हो कर तुम्हारे ऐसी सुन्दरी स्त्री को अनजाने पुरुष के संग कहीं भी नहीं भेज सकता।" बस इन की बातें सुन कर मैं रुक गई।

एक दिन मैंने सुना कि इस ग्रास के कृष्णदास बसु नामक एक भले आदमी सपरिवार कलकत्ते जायंगे। यह सुन कर मैं ने इस सुयोग को उत्तम जाना। यद्यपि कलकत्ते से मेरा पीहर(मैका) और ससुराल बहुत दूर है। किन्तु वहाँ पर मेरे जाति के चाचा जीविका के कारण रहते थे। मैं ने सोचा कि कलकत्ते जाने