पृष्ठ:कर्मभूमि.pdf/३७४

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करके एक दूसरे का दुश्मन बना दिया है। तेग़मुहम्मद रोज़ा नमाज का पाबन्द, दीनदार मुसलमान था। मजहब की तौहीन क्योंकर बरदाश्त करता। उधर तो अहिराने में पुलिस और अहीरों में लाठियां चल रही थीं, इधर इन दोनों में हाथा-पाई की नौबत आ गयी। कसाई पहलवान था। सलीम भी ठोकर चलाने और घूंसेबाजी में मँजा हुआ, फुरतीला, चुस्त। पहलवान उसे अपनी पकड़ में लाकर दबोच बैठना चाहते थे। वह ठोकर पर ठोकर जमा रहा था। ताबड़ तोड़ ठोकरें पड़ीं, तो पहलवान साहब गिर पड़े और लगे मातृभाषा में अपने मनोविकारों को प्रकट करने। उसके दोनों साथियों ने पहले दूर ही से तमाशा देखना उचित समझा था; लेकिन जब तेग़ मुहम्मद गिर पड़ा, तो दोनों कसकर पिल पड़े। यह दोनों अभी जवान पट्ठे थे, तेज़ी और चुस्ती में सलीम के बराबर। सलीम पीछे हटता जाता था और यह दोनों उसे ठेलते जाते थे। उसी वक्त सलोनी लाठी टेकती हुई अपनी गाय खोजने आ रही थी। पुलिस उसे उसके द्वार से खोल लायी थी। यहाँ यह संग्राम छिड़ा देखकर उसने अंचल सिर से उतार कर कमर में बाँधा और लाठी सँभालकर पीछे से दोनों कसाइयों को पीटने लगी। उनमें से एक ने पीछे फिरकर बुढ़िया को इतने ज़ोर से धक्का दिया कि वह तीन-चार हाथ पर जा गिरी। इतनी देर में सलीम ने घात पाकर सामने के जवान को ऐसा घूंसा दिया कि उसकी नाक से खून जारी हो गया और वह सिर पकड़ कर बैठ गया। अब केवल एक आदमी और रह गया। उसने अपने दो योद्धाओं की यह गति देखी, तो पुलिसवालों से फरियाद करने भागा। तेग़मुहम्मद की दोनों घुटनियाँ बेकार हो गयी थीं। उठ ही न सकता था। मैदान खाली देख कर सलीम ने लपककर मवेशियों की रस्सियां खोल दी और तालियां बजा-बजा कर उन्हें भगा दिया। बेचारे जानवर सहमे खड़े थे, आनेवाली विपत्ति का उन्हें कुछ आभास हो रहा था। रस्सी खुली तो सब पूंछ उठा-उठा कर भागे और हार की तरफ़ निकल गये।

उसी वक्त आत्मानन्द बदहवास दौड़े आये और बोले--आप ज़रा अपना रिवालवर तो मझे दीजिए।

सलीम ने हक्का-बक्का होकर पूछा--क्या माजरा है, कुछ कहो तो?

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कर्मभूमी