पृष्ठ:कर्बला.djvu/११८

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कर्बला

मु॰---साद, तुमको मालूम है कि तुम मेरे कराबतमन्द हो?

साद॰---मालूम है।

मु॰---मैं तुमसे कुछ वसीयत करना चाहता हूँ।

साद॰---शौक़ से करो।

मु॰---मैंने यहाँ कई आदमियों से क़र्ज़ लेकर अपनी ज़रूरतों पर खर्च किया था। इस काग़ज़ पर उनके नाम और रक़में दर्ज हैं। तुम मेरा घोडा और मेरे हथियार बेचकर यह कर्ज़ अदा कर देना, वरना हिसाब के दिन मुझे इन आदमियों से शर्मिन्दा होना होगा।

साद॰---इसका इतमीनान रखिए।

मु॰---मेरी लाश को दफ़न करा देना।

साद॰---यह मेरे इमकान में नहीं है।

[ जल्लाद आकर मुस्लिम को ले जाता है। ]

अश॰---या अमीर, मुस्लिम क़त्ल हुए। अब बग़ावत का कोई अन्देशा नहीं। अब आप हानी की जानबख़्शी कीजिए।

ज़ियाद---कलाम पाक की क़सम, अगर मेरी नजात भी होती हो, तो हानी को नहीं छोड़ सकता।

अश॰---लोग बिगड़ खड़े हों, तो?

ज़ियाद॰---जब क़ौम के सरदार मेरे तरफ़दार हैं, तो रियाया की तरफ़ से कोई अन्देशा नहीं। ( जल्लाद को बुलाकर ) तूने मुस्लिम को क़त्ल किया?

जल्लाद---अमीर के हुक्म की तामील हो गयी। ख़ुदावन्द किसी को इतनी दिलेरी से जान देते नहीं देखा। पहले नमाज़ पढ़ी, तब मुझसे मुस्किराकर कहा---'तू अपना काम कर'।

ज़ियाद---तूने उसे नमाज़ क्यों पढ़ने दिया? किसके हुक्म से?

जल्लाद॰---ग़रीबपरवर, आखिर नमाज़ के रोकने का अज़ाब जल्लादों के लिए भी भारी है, जिस्म को सिर से अलग कर देना इतना बड़ा गुनाह नहीं है, जितना किसी को ख़ुदा की इबादत से रोकना।

ज़ियाद---चुप रह नामाक़ूल। तू क्या जानता है, किसको क्या सज़ा