पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/११२

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
( ९५)

के मानी और अत्याचारी राजाओ के लिए बतलागया है कि प्रजा की प्राह के सामने जालिम राजा का पत्थर सा कठोर पल भी बर्फ की नाई पिघल जाता है, चट्टान सा भी अटल और अचल राज्य मिट्टी की ढाय के समान पहले के बेग से जाता है :--

गर तू राजा है तो गजापन को सीख--
जर तू योद्धा है तो योद्धापन को देख।।
देखता है क्या सुझ अमिमान से-
पहले अपने पापवाले मन को देख ।।

वाणा०--लड़के, तू यह नहीं जानता कि तू मेरा चोर है। तुझ सजा देना मेरा धर्म है । तुझे मेरे महल में घुसने का क्या अधिकार था ?

अनि०--वही अधिकार जोकि सूर्य के प्रतिविम्ल को जल के प्रत्येक घड़े में होता है, वही अधिकार जो कि हवा के मोके को प्रत्येक खुली हुई खिड़की के मार्ग में होता है।

बाणा--इसका स्पष्ट अर्थ ?

अनि०--मैं नही बता सकता, तेरी पुत्री बतायगी :--

शुद्ध प्रेम के भाव को क्या समझेगा नीच ।
गङ्गारज की शानाको, पहुंच न सकती क्रीच !

वाणा०-- तो क्या मैं कीच हू? अगर मैं कीच हूँ तो ऊषा कौन है?

अनि०--कीच में उत्पन्न होनेवाली कमिलिनी :--