पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/८

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भूमिका

प्राचीन समय से भारतवासी नाटक लिखने और देखने के प्रेमी रहे हैं। उन्होंने नाट्यशास्त्र में जो ख्याति प्राप्त की वह किसी से छिपी नहीं है। भरतमुनि नाटकशास्त्र के पिता माने जाते हैं, परन्तु संस्कृत का सबसे पहला नाटक भासमुनि ने लिखा। कालिदास और भवभूति ने काव्य और नाटक में जो उन्नति करके दिखाई, उसके सामने युरोप के बड़े २ नाट्यकार भी सर झुकाते हैं। जर्मनी का प्रसिद्ध कवि गेटे 'शकुन्तला' पर इतना मुग्ध था, कि उसने स्वयम् शकुन्तला के कुछ अंशों का छन्दोबद्ध अनुवाद किया। युरोप के कुछ नाट्यकारों ने कालिदास की रचना की इतनी प्रशंसा की कि उसके सामने वे चरित्र चित्रण और उच्चभाव प्रदर्शन में शेक्सपियर की रचना को भी हेच समझने लगे।

मुसलमानों के शासनारम्भ से संस्कृत भाषा की अवनति का काल शुरू हुआ। धीरे २ संस्कृत नाटकों की रचना बंद सी हो गयी। अरब और फ़ारिस के लोग नाटक के नाम से घृणा करते थे, इसलिए मुग़ल शासनकाल में भारत की किसी भाषा में नाटक न लिखे गये। हां, अंग्रेज़ों के हिन्दुस्तान में आने के समय से बङ्गभाषा ने विशेषोन्नति की और उसके पुजारियों में माननीय द्विजेन्द्र लाल राय जैसे अद्वितीय नाट्यकार हुए। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत की किसी अन्य भाषा में द्विजेन्द्र बाबू की प्रतिभाशाली रचना का उदाहरण न दिया। उर्दूभाषा तो अङ्गरेज़ी के अनुवाद और लौकिक प्रेम के छोटे मोटे गंदे ड्रामों से सन्तुष्ट रही। उस समय की जनता के लिये उत्तम मानसिक खाद्य न मिल सका। इसलिए उसकी रुचि गिरती ही गयी। इधर देवनागरी में संस्कृत के उत्तमो-