जो नर दुख में दुख नहिँ माने॥
सुख सनेह भरु भय नहिँ जाके कंचन माटी जानै॥
नहि निन्दा नहिँ अस्तुति जाके लोभ मोह अभिमाना॥
हर्ष शोक तें रहे नियारी नाहिँ मान अपमाना॥
आसा मनसा सकल त्यागि कै जगते रहे निरासा॥
काम क्रोध जेहि परसै नाहिन तेहिँ घट ब्रह्म निवासा॥
गुरु किरपा जेहि नर पै कीन्ही तिन यह जुगति पिछानी॥
नानक लीन भयौ गोविन्द सों ज्यों पानी सँग पानी॥१२॥
रे मन कौन गत होइ है तेरी।
गहि जग में रामनाम सो तो नहिँ सुन्यो कान।
विषयन सों अति लुभान मति नाहिन फेरी॥
मानस को जनम लीन्ह सिमरन नहिँ निमिष कीन्ह।
दारा सुत भयो दीन पगहुं परी बेरी॥
बानक जन कह पुकार सुपने ज्यों जग पसार।
सिमरत नहिँ क्यों मुरार माया जाकी चेरी॥१३॥
सूरदास
सूरदास का जन्म अनुमान से १५४० वि॰ में और मरण १६२० वि॰ में कहा जाता है। उन्होंने ६७ वर्ष की अवस्था में 'सूरसारावली' लिखी। सूरदास का सब से बड़ा ग्रंथ 'सुरसागर' है, 'सूरसारावली' उसी की सूची है, जो सूरसागर के बनने के बाद बनी है। सूरसारावली में लिखा है—
"गुरू प्रसाद होत यह दरसन, सरसठि बरस प्रवीन।
शिव विधान तप करेउ बहुत दिन, तऊ पार नहिँ लीन॥