पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/७८

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
(६१)

गौरी०--देखना है तेरे अवतार को, तू नहीं मानेगा?

गङ्गाराम--हर्गिज नहीं।

गौरी०--मार डाला जायगा।

गङ्गाराम--पर्वाह नहीं।

आयेगा किस काम यह देह अन्म और प्रान।
नवजीवन है--धर्मपर, हो जाना बलिदान।।

भोला०--पकड़लो।

गङ्गाराम--खबरदार।

गौरी०--तेरा यहाँ कौन मददगार है।

गङ्गाराम--वह विष्णु, जो सारी सृष्टि का रचनहार है।

भोला०--अच्छा तो इसके विष्णु को देखना है। भैया गौरीगिरि, फाड़ो इसके मुंह को। ठूंंसो इसमें चिलम।

कृष्णदास--(मेपथ्य मे) ठहरो खबरदार!

भोला०--अरे वैष्णव दल आरहा है। जल्दी से इसकी कंठी तोड़ो।

गङ्गाराम--अरे बचाओ, बचाओ, मुझे इन धूतों से बचाओ।

कृष्ण--बेटा न घपराओ।

भोला०--भागो भैया, गौरीगिरि, यहाँ हम तुम दो ही हैं, उधरसे चारभादमी आरहे हैं। फिर कभी निबट लेंगे। जबरदस्ती किसी का धर्म बदलने में भी गुनाह है। (दोनों का जाना)

[कृष्णदास और महन्त माधोदास का पाना]

कृष्ण०--बेटा तुम कौन हो।

गाङ्गा०--एक पतित वैष्णव।

कृष्ण०--प्रतित? पतित कैसे?