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कलम, तलवार और त्याग
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की शोभा थे तो बीरबल भी अकबर के राज-मुकुट का एक अमूल्य रत्न था। यही वह वस्तु थी जिसने राजपूतों और ब्राह्मणों को राज्य का इतना शुभचिन्तक बना दिया था कि उन्हें अपने बाग़ी देशवासियों और सधर्मियों के मुकाबले लड़ने और जान देने में भी आगा-पीछा न होता था।

जान पड़ता है कि अकबर को रात-दिन यही चिन्ता रहती थी, कि किसी तरह भारत की विभिन्न जातियों-संप्रदायों को एक में मिलाकर शक्तिशाली स्वदेशी राज्य की स्थापना करे। इसी लिए उसने पुराने राजपूत घरानों से नाता जोड़ने की रीति चलाई, जिसमें राजकुल को वे गैर की जगह अपनी समझने लगें। इसी उद्देश्य से सन २३ जुल्स में फतहपुर सीकरी के 'इबादतखाने’% (उपासनागृह) में इन धार्मिक शास्त्रार्थों की योजना की जिनमें प्रत्येक जाति तथा धर्म के विद्वान् सम्मिलित होते थे और बिना किसी भय संकोच के अपने- अपने धर्म के तत्वों की व्याख्या करते थे। इन्ही शास्त्रार्थों और ज्ञान- चर्चाओं का यह फल हुआ कि अकबर जो बिल्कुल अनपढ़ था, विचारों की उस ऊँचाई पर पहुँच गया जो केवल दार्शनिकों के लिए सुलभ हैं, और जहाँ से सभी धर्मों के सिद्धान्त आध्यात्मिकता का रंग लिये हुए आते हैं। इनका एक बड़ा लाभ यह भी हुआ कि जो लोग इनमें सम्मिलित होते थे उनकी दृष्टि अधिक व्यापक हो जाने से धर्मगत संकीर्णता और कट्टरपन अपने आप घट गया। उस काल में इसलाम धर्म की भी शताब्दियौ की गतानुगतिकता और धर्माचार्यों के

  • एलफिंस्टन, ब्राकमैन आदि अंग्रेज़ इतिहासिक में इस सम्मेलन में बहुत

महत्व दिया है। पर वस्तुतः यह कोई नई बात न थी। चारों आरम्भिक कालोफो़ के अतिरिक्ष इमैया और अब्बासौ भर्ती के अली को भी कार्मिक विषय में नेतृत्व इमाम को पद सर्वे-स्वीकृत भी। इस प्रकार से मैं तुर्की मैं शैकुल इसलाम। तक मुजतहिद (धर्माध्यक्ष) का दरजा रखते हैं और शीया लोगों में ऐसा कोई उस समय नहीं होती और दो-चार मुजतहिद मौजूद न हों।