पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/७५

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
( ५८ )

चिलम पियारी है रतनारी, मुक्ति दिलावनहारी ।
पीतेहैं जो इसे औलिया, उनकी उमर हजारी ।।

लेना हो विश्वनाथ, मुंडमालधारी, खबर हमारी।

भोला०--भाई गौरी गिरि, सुना है कि कृष्णदास नामक किसी वैष्णव ने सगठन बनाया है। अब एक छड़ी हानि हुई । हम तुम जो जहाँ तहां झगड़े रठाकर वैषको को शेष बना लेतेथे, उसमें बाधा आगई।

गौरी०--अरे क्या वाधा आगई। हम तो शंकर-पंथी हैं। शोध आजायगा तो सारे ससार का संहार करडालेगे। हमने तो सुना है कि पुगने खयाल के वैष्णव इन संगठन पंथी वैष्णवों की बात नहीं मानते।

भोला०--हाँ, माई अथी तो वह लोग इनकी बात नहीं मानते पर गानने लाजायेगे। मैंने सोचा है, इससे पहले चिलम भवानी की सेवा कर के जहाँ तहाँ खून झगड़ा उठाया जाय और वैष्णवों के बालक बालिकाओं को भगाया जाय । जो प्रसन्नता पूर्वक शेष न हो उसे जबरदस्ती शेष बनायाजाय ।

गौरी०--किस तरह बनाया जाय ।

भोला०--चिलम पिलाके बनाया जाय । कंठी तोड़ कर बनाया जाय।

गौरी०--अरे यार मेग तो यह मत है कि :--

वैष्णव हो या शैव हो, नहीं किसी की शर्म ।
मालपुश्रा मिलता जहां, वहीं हमारा धर्म ।।