पृष्ठ:कलम, तलवार और त्याग.pdf/९२

विकिस्रोत से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
९१ ]
राजा मानसिंह
 


लिया था कि यह बेल मुँढे चढ़ने की नहीं। इस प्रकार राज्य कभी स्थिर न रह सकेगा, जब तक की एक ऐसा नगर ने बसाया जाय जो दरियाई हमलों से सुरक्षित हो और ऐसे केन्द्रीय स्थान पर स्थित हो जहाँ से चारों ओर आसानी से कुमक भेजी जा सके। अन्त को बड़े बहस-मुबहसे, सलाह-मश्विरे के बाद अकबर-नगर की नींव डाली गई। मानो जंगल में मंगल हो गया। कुछ ही वर्षों में नगर में ऐसी शोभा और चहल-पहल हो गई कि इन्द्रजाल-सा मालूम होने लगा। यह नगर आज राजमहल के नाम से प्रसिद्ध है और जब तक धारा- धाम पर बना रहेगा, अपने संस्थापक का नाम उजागर करती रहेगी। इस नगर के बीचो-बीच एक सुदृढ़ दुर्ग निर्माण कराया गया और 'पठानो को फिर सिर उठाने का साहस न हुआ। राजा ने चार ही पाँच साल के प्रयत्न और परिश्रम से सारे बंगाल से अकबर के चरणों पर माथा टेकवा दिया। खाॅजमा, खानखाना, राजा टोडरमल जैसे यशस्वी व्यक्तियों ने बंगाल पर जादू फेंके, पर वहाँ अधिकार जमाने में असफल रहे। ऐतिहासिकों ने इस गौरव का अधिकारी मानसिंह को ही माना हैं। इन सूबो में नवयुवक जगतसिंह ने भी मरदानगी के खूब जौहर दिखाये और सन् १५९८ ई० में पंजाब के पहाड़ी इलाके की सूबेदारी से सम्मानित किया गया। पर यह साल मानसिंह के लिए बड़ा ही मनहूस था। उसके दो बेटे ठीक चढ़ती जवानी में, जब जीवन के सुखों के उपभोग के दिन आ रहे थे, काल के ग्रास बने और बाप की आशाओं की कमर तोड़ गये।

पर राजा संभवतः उन संपूर्ण सुखों का उपभोग कर चुका था जो विधाता ने उसके भाग्य-लेख में लिख रखे थे। इन महाशोकों के दो ही साल बाद उसके हृदय पर ऐसा घाव बैठा कि उबर न सका।

मेवाड़ का राणा अभी तक अकबरी दरबार में हाजिरी लगाने वालों की श्रेणी में न आया था, और अकबर के दिल में लगी हुई थी कि उसे अधीनता का जुआ पहनाये। अभी तक जितनी सेनाएँ इस मुहिम पर गई थीं सब विफल लौटी थीं। अबकी बार बहुत बड़े