पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/३०

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इन्दिरा।

मैं एक कोठरी में जा कोने में पड़ कर रोने लगी। सन्ध्या होने से कुछ देर पहिले बाबू कृष्णदास की स्त्री ने मुझे पुकारा। मैं बाहर आ कर उन के पास गई। उन्हों ने कहा,―“यह सुबो आई है, तुम यदि इसके यहां लौंडी का काम करना चाहो तो मैं इस से कह दूँ।”

दासी न बनूंगी, बिना खाये मर जाऊंगी, यह तो पहिले ही से सोच चुकी हूं;―किन्तु यह बात इस समय की नहीं है―इस समय सुबो को एक बार देख लिया। “सुबो” सुन कर मैंने सोचा था कि “साहब सुबो” के मेल को कोई चीज़ होगी, क्यों कि मैं ता गांव गंवई की लड़की थी न! किन्तु देखा कि सो बात नहीं है―यह तो एक स्त्री है-देखने लायक सामग्री है। बहुत दिनों से ऐसो अच्छा बोज नहीं देखी थी, वह मेरे ही बराबर की रही होगी। उस का रंग मुझ से अधिक साफ़ न था, सिंगार पटार भी कुछ अधिक न था, केवल कानों में कई बालियां, हाथों में कड़े,गले में चीक(गहना विशेष) और तन पर एक काले किनारे की साड़ी भर थी, इसी लिये वह देखने योग्य सामग्री है। ऐसा मुख मैंने नहीं देखा था, आनो कमल खिल रहा है और चारों ओर नागिन सो घुंधघराल महकों ने फन उठा कर उस मुख दम को घेर रक्खा है। बहुत बड़े नेन हैं―जो कभी स्थिर ओर कभी हास्यमय दीखते हैं। दो अवरोष्ठ पतले पतले लाल फूल को जलती हुई बत्ती के समान शोभामय हैं। मुखड़ा छोटा―बस सब मिला कर मानों एक खिला हुआ फूल है। गढ़न इस को ली थी, इसे न जांच की! आम के पेड़ की वह डाल,जिस में