पृष्ठ:ऊषा-अनिरुद्ध.djvu/८८

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
(७१)

प्रेम के इस खेल में मैं इस बाला से आगे निकल जाऊँगा, परन्तु ऐसा नहीं हुआ, यही मुझसे आगे निकल गई ।

ऊषा०--(स्वगत) मुझे ऐसा प्रतीत होरहा है कि मैं एक रूपसुधा का पाम कर रही हूं । सोमरस के पीने से जैसे मनुष्य के दिल में ताजगी और एक नई ताकत सी भातो है, उसी प्रकार यह देह मतवाली सी होती जाती है ।

अनि०--देवी।

ऊषा०--देवता

भनि०--मैं तुम्हाग होगया ।

उषा०-और मैं तुम्हारी होगई, ।

चित्र०--प्यारी प्यारा होगई, और प्यारा प्यारी होगई।

देखो, बादल उमड़ने लगे, बिजली चमकने लगी, पपीहो की पिठ घिउ और कोयलियों की कूकू मजबूर करती है कि प्रिया और प्रियतम इस समय प्रथम मिलन के सिलसिले मे मूले पर झूलने के लिये विराज जायें और हम सब सखियां प्रेम पूर्वक मुलाये। अरी, माधुरी, सरस्वती, मनोरमा और प्रभा, तुम सब कहा चली गई ? माओ, प्यारी और प्यारे को मुलायो ।

(ऊषा-अनिरुद्ध झले म बठजात ह चित्रलेखा झुलाती है)

सब सखियाँ-

गाना

झूलाओ सब सखियाँ प्यारी को झूला झुलाओ। झूम झूम, मुक झपट, झकाझक झक मार झोक झुकाओ । सांग सुन्दर सलोने सुरों से सावन सुहावन सुनायो।

(बामामुर का प्राना)