देखहि भूप महा रनधीर मनहुँ वीर रस धरे शरीरा
डरे कुटिल नृप प्रभुहि। निहारी मनहुँ भयानक मूरति भारी
रहे असुर छल छेनिष बेखा तिन प्रभु प्रकट कालसम देखा
पुरवासिन देखे दाउ भाई नरभूषन लोचन सुखदाई
नारि विलोकहि हरषि हिय निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत शृंगार धरि मूरति परम अनूप॥
विदुषन प्रभु विराटमय दीसा बहुमुख-कर- पग-लोचन सीसा
जनक जाति अवलोकाहि कैसे सजन सगे प्रिय लागहिं जैसे
सहित विदेह विलोकहि रानी सिसुसमप्रीति न जाइ बखानी
जोगिन्ह परम तत्त्व-मय भासा सांत सुद्ध-सम सहज प्रकासा
हरि भगतन देखे दोउ भ्राता इष्ट देव इव सब सुख दाता
रामहि चितव भाव जेहि सोया सो सनेह मुख नहि कथनीया
उर अनुभवति न कहिसकसाँऊ कवन प्रकार कहइ कवि कोऊ
जेहिविधि रहा जाहि जस भाऊ तेहि तस देखेउ कोसलराऊ
राजत राज समाज महं कोसल राज किसोर।
सुन्दर-स्यामल-गौर-तनु विस्व-विलोचन चोर॥
सहज मनोहर मूरति दोऊ कोटि काम उपमा लघु सोऊ
सरद-चंद-निदक मुख नीके नीरजनयन भावते जीके
चितवनि चारु मार-मद हरनी भावत हृदय जात नहि बरनी
कल कपोल स्रुतिकुंडल लीला चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला
कुमुद-बंधु कर निंदक हासा भृकुटी विकट मनोहर नासा
भाल बिलाल तिलक झलकाही कचबिलो किअलिअवलिलजाहीं
पीत चैतनी सिरन्ह सुहाई कुसुमकली बिच बीच बनाई
रेखा रुचिर कंबु कल ग्रीवाँ जनु त्रिभुवन सोभा की सीवाँ
कुंजर-मनि-कंठा कलित उरन्ह तुलसिका माल।
वृषभकंध केहरि उवनि बलनिधि बाहु बिसाल॥