हिरदे जिनके हरि बसे से जन कहियहि सूर।
कही न आई नानका पूरि रह्या भरपूर॥६॥
मन की दुविधा ना मिटै मुक्ति कहाँ ते होइ।
कउड़ी बदले नानका जन्म चल्या नर खोइ॥७॥
जित बेले अमृत बसे, जीयाँ होवे दाति।
तिन बेले तू उठि बहु चिह पहरे पिछली राति॥८॥
इस दम दा मैनूँ कीबे भरोसा
आया आया न आया न आया॥
या संसार रैन दा सुपना
कहिं दीखा कहिं नाहिं दिखाया॥
सोच विचार करे मत मन में
जिसने ढूँढ़ा उसने पाया॥
नानक भक्तन के पद परसे
निस दिन, रामचरन चित लाया॥९॥
सय कछु जीवत को व्योहार।
मात पिता भाई सुत बांधव अरु पुन गृह की नार॥
तन तें प्रान होत जब न्यारे देरत प्रत पुकार॥
आध घरी कोऊ नहि राखै घर तें देते निकार॥
मृग तृस्ना ज्यों जग रचना यह देखो दै विचार॥
कछु नानक भज राम नाम नित जातें हो उधार॥१०॥
मन की मनहीं माहिं रही
ना हरि भजे न तीरथ सेये चोटी काल गही॥
दारा मीत पूत रथ संपत्ति धन जन पूर्न मही॥
और सकल मिथ्या यह जानो भजना राम सही॥
फिरत फिरत बहुते जुग हास्यो मानस देह लही।
नानक कहत मिलन की बिरियाँ सुमिरत कहा नहीं॥११॥