पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/२०

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(३)

जो सोते हैं उन्हें अपने मधुर स्वर से जगायेंगे।
विरोधों को मिटाकर, प्रेम की वंशी बजायेंगे॥

नटी––तो आज के नाटक का प्रारम्भ कल्पना ही से होगा या किसी इतिहास अथवा पुराण से?

नट––हमारे महर्षियों ने अपने पवित्र ग्रन्थों में कोई बात नहीं छोड़ी है। शिव और विष्णु भक्तों के चरित्र अक्सर पुराणों में पाये जाते हैं। तुम जिसे कहो उसे करके दिखायें।

नटी––मेरे विचार से तो शिव के भक्त शोणितपुर-पति वाणासुर और भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के पौत्र श्री अनिरुद्ध कुमार का चरित्र दिखाइये।

नट––तो यह कहो न कि "ऊषा अनिरुद्ध" का नाटक रचाइये!

नटी––हां, इसी विचारको काममें लाइये। एक ओर प्रेमसागर में अपने दर्शकों को नहलाइये और दूसरी ओर सम्प्रदाय के झगड़ों की बुराइयां बताकर, ऐक्य और संगठन के झंडे के नीचे अपने देश और अपनी जाति को लाइये:––

उसी देश को मिलता मान, धर्म कर्म जिसका बलवान।
हम अनेक हैं एक समान, घर घर होता हो यह गान॥

 

बाहर वाले जानलें, घर वालों की टेक।
बाहरवालों के लिये, घर वाले सब एक॥