पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/६

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इंदिरा

और घर पर रुपये भेजने लगे, किन्तु सात आठ वर्ष तक न घर आये, न उन्हों ने मेरी कोई खबर ली। मारे क्रोध मेरा शरीर थर्राने लगता। कितने रूपये चाहियें? अपने माता पिता के ऊपर मुझे बड़ी झूझलाहट आती -- क्योंकि उन्हीं निगोड़े ने रुपये उपार्जन की बात उठाई थी। रुपया क्या मेरे सुख की अपेक्षा भी बढ़ कर है? मेरे बाप के घर बहुत रुपये थे--मैं रुपये लेकर पानी में "कश्ती" खेलती और मन ही मन कहती कि एक दिन रुपयों को बिछा, सो कर देखूंगी कि इस में कौन सा सुख है? एक दिन मैंने माँ से कहा कि, "माँ! मैं रुपये बिछा कर सोऊंगी यह सुन माँ ने कहा, "पगली कहीं की!" माँ ने मेरी बाते समझी और क्या झल बल किया सो मैं कह नहीं सकती, किन्तु जिस समय का इतिहास मैं प्रारम्भ करती हूँ उस के कुछ दिन पहिले मेरे पति घर आये। हल्ला मचा कि वे कमिसेरेयेट। कर्म-सोरयेटहीन?) का काम करके अतुल ऐश्वर्य के अधिपति हो कर आये हैं। मेरे ससुर ने मेरे पिता जी को शिख भेजा कि, "आपके के आशीर्वाद से उपेन्द्र ( मेरे स्वामी का नाम उपेन्द्र है --- उन का नाम मैंने लिया, इस से प्राचीनागण मुझे क्षमा करें: क्योंकि आजकल की "नई" आईन के अनुसार उन्हें 'मेरे उपेन्द्र कह कर पुकारना उचित है}-- बहू के प्रतिपालन करने में समर्थ हुआ है पालक कार भेजे जाते हैं बहू जो यहाँ भेज दीजियेगा। नहीं तो आज्ञा दीजिये कि पुत्र के दुसरे विवाह का प्रबन्ध करें।"

पिता ने देखा कि ये नये धनी (अमीर हैं। पालकी के