सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:कविता-कौमुदी 1.pdf/१५२

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
तुलसीदास
९७
 

नृप सब नखत करहिं उजियारी टारि न सकहिं चाप तम भारी
कमल कोक मधुकर खग नाना हरषे सकल निसा अवसाना
ऐसहि प्रभु सब भगत तुम्हारे होइहहिं टूटे धनुष सुखारे
उदयभानु बिनुश्रम तम नासा दुरे नखत जग तेज प्रकासा
रवि निज उदय व्याज रघुराया प्रभु प्रताप सब नृपन्ह दिखाया
तब पुजबल महिमा उदघाटी प्रकटी धनु विघटन परिपाटी
बन्धु बचन सुनि प्रभु मुसकाने होइ शुचि सहज पुनीत नहाने
नित्य क्रिया करि गुरु पहं आये चरन सरोज सुभग सिरनाये
सतानन्द तब जनक बुलाये कौशिक मुनि पंह तुरत पठाये
जनक विनय तिन आनि सुनाई हर्षें बोलि लिये दोउ भाई

शतानन्द पद बन्दि प्रभु बैठे गुरु पहँ जाइ।
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बुलाइ॥

सीय स्वयम्बर देखिय जाई ईस काहि धौ दइ बड़ाई
लषन कहा यश भाजन साई नाथ कृपा तब जा पर हाई
हर्षें सुनि सब मुनि बर बानी दीन्ह असीस सर्वाह सुखमानी
पुनि मुनि वृन्द समेत कृपाला दखन चले धनुष मखशाला
रङ्ग-भूमि आये दाउ भाई अस सुधि सव पुरवासिन पाई
चले सकल गृह काज बिसारी बालक युवा जरठ नर नारी
देखी जनक भीर भइ भारी सुचि सेवक सब लिये हंकारी
तुरत सकल लोगन यह जाहू आसन उचित दहु सब काहू

काहे मृदु बचन बिनीतातिन बेठार नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥

राजकुँवर तेहि अवसर आये मैहुँ मनोहरता तन छाये
गुन सागर नागर बर बीरा सुन्दर श्यामल गौर शरीरा
राज समाज बिराजत रूरें उड़ गन मह जनु युग विधु पूरे
जिनकै रही भावना जैसा प्रभु मूरति तिन दखी तैसी