पृष्ठ:इन्दिरा.djvu/७४

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इन्दिरा।

तुम्हारे रुपये मैं फेक दिया चाहती थी, भन्झनाहट होने पर एक बखेड़ा उठ खड़ा होता, इसी से मैंने धीरे से यहीं रख दिया―उठा लो,―और ऐसी निकम्मी बातें कभी मुंह से न निकालो।”

यह सुन मैंने रो दिया। एक हारानी ही विश्वासी दासी थी, और टहलानियों का विश्वास न था, तो फिर किस को धरती? मेरे रोज का असली भेद हारानी नहीं जानती थी, तो भी उसे दया आई, उसने कहा―“रोते क्यों हो? क्या ये बाबू चीन्हें आदमी तो नहीं है?”

तक एक बार मैंने मन में विचारा कि हारानी से सब बात खोल कर कह दूं, किन्तु फिर सोचा कि शायद यह इतना विश्वालन करेगी और उपद्रव खड़ा कर देगी। यही सब सोच विचार कर मैंने स्थिर किया कि, ‘सुभाषिणी के अतिरिक्त इस समय मेरी दूसरी गति नहीं है। क्योंकि इस समय वही मेरी बुद्धि और वही मेरी रक्षा करनेवाली है तो उसी से सब हाल खुलासे कह कर सलाह करूं। यह सोच कर मैंने हारानी से कहा― “हाँ, चीन्ह पहिचान के आदमी हैं―खूब पहिचाने हुए हैं―और सारी राम कहानी सुन कर तू विश्वास न करेगी, इसी से तुझ से सब बात खोल कर नहीं कही। पर इतना तू जान रख कि काई बुराई की बात नहीं है।”

“कोई की बात नहीं है। ”इतना कह कर मैं ने ज़रा विचार किया कि मेरे लिये कोई बुराई की बात नहीं है, पर हारानी के लिये? हां! उस के लिये बुराई है, तो फिर उसे कीचड़ में क्यो